सोमवार, 3 जनवरी 2011

नम्रता और ध्यान

टा्रध्यान टिकाने की कला बहुत से लोग सीखना चाहते हैं, परंतु अलग-अलग कारणों से। कुछ लोग शांति पाने के लिए इसे सीखना चाहते हैं तो कुछ लोग शारीरिक स्वास्थ्य में लाभ के लिए। कुछ लोग इसका अभ्यास अपनी एकाग्रता बढ़ाने के लिए करते हैं, ताकि अपने काम या अध्ययन में बेहतर हो पाएं। कुछ इसलिए सीखते हैं कि मानसिक या अलौकिक शक्तियों का विकास कर सकें। कुछ लोग ध्यान-अभ्यास इसलिए करते हैं कि वे प्रभु को पाना चाहते हैं।

सूफी परंपरा में राबिआ बसरी एक ऐसी महिला संत हुई हैं जिन्होंने लोगों को यह संदेश देने का प्रयास किया कि ध्यान-अभ्यास या प्रार्थना का सर्वोच्च उद्देश्य प्रभु-प्राप्ति होना चाहिए ताकि हम प्रभु का प्रेम पा सकें। इसके अलावा कोई और उद्देश्य नहीं होना चाहिए। एक बार राबिआ अपने समकालीन सूफी, हसन-अल-बसरी के घर के पास से गुजर रही थीं। उन्होंने हसन को छत पर रोते हुए सुना। उनके कुछ आंसू राबिआ के चेहरे पर गिरे। उन्होंने ऊपर देखा और पूछा-"हसन, क्या ये सिसकियां तुम्हारे अहंकार की हैं? अपने आपको काबू में करो। इससे बेहतर है कि तुम प्रभु-प्रेम में आंसू बहाओ।" हसन के लिए इन शब्दों को सुन पाना कठिन था, परंतु वह राबिआ का सम्मान करता था एवं जानता था कि उन्होंने जो भी कहा, वह उसकी अपनी भलाई के लिए था।

कुछ दिनों बाद हसन नदी के किनारे चल रहा था, तभी उसने राबिआ को देखा। उसने अपनी जानमाज (नमाज का आसन) पानी के ऊपर फेंक दी और राबिआ को अपने साथ पानी के ऊपर जानमाज पर बैठकर नमाज पढ़ने के लिए आमंत्रित किया। उसका अहंकार फिर उससे ऊपर हावी हो गया था और वह यह दिखाना चाहता था कि वह पानी पर चल सकता था और पानी के ऊपर बैठकर प्रार्थना कर सकता था। राबिआ ने जब यह महसूस किया कि वह अपनी आध्यात्मिक उपलब्धियों को लोगों को प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल कर रहा है, तो उन्होंने उसे एक सबक सिखाना चाहा। उन्होंने उससे कहा-"अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करने से बेहतर है कि तुम इस तरह का व्यवहार करो, जिससे दूसरे लोग भी तुम्हारा अनुकरण करना चाहें।" तब वह अपनी जानमाज पर बैठ गईं और बीच हवा में बैठकर नमाज पढ़ी?" यह देखकर हसन का सिर राबिआ के सामने शर्म से झुक गया। उसे अपनी आध्यात्मिक शक्तियों के प्रदर्शन पर पश्चाताप करते हुए देखकर उन्होंने आगे कहा-"जो तुमने अपनी जानमाज के साथ किया, वह तो मछलियां भी कर सकती हैं, और जो मैंने अपनी जानमाज को बीच हवा में लटकाकर किया, वह मच्छर भी कर सकते हैं। असली आध्यात्मिक कार्य जो हमें करना है, वह इन दोनों करतबों से ऊंचा है।"

राबिआ का भाव यह था कि प्रार्थना एवं ध्यान-अभ्यास के सभी फायदों में से सबसे बड़ा फायदा है, प्रभु से एकमेव होना। हम अपने अंदर विद्यमान ज्योति एवं श्रुति से जुड़कर परमात्मा का अनुभव कर सकते हैं और इस धारा से जुड़कर हम परमात्मा की गोद में पहुंच सकते हैं। बहुत से लोग अपने बारे में बहुत बढ़-चढ़कर सोचते हैं। हम सोच सकते हैं कि शारीरिक रूप से हम बहुत ताकतवर हैं, बहुत सुंदर हैं, अपनी बौद्धिक क्षमता या अपनी उच्च शिक्षा के कारण अहंकार कर सकते हैं। हमें अपनी नौकरी, अपने काम या अपनी पदवी का भी अहंकार हो सकता है। हमें इस बात का भी अहंकार हो सकता है कि हम धनी हैं या हमने इस भौतिक संसार में अपने लिए एक साम्राज्य स्थापित कर लिया है। ये सभी परिस्थितियां हमें ऐसा बना देती हैं कि हम दूसरों को अपने से हीन समझने लगते हैं। जब तक हम ऐसी अवस्था में रहते हैं, तब तक हम किसी दूसरे की सहायता करने के योग्य नहीं रहते हैं। यदि हम धनी हैं तो किसी की आर्थिक रूप से मदद कर सकते हैं। अगर हम शक्तिशाली हैं तो किसी की शारीरिक रूप से मदद कर सकते हैं। परंतु इस प्रक्रिया में अगर हम अहंकार की भावना रखते हैं तो वह मदद हमारी आध्यात्मिक प्रगति में उपयोगी नहीं होगी बल्कि बाधक होगी।

आध्यात्मिक प्रेम हमें हर पल पुकार रहा है। यदि हम अपनी नजरें उस दिशा में घुमाएं और पूरी निष्ठा के साथ प्रभु के आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करें, तो प्रभु हमारा जवाब अवश्य देंगे। यह विश्वास करना कठिन है, परंतु वह एक मात्र वस्तु, जो हमें सदा-सदा के आनंद एवं प्रेम से अलग रखती है, हमारा अहम ही है। हमारी बुद्धि एवं अहम हमें भौतिक दुनिया में खुशी की खोज में लगाए रखते हैं। यदि हम रुक जाएं, अपने अंदर की शांत-अवस्था में स्थित हो जाएं और प्रभु से प्रार्थना करें तो वे निश्चित रूप से हमारे सम्मुख प्रकट होंगे। वे हमें इस दुनिया के मायाजाल से ऊपर उठा लेंगे और दिव्य प्रकाश के मंडलों में ले जाएंगे जहां हम अमर-प्रेम के सोते से जी भरकर प्रेमामृत पी सकेंगे।

(प्रस्तुतिः डॉ. गोविंद बल्लभ जोशी,नई दुनिया,दिल्ली,2.1.11)

3 टिप्‍पणियां:

  1. मित्र बहुत ही अच्छी पोस्ट दी है। पर ये जो मैं हैं न निकल नहीं पाता। कई बार याद आता है कि मैं ज्यादा हो गया है। पर अधिकतर तो मैं ही हावी हो जाता है सब पर। मैं निकल जाए तो कहना ही क्या। पर सवाल यही पर ......

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  2. उपयोगी समाचार पाठकों तक पहुँचाने के लिए आभार!

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