शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

एम्सःकब तक आएंगे वंचित तबके से डॉक्टर?

क्या केंद्र सरकार के अधीन मुल्क की राजधानी में चल रहे एक अग्रणी चिकित्सकीय प्रतिष्ठान में डॉक्टरों की नियुक्ति तथा उनके प्रमोशन में आरक्षण के नियमों का खुलेआम उल्लंघन किया जा सकता है? यह सवाल अहम हो उठा है अखिल भारतीय चिकित्सा विज्ञान संस्थान (एम्स) में वर्ष 1995 से 2003 के बीच तदर्थ यानी एडहाक कहकर भरती किए गए डेढ़ सौ डॉक्टरों की नियुक्ति को लेकर, जिन्हें अब जल्द ही असिस्टेट प्रोफेसर के पद पर प्रमोशन देने की बात हो रही है। याद रहे कि इनकी नियुक्ति में आरक्षण के प्रावधानों को, अनुसूचित तबकों तथा पिछड़ी जातियों के अधिकारों के प्रति संविधानप्रदत्त जिम्मेदारियों को जिस तरह ठेंगा दिखाया गया था, यह बात किसी से छिपी नहीं है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार के पहले संस्करण में इस मामले की जांच के लिए एक वरिष्ठ सांसद करण सिंह यादव के नेतृत्व में कमेटी भी बनाई गई थी, जिसने इन नियुक्तियों में बरती गई अनियमितताओं को लेकर सवाल खड़े किए थे और उन्हें गैरकानूनी बताया था। इतना ही नहीं, न्यायालय में लंबित इस मामले को लेकर खुद केंद्र सरकार और संस्थान की तरफ से शपथपत्र भी दाखिल किए गए हैं, जिसमें इस बात को स्पष्टत: स्वीकारा गया है कि इन नियुक्तियों में संबंधित नियमों का पालन नहीं किया गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए और प्रस्तुत मसला कोई नजीर बन जाए, इसके मद्देनजर अलग-अलग पार्टियों से जुड़े 18 सांसदों ने स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद को ज्ञापन भी दिया है। इस ज्ञापन पर कांग्रेसी सांसद डॉ. ज्योति मिर्धा के भी हस्ताक्षर हैं, जो पेशे से खुद डॉक्टर हैं और एम्स के निकाय पर संसद के प्रतिनिधि की हैसियत से बैठती हैं। अभी यह कहा नहीं जा सकता कि कांग्रेस पार्टी दलितों-आदिवासियों और पिछड़ी जातियों के कल्याण की बातों को, उन्हें सशक्तिकृत करने के दावों को महज बातों तक ही सीमित रखती है या इन तबकों के लिए संविधानप्रदत्त अधिकारों की रक्षा के लिए कारगर कदम उठाती है। यह देखा जा सकता है कि विगत लगभग पांच वर्षो से एम्स में आरक्षित तबकों के साथ अध्ययन के दौरान तथा नई भर्ती के संदर्भ में विभिन्न स्तरों पर बरते जा रहे भेदभाव का मसला उठता ही रहा है। राष्ट्रपति को सौंपे अपने ज्ञापन में मेडिकोज फोरम फॉर इक्कवल आपरच्युनिटीज की तरफ से इस अग्रणी संस्थान के आंतरिक हालात से अवगत कराते हुए यह भी कहा गया था कि किस तरह उपरोक्त संस्थान में ही नहीं, बल्कि दिल्ली के अन्य मेडिकल कॉलेजों में ऐसी स्थितियां व्याप्त हैं। यह अकारण नहीं था कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के चेयरमैन सुखदेव थोराट की अगुआई में एक कमेटी भी बनाई गई थी, जिसने आरक्षित तबकों के छात्रों की शिकायतों की पुष्टि की थी। हालांकि इस कमेटी ने इसके लिए जिम्मेदार पदाधिकारियों को दोषी करार देने और किसी किस्म की सजा देने की कोई सिफारिश नहीं की थी। यूपीए सरकार ने जब अपनी पहली पारी में शिक्षा संस्थानों में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण देने का ऐलान किया था, तब उपरोक्त संस्थान का प्रांगण ही आरक्षण विरोधी आंदोलन का केंद्र बना था। जाहिर है कि संस्थान के प्रबंधन के एक हिस्से की मौन सहमति के बिना यह मुमकिन नहीं था। अभी जुलाई माह की बात है, जब एम्स के डॉक्टरों के एक दल ने वहां ठेके पर की जा रही डॉक्टरों की सालभर के लिए अस्थायी नियुक्ति की मुखालफत करते हुए बयान जारी किया था। बताया गया था कि किस तरह ऐसी नियुक्तियां केंद्र सरकार की इस घोषित नीति के खिलाफ हैं, जिसके मुताबिक विश्वविद्यालय अध्यापक पदों के लिए कांट्रैक्ट आधार पर नियुक्तियों को न्यूनतम रखने की बात कही गई थी। अपने अन्य सहयोगियों से कम तनखाह पा रहे ठेका पद पर नियुक्त ऐसे डॉक्टर, जिनकी नियुक्ति में मेरिट का ध्यान रखा नहीं जा सकता, मरीजों के लिए कितने उपयोगी साबित होंगे, यह बात भी अपने ज्ञापन में उन्होंने कही थी। दिलचस्प है कि एम्स में दलितों, आदिवासियों व पिछड़ी जातियों के डॉक्टरों के पदों की नियुक्तियों में बरती गई अनियमितताओं का सवाल तभी सुर्खियां बना है, जबकि हाल ही में स्वास्थ्य मंत्री ने संसद के पटल पर यह बयान देकर लोगों को विचलित किया था कि राजधानी में ही केंद्र सरकार के अधीन चल रहे तीन अस्पतालों सफदरजंग, राममनोहर लोहिया और लेडी हॉर्डिग्ज अस्पताल में लगभग वंचित तबकों के लिए आरक्षित डॉक्टरों के 500 पद खाली पड़े हैं। उनका सपाट-सा बयान था कि मृत्यु, सेवानिवृत्ति, इस्तीफा और योग्य प्रत्याशियों की अनुपलब्धता की वजह से यह स्थिति बनी है। वैसे आरक्षित पदों को लेकर योग्य प्रत्याशियों की अनुपलब्धता का तर्क हर जगह दोहराया जाता है, जहां संविधानप्रदत्त जिम्मेदारियों के निर्वहन में कमी नजर आती है, जबकि मामला कहीं अलग होता है। अगर अस्पतालों के संदर्भ में देखें तो इसका एक सिरा चिकित्सा संस्थानों के प्रबंधन में आरक्षित तबकों के अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता, जागरूकता की कमी तथा कहीं-कहीं उसे लेकर जबरदस्त विरोध में भी देखा जा सकता है तो इसका एक सिरा नवउदारवाद के प्रभाव में गढ़ी गई आर्थिक नीतियों में ढूंढ़ा जा सकता है, जिसके तहत सार्वजनिक कल्याण के क्षेत्रों को भी रफ्ता-रफ्ता तो कहीं तेजी से बाजारशक्तियों के हवाले किया जा रहा है और इसी के चलते संसाधनों की कमी का रोना रोते हुए स्थायी पदों को भरने में सरकारों द्वारा अलग-अलग बहानों से आनाकानी की जाती है और डॉक्टरों को मामूली तनख्वाह पर ठेके पर रखने का सिलसिला चलता है। वैसे यह बात सुनने में अटपटी लग सकती है, मगर यह बात भी उतनी ही सच है कि मानव शरीर की बीमारियों के इलाज में अत्याधुनिक तरीके से इलाज करने में मुब्तिला चिकित्सा संस्थानों के प्रबंधन एवं उच्च अधिकारियों का एक हिस्सा ऊंच-नीच अनुक्रम पर टिके भारतीय समाज में व्याप्त भेदभाव पर भी अमल करता दिखता है, जिसका प्रभाव ऐसे संस्थानों के संचालन में भी नजर आता है। कुछ साल पहले दिल्ली के ही गुरु तेग बहादुर अस्पताल में अनुसूचित जाति और गैरअनुसूचित छात्रों के बीच चले तीखे विवाद का मसला अखबारों की सुर्खियां बना था, जब यह देखा गया था कि इन वंचित तबकों के छात्रों के साथ जातिगत भेदभाव भी होता है। साझा मेस में इन तबकों के लिए टेबल भी रिजर्व रखे जाते हैं और उनके लिए सूडो नामक अपमानजनक संबोधन का प्रयोग किया जाता है। एक तरफ सरकार देश के अलग अलग हिस्सों में एम्स जैसे संस्थान कायम करने की बात करती है, वहीं राजधानी स्थित एम्स में निजीकरण को बढ़ावा देने की योजना का खाका रखने के लिए आधुनिकीकरण के लिए बनी कमेटी की आड़ ली जाती है। एम्स जैसे अग्रणी संस्थानों का पिछले दरवाजे से हो रहा निजीकरण एक तरह से सरकार की नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का ही प्रतिबिंबन होगा, जो एक तरह से आरक्षण के प्रावधानों को और अधिक सीमित कर देगी(सुभाष गताडे,दैनिक जागरण,24.12.2010)।

4 टिप्‍पणियां:

  1. सरकार की नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का ही प्रतिबिंबन ही तो है।

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  2. मुश्किल यही है कि हम समस्या को नही देखते। समस्या की जड़ को खोदने की जगह उसके तने और टहनियों पर अपना गुस्सा उतारते रहते हैं। डॉक्टर सिर्फ डॉक्टर होता है न कि पिछड़ा या अगड़ा। डॉक्टरी के पेशे को इससे पूरी तरह से अलग रखा जाना चाहिए। सुधार शिक्षा क्षेत्र में होना चाहिए न कि डॉक्टरों कि नियुक्ति के दौरान। सही शिक्षा का अवसर उपलब्ध कराने में सरकार और समाज की सोच बदलने में नाकाम रहा समाज अब खुद दिखावे के तौर पर आरक्षण के बहाने और वैमनस्य बढ़ाने का काम कर रहा है।

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