बुधवार, 3 नवंबर 2010

सबसे खराब नशा

शराब आज सोशल ड्रिंक जरूर बन गया है लेकिन ब्रिटेन के वैज्ञानिकों का कहना है कि यह लोगों को अनसोशल विहेवियर करने के लिए प्रेरित करता है। हाल ही में हुए शोध में उन्‍होंने पाया है कि शराब हीरोइन, कोकीन और गांजा से भी कहीं ज्यादा खतरनाक है।
ब्रिटेन मादक पदार्थ सलाहकार प्रोफेसर डेविड नट के नेतृत्व में हाल में किये गए एक शोध से यह बात सामने आयी कि शराब कोकीन और तम्बाकू से तीन गुना अधिक खतरनाक होती है। हिरोइन और कोकिन शराब के बाद क्रमश: दूसरा और तीसरा हानिकारक मादक पदार्थ हैं। शोधकर्ताओं ने कहा कि यदि मादक पदार्थों को उनसे होने वाली हानि के आधार पर वर्गीकृत किया जाए तो शराब ‘ए’ श्रेणी में आती है जबकि हेराइन और कोकीन उसके बाद आते हैं। खुद वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने हिसाब लगाया था कि शराब पीने से एक साल में लगभग 25 लाख लोगों की दिल, लीवर की बीमारियों, कैंसर, सड़क हादसों और सूइसाइड से मौत हो जाती है। यह दुनिया भर में होने वाली मौतों का 3.8 प्रतिशत है। इसके अलावा यह दुनिया भर में असामयिक मृत्यु और विकलांगता के लिए जिम्मेदार तीसरा बड़ा फैक्टर है। इसी बारे में देखिए आज नवभारत टाइम्स का संपादकीयः नशे के बारे में दुनिया की समझ बदल रही है। ताकतवर सरकारी और निजी स्वार्थ आड़े न आए तो इस स्थगित प्रश्न पर शायद दोबारा विचार शुरू हो कि किसी समाज से उसके पारंपरिक नशे छीनकर उस पर कोई और नशा आरोपित करना वहां कैसी-कैसी सामाजिक और व्यक्तिगत आपदाओं का कारण बन जाता है। डेढ़-दो सौ साल पहले तक भारत में ही नहीं, संसार के लगभग सारे पारंपरिक समाजों में स्थानीय नशे प्रचलित थे। भारत में भांग, गांजा, ताड़ी, गुड़ या महुए की शराब और मुगलों की लाई अफीम मुख्यधारा के नशे समझे जाते थे जबकि चावल, काजू आदि को फर्मेंट करके निकाली जाने वाली हंडि़या, छंग या फेनी जैसी शराबें आदिवासी और मेहनतकश समुदायों की पहचान मानी जाती थीं। यूरोप में अंगूर से निकलने वाली वाइन और जौ के पानी से बनी बियर का चलन था, जबकि प्राचीन अमेरिकी सभ्यताओं में उत्सवों के मौके पर तंबाकू और कोको के पत्ते चबाने का रिवाज था। फिर पासा ऐसा पलटा कि दुनिया में हर जगह डिस्टिल्ड शराब और कागज में लपेट कर सिगरेट की शक्ल में बेचे जाने वाले तंबाकू का जलवा हो गया और सिर्फ यूरोप को छोड़कर बाकी सभी जगहों के स्थानीय नशे एक झटके में गैरकानूनी घोषित कर दिए गए। कुछ समाजविज्ञानी नशे के मामले में आए इस बदलाव का सीधा रिश्ता यूरोपीय साम्राज्यवाद से जोड़ते हैं। उनका कहना है कि फैक्टरी में बनने वाली शराब और सिगरेट तीन-चौथाई दुनिया पर डेढ़-दो सौ साल चली ब्रिटिश हुकूमत की देन है। आज भी सिर्फ ये ही दो नशे दुनिया के किसी भी देश के किसी भी बाजार में खड़े-खड़े खरीदे जा सकते हैं। सीधे वनस्पतियों के रूप में उपलब्ध भांग और गांजा या पौधों से आसानी से निकाली जा सकने वाली अफीम, चरस और कोकीन अलग-अलग देशों में सख्त सरकारी निगरानी में बिकते हैं, जबकि रासायनिक प्रक्रिया में बनने वाली हिरोइन, क्रैक कोकीन, एलएसडी, मेथ और एक्सटेसी जैसे पदार्थ गैरकानूनी ड्रग्स के रूप में जाने जाते हैं और इनकी बिक्री संसार में हर जगह प्रतिबंधित है। ब्रिटिश डॉक्टर और शोधकर्ता डेविड नट ने हाल में अपने एक शोध के जरिये यह साबित करके ब्रिटेन और अमेरिका में हलचल मचा दी है कि इन सारे कानूनी और गैरकानूनी नशों में सबसे ज्यादा खतरनाक शराब है। अपनी रिसर्च के लिए उन्होंने नशों से होने वाले नौ तरह के व्यक्तिगत और सामाजिक नुकसानों की सूची बनाई और हर नशे से इन सभी तरह के नुकसानों के लिए अलग-अलग अंक निर्धारित किए। इन अंकों को जोड़कर तैयार किए गए पैमाने पर शराब का मुकाम हिरोइन जैसे जानलेवा नशों से भी ऊपर पाया गया। इस शोध का यह तात्पर्य कतई नहीं है कि पारंपरिक या रासायनिक प्रक्रिया में तैयार होने वाले नशे व्यक्ति या समाज के लिए कम नुकसानदेह हैं और उनके प्रति किसी तरह की नरमी बरती जानी चाहिए। लेकिन शराब की बिक्री को आधुनिकता का पर्याय समझ लेने वाली सरकारों के लिए इस शोध में एक संदेश जरूर मौजूद है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आधुनिक सोसाइटी में तो शराब न पीना पिछड़ेपन की निशानी माना जाता है..

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  2. क्या कह सकते हैं इस देश में तो सरकार शराब के ठेके ऐसे जारी कर रही है जैसे सरकार ,सरकार नहीं शराब माफिया और दलाल हो.....हर गांव इस शराब से दुर्गंधित है लेकिन ये भ्रष्ट नेता सालों को दिख नहीं रहा....

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  3. भारतीय नागरिक जी,

    आपने बात तो सही कही है, मगर हमने अभी तक शराब का सेवन नहीं किया है. उम्मीद है आगे भी इस से परहेज़ ही रखेंगे.

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