बुधवार, 3 नवंबर 2010

मिलावट का त्योहार

दीपावली के अवसर पर दोस्तों और रिश्तेदारों में मिठाइयों के आदान-प्रदान का विशेष महत्व रहा है, लेकिन जिस तरह मिलावट का डर बढ़ रहा है, उससे अब लोग मिठाई खरीदने से बच रहे हैं। दीपावली के तोहफों के लिए लोग विकल्प के रूप में चाकलेट, नमकीन और मेवों की खरीददारी ज्यादा कर रहे हैं। बाजार की इस मांग को देखते हुए छोटी किराने की दुकानों से लेकर राजधानी की नामी मिठाई की दुकानों पर भी मेवे और चॉकलेटों की भरमार देखने को मिल रही है। इन्हें आकर्षक रूप देने के लिए विशेष रूप से चमकीले कागजों और खूबसूरत तोहफों वाले डिब्बों में पैक किया जा रहा है। हालांकि, दिल्ली के मशहूर मिठाई विक्रेताओं का मानना है कि मिलावट की खबर को देखते हुए इस बार मिठाइयों को लेकर कई तैयारियां की गई हैं, जिसके तहत शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया गया है और तरह-तरह की मिठाइयां विशेष तौर पर बनवाई गई हैं। बंगाली मार्केट की प्रसिद्ध मिठाई की दुकान बंगाली स्वीट्स के मालिक सतीष अग्रवाल का कहना है कि दीपावली के त्योहार के लिए यहां कई नई मिठाइयों की किस्में रखी गई हैं। इनमें काजू की बर्फी, सोहन हलवा, मोहन भोग, सकर पारा, मोतीचूर के लड्डू, गुजिया जैसी कई पारंपरिक मिठाइयों के साथ कई नई मिठाइयां भी उपलब्ध हैं। मिलावटी सामान से बचने के लिए दुकानों में इस बार दूध और खोये से बनी मिठाइयों की कम ही संख्या रखी गई है। बावजूद इसके खरीददार मेवे और चॉकलेट को खरीदना अधिक मुनासिब समझ रहे हैं। उन्होंने बताया कि इसका कारण मीडिया में आई मिलावट की खबर तो है ही, टीवी पर आ रहे चॉकलेट और खानेपीने के सामानों की मल्टी नेशनल कंपनियों के तरह-तरह के विज्ञापन भी हैं। इसको लेकर खरीददारों के भी अपने-अपने तर्क हैं। कालकाजी से बंगाली मार्केट आयीं पूर्णिमा शर्मा का कहना है कि मिठाइयों की तुलना में मेवे ज्यादा स्वास्थवर्धक हैं। इनमें मिलावट जैसी समस्या भी नहीं होता। हालांकि, इनकी कीमत बहुत ज्यादा है। चार दिन पहले जो चीजें 200 रुपए में मिल रहीं थीं, वे आज ५क्क् रुपए तक में बिक रही हैं। कैसे होती है मिलावटः अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान की आहार विशेषज्ञ अनुजा अग्रवाल कहती हैं कि इस समय बाजार में मिठाइयों की मांग को देखकर कुछ दुकानदार सिंथेटिक दूध या दूषित मेवे से मिठाइयां बनाकर बाजार में बेचते हैं। सिंथेटिक दूध और दूषित मेवे में कास्टिक सोडा और यूरिया मिला होता है। यूरिया एक कीटनाशक है। गाढ़ा करने के लिए इसमें डिटर्जेंट भी मिलाया जाता है। सेंथेटिक दूध में वसा उत्पन्न करने के लिए तेल का भी प्रयोग करते हैं, जो अमूमन घटिया किस्म का ही होता है। मेवे में सफेद टरपेंटाइन मिलाया जाता है। यही नहीं, चॉकलेट में भी कई तरह की मिलावट की बात कही जा रही है। मीठा बनाने के लिए इनमें घटिया किस्म की चीनी का प्रयोग होता है, जिससे वजन तेजी से बढ़ने की बीमारी हो सकती है। वहीं, इनके रंग को चटख बनाने के लिए घटिया रंग भी मिलाया जा रहा है। मिलावटी सामग्री खाने से तबीयत खराब होने के शुरुआती लक्षणः सिर दर्द, जी मिचलाना, चक्कर आना, पेशाब के साथ खून आना, दस्त लगना आदि शुरुआती लक्षण हैं। मिलावटी मिठाई से गुर्दे, अमाशय, यकृत ओर हृदय को भी नुकसान पहुंच सकता है। यूरिया, सोडा आदि से आहार नलिका से रक्त स्राव भी हो सकता है। मिठाइयों की तुलना में मेवे ज्यादा स्वास्थवर्धक हैं। इनमें मिलावट जैसी समस्या भी नहीं होता। हालांकि, इनकी कीमत बहुत ज्यादा है(दैनिक भास्कर,दिल्ली,3.11.2010)। इसी बारे में पढिए नवभारत टाइम्स का आज का संपादकीयः देश भर से रोज मिलावट की खबरें आ रही हैं। कहीं नकली मावा पकड़ा जा रहा है तो कहीं मिठाइयां, चॉकलेट, दूध, पनीर और घी। मिलावटखोरों को न तो कानून का भय है न ही मानवीयता की परवाह। उन्हें तो बस अपनी थैली भरने से मतलब है। मिलावट की खबरों ने दिवाली का उत्साह फीका कर दिया है। लेकिन यह सब केवल त्योहार तक सीमित नहीं है। मिलावटी खाद्य पदार्थ और नकली दवाएं अकसर बरामद होती रहती हैं। कुछ समय पहले जब प्रधानमंत्री कानपुर गए थे, तो वहां उनके लिए जो खाद्य सामग्री आई उसमें भी मिलावट पाई गई। हमारे देश में खाद्य पदार्थों में मिलावट के मामले को गंभीरता से लिया ही नहीं जाता है। इस मामले में विधायिका और कार्यपालिका दोनों के स्तर पर भारी उदासीनता और लापरवाही दिखती है। विधायिका ने इस पर कठोर कानून बनाने में कोई खास तत्परता नहीं दिखाई और कार्यपालिका मौजूदा कानूनों को अमल में लाने में बहुत मुस्तैदी नहीं दिखाती। दरअसल राजनीतिक नेतृत्व व्यवसायी वर्ग को दुधारू गाय की तरह देखता है। वह उसे नाराज नहीं करना चाहता। इसी का फायदा कारोबारी तबका उठाता है। सच कहा जाए तो पॉलिटिकल लीडरशिप और ब्यूरोक्रेसी के रवैये के कारण हमारे सिस्टम का बंटाधार हो रहा है। वही क्षेत्र थोड़ा बेहतर हाल में हैं जिन पर इनकी 'कृपा' नहीं हुई जैसे आईटी सेक्टर। गौरतलब है कि प्रिवेंशन ऑफ फूड अडल्टरेशन एक्ट 1954 के तहत मिलावट करने वालों के लिए छह महीने से लेकर छह वर्ष तक की कैद का प्रावधान है। विशेष परिस्थितियों में उम्र कैद की सजा भी दी जा सकती है। लेकिन मिलावट के मामले में सख्त सजा दिए जाने के उदाहरण ढूंढना मुश्किल है। अगर कोई व्यवसायी पकड़ा भी जाता है तो वह दूसरे नाम से लाइसेंस लेकर धंधा जारी रखता है। प्रिवेंशन ऑफ फूड अडल्टरेशन एक्ट को अमल में लाने की जिम्मेदारी राज्यों की है पर सभी राज्य सरकारों का रवैया एक जैसा नहीं है। कई राज्यों ने इसके लिए अपने कानून तो बनाए हैं लेकिन उन्होंने जरूरी संख्या में फूड इंस्पेक्टरों तक की नियुक्ति नहीं की है। इस कारण खाद्य पदार्थों की बिक्री की मॉनिटरिंग नहीं हो पाती। विकसित देशों में उपभोक्ता आंदोलन काफी मजबूत है इसलिए मिलावट को लेकर वहां काफी कठोरता बरती जाती है। लेकिन भारत में अब भी इस मामले में जनता में चेतना नहीं आई है। अपने खानपान और स्वास्थ्य को लेकर जागरूक होना पड़ेगा और सरकार पर दबाव बनाना होगा। तभी कोई बात बनेगी।

2 टिप्‍पणियां:

  1. जब तक कड़े कानून और उनका सही पालन नहीं होगा ये सब चलता रहेगा, वास्तव में लोगों के अन्दर कानून का दर समाप्त हो गया है , यही इसका मूल कारण है ,
    dabirnews.blogspot.com

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  2. sahi kaha aapne...अपने खानपान और स्वास्थ्य को लेकर जागरूक होना पड़ेगा और सरकार पर दबाव बनाना होगा। तभी कोई बात बनेगी। Sundar jaagrukta bhari post ke liye dhanayvaad..

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