रविवार, 10 अक्तूबर 2010

दिल्लीःनिजी अस्पतालों में नहीं हो रहा मरीज़ों का इलाज़

दिल्ली में, अधिकतर निजी अस्पताल गरीबों को स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने को तैयार नहीं हैं। सूचना के अधिकार के तहत आरटीआई डाले जाने पर केंद्रीय सूचना आयोग के निर्देश के बाद स्वास्थ्य निदेशालय की वेबसाइट पर डाले गए आंकड़ों से खुलासा हुआ है कि राजधानी के ज्यादातर निजी अस्पतालों में गरीब मरीज कोटे के बिस्तर खाली हैं। हालांकि, स्वास्थ्य विभाग ने कई अस्पतालों में गरीब मरीजों के इलाज होने की सूचना दी है, लेकिन मरीजों का ब्योरा नहीं दिया है। उत्तम नगर निवासी दिनेश कौशिक की आरटीआई पर केंद्रीय सूचना आयोग ने स्वास्थ विभाग को निर्देश दिया था कि सरकार से रियायती दर पर जमीन हासिल करने वाले निजी अस्पतालों में गरीब कोटे के मरीजों का पूरा ब्योरा इंटरनेट पर उपलब्ध कराया जाए। इसके बाद दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य निदेशालय ने एक अक्टूबर से अपनी वेबसाइट पर लिंक बनाकर आंकड़े उपलब्ध कराना शुरू कर दिया है। विभाग ने 39 अस्पतालों को सूचीबद्ध किया है, लेकिन निर्देश के मुताबिक इसे रोज अपडेट नहीं किया जा रहा है। विगत 7 अक्टूबर को उपलब्ध आंकड़े के मुताबिक, कई अस्पतालों में गरीब कोटे के कई बिस्तर खाली हैं। स्वास्थ्य विभाग ने कुछ अस्पतालों में गरीबों कोटे के अधिकांश बिस्तर भरे होने की जानकारी जरूर दी है, लेकिन विभाग ने सभी मरीजों का ब्योरा नहीं दिया है। आंकड़ों को मिलाने पर विभाग की इस जानकारी पर सवाल उठ रहे हैं। कोर्ट के दिशा-निर्देश के मुताबिक, सभी सरकारी अस्पतालों में रेफरल टीम गठित करना जरूरी है ताकि गरीब मरीजों को नजदीकी अस्पतालों में रेफर किया जा सके। रेफरल टीम के पास निजी अस्पतालों के खाली बिस्तरों का ब्योरा होता है। विभाग के इन आंकड़ों से सवाल उठ रहा है कि क्या सरकारी अस्पताल जरूरत के मुताबिक गरीबों को निजी अस्पतालों में रेफर नहीं करते, जबकि इन दिनों अस्पतालों में मरीजों को दाखिला नहीं मिल पा रहा है(रणविजय सिंह,दैनिक जागरण,दिल्ली,10.10.2010)।

2 टिप्‍पणियां:

  1. ग़रीब आदमी को तो इन 5 सितारा अस्पतालों का गार्ड ही भीतर नहीं जाने देगा तो वो बिस्तर इन्हें कहां मिलने लगे. अलबत्ता हो सकता है कि ये बिस्तर दो नंबर की कमाई का ज़रिया ज़रूर बने बैठे हों.

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  2. एनसीआर में तो गरीबों के साथ अमीरों का इलाज नहीं हो रहा है ... पांच दिन पहले मेरे मित्र का नोएडा फोर्टिस हास्पिटल में देहांत किडनी फेल होने से हुआ जब कि वो सर की चोट के कारण दस दिन से एडमिट थे ... बिल बना साढ़े चार् लाख
    दूसरा उदाहरण भी मेरे आफिस का ही है जो खुद चल कर हास्पिटल गए थे अपना चेकअप करवाने फोर्टिस वालों ने उन्हें आई सी यू(यू कांट सी मी) में भर्ती किया फिर वेंटिलेटर पर डाला और दो तीन दिन में काम खतम... बिल ढाई लाख

    आज प्राइवेट हास्पिटल पैसा छापने की मशीन मात्र राह गए हैं ... और पैसे के बल पर सरकार और जनता सब को अपनी ऊँगली पर नचाते हैं ...

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