शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

हर पांचवा आदमी क्रोनिक पीठ दर्द से ग्रसित

दुनिया का हर पांचवा आदमी क्रोनिक पीठ दर्द से जूझ रहा है। उम्रदराज लोगों में से एक तिहाई लोगों में ज्यादा मामले देखने में आते हैं। भारत में एक तिहाई से ज्यादा लोग क्रोनिक पीठ दर्द से पीड़ित हैं। नोएडा जैसे देश के सभी ऐसे शहर जहां आधी आबादी शहरी और आधी ग्रामीण है, यह समस्या ज्यादा विकट है। कई तरह की रिपोर्ट और सर्वे के आधार पर चिकित्सक नोएडा-गाजियाबाद आदि में सर्विस रोड पर खास कर बनाए गए ब्रेकर को पीठ पर गहरा जख्म का जनक मानते हैं।

हड्डी रोग विशेषज्ञों के अनुसार कई बार सड़क पर बाइक सवार बहुत छोटे हादसे का शिकार होते हैं। इसमें न खरोंच आती है और न तुरंत अंदरूनी चोट का पता चलता है। यही हालत ब्रेकर के मामले में भी होती है। ब्रेकर देख अचानक गाड़ी में तेज ब्रेक लगाना या इसपर से तेजी से उछल कर निकल जाना, दोनों ही स्थितियां गलत हैं। रीढ़ रोग के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ डा. आर. एन. सिंह के अनुसार ब्रेकर का ‘स्मूथ’ नहीं होना बहुत बड़ी खराबी है और इसे नजरअंदाज करना बाइक सवारों को खास कर नुकसान देता है। बाइक सवारों को सड़क पर हर दिन लगने वाले हिचकोले भी वक्त गुजरने पर रीढ़-पीठ और गरदन की दर्दनाक बीमारी दे जाते हैं।

अपोलो हॉस्पीटल के डॉ़ के. जे. चौधरी के अनुसार ऐसे कई लोग हैं जो बेवजह दर्द के साथ जी रहे हैं। वे इस दर्द के साथ जीते हैं क्योंकि जो इलाज उन्हें मिल रहा है वह प्रासंगिक एवं प्रतिक्रियाशील है। डा. चौधरी कहते हैं कि लोगों को उन रास्तों पर विशेष कर धीमा वाहन चलाना चाहिए, जिनके हिचकोलों, ब्रेकरों या गड्ढों से वे पूर्व परिचित नहीं हैं। इसके साथ ही चौराहों पर लाल बत्ती के समय निकलने से बचना चाहिए क्योंकि डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार सड़क हादसों में दर्द वाली बीमारियां इनकी वजह से बहुत ज्यादा मिल रही है।

पेन मैनेजमेंट बना विषयः डब्ल्यूएचओ के मुताबिक दुनिया के 80 प्रतिशत दर्द पीड़ितों के पास कारगर दवा नहीं है। चिकित्सकों के अनुसार भारत में यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है क्योंकि यहां पर पेन मैनेजमेंट के तय दिशा निर्देश नहीं हैं और अस्पतालों में भी इसपर सही काम नहीं हो पाया है। इंडियन सोसाइटी फॉर स्टडी ऑफ पेन ने ब्रुफेन फाउंडेशन के साथ मिल पेन मैनेजमेंट को विषय के रूप में अस्पतालों व मरीजों तक पहुंचाने की पहल की है।

नोएडा-गाजियाबाद क्यों निशाने परः सुप्रीम कोर्ट की ओर से स्पीड ब्रेकर के संबंध में जो गाइडलाइन जारी हैं, उस हिसाब से इन शहरों में स्पीड ब्रेकर नहीं बनाए गए हैं। स्पीड ब्रेकर की ऊंचाई तो तय है ही, इन्हें स्मूथ बनाने के लिए भी स्पष्ट दिशानिर्देश हैं। स्पीड ब्रेकर मुख्य सड़कों पर तो फिर भी ठीक हैं, हादसे रोकने के लिए सर्विस रोड पर भी इनका इस्तेमाल सही माना जा सकता है लेकिन इनके पहले दोनों तरफ स्पीड ब्रेकर की जानकारी का बोर्ड नहीं लगा होना और ब्रेकर के पास पर्याप्त रोशनी का अभाव संकट को बढ़ाने में मदद कर रहा है। शहर में अनजान रास्तों पर लोग हर दिन कहीं न कहीं ब्रेकर की वजह से हादसों का शिकार हो रहे हैं।

कुछ खासः

  • आम जनसंख्या का 14 से 20 प्रतिशत कमर दर्द से पीड़ित
  • 80 प्रतिशत भारतीयों को कभी न कभी रीढ़ या कमर दर्द
  • भारत में लगभग 35 प्रतिशत लोग क्रोनिक पीठ दर्द से जूझ रहे
  • ऑस्टियोआर्थराइटिस घुटना दर्द का कारण, 80 प्रतिशत परेशान
(लाईव हिंदुस्तान डॉटकॉम,नोएडा,16.10.2010)

3 टिप्‍पणियां:

  1. mai bhi jab jukta hu tab drad hota hai
    din kursi pr baithe 2 kam kerna padta hai

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  2. दिल्ली में एक बार तो उच्च न्यायालय ने सभी गति अवरोधक हटवा दिये थे कि अगर बनाना ही है तो मानकानुसार बनाओ पर ठेकेदार व अफ़सर मिलकर स्पीड-ब्रेकर की चौड़ाई कम रखते हैं और बाक़ी माल पचा जाते हैं. जब तक न्यायालय इनमें से कुछ को पक्के से जेल नहीं भेजेंगे, बड़ा मुश्किल है इन पूंछों का सीधा होना.

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  3. सिर्फ गति अवरोधक ही नहीं बल्कि मानवीय स्वास्थ्य को ख़राब करने के लिए सरकार ने पंचायत स्तर से लेकर पीएमओ तक कई अवरोधक लगा रखें हैं ...आज सरकार या सरकारी कार्यप्रणाली नागरिकों के स्वास्थ्य के विरुद्ध है खासकर मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से ..अगर गहन विवेचना की जाय तो ...

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