शनिवार, 4 सितंबर 2010

पंजाबःऔषधि के नाम पर भांग खा रहे बच्चे

आयुर्वेदिक औषधि के नाम पर बच्चों को भांग के नशे का आदी बनाया जा रहा है। जालंधर शहर और गांवों में किराने की दुकानों और खोखों पर ‘श्री भोला मुनक्का’ के नाम से बिकने वाली गोली में सबसे ज्यादा मात्रा भांग की है।
निर्माता कंपनी का दावा है कि इससे पाचन क्रिया सही रहती है, स्फूर्ति मिलती है और कब्ज दूर होती है। कई इलाकों में बड़ी गिनती में बच्चे गोलियों के आदी हो चुके हैं।छोटे कस्बों और स्कूलों के आसपास इनकी खपत सबसे ज्यादा है।
इसके रैपर पर ही लिखा है कि इस गोली में 25 फीसदी मात्रा भांग की है। जिले में अलावलपुर कस्बे में स्कूल के नजदीक दुकानों व खोखों में हर दुकानदार रोजाना इसकी करीब १0 गोलियां बेच देता है। यहां करीब १0 खोखे और इतनी ही करियाने की दुकानें हैं, जहां ये गोलियां बिकती हैं। एक दुकान में औसतन १0 गोली भी रोजाना बिके तो संख्या दो हजार से ऊपर चली जाती है। कैंट क्षेत्र में भी यही स्थिति है। यहां भी ये गोलियां खुलेआम बिकती हैं। शहर में इमामनासर में सिगरेट, तंबाकू की होलसेल की दुकानों पर इनकी सप्लाई आम है। कोई भी व्यक्ति रिटेल या होलसेल के लिए यहां से गोली खरीद सकता है। इस गोली की मेन्यूफेक्चरिंग कंपनी गुजरात से है। जालंधर के अलावा राज्य के दूसरे जिलों के भी कई व्यक्तियों ने इसकी एजेंसी ले रखी है। ये गोलियां पिछले तीन-चार साल से बिक रही हैं। इस कारण काफी लोग इनकी गिरफ्त में आ चुके हैं। इस गोली को भांग की गोली या नशे की गोली के नाम से जाना जाता है। शहर की एजेंसी के सेल्समैन सुबह-सुबह दुकानों पर सप्लाई पहुंचा देते हैं। इसमें नशा भी इतना ज्यादा है कि अगर आम व्यक्ति इसे खा ले तो वह पूरा दिन होश में न आए। अलावलपुर निवासी पवन कुमार ने करीब चार महीने पहले एक दिन इस गोली को खा लिया था। इससे उसकी तबीयत बिगड़ गई और अस्पताल में दाखिल करवाना पड़ा था। रेट से ज्यादा वसूलते हैं दुकानदार मुनाफा ज्यादा होने के कारण दुकानदार इन्हें धड़ल्ले से बेच रहे हैं। रैपर पर इसका दाम एक रुपए प्रिंट है, लेकिन दुकानदार तीन से पांच रुपए वसूलते हैं। जिनके लिए नहीं, वही बन गए आदी गोली के रैपर पर लिखा हुआ है कि ये नाबालिगों को सेल करने के लिए नहीं है। इसके बावजूद स्कूलों के आसपास लगने वाली दुकानों पर बच्चों को बेची जा रही हैं। व्यस्क भी इसे सस्ते नशे के रूप में ले रहे हैं। खेलों में भी बढ़ाती है दम स्कूलों की टीमों में खेलने वाले बच्चे भी इसे खा रहे हैं। इससे उनका दमखम बढ़ जाता है और वे जल्दी थकते नहीं हैं। अलावलपुर के एक स्कूल टीम के फुटबाल खिलाड़ी ने बताया कि मैच से पहले वह इसे खाते है। उनके शिक्षक भी इसे खाने की सलाह देते हैं। नाम मनक्का, लेकिन सबसे अधिक भांग इस गोली का नाम मनक्का है, लेकिन इसमें भांग की मात्रा सबसे अधिक है। गोली के घटकों में 20 फीसदी मनक्का है, जबकि 25 फीसदी मात्रा भांग की है। बाकी घटकों की मात्रा एक से पांच फीसदी तक है। बच्चों की मानसिकता पर असर मनोचिकित्सक डा. गुलबहार सिंह सिद्धू का कहना है कि इस तरह की गोलियां खाने से बच्चे मानसिक तनाव का शिकार हो सकते हैं। इससे वे कभी हंसने लग जाते तो कभी एकदम रोने। इसके अलावा ऐसी गोलियों को खाकर खेलने वाले बच्चों को कुछ समय के लिए तो एनर्जी मिल सकती हैं, लेकिन बाद में हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। लंबे समय तक इसके इस्तेमाल से किडनी भी फेल हो सकती है और शूगर के शिकार भी बन सकते हैं। कभी कोई चैकिंग नहीं आम दुकानों पर बिकने वाली इन नशीली दवाइयों की कभी चैकिंग नहीं हुई। सिविल सर्जन डा. एसके गुप्ता का कहना है कि उनके पास एक ड्रग इंस्पेक्टर है। इस स्थिति में उनसे पूरे मेडिकल स्टोरों की ही चैकिंग खत्म नहीं होती है। करियाने की दुकानों पर बिकने वाली इन दवाइयों की सप्लाई बारे उनके पास जानकारी नहीं है। अब ये मामला ध्यान में आया है और हम दुकानों पर इसके लिए चैकिंग करेंगे(सुखविंदर विरदी,दैनिक भास्कर, अलावलपुर/जालंधर,3.9.2010)।

7 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा आपने इसका चलन आजकल हर जगह हो गया है यंहा राजस्थान में भी आयुर्वेद की दवा के रूप में बहुतायत से बेचा जाता है |जंहा नई पीढ़ी इस नशे की आदी हो गयी है |

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  2. आपने बिल्कुल सही कहा है। यहा भी यह मीठा जहर प्रचलन में है।
    ‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया
    लक्ष्य

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  3. यहाँ सब कुछ संभव है । आखिर कौन परवाह करता है ?

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  4. @नरेश जी,आपका ब्लॉग खोलने की कोशिश करने पर लिखा आता है कि प्रोफाइल साझा किया हुआ नहीं है। मैंने तो अपना प्रोफाइल साझा किया हुआ है। कृपया देखें।

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  5. यह 80% भांग होती है। मुनक्का और अन्य घटक न के बराबर होते है।

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