गुरुवार, 26 अगस्त 2010

गेहूँ का सेवन ज़रा संभलकर

गेहूं या गेहूं से बने उत्पाद भी किसी को बीमार कर सकते हैं। भले ही यह सुनने में अटपटा लगे लेकिन बहुत लोगों की ऐसी तादाद है जिन्हें गेहूं और गेहूं के उत्पाद नुकसान पहुंचाते हैं। गेहूं से होने वाली बीमारी को सीलियक डिजीज के नाम से पुकारा जाता है। गेहूं में ग्लूटीन प्रोटीन होता है जिसके दो हिस्से होते हैं। एक ग्लायडीन और दूसरा ग्लूटानीन। ग्लूटानीन ही इस बीमारी होने की मुख्य वजह है। ग्लूटानीन प्रोटीन शरीर में एंटी बॉडीज बनाता है और पीड़ित व्यक्ति को माफिक नहीं आता। ग्लूटानीन की वजह से व्यक्ति को हमेशा डायरिया (बार बार दस्त आना) रहता है। असल में ग्लूटानीन बड़ी आंत को प्रभावित करता है। बड़ी आंत में विलस नाम से उंगली जितने उभरे हिस्से होते हैं। यहीं पर पाचन रस शरीर में घुलने की प्रक्रिया होती है। जिन व्यक्तियों या बच्चों में यह बीमारी होती है उनमें विलस फ्लैट होने शुरू हो जाते हैं। यानी, इनका उभार समाप्त हो जाता है। इसकी वजह से हीमोग्लोबिन लेवल कम हो जाता है। अगर समस्या विकराल हो जाए तो लीवर भी डैमेज हो जाता है। इसकी वजह से व्यक्ति को लूज मोशन (दस्त)लगे रहते हैं। पीडि़त मरीज का पेट फूला फूला रहता है। त्वचा पर छाले भी पड़ सकते हैं। इंसुलीन के टाइप वन मरीजों में सीलियक डिजीज हो सकती है।
क्या होता है बीमारी में
बीमारी से पीडि़त मरीज की कद काठी छोटी रह जाती है। उनका पूरा विकास नहीं हो पाता और हीमोग्लोबिन का स्तर भी काफी कम हो जाता है। इसकी वजह से चेहरा पीला पीला रहता है। टिश्यू ट्रांस ग्लूटानाइनेज (टीटीजी टेस्ट) से बीमारी का पता चलता है। ऐसे मरीजों में पीढ़ी दर पीढ़ी यह बीमारी चलती है। जेनेटिक म्यूटेशन की वजह से जींस में गड़बड़ हो जाती है और पैदा होने वाले बच्चे भी इसका असर भुगतते हैं। पीजीआई के इंडोक्रायनोलॉजी विभाग में इस पर रिसर्च भी चल रही है। मरीज गेहूं या गेहूं से बने उत्पाद नहीं खा सकता। गेहूं की चपाती, बिस्कुट, बन, बेकरी प्रोडक्ट, ब्रेड, पास्ता, मैदे से बनी मठ्ठी व अन्य पदार्थ मरीज को माफिक नहीं आते। उन्हें मक्का, बाजरे की रोटी या चावल खाकर ही जिंदगी भर काम चलाना पड़ता है। बाजार में ग्लूटानीन फ्री आटा भी आता है लेकिन डाक्टरों का कहना है कि यह भी ज्यादा प्रभावी नहीं है। मरीजों को दिक्कत रहती है(साजन शर्मा,दैनिक जागरण,चंडीगढ़,26.8.2010)।

11 टिप्‍पणियां:

  1. यह तो विचित्र बात है .

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  2. भाई बताओ....... रोटी की जगह क्या खाएं............

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  3. आप की रचना 27 अगस्त, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
    http://charchamanch.blogspot.com

    आभार

    अनामिका

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  4. ये एकदम उचित बात है। मेरे एक सहकर्मि की पत्नी को यही बीमारी पिछले महीने निकली। ये अलग बात है कि इस बीमारी का पता लगाने में निजी अस्पताल ने 75 हजार का बिल बना दिया। हैरानी तो मुझे भी हुई थी कि इस तरह की कोई बीमारी होती है....पर संसार विचित्र संसार में बीमारी विचित्र.....

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  5. बात आपकी सही है किसी जानने वाले के एक महिला रिश्तेदार की बीमारी की वजह गेहूँ ही था | गेहूं खाना बंद करते ही बीमारी ठीक हो गयी |

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  6. पिछले कुछेक महीनों से ऎसे कईं लोग हमारे भी सम्पर्क में आए, जो कि इस नामुराद बीमारी से पीडित हैं.....

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  7. मेरे ध्यान में भी ऐसा मरीज है,पर उसे गेहूं नहिं मैदे व मैदे के पदार्थों से परहेज का कहा गया है। वस्तूत यह एलर्जि जैसी बिमारी है। सभी को गेहूं से डरने की आव्श्यक्ता नहिं।

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