मंगलवार, 4 मई 2010

दमे को करें बेदम

आज विश्व दमा दिवस है। दुनिया भर में दमा के मरीजों की अनुमानित संख्या 30 करोड़ है। यह रोग पुरुषों में ज्यादा और महिलाओं में कम होता है। दमा का कारण ज्ञात नहीं है। इस मर्ज के मुख्य कारण पुष्प के परागकण, तेज गंध व स्प्रे, धूल या धुआं, धूम्रपान का धुआं, बिस्तर व तकिए की धूल, मौसम में परिवर्तन और इत्र व पाउडर का प्रयोग आदि हैं। इसे ठीक नहीं किया जा सकता। हां,दवा से नियंत्रित जरूर किया जा सकता है।
दमा के दौरे के वक्त,bronchial tubes में सूजन आ जाती है जिसके कारण सांस के लिए हवा का प्रवाह बाधित होता है । दमे के कारण फेफड़े में हवा की कमी हो जाती है इसके बार-बार अटैक से अनिद्रा और दिन में थकान जैसी शिकायतें होती हैं। सामान्यतया, दमे से पीड़ित मरीज़ को रात में खांसी आती है। मरीज को बार-बार सांस फूलने के दौरे पड़ते हैं। सोते समय दम घुटने जैसा अहसास होता है। बार-बार नाक व गले में संक्रमण होता है। बच्चों में पसलियां चलनी शुरू हो जाती हैं। ये लक्षण पूरे साल में कभी भी प्रकट हो सकते हैं, लेकिन मौसम परिवर्तन पर इनकी संभावना अधिक होती है। ध्यान रखें कि दमा संक्रमण की बीमारी नहीं है। माता-पिता में अगर किसी को एलर्जी की शिकायत है तो संतानों में इस मर्ज की संभावना अधिक होती है। 77 प्रतिशत रोगियों को अस्थमा की तकलीफ 5 वर्ष की उम्र से पहले ही शुरू हो जाती है। इस बीमारी से बच्चों को बचाने तथा अन्य मरीजों को जागरूक बनाने के लिए हर साल 4 मई को विश्व अस्थमा दिवस मनाया जाता है। अन्य असाध्य रोगों की तुलना में अस्थमा से मरने वालों की संख्या काफी कम होते हैं मगर 2005 में,दुनिया भर में 2 लाख 55 हजार लोग इस रोग से मारे गए। विकासशील देशो में औद्योगीकरण और वाहनों की बढ़ती संख्या और धूम्रपान के बढ़ते चलन के कारण यह रोग भी बढ़ रहा है। विश्व में 30 करोड़ लोग दमा से ग्रस्त हैं और इस रोग के एक तिहाई मरीज भारत में हैं। भारत में प्रति एक लाख जनसंख्या में 2468 लोग दमे से पीड़ित हैं। चंडीगढ़ शहर में 5 प्रतिशत बच्चे अस्थमा रोग से पीडि़त हैं। दिल्ली में 10 व मुंबई में 12 से 15 प्रतिशत लोग अस्थमा से पीड़ित हैं। भोपाल में एक लाख लोग दमे से पीड़ित हैं। इनहेलेशन थेरैपी दमा के इलाज में वरदान साबित हुई है। इस थेरैपी का समुचित प्रयोग हो तो 90 प्रतिशत से ज्यादा लोगों में दमा पर पूर्णतया नियंत्रण पाया जा सकता है। पूरे विश्व में यह इलाज की पहली अवस्था है। इस विधि में मुख्यतया दो प्रकार की दवाइयों का प्रयोग होता है। एक वह जिसमें तुरन्त लाभ मिलता है जिसे ब्रॉन्कोडाइलेटर कहते हैं। दूसरी वह जो बीमारी को आगे बढ़ने से रोकती है और कुछ मरीजों में उसे समाप्त करने की भी क्षमता रखती है। इसके अन्तर्गत मुख्यतया इन्हेलर स्टेरॉयड को शुमार किया जाता है। आज दैनिक जागरण में, चेस्ट फिजीशियन डॉ. ए.के. सिंह सीनियर ने अपने आलेख में लिखा है कि इन्हेलर्स का सबसे बड़ा लाभ यह है कि दवा सीधे सांस नली में पहुंचती है जबकि खाने वाली दवाएं शरीर के विभिन्न अंगों में जाकर नुकसान पहुंचा सकती हैं। कभी भी दमा के लक्षण प्रकट होने पर घबराएं नहीं। खुली खिड़की के पास खड़े हो जाएं, इन्हेलर का प्रयोग स्पेसर डिवाइस से करें। नेब्यूलाइजर भी ऐसी स्थिति में काफी उपयोगी होते हैं। अगर आराम नहीं मिलता, तो चिकित्सक से सम्पर्क करें। नवीनतम शोध-अध्ययनों से यह पता चला है कि 10 प्रतिशत लोगों में दमा को नियंत्रित करना कठिन है। ऐसे मरीजों में नयी पद्धति जैसे थर्मल ब्रान्कोप्लास्टी, एण्डोब्रांकियल वाल्व प्लेसमेंट, एंटी आईजीई, एंटीबॉडीज, स्पेसिफिक मॉडीफाइड इम्यूनोथेरैपी का इस्तेमाल किया जा सकता है।
नेचुरोपैथी की एक किताब कहती है कि पके केले को छिलके सहित सेंकने के बाद इसका छिलका हटा दें व केले के टुकड़े कर लें। इस पर 15 काली मिर्च पीसकर बुरक दें व गरम-गरम ही दमा रोगी को खिलाएँ, तो दमा के दौरे में लाभ होता है। केले के पत्तों को छाँव में सुखाकर बाद में इसकी राख बना कर दिन में तीन बार एक-एक चुटकी की मात्रा में शुद्ध शहद के साथ लेने से भी आराम मिलता है। दमा के रोगी को कपालभाति क्रिया के अलावा भस्त्रिका सूर्यभेदी(उच्च रक्तचाप व तनाव वाले रोगी के लिए वर्जित), उच्चायीब्रह्म कुंभम प्राणायाम करना चाहिए। सांस के रोगियों के लिए सूर्यभेदीब्रह्मकुंभम उपयोगी है। ये गरम प्राणायाम हैं और कफ व विजातीय तत्वों को वाष्प बनाकर बाहर निकालते है। परिणामस्वरूप, सांस नली व फेफड़ों की नस नाड़ियों व शिराएं खुलकर ठीक से कार्य करती हैं तथा रोगियों का इन्हेलर तक छूट जाता है। दमा के रोगियों के लिए पवन मुक्त भुजंग अर्धश्लव, मारजार, नटराज आसन ज्यादा लाभदायक है। दमा के तीव्र वेग में तत्काल कफ निकालने का उपाय करना चाहिए। इसके लिए सरसों का तेल गर्म कर तथा इसमें थोड़ा नमक मिलाकर गुनगुना तेल छाती एवं पीठ पर लगाना चाहिए। अदरक का रस एक तोला, तुलसी के पत्तों का रस एक तोला- दोनों के मिश्रण में एक ग्राम शुद्ध हींग पाऊडर मिलाकर एक चम्मच शहद के साथ सुबह-शाम लेने से आराम मिलता है। आयुर्वेद कहता है कि दमा के रोगियों को तैलीय पदार्थ व मैदा से बने पदार्थ नहीं खाने चाहिए। इसके अलावा दही, लस्सी, कढ़ी, खीर, उड़द की दाल अरबी, भिंडी व चावल के भी सेवन से बचना चाहिए। रोगी को गुनगुने दूध में शुद्ध हल्दी सुबह-शाम सेवन करना चाहिए। ऐसे रोगियों को मूंग, मसूर की दाल, घीया, तोरई, परमल व टमाटर की सब्जी खानी चाहिए। ठंडा पानी पीने से बचना चाहिए। खाने के पहले व बाद में पानी नहीं पीना चाहिए। अपने आसपास का वातावरण शुद्ध रखना चाहिए तथा गुनगुना पानी पीना चाहिए। भोजन के पूर्व नमक एवं अदरक का सेवन लाभकारी है। रात को सोते समय लगभग आधा तोला इसबगोल सेवन करना चाहिए। धतूरे से निर्मित 'कंकासव' को एक चम्मच पानी में मिलाकर दिन में दो बार भोजन के बाद लेने से भी राहत मिलती है। दिल्ली में कर्मचारी राज्य बीमा निगम के आयुर्वेदाचार्च डॉ. प्रभाकर राव और डॉ. जे.एन.राव कहते हैं कि आयुर्वेद में दमे से निजात के लिए प्रतिरोधक क्षमता बढाने वाली दवाएं दी जाती हैं। इनमें च्यवनप्राश,ब्रह्मरसायन और अगस्त्य हरीतिकी रसायन प्रमुख हैं। रामदेव जी की औषध-दर्शन पुस्तिका कहती है कि दमबेल(टाइलोफोर/इंडिका)का एक पत्र लेकर,उसमें एक काली मिर्च डालकर पान की तरह खाली पेट तीन दिन तक चबाने से अस्थमा के रोगी को लगभग पूरा आराम मिल जाता है। इस प्रयोग को जरूरत होने पर हफ्ते भर तक दुहराया जा सकता है। तीन या सात पत्ते मात्र खाने से दमे से छुटकारा मिल जाता है। किसी-किसी को इसके सेवन से उल्टी हो सकती है किंतु इससे घबराने की जरूरत नहीं है। जब कफ निकल जाएगा तो उल्टी अपने आप रूक जाएगी। इसी पुस्तक में एक अन्य स्थान पर सलाह दी गई है कि दिव्य श्वासारि रस-20 ग्राम,दिव्य अभ्रक भस्म 5 ग्राम,दिव्य प्रवालपिष्टी 5 ग्राम,दिव्य त्रिकटु चूर्ण-10 ग्राम और सितोपलादि चूर्ण 25 ग्राम लेकर मिला दें और 60 पुड़िया बना लें। सुबह नाश्ते से औऱ शाम खाने से एक घँटा पहले शहद या गर्म पानी के साथ लें। जीर्ण रोग की स्थिति में,इसमेंस्वर्ण बसन्तमालती दो-तीन ग्राम मिलाने से अत्यंत लाभ मिलता है। दूसरा उपाय यह है कि लक्ष्मीविलास रस और संजीवनी वटी को 20-20 ग्राम लेकर दोनों में से 1-1 गोली लेकर दो या तीन बार सुबह-शाम गर्म दूध या गर्म पानी के साथ लें। वैसे,हैदराबाद में बाथिनी गौड़ परिवार गत 160 सालों से भी अधिक समय से हर साल मृगशिरा कार्तिक(5 से 9 जून के बीच) के दिन प्रसादम नामक हर्बल दवा को बांटता है। तमाम आस्थाओं के बावजूद,यह स्वीकार करना होगा कि गुप्त विधि से तैयार कर मरल जाति की मछली के मुंह में भरकर साबुत खिलाई जाने वाली यह दवा अगर कारगर होती तो दुनिया से दमे का सफाया हो गया होता।

3 टिप्‍पणियां:

  1. अत्यंत सार्थक और उपयोगी आलेख..........

    न केवल पठनीय बल्कि सहेजनीय भी.......

    धन्यवाद !

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  2. Behad upyukt jaankaari hai yah..waqayi ise sahejkar rakhna chahiye..

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