शनिवार, 10 अप्रैल 2010

जानिए होम्योपैथी से जु़ड़ी भ्रांतियों को

आज होम्योपैथी के जनक हेनिमैन की जयंती है। उनकी स्मृति में आज का दिन विश्व होम्योपैथी दिवस के रूप में मनाया जाता है। होम्योपैथी अब केवल गरीबों की उपचार-विधा नहीं है। तुरंत इलाज़ की चाहत में खासकर एलोपैथिक दवाओं के साइड-इफेक्ट के लगातार बढते मामलों ने होम्योपैथी की प्रासंगिकता को एक बार फिर साबित किया है। ये दवाएं सस्ती तो हैं ही,इन्हें प्रयोगशालाओं में जांच कराए बगैर भी दिया जा सकता है। हैपेटाइटिस, राइनिटिस, एंफ्लूएंजा, कंजक्टिवाइटिस, चिकन पॉक्स, खसरा, त्वचा एलर्जी, सोरायसिस एक्जीमा,गांठ,दाने,माइग्रेन,इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम,अनियमित मासिक,सर्वाइकल एरोजन और तनाव को दूर करने में होम्योपैथिक दवाएं बेहद कारगर सिद्ध हुई हैं। जिन रोगों का इलाज़ सर्जरी बताया जाता है,उनका समाधान भी होम्योपैथी में है,जैसे-रेनल कैलकली,बिनाइन प्रोस्टेट एनलार्जमेंट,बवासीर,भगन्दर आदि। इतना ही नहीं,सर्जरी और प्रसव के बाद शीघ्र स्वस्थ होने की प्रक्रिया को तेज़ करने में भी होम्योपैथी सहायक है। हड्डियों का जोड़ भी होम्योपैथी के उपयोग से जल्दी भर जाता है।
होम्योपैथी के प्रैक्टिशनर आपको हर जगर मिल जाएंगे। मगर यहां बता दें कि केवल मैटेरिया मेडिका पढकर होम्योपैथी की प्रैक्टिस कर रहे लोग भी झोलाछाप जैसे ही हैं। आयुष में होम्योपैथी विभाग के उप-निदेशक डॉक्टर विक्रम सिंह स्पष्ट कहते हैं कि दिल्ली में जनकपुरी में केंद्रीय होम्योपैथी परिषद है जिसने राज्य स्तर पर भी बोर्ड/परिषद् स्थापित कर रखे हैं । होम्योपैथी की प्रैक्टिस के लिए जरूरी है कि इनमें से कहीं से प्रशिक्षण लिया जाए अन्यथा वह प्रैक्टिस गैर-कानूनी होगी। यह प्रशिक्षण ठीक वैसा ही है जैसा किसी एलोपैथ का होता है,अर्थात् साढे पाँच साल का। साढे पाँच साल के बाद अगर करना चाहें तो 3 साल का और प्रशिक्षण देने की व्यवस्था है। डॉ. विक्रम सिंह जी ने यह भी बताया कि देश भर में हर जिले में सरकार ने होम्योपैथी डाक्टर नियुक्त कर रखे हैं जो होम्योपैथी प्रैक्टिस की गुणवत्ता पर नज़र रखते हैं।
खैर,भारत सरकार का आयुष(आयुर्वेद,योग व प्राकृतिक चिकित्सा,यूनानी,सिद्ध एवं होम्योपैथी) विभाग होम्योपैथी के प्रसार के लिए निरन्तर सक्रिय है। सरकार की कोशिश है कि होम्योपैथी को लेकर जो भ्रांतियां हैं,वे समाप्त हों और लोग वास्तविकता को समझें। आयुष की वेबसाइट होम्योपैथी से जुड़ी कई भ्रांतियों को दूर करती है। इनमें से कुछ भ्रांतियों की चर्चा यहां की जा रही हैः
धारणा है कि होम्योपैथी दवाओं के काम करने की गति धीमी होती है। दरअसल,यह कई बातों पर निर्भर करता है। यदि बीमारी का पता जल्दी लग गया हो,तो दवा का परिणाम भी जल्दी मिलता है। यदि सही दवा चुनी गई हो और उसकी सही मात्रा बताए गए अनुसार दुहराई गई हो,तो होम्योपैथी दवाओं का असर भी जल्दी देखा जा सकता है। पुराने रोगों के ठीक होने में वक्त लगता है। होम्योपैथी दवाओं से रोग कम नहीं होता बल्कि जड़ से समाप्त हो जाता है और इसमें समय लगना ज़रूरी है । यदि रोगी अपना आहार और व्यवहार बताए गए अनुसार नहीं रखता तो इलाज़ का असर दिखने में और ज्यादा वक्त लगता है।
धारणा है कि होम्योपैथी दवाओं से रोग पहले बढता है। दरअसल,कुछेक आपवादिक मामलों में रोगी ऐसी शिकायत करते हैं। होता यह है कि अगर रोगी ने होम्योपैथी से पहले एलोपैथिक दवाएं ली हों,तो संभव है उन एलोपैथिक दवाओं के कारण रोग तात्कालिक रूप से दब गया हो। ऐसी स्थिति में,होम्योपैथिक दवाएं लेने पर संभव है,रोग के मूल लक्षण फिर से उभर आएं। ऐसा होने पर रोगी को लगता है कि होम्योपैथी के कारण रोग बढ गया है। दूसरा कारण यह है कि अगर रोगी के लिए निर्धारित होम्योपैथिक दवा थोड़ी ज्यादा पावर की ले ली जाए,या रोगी मूलतः हाइपरसेंसिटिव हो,तो रोग तत्काल बढ गया लगता है। किन्तु,ऐसी स्थिति लंबे समय तक बनी नहीं रहती और रोगी अंततः ठीक हो जाता है।
धारणा है कि जब होम्योपैथी दवाएं चल रही हों,तो कई चीजों का सेवन बंद करना होता है। यह सरासर मिथ्या धारणा है कि होम्योपैथिक इलाज़ के लिए प्याज,लहसुन,चाय,कॉफी,पान,अल्कोहल,तंबाकू,परफ्यूम आदि का सेवन निषिद्ध है। इतना ज़रूर है कि किसी दवा विशेष के प्रभाव को कम करने वाली वस्तु का उपयोग नहीं करना चाहिए। मसलन, थुजा के असर को चाय और कच्चा प्याज और सोरिनम के असर को कॉफी कम कर देता है। अधिकतर होमयोपैथिक दवाओं के सेवन के दौरान कर्पूर का उपयोग निषिद्ध है। इसमें संदेह नहीं कि होम्योपैथिक दवाओं का असर उन रोगियों पर जल्दी होता है जिनको किसी प्रकार के नशे की लत नहीं है। यह समझना भी ज़रूरी है कि होम्योपैथी दवाएं अच्छी तरह मुंह साफ करके ही लेनी चाहिए और तेज गंध वाली किसी अन्य चीज के साथ इनका सेवन नहीं करना चाहिए।
मधुमेह के रोगी भी ऐसी होम्योपैथिक दवाएं ले सकते हैं जिनमें चीनी की मात्रा हो क्योंकि होम्योपैथिक दवाओं में चीनी की मात्रा नगण्य होती है। ज़रूरी होने पर,दवाएं शुद्ध(डिस्टिल्ड) पानी के साथ ली जा सकती हैं।
क्या होम्योपैथिक दवाएं एक्सपायर करती हैं? होम्योपैथिक दवाएं एक्सपायर नहीं करतीं मगर उन दवायुक्त गोलियों का उपयोग अवश्य ही नहीं करना चाहिए जिनके रंग सफेद नहीं रह गए हों। केवल वही तरल होम्योपैथिक दवाएं खराब मानी जाती हैं जिनका रंग बदल गया हो या जिनके तल में मैल जमा हो गई हो। अल्कोहल में तैयार ताजा होम्योपैथिक दवाओं की गंध तेज़ होती है जो धीरे-धीरे कम हो जाती है। यह मानना ग़लत है कि कम गंध वाली दवाओं का असर कम होता है क्योंकि गंध के कारण दवाओं की प्रभावोत्पादकता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। हां,यह सलाह अवश्य दी जाती है कि होम्योपैथिक दवाओं को ठंढी और सूखी जगह पर रखा जाए। इन्हें तेज़ धूप या तीव्र गंध वाली चीजों से एकदम दूर रखना चाहिए।
क्या आपात् स्थिति में अन्य दवाएं ली जा सकती हैं? अगर एकदम ज़रूरी हो गया हो तो गैर-होम्योपैथिक दवाएं ली जा सकती हैं। आपात् स्थिति समाप्त होते ही,होम्योपैथिक दवाएं फिर शुरू की जा सकती हैं।
क्या होम्योपैथी में हर बीमारी का इलाज़ है? अन्य विधाओं की ही तरह,होम्योपैथी की भी अपनी सीमाएं हैं। होम्योपैथी से ऐसे हर रोग का इलाज़ किया जा सकता है जिनके लिए सर्जरी एकदम ज़रूरी न हो। यह समझना भी ज़रूरी है कि जिन रोगों के लिए सर्जरी को ही उपाय माना जाता है,ऐसे कई रोग भी होम्योपैथी से ठीक हो सकते हैं,जैसे-टॉंसिल,नैजेल पॉलिप्स,किडनी स्टोन,मस्सा,बवासीर,भगन्दर, गर्भाशय,अण्डाशय और स्तन के ट्यूमर आदि।
क्या होम्योपैथिक दवाओं का कोई साइड-इफेक्ट होता है? बिल्कुल नहीं। साइड इफेक्ट उन्हीं दवाओं का होता है जो लक्षित हिस्से के अतिरिक्त शरीर के अन्य भागों को भी प्रभावित करते हैं। यदि अन्य भागों पर हुए ये प्रभाव अवांछित हों,तो इन्हें ही साइड-इफेक्ट कहते हैं। होम्योपैथिक दवाएं शरीर के किसी अंग विशेष के लिए नहीं होतीं बल्कि होम्योपैथिक दवाओं का चयन रोगी के लक्षणों की संपूर्णता के आधार पर किया जाता है और यह रोगी के सम्पूर्ण उपचार के सिद्धांत पर आधारित है। कई एलोपैथिक उपचारों के बाद कोशिकाओं के नष्ट होने के मामले सामने आते हैं। होम्योपैथी में इस प्रकार के प्रकरण नहीं होते।
क्या होम्योपैथी दवाओं के लिए प्रयोगशालाओं की जांच ज़रूरी होती है? यद्यपि होम्योपैथिक दवाओं का चयन रोगी के लक्षणों के आधार पर किया जाता है,रोग का पता लगाने,रोग के समान्य प्रबंधन(जैसे-मधुमेह के मामले में चीनी की मात्रा का प्रतिषेध,हाइपरटेंशन के मामलें में अधिक कॉलेस्टरॉल का निषेध,जीवन-शैली में बदलाव आदि) तथा रोग के संभावित चरण के आकलन के प्रयोजन से जांच बेहद ज़रूरी होती है। कुछेक मामलों में,दवाओं के चयन(जैसे-कृमि संबंधी परेशानी,किडनी या गॉल ब्लैडर के स्टोन,फ्रैक्चर आदि) के लिए भी प्रयोगशाला की जांच उपयोगी होती है।

9 टिप्‍पणियां:

  1. इस लेख के लिए आभार। लेकिन मुझे अभी भी शंका रहती है कि इतने कम सान्द्रण में कोई रसायन या अर्क कैसे प्रभाव डाल सकता है - सम्भवत: इस शंका का कारण यह हो कि मेरे उपर होम्योपैथी दवाओं ने अच्छा या बुरा कभी भी कोई प्रभाव नहीं डाला । न तो मैं शराबी हूँ और न ही कोई और नशा करता हूँ।

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  2. होम्योपैथी के पुराने और प्रसिद्ध चिकित्सक किसी प्रयोगशाला का उपयोग नहीं करते थे . उनका नाड़ी ज्ञान विस्तृत था .
    सही जानकारी नहीं होने पर यह विधा भी नुकसान पहुँचा सकती है

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  3. जानकारी अच्छी है पर आप मुझे केवल यह बताइए कि होम्योपैथिक दवा किस प्रकार काम करती है. मुझ पर कोई होम्योपैथिक दवा कभी असर नहीं करती. कहीं इसका कारण यह तो नहीं कि मैंने हैरिसन की 'प्रिंसिपल्स ऑफ़ इन्टरनल मेडिसिन' और 'फिज़ोलोजिकल बेसिस ऑफ़ ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन' पढी हुई है.
    कुछ महीनों पहले जर्मनी में होम्योपैथी के आलोचकों ने होम्योपैथिक डाक्टरों द्वारा लाई गयी स्ट्रोंग होम्योपैथिक दवाइयों को सौ से पांच सौ गुने डोज़ में सबके सामने खाकर किसी प्रकार का प्रभाव या दुष्प्रभाव नहीं पड़ने का चैलेन्ज किया. वे यह चैलेन्ज जीत गए. क्यों?

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  4. @ गिरजेश जी डाक्टर महेश सिन्हा जी और निशांत मिश्र जी
    आप तीनों का शंका करना ठीक है। मेरी भी पहले ऐसी ही शंकाएँ हुआ करती थीं लेकिन वे निर्मूल निकलीं। मैं ने बीएससी तक जीव विज्ञान पढ़ा है. फिर आयुर्वेद विशारद कर कुछ दिन आयुर्वेदिक चिकित्सालय में मामाजी के साथ अभ्यास भी किया है। बाद में मैं होमियोपैथी के संपर्क में आया और उसी का हो कर रह गया। पिछले सत्ताईस वर्षों से वही व्यवहार में है। घर में दवाखाना बन गया है जिसे मेरी पत्नी शोभा देखती हैं।

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  5. द्विवेदी जी यह कोई सर्व मान्य जवाब नहीं हुआ

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  6. यह तो है.....अगर शंका का समाधान हो जाए तो बेहतर है

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  7. .
    .
    .
    निशांत मिश्र जी व गिरिजेश राव जी से सहमत,

    एक cohort है placebo acceptors का, होम्योपैथी उन्हीं लोगों में काम करती है । काफी पढ़ा है इस बारे में, अधिकतर लेखकों द्वारा लिखी गई केस स्टडीज चमत्कारिक ईलाज होते दिखाती हैं परंतु उन केस स्टडीज को दोबारा से निश्चितता के साथ दोहराया नहीं जा सकता... मामला आस्था पर आकर खत्म हो जाता है... आज के दौर में Psychosomatic मरीजों, Terminally ill मरीजों, Vague ill defined symptoms वाले मरीजों, Self limiting illness के मरीजों का आसरा है यह पद्धति...

    किसी भी वैज्ञानिक ट्रायल में यह पद्धति अपने आपको साबित नहीं कर पाई है।

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  8. मैने अपने कई स्वास्थ्य समस्याओं के लिये होमियोपैथी की दवा ली और वह कारगर भी रही है. पिछले दिनो मुझे गंभीर साइनासाईटिस की प्राबलम हो गयी थी.रात में मुझे दो तीन बार एन्हेलर लेना पड़्ता था. जिसका एलोपैथी डाक्टर ने सभी इलाज करके हार जाने के बाद आप्रेशन ही एकमात्र इलाज बताया था . लेकिन एक दोस्त की सलाह पर मैने एक होमियोपैथी डाक्टर से अपना इलाज कराया जिसने मुझे छ: महीने तक लगातार दवा खाने को दी और आज मै पूरी तरह स्वस्थ्य हूं.

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