शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

बजट और स्वास्थ्य

बजट के शुरू में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने जब स्वास्थ्य पर जोर देने की बात कही तो लगा शायद स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च को सकल घरेलू उत्पाद का २ या ३ प्रतिशत कराने की स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद की कोशिशें रंग ला रही हैं लेकिन वह खर्च एक प्रतिशत के आसपास ही अटका रहा। मुखर्जी ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सालाना आवंटन में मात्र २७६६ करोड़ रुपए की वृद्धि कर स्वास्थ्य पर अपना "जोर" दिखा दिया। जहां तक स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च का सवाल है तो भारत स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च करने वाले बुरुंडी व सूडान जैसे देशों की जमात में शामिल है। स्वास्थ्य अर्थशास्त्री व स्वास्थ्य मंत्री की अध्यक्षता में बनी राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की संचालन समिति के सदस्य डॉ. एके शिवकुमार ने कहा, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का सालाना बजट १९,५३४ करोड़ से बढ़ा कर २२,३०० करोड़ करने से कुछ नहीं होने वाला। वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण के शुरू में कहा कि उनके बजट को सिर्फ आंकड़े के रूप में नहीं देखना चाहिए। वे अपनी दृष्टि और नीतिगत मंशा भी प्रकट कर रहे हैं। हेल्थ के मामले में उन्होंने किसी भी सकारात्मक मंशा का इजहार नहीं किया है। जेएनयू के सेंटर ऑफ सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ की प्रोफेसर डॉ. रितु प्रिया ने कहा अगर सरकार स्वास्थ्य पर खर्च को जीडीपी का ३ प्रतिशत नहीं करना चाहती तो वह पोषण पर खर्च बढ़ा कर उसकी भरपाई कर सकती है ताकि बाल और मातृ मृत्यु दर पर रोक लग सके । हार्ट केयर फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल ने कहा, वित्त मंत्री ने मानो दवा कह कर चीनी की पुड़िया थमा दी है। मेडिकल भाषा में इसे प्लैसिबो इफेक्ट कहते हैं। हां, मेडिकल उपकरण पर आयात शुल्क में छूट देने व एक समान (५ प्रतिशत) करने का कदम सकारात्मक है। इससे देश में चिकित्सा का स्तर बढ़ेगा। देश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल का बजट २०१०-११ के लिए दो करोड़ बढ़ा कर १३ करोड़ किया गया है। तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम के लिए आवंटन को २४ करोड़ से बढ़ा कर ३९ करोड़ करने व सिगरेट व तंबाकू की कीमत बढ़ाने के कदम को स्वास्थ्य के हित में माना जा रहा है । (नई दुनिया,दिल्ली,27.2.10 में धनंजय जी की रिपोर्ट)

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