शनिवार, 25 दिसंबर 2010

मधुमेह से निपटेगा पैंक्रियाज प्रत्यारोपण

मधुमेह को मेडिकल साइंस में धीमा जहर कहा जाता है। मधुमेह कई अंगों को क्षतिग्रस्त कर जिंदगी को मुश्किल बना देता है। इससे मुक्ति दिलाने के लिए डॉक्टरों ने एक नया रास्ता ढूंढा है। इसके तहत पैंक्रियाज का प्रत्यारोपण कर न सिर्फ अन्य अंगों को खराब होने से बचाया जा सकेगा बल्कि मरीजों को नई जिंदगी मिलेगी। पैंक्रियाज प्रत्यारोपण के विशेषज्ञ और लंदन स्थित इंटरनेशनल कालेज ऑफ सर्जन के प्रो. नादेय हकीम का मानना है कि पैंक्रियाज प्रत्यारोपण की सफलता दर 94 फीसदी है। भारत में मधुमेह के कारण किडनी की मांग तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में यह तकनीक कारगर साबित होगी।
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के वर्ष 2007 के आंकड़े में मधुमेह रोगियों की संख्या चाैंकाने वाली है। देश की कुल आबादी का चार फीसदी यानी करीब 4.40 करोड़ लोग मधुमेह की चपेट में हैं। इनमें से लगभग 4.40 लाख लोग टाइप-1 मधुमेह से पीड़ित हैं। जबकि टाइप-2 से 4.36 करोड़ लोग पीड़ित हैं। टाइप-1 में इंसुलिन का प्रयोग किया जाता है। जबकि टाइप-2 के मरीज गोलियों से ही मधुमेह नियंत्रित रखते हैं। आशंका है कि वर्ष 2030 तक भारत मधुमेह रोग की राजधानी कहलाएगा। मधुमेह से देश में 10 लाख लोग दिल के रोगी बन चुके हैं। जबकि 12 लाख की किडनी खराब हो चुकी है। 6 से 8 लाख लोगों की आंखों की रोशनी जा चुकी है। एसिकॉन में भाग लेने आए प्रो. हकीम का कहना है कि पैंक्रियाज जब खराब होने लगता है तो इंसुलिन बनना बंद हो जाता है। इससे शरीर में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है। ग्लूकोज को सामान्य करने के लिए बाहरी इंसुलिन की जरूरत होती है। पैंक्रियाज प्रत्यारोपण का मुख्य उद्देश्य बाहरी इंसुलिन पर निर्भर मरीजों को इससे मुक्ति दिलाना होता है। प्रत्यारोपण एक मात्र विकल्प है जो मरीजों के ग्लूकोज स्तर को स्थायी रूप से सामान्य कर पाता है। कुछ समय में एक साथ पैंक्रियाज और किडनी प्रत्यारोपण करवाने वालों की संख्या में कई गुना वृद्धि हुई है। महज दो घंटे में पैंक्रियाज प्रत्यारोपण करवाकर मधुमेह रोगी सामान्य जिंदगी में लौट आते हैं। सिर्फ किडनी प्रत्यारोपण करवाने वालों की सफलता दर 87 फीसदी है। जबकि पैंक्रियाज प्रत्यारोपण करवाने वालों की सफलता दर 89 फीसदी है। पैंक्रियाज और किडनी प्रत्यारोपण कराने वाले 94 फीसदी लोग सामान्य जिंदगी जी रहे हैं। पैंक्रियाज प्रत्यारोपण होने के तीन माह बाद इंसुलिन बनना शुरू हो जाता है और चार साल के अंदर सभी नर्व सिस्टम सुधर जाते हैं।
देश में अंग प्रत्यारोपण की जरूरत वाले मरीज
किडनी - 15 लाख, प्रतिवर्ष 1,50,000 नए मामले
लिवर - 80,000 मामले प्रतिवर्ष
दिल- 6 से 7 करोड़, प्रतिवर्ष 80,000 नए मामले
पैंक्रियाज - 50,000 से ज्यादा
कॉर्निया - एक लाख से ज्यादा(अमर उजाला,दिल्ली,क्रिसमस-2010)

नोटःश्री मनोज कुमार जी ने चर्चामंच पर 26.12.2010 की रविवासरीय चर्चा में इस पोस्ट का जिक्र किया है। यहां देखें

14 टिप्‍पणियां:

  1. हमारे एक फैमिली डॉक्टर मित्र कहा करते थे कि मधुमेह और रक्तचाप उस बिगड़े घोड़े कि तरह होते हैं जिन्हें आप क़ाबू में रख सकते हैं, इनसे छुटकारा नहीं पा सकते!! शायद यह समाचार उनकी बात को झूठा साबित कर सके!!

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  2. dekhana hai sarakar,is ke bare me kitana jagaruk hoti hai.ise jald prabhawi banane se bahut logo ko faida hoga. bahut sundar janakari sir.thank .

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  3. और पैन्क्रिया प्रत्यारोपण में कितना खर्च अनुमानित है ?

    बहुत ही अच्छी जानकारी दी आपने
    इसके लिए धन्यवाद.

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  4. अभूतपूर्व जानकारी, आभार

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  5. क्रिसमस की शांति उल्लास और मेलप्रेम के
    आशीषमय उजास से
    आलोकित हो जीवन की हर दिशा
    क्रिसमस के आनंद से सुवासित हो
    जीवन का हर पथ.

    आपको सपरिवार क्रिसमस की ढेरों शुभ कामनाएं

    सादर
    डोरोथी

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  6. ये एक अच्छी खोज है। बहुतों को राहत मिलेगी। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    एक आत्‍मचेतना कलाकार

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  7. अच्छी जानकारी के लिए शुक्रिया पर ये तकनीक अभी भारत में आई है या नही ये भी बताये और आई है तो किन अस्पतालों में है|

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  8. अच्छी जानकारी परख और उपयोगी पोस्ट । शुभकामनाएं ।

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  9. लोक-हित में बहुत अच्छी और ज्ञानवर्धक जानकारी दी आपने . आभार .

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  10. अच्छी बात
    पर इस पर खर्च कितना आता है
    और भारत में को से हॉस्पिटल में हॉट्स है ये इलाज

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  11. अच्छी बात
    पर इस पर खर्च कितना आता है
    और भारत में को से हॉस्पिटल में हॉट्स है ये इलाज

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  12. अच्छी बात
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    और भारत में को से हॉस्पिटल में हॉट्स है ये इलाज

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  13. अच्छी बात
    पर इस पर खर्च कितना आता है
    और भारत में को से हॉस्पिटल में हॉट्स है ये इलाज

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