सोमवार, 28 जून 2010

शिशुओं और किशोरों का खान-पान

स्वस्थ परिवार की निशानी है तरक्की। परिवार में किसी एक का भी स्वास्थ्य गड़बड़ाया नहीं कि पूरा परिवार परेशान हो जाता है। ऐसे में यदि परिवार के सदस्यों की उम्र के हिसाब से खाना-पीना सुनिश्चित कर लिया जाए तो आप जल्दी किसी बीमारी की चपेट में नहीं आएंगे। बस इस बात का ध्यान रखें कि उनको पहले से तो कोई बीमारी नहीं है। तो चलिए, इस बार हम आपको बताते हैं कि नन्हे-मुन्ने और टीनएजर का कैसा खान-पान हो ताकि वह अंदर से बने स्ट्रांग। बच्चे का खानापीना शिशु (बच्चा) माता के गर्भ में रहता है तो उसका पोषण एवं खाने की पूर्ति माता द्वारा लिए गए भोजन से ही होती है। शिशु का जन्म होना प्रकृति की एक लीला है। बच्चे की पैदाइश के बाद माता के शरीर में से भोजन सीढ़ी या प्रक्रिया समाप्त हो जाती है। अत: उसका भोजन अलग से व्यवस्थित करना पड़ता है। बच्चा फूल की तरह कोमल होता है। उसको यदि जरा-सी भी गलत चीज दे दी जाती है तो अनर्थ हो सकता है, कारण कि उसके शरीर में कोमलता किसी गलत चीज को सहने में सक्षम नहीं। वह तो अपनी माता या धाया पर निर्भर है। एक से छह महीने तक नवजात शिशु को माता का दूध ही दिया जाना चाहिए क्योंकि माता के दूध में वे सभी आवश्यक पोषक तत्व मौजूद हैं, जिससे उनके मन तथा शरीर की विकास प्रक्रियाओं की आधारशिला रखी जानी है। यदि किसी कारण से माता के स्तनों में दूध आता ही न हो या इतनी मात्र में न आता हो जो बच्चे की आवश्यकता पूरी करने के लिए पर्याप्त न हो तो उन्हें किसी चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए। यदि संभव उपाय करने के बाद भी समस्या का कोई उपाय न निकले तो बच्चों को केवल गाय का दूध ही दें। माता के दूध के बाद गाय के दूध का नंबर ही आता है। यदि गाय का दूध आसानी से न मिल सके तो शिशु को बकरी का दूध ही दें। दो पशुओं का दूध मिलाकर शिशु को कभी न दें क्योंकि हर दूध में पोषक तत्व अलग-अलग होते हैं, तासीर भी अलग-अलग होती है और प्रभाव भी अलग होता है। दूध के बाद बच्चे को विटामिन सी और डी की जरूरत होती है जिसकी पूर्ति क्रमश: मौसमी या संतरे के ताजे रस और मछली के तेल से पूरी हो सकती है। आहार का समय निश्चित कर लें और नियत समय पर ही आहार दें। प्राय: माताएं समझती हैं कि शिशु जब रोता है तो भूखा होता है, यह धारणा निराधार है। शिशु के रोने का कारण कोई रोग भी हो सकता है। शिशु का आहार जिन बर्तनों में दिया जाता है (जैसे दूध की बोतल, चम्मच, कटोरी, प्लेट आदि) उन्हें सदा स्वच्छ रखें और स्वच्छ रूप से ही उन्हें सदा प्रयोग करें। शिशु को आहार सुषुम देना चाहिए-न तो गरम हो और न ही ठंडा। गर्म के बाद ठंडा या ठंडे के बाद गरम। जब भी शिशु दूध या अन्य आहार लेने से मना कर दे या अरुचि दिखाए या वह सो रहा हो, तो ऐसी अवस्था में जोर-जबर्दस्ती न करें। वयस्कों के नियम और दिनचर्या शिशु पर लागू करना अनुचित है। उसे आप स्वाभाविक जीवन व्यतीत करने दें। शिशु को कोई वस्तु खाने पर मजबूर न करें। उसकी रुचि-अरुचि का पूरा ध्यान रखें। रात या जब भी आवश्यक हो शिशु को पेशाब कराना न भूलें और ऐसा प्रयत्न करें कि वह शौच और मूत्र समय पर ही विसजिर्त करे। शिशु का भोजन हल्का, सुपाच्य, खट्टे और मिर्च-मसाले से रहित होना चाहिए और उसकी तासीर मौसम के अनुसार ही होनी चाहिए। शिशु को कभी भी बहुत ढीले या कसे हुए कपड़े न पहनाएं। उसके कपड़े नायलोन या सिंथेटिक कपड़ों के न होकर सूती हों तो बेहतर है। शिशु के शरीर की स्वच्छता का पूरा ध्यान रखें। जब भी कपड़ा गीला हो जाए तो उसे फौरन बदल दें वरना गीले कपड़े शरीर पर अधिक देर तक रहने से उसे चमड़ी के रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। बच्चे को कभी ज्यादा ठंडे या गरम वातावरण में आहार न दें। ऋतु परिवर्तन के अनुसार उसके कपड़े, आहार और रख-रखाव का पूरा ध्यान रखें। शिशु को कोई रोग हो जाए तो उस अवस्था में जिस प्रकार को भोजन दिया जाना जरूरी है, उसके बारे में योग्य चिकित्सक से सलाह लेने के बाद ही उसके आहार में परिवर्तन करें, स्वयं कोई परिवर्तन न करें। ऐसा आहार (जैसे चिकनाई वाले पदार्थ, खट्टा, मिर्च, मसाला आदि) जो शिशु को सुहाते न हों और जिनसे खांसी, बुखार, दस्त, पेट में दर्द, वमन, ठंड लगने, गला खराब होने की आशंका हो, न दें(हिंदुस्तान,26.6.2010)।

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