बुधवार, 19 मई 2010

आज विश्व हैपेटाइटिस दिवस है





रॉकलैंड अस्पताल के गैस्ट्रोएंटोलॉजी डिपार्टमेंट के डॉ. एम.सी.शर्मा कहते हैं कि दुनिया भर में एड्स को सबसे खतरनाक बीमारी बताया जाता है, लेकिन हेपेटाइटिस से मरने वालों की संख्या एड्स से दस गुना है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जब हेपेटाइटिस के टीके बाजार में उपलब्ध हों, फिर भी अकेले भारत में हर साल दो लाख से ज्यादा लोगों की मौत हेपेटाइटिस के कारण हो रही है। पूरी दुनिया में हर साल 15 लाख लोग हेपेटाइटिस बी या सी से मरते हैं।

हेपेटाइटिस बीमारी ज्यादातर वायरस के कारण होती है, पर कभी-कभी बैक्टीरिया के संक्रमण अथवा दवाइयों के दुष्प्रभावों के कारण भी हो सकती है। वायरस से होने वाली हेपेटाइटिस गंभीर रूप भी धारण कर सकती है, इसलिए इसमें विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है।

हेपेटाइटिस ए
पानी चेक किया क्या 


शहर हो या गांव दूषित पानी की समस्या कहां नहीं है। पीने का पानी साफ मिले, इसके लिए कुछ राज्यों में कई स्थानों पर लोगों को कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ता है। शहरों में लोग आरओ सिस्टम लगाने लगे हैं। यह सब इसलिए करना पड़ता है क्योंकि एक तो पानी के बिना काम नहीं चलता और दूसरे यदि पानी गंदा या दूषित होगा तो कई प्रकार की बीमारियां आ घेरेंगी। सरकार भी पीने के साफ पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बहुत पैसा खर्च कर रही है।
इसके बावजूद, हर वर्ष भारत में जलजनित बीमारी पीलिया की चपेट में आने वाले लोगों की संख्या बहुत ज्यादा हैं। यह बीमारी दूषित खाने व जल के सेवन से होती है। जब नाली का गंदा पानी या किसी अन्य तरह से प्रदूषित जल सप्लाई के पाइप में मिल जाता है तो बहुत से लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं।
वैसे तो यह बीमारी तीन-चार हफ्तों के परहेज से ठीक हो जाती है किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब गर्भवती महिलाओं को पीलिया हो जाता है। तब यह भयानक रूप ले लेता है। ऐसे में माँ और बच्चा दोनों की जान को खतरा होता है।
दरअसल, लिवर में कुछ ऐसे पदार्थ होते हैं जिनमें बहते खून को रोकने की क्षमता होती है। जब लिवर क्षतिग्रस्त हो जाता है तो इन पदार्थो की कमी हो जाती है। ऐसे में अगर शरीर के किसी भाग से रक्त बहने लगे तो वह जानलेवा हो सकता है। हेपेटाइटिस बी और सी के उलट हेपेटाइटिस ए संक्रमण क्रॉनिक लिवर डिजीज पैदा नहीं करता और कम घातक होता है, लेकिन यह दुर्बलता के लक्षण पैदा कर सकता है।
लक्षण रोग को शुरुआत में रोगी को ऐसा महसूस होता है- बुखार, झुरझुरी, भूख न लगना, खाने को देख जी मिचलाना, उल्टी, बदन दर्द, सिगरेट पीने वालों को तंबाकू से अरुचि। इन शुरुआती लक्षणों के बाद अगर इलाज न हुआ तो रोगी को पीलिया हो सकता है। इसमें बदन में खुजली, पेट में गड़बड़ी, मल का रंग सफेद होना, आंखों में पीलापन, पेशाब का रंग पीला हो जाता है।
जब रोग और बढ़ जाता है तो पैरों में सूजन बढ़ जाती है तथा जोड़ों में भी दर्द हो जाता है। यदि रोग का निदान इस अवस्था में भी न हो पाए तो हेपेटाइटिस प्राणघातक रूप धारण कर सकता है। जिस किसी व्यक्ति को हेपेटाइटिस होता है और जिगर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है, तो रोगी बेहोशी या कोमा में चला जाता है तथा उसकी मृत्यु भी हो सकती है।
जरूरी नहीं कि हर संक्रमित व्यक्ति में ये सभी लक्षण हों। बच्चों की तुलना में वयस्कों में इसके लक्षण अक्सर जल्दी दिखते नहीं और रोग की गंभीरता और मृत्यु का खतरा अधिक उम्र के लोगों में बढ़ जाता है।
निवारण साफ सफाई का विशेष खयाल रखें और हेपेटाइटिस ए का टीका जरूर लगवाएं। एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में दो अरब लोग हेपेटाइटिस बी वायरस से संक्रमित हैं और 35 करोड़ से अधिक लोगों को क्रॉनिक (लंबे समय तक) लिवर संक्रमण होता है।

हेपेटाइटिस बी
ज्यादा पी तो लिवर बोल जाएगा


एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में दो अरब लोग हेपेटाइटिस बी वायरस से संक्रमित हैं और 35 करोड़ से अधिक लोगों में क्रॉनिक (लंबे समय तक) लिवर संक्रमण होता है, जिसकी मुख्य वजह शराब है।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अल्कोहल एब्यूस एंड एल्कोहलिज्म द्वारा किए गए अनुसंधान के अनुसार 15 साल से कम उम्र में शराब का सेवन शुरू करने वाले नौजवानों में 21 साल की उम्र में शराब पीना शुरू करने वाले किशोरों की तुलना में शराब के आदि होने की संभावना चार गुना अधिक होती है। पीने की यही आदत उन्हें कुछ ही महीनों में हेपेटाइटिस बी का शिकार भी बनाती है।
शराब के लगातार और लम्बे समय से सेवन के कारण हेपेटाइटिस जैसी गंभीर बीमारियां पनप सकती हैं। और हां, नियमित रूप से पीने पर हेपेटाइटिस के मामलों में वृद्घि होती है यह आपको विशेषकर हेपेटाइटिस ए और बी के प्रति अतिसंवदेनशील बना सकता है। जिन व्यक्तियों को पहले से ही हेपेटाइटिस ए और बी है और उनके साथ शारीरिक संपर्क होने से दूषित संक्रमित जीवाणु वाले चिकित्सा उपकरण जैसे सुइयों से संक्रमित खून चढ़ाने से, टैटू बनवाने से यह बीमारी हो सकती है।
हेपेटाइटिस की दो अवस्थाएं होती हैं, पहला, प्रारंभिक (एक्यूट) और दूसरा पुरानी (क्रॉनिक)। हेपेटाइटिस की प्रारंभिक अवस्था रोग शुरू होने की तीन महीनों तक रहती है। किंतु छह माह तक जब इसका इलाज नहीं होता तो यह क्रॉनिक हेपेटाइटिस में बदल जाती है।
प्रारंभिक अवस्था में यदि हेपेटाइटिस के साथ पीलिया भी हो जाए तथा इसका उपचार ठीक से न किया जाए तो यह क्रॉनिक बी या सी का रूप ले लेती है। यदि फिर भी उचित इलाज न हो सका तो यह लिवर सिरोसिस में परिवर्तित हो जाती है जिसके फलस्वरूप पूरा लिवर क्षतिग्रस्त हो जाता है। इसके अलावा लिवर का कैंसर भी हो सकता है।
इलाज शुरू करने से पहले यह जरूर जान लेना चाहिए कि रोगी को दोनों में से कौन सा हेपेटाइटिस है क्योंकि दोनों का इलाज अलग है। इन दोनों की ही तरह हेपेटाइटिस का इलाज यदि शुरुआत में ही करा लिया जाए तो पूरी तरह से ठीक होने की संभावना अधिक रहती है, पर ज्यादा देर होने पर यकृत क्षतिग्रस्त हो जाता है और फिर इलाज के बहुत अच्छे परिणाम नहीं मिलते। इनमें 20 से 25 प्रतिशत रोगी दवाओं के साथ परहेज से ठीक हो जाते हैं, लेकिन 80 प्रतिशत में यह बीमारी क्रॉनिक हो जाती है।
लक्षण त्वचा और आँखों का पीलापन (पीलिया), गहरे रंग का मूत्र, अत्यधिक थकान, उल्टी और पेट दर्द। लोगों को इन लक्षणों से निजात पाने में कुछ महीनों से लेकर एक साल तक का समय लग सकता है। हेपेटाइटिस बी क्रॉनिक लिवर संक्रमण भी पैदा कर सकता है जो बाद में लिवर सिरोसिस या लिवर कैंसर में परिवर्तित हो सकता है।
एहतियात - घाव को खुला न छोड़ें। यदि त्वचा कट फट जाए तो उस हिस्से को डिटॉल से साफ करें। - शराब पीना बंद कर दें। - किसी के साथ अपने टूथब्रश, रेजर, सुई, सिरिंज, नेल फाइल, कैंची या अन्य ऐसी वस्तुएं जो आपके खून के संपर्क में आती हो, शेयर न करें। - ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के मार्च के अंक में कहा गया है कि यहां तक कि एक्यूपंक्चर संक्रमित सुई के माध्यम से हेपेटाइटिस बी और सी दोनों को फैला सकता है। अत: किसी भी चीज को शेयर करने के प्रति सावधान रहें।
निवारण मौजूदा नियमित टीकाकरण के एक हिस्से के तहत तीन या चार अलग-अलग खुराक में हेपेटाइटिस बी का टीका दिया जा सकता है। नवजात बच्चों, छह माह और एक वर्ष की आयु के समय में यह टीका दिया जाता है। ये कम से कम 25 साल उम्र तक सुरक्षा प्रदान करते हैं।

हेपेटाइटिस सी 
खामोश मौत दे सकता है टैटू 

हेपेटाइटिस सी को खामोश मौत की संज्ञा दी गई है। शुरू-शुरू में इसका कोई प्रभाव नहीं दिखता और जब दिखता है तो मौत एकदम से सामने खड़ी होती है। यह खून के संक्रमण से फैलता है। हाथ पर टैटू गुदवाने, संक्रमित खून चढ़वाने, दूसरे का रेजर उपयोग करने आदि की वजह से हेपेटाइटिस सी होने की संभावना रहती है। हेपेटाइटिस सी अंतिम चरण में सिरोसिस और लिवर कैंसर के लिए जिम्मेवार होता है।
हेपेटाइटिस के अन्य रूपों की तरह हेपेटाइटिस सी, लिवर में सूजन पैदा करता है। हेपेटाइटिस सी वायरस मुख्य रूप से रक्त के माध्यम से स्थानांतरित होता है और हेपेटाइटिस ए या बी की तुलना में अधिक स्थायी होता है। युवाओं में टैटू लगवाने (गोदना) की प्रवृत्ति बढ़ रही है, लेकिन गैर विषाणुरहित और दोबारा इस्तेमाल किये गये उपकरण निश्चित तौर पर हेपेटाइटिस बी और सी के साथ-साथ एचआईवी के संचरण के स्रोत हैं।
चिकित्सक भी सौंदर्य चिकित्सा को लेकर चिंतित हैं जहां कई पदार्थो से मृत कोशिकाओं को हटाया जाता है। यहां तक कि जहां मृत त्वचा कोशिकाएं गिरी होती हैं, उसकी सतह पर कई दिनों तक हेपेटाइटिस सी का वायरस पनपता रहता है। अगर स्पा या सैलून स्ट्रिंजेंट स्टरलाइजेशन तकनीकों का इस्तेमाल नहीं करते हैं तो ग्राहक वायरस के संपर्क में आ सकते हैं।

हेपेटाइटिस सी वायरस के फैलने के अन्य तरीके -
दवा इंजेक्ट करने वाले उपकरणों (सुई, हीटिंग चम्मच आदि) को शेयर करने से। यह उप-सहाराई अफ्रीका के बाहर एचसीवी के संचरण का प्राथमिक स्रोत है। - किसी संक्रमित व्यक्ति के साथ असुरक्षित सेक्स से। - कभी-कभार प्रसव के दौरान संक्रमित माता से उसके बच्चे में हो सकता है। यह खतरा तब और भी बढ़ सकता है जब माता एचआईवी से भी संक्रमित हो। - संक्रमित रक्त से। - नाक से कोकीन का इस्तेमाल करने वाले उपकरणों को शेयर करने से।
लक्षण
कई लोगों में हेपेटाइटिस सी से संक्रमित होने पर भी कोई लक्षण नहीं दिखाई देते। अमूमन इसके लक्षण 15 से 150 दिन में विकसित हो सकते हैं। कुछ लोगों में कोई भी लक्षण नहीं दिखाई देता और ऐसे संक्रमित लोग ही वायरस को फैलाने में अहम भूमिका निभाते हैं। संक्रमित व्यक्ति एक वाहक का काम करता है। हालांकि इसके कुछ लक्षणों में भूख में कमी, पीलिया, उल्टी, अनिद्रा और अवसाद शामिल हो सकते हैं।

हेपेटाइटिस डी बी, सी को न रुके तो डी आएगा 


यह वायरस तभी होता है जब मरीज को बी या सी का संक्रमण हो चुका हो। हेपेटाइटिस डी वायरस बी पर सवार रह सकते हैं। इसलिए जो लोग हेपेटाइटिस से संक्रमित हो चुके हों, वे हेपेटाइटिस डी से भी संक्रमित हो सकते हैं।
बुरी खबर यह है कि जब कोई व्यक्ति डी से संक्रमित होता है तो सिर्फ बी से संक्रमित व्यक्ति की तुलना में उसके लिवर के नुकसान का खतरा अधिक होता है। सन् 1977 में पहचान की गई थी कि हेपेटाइटिस डी आम तौर पर संक्रमित इंट्रावीनस इंजेक्शन उपकरणों के द्वारा फैलता है। हेपेटाइटिस बी के खिलाफ प्रतिरक्षित होने पर यह कुछ हद तक हेपेटाइटिस डी से सुरक्षा कर सकता है।
वैसे तो सभी प्रकार के हेपेटाइटिस के लक्षण एक ही तरीके के होते हैं, इस कारण उपचार आरंभ करने से पहले परीक्षणों द्वारा यह पता लगा लेना चाहिए कि किस प्रकार के वायरस के संक्रमण हैं तभी इसका इलाज शुरू करना चाहिए। इस बीमारी में जितनी जरूरी दवाएं होती हैं, उतना ही जरूरी परहेज भी है। हेपेटाइटिस एक की प्रारंभिक अवस्था परहेज से ही ठीक हो जाती है।

लक्षण : थकान, उल्टी, हल्का बुखार, दस्त, गहरे रंग का मूत्र ।
टीका : एचबी का टीका लेने से कुछ हद तक सुरक्षा मिलती है।

हेपेटाइटिस ई 
हेपेटाइटिस ई एक जलजनित रोग है और इसके व्यापक प्रकोप का कारण दूषित पानी या भोजन की आपूर्ति है। प्रदूषित पानी इस महामारी को बढ़ा देता है और स्थानीय क्षेत्रों में छिटपुट मामलों के स्रोत कच्चे या अधपके शेलफिश को खाना होता है। इससे वायरस के फैलने की संभावना अधिक होती है। हालाकि अन्य देशों की तुलना में भारत के लोगों में हेपेटाइटिस ई न के बराबर होता है। बंदर, सूअर, गाय, भेड़, बकरी और चूहे इस संक्रमण के प्रति संवेदनशील हैं।
(मीनाक्षी,हिंदुस्तान,दिल्ली,18 मई,2010)

3 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी और उपयोगी जानकारी से भरी प्रस्तुती /

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  2. इतनी काम की जानकार इतने सरल शैली में मुहैया कराकर आपने बड़ा ही उपकार का काम किया है। साधुवाद !!

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  3. हेपटाइटिस ए सबसे पुराना रूप है वाइरस जनित हेपटाइटिस का . सामान्य रूप से बचपन में होने वाला पीलिया ज्यादातर ए से ही होता है लेकिन एक बार इससे गुजरने के बाद इससे सरक्षा मिल जाती है .
    बी और सी ज्यादा खतरनाक है लेकिन ये भी वाइरस से होते हैं .

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