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शनिवार, 26 मई 2012

नींद में पेशाब की समस्या लड़कों में ज्यादा होती है

बच्चों की नींद में बिस्तर गीला करने की समस्या को पालक अक्सर समझ नहीं पाते हैं। अधिकतर यह नहीं जानते कि उन्हें इस बारे में क्या करना चाहिए और क्या नहीं। बिस्तर गीला करना बचपन की एक आम समस्या है। विभिन्न अध्ययनों के ज़रिए शोधकर्ता नींद में बिस्तर गीला करनेके कई कारणों को खोज पाए हैं।  

हालिया शोध अध्ययन नींद में बिस्तर गीला करने की समस्या व इससे जुड़े भ्रम पर प्रकाश डालता है। इसके नतीजों में बच्चों की इस शर्मिंदगी भरी समस्या के कारणों के साथ ही इसके लिए उपायों के बारे में भी बताया गया है। एलबर्टा विश्वविद्यालय, कनाडा में पीडियाट्रिक यूरोलॉजी के असि. प्रोफेसर डार्सी किडू का मानना है कि इस समस्या से कई भ्रांतियाँ जुड़ी हैं। अधिकतर पालक सोचते हैं कि यह समस्या बच्चों के काबू में होती है, वे चाहें तो इसे नियंत्रित कर सकते हैं। शोधकर्ता डॉ. किडू के मुताबिक पालकों को यह समझना जरूरी है कि बच्चे का इस पर कोई नियंत्रण नहीं होता। बेवजह इस समस्या के लिए बच्चों को डाँटना-फटकारना उचित नहीं है।  

कारण 
बच्चे की उम्र चाहे जो हो, यदि बिस्तर गीला करने की समस्या के कारण उसका जीवन प्रभावित हो रहा हो तो चिकित्सकीय सलाह की ज़रूरत होती है। बच्चे बिस्तर गीला करने के बाद घबराने लगें या फिर इसके डर से कहीं भी जाने से कतराने लगें तो चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए। नींद में पेशाब करने का कारण पता करने के लिए सबसे पहले बच्चे की दिन भर की गतिविधियों पर गौर करना ज़रुरी है। ब्लैडर का अधिक सक्रिय होना यदि समस्या का कारण है तो आमतौर पर इसके लक्षण दिन में दिखाई देते हैं जैसे बार-बार पेशाब आना, पेशाब रोक न पाना आदि। हारमोन के स्तर में असंतुलन से मूत्राशय का कार्य प्रभावित हो सकता है। इसके लिए चिकित्सकीय उपचार की आवश्यकता भी हो सकती है,हालांकि नींद में बिस्तर गीला करने वाले अधिकतर बच्चों को दवाओं की ज़रूरत नहीं पड़ती।  

उचटी हुई नींद की वजह से भी बच्चा पेशाब आने पर जाग नहीं पाता है। इस शोध के अनुसार,लड़कों के बिस्तर गीला करने की आशंका लड़कियों के मुक़ाबले दोगुना से भी ज़्यादा होती है। यदि बच्चे की मां भी बचपन में इससे प्रभावित रही हो तो उसके बच्चे के बिस्तर गीला करने की आशंका सामान्य के मुक़ाबले साढ़े तीन गुना अधिक होती है। इसके अलावा,तनाव,घर में नए सदस्य का आना,स्थान परिवर्तन या किसी करीबी की मृत्यु होने पर बच्चे अस्थायी रूप से बिस्तर गीला करने लगते हैं,हालांकि यह कारण कम ही ज़िम्मेदार होता है और इससे समस्या अस्थायी रूप से ही होती है। बेडवेटिंग का कारण जानने का दूसरा क़दम है-बच्चे का शारीरिक परीक्षण।  

अमेरिका के वेक फॉरेस्ट विश्वविद्यालय के पीडियाट्रिक यूरोलॉजिस्ट स्टीव जे. हॉजेस मानते हैं कि कब्ज़ नींद में बिस्तर गीला करने का एक आम कारण है,लेकिन अक्सर इसे नज़रंदाज़ कर दिया जाता है। कब्ज़ होने पर बड़ी आंत में मल जमा हो जाता है जिससे मूत्राशय पर ज़ोर पड़ता है और बच्चा पेशाब रोक नहीं पाता। अल्ट्रासाउंड या एक्स-रे से इस स्थिति का पता लगाया जा सकता है। हॉजेस के हाल ही में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार,नींद में बिस्तर गीला करने वाले हर 5 में से 4 बच्चों की एक्स-रे जांच में कब्ज़ के संकेत दिखाई दिए जबकि 10 में से केवल 1 को इसके लक्षण महसूस हुए थे। कब्ज़ के उपचार के बाद 83 प्रतिशत बच्चों ने तीन महीने के भीतर बिस्तर गीला करना बंद कर दिया।  

उपाय 
बेड अलार्म : बिस्तर के नम होते ही अलार्म बजना प्रभावी इलाज है। ये विशेष बेड अलार्म बिस्तर पर थोड़ी सी भी नमी होते ही बजने या वाइब्रेट होने लगते हैं। ताज़ा शोध से पता चलता है कि बेड अलार्म का उपयोग करने वाले ६६ प्रतिशत बच्चों ने अगली १४ रातों तक बिस्तर गीला नहीं किया। वहीं कोई भी उपाय न करने पर केवल ४ प्रतिशत बच्चों में ही इस तरह का सुधार हो पाया। अलार्म का उपयोग बंद करने के बाद भी बच्चों में सुधार जारी रहा(सेहत,नई दुनिया,मई तृतीयांक 2012)। 

इसी विषय पर इस ब्लॉग पर पूर्व में प्रकाशित  
इन और इन 
आलेखों को भी देखिए।

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मंगलवार, 13 मार्च 2012

मूत्र मार्ग संक्रमण

मूत्र मार्ग संक्रमण जीवाणु जन्य संक्रमण है जिसमें मूत्र मार्ग का कोई भी भाग प्रभावित हो सकता है। हालाँकि मूत्र में तरह-तरह के द्रव एवं वर्ज्य पदार्थ होते है किंतु इसमें जीवाणु नहीं होते। यूटीआई से ग्रसित होने पर मूत्र में जीवाणु भी मौजूद होते हैं। जब मूत्राशय या गुर्दे में जीवाणु प्रवेश कर जाते हैं और बढ़ने लगते हैं तो यह स्थिति आती है। 

मूत्र-मार्ग ६ प्रमुख अंगों - दो गुर्दें, दो मूत्रवाहिनियों, मूत्राशय और यूरेथ्रा से मिलकर बना होता है। गुर्दे रक्त को साफ करके उसमें मौजूद अनुपयोगी या विषैले तत्वों को हटाकर मूत्र के ज़रिए शरीर से बाहर निकालने का काम करता है। सबसे पहले गुर्दा रक्त की सफाई करता है और सफाई के बाद जो गंदा तरल पदार्थ निकलता है वह मूत्रवाहिनी के रास्ते मूत्राशय में जमा हो जाता है। जब मूत्राशय पूरी तरह भर जाता है तब यूरेथ्रा पर दबाव पड़ता है, इसी वजह से मूत्र त्याग करने की ज़रूरत महसूस होती है। मूत्र के सामान्य प्रवाह में किसी भी प्रकार की रुकावट संक्रमण के लिए ज़िम्मेदार होती है जैसे गुर्दे की पथरी, बढ़ी हुई प्रोस्टेट या मूत्र मार्ग में किसी भी प्रकार का संरचनात्मक विकार। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में संक्रमण का खतरा ज़्यादा होता है क्योंकि उनका मूत्रमार्ग छोटा होता है और योनि के पास होने से जीवाणु आसानी से मूत्रमार्ग में प्रवेश कर जाते है। गर्भावस्था में भी मूत्रमार्ग के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है जिसका सीधा असर बच्चे पर पड़ता है। इस कारण से बच्चा समय से पहले और कम वज़न का हो सकता है। 

प्रमुख लक्षण
-मूत्रमार्ग में जलन। गुप्तांग में खुजली।
-बार-बार पेशाब त्यागना।
-पेशाब करते वक्त दर्द होना।
-मूत्र में से दुर्गंध आना।
-कभी-कभी मूत्र के साथ रक्त का आना। -कंपकपी के साथ बुखार आना। -भूख न लगना। -कमज़ोरी और थकान महसूस होना। -बच्चे का कद और वजन न बढ़ना।

निदान 
इस संक्रमण का पता करने के लिए कई प्रकार के परीक्षण हैं, इनमें सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है मूत्र का विश्लेषण करना। जाँच के लिए मूत्र का नमूना भेजा जाता है। उसमें अगर बैक्टीरिया और श्वेत रक्त कोशिकाओं की मौजूदगी से मरीज़ के संक्रमण से ग्रसित होने का पता लगता है। इसके अलावा भी कई जाँचें कराई जा सकती हैं जैसे टोटल ब्लड काउंट, इंट्रावीनस पायलोग्राम (आईवीपी), सीटी स्कैन और ब्लड कल्चर।

उपचार 
मूत्र मार्ग संक्रमण का उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि संक्रमण कौन से रोगजनक कीटाणु पैदा कर रहे है और वो कौन-सी दवाइयों के लिए संवेदनशील है। इलाज के लिए मुख्य रुप से एंटीबायोटिक दवाएँ दी जाती हैं।  

बचाव  
- संक्रमण से बचने के लिए शरीर की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए। टॉयलेट हमेशा साफ-सुथरा रखें।

-खानपान की स्वच्छता का ध्यान रखना भी ज़रुरी है। गंदी जगह पर बनाया गया खाना खाने से भी यह परेशानी हो सकती है। खाने का संक्रमण खून में मिल जाता है इसलिए उससे भी मूत्र मार्ग में संक्रमण हो सकता है।

-पानी और तरल पदार्थों का सेवन अधिक मात्रा में करना चाहिए।

-हमेशा सूती कपड़े के इनरवेयर ही पहनने चाहिए। 

-सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि जैसे ही संक्रमण का कोई भी लक्षण महसूस होने पर तुरंत डॉक्टरी सलाह लें। देर करने से ये संक्रमण बढ़कर ऊपर गुर्दों तक पहुँच कर उन्हें क्षतिग्रस्त कर सकता है(डॉ. सुमित्रा यादव,,सेहत,नई दुनिया,मार्च प्रथमांक 2012)।

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शनिवार, 10 मार्च 2012

रुक सकता है बच्चों का नींद में बिस्तर भिगोना

कई बच्चे अनजाने में नींद में बार बार बिस्तर में पेशाब कर देते हैं। इन बच्चों को इस बीमारी से बहुत लज्जित होना पड़ता है व कुछ को पालकों की प्रताड़ना भी झेलनी पड़ती है। इस बीमारी को नॉक्टर्नल एन्युरेसिस कहते हैं। ज़्यादातर बच्चे ५ वर्ष की उम्र के बाद पेशाब रोक पाते हैं। कभी-कभी नियंत्रण खोना सामान्य है। पर यदि ऐसा कई बार यानी हफ्ते में दो बार से अधिक और लगातर ३ महीनों से ज़्यादा समय के लिए हो रहा है तो यह बीमारी के लक्षण हैं। यह तकलीफ ५ वर्ष की उम्र के ७ प्रतिशत लड़कों में और ३ प्रतिशत लड़कियों में पाई जाती है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ इनकी संख्या में कमी आती जाती है।


पेशाब पर हम नियंत्रण कैसे करते हैं?
पेशाब की थैली भर जाने पर यह सूचना तंत्रिकाओं द्वारा हमारे मस्तिष्क तक पहुँचती है और नींद में होने के बावजूद मस्तिष्क हमें उठने की चेतना देता है ताकि मूत्र त्याग कर पेशाब की थैली को खाली किया जा सके। हम उचित समय एवं स्थान होने तक मूत्र त्यागने की इच्छा को रोक सकते हैं। यदि यह मूत्र त्याग रोकने की क्षमता देरी से विकसित हो या फिर पेशाब मार्ग या तंत्रिकाओं की रचना में खराबी हो तो ये बच्चे इसको नियंत्रित नहीं कर पाते।

क्यों करते हैं बच्चे बिस्तर गीला?
अनुवांशिक कारणों को छोड़कर अन्य कई कारणों से यह परेशानी हो सकती है। इनमें कुछ मानसिक और कुछ शारीरिक कारण शामिल हैं। मानसिक कारणों में बच्चे का अत्यधिक चंचल होना या लगातार तनावग्रस्त होना शामिल है। शारीरिक कारणों में एवीपी (अर्जिनीन वेसोप्रेसीन) नामक हारमोन का कम बनना या पेशाब मार्ग की रचना में खराबी होना शामिल हैं। कुछ बच्चों में इस परेशानी का कोई कारण नहीं होता और ये परेशानी महज़ उनके इस क्षमता के देरी से विकसित होने से होती है। 


प्राइमरी नॉक्टर्नल एन्युरेसिस 
कुछ बच्चे जन्म से ही कभी भी पेशाब रोकने पर नियंत्रण नहीं कर पाते हैं। इसे प्राइमरी नॉक्टर्नल एन्युरेसिस कहते हैं। 


सेकंडरी नॉक्टर्नल एन्युरेसिस 
कुछ बच्चे पेशाब पर नियंत्रण शुरू में तो कुछ समय के लिए पा लेते हैं(6 महीने से अधिक समय) लेकिन परेशानियों के आने पर फिर इसे खो देते हैं। पेशाब मार्ग में संक्रमण,मधुमेह,अत्यधिक मानसिक तनाव आदि इन परेशानियों में शामिल हैं। 


पालक क्या करें 
बच्चे को चिकित्सक के पास ले जाएं जिससे उन्हें समुचित सलाह मिल पाए(डॉ.अंजली भराणी,सेहत,नई दुनिया,मार्च प्रथमांक 20120।

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मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

पुरुष संतानहीनता

अनादिकाल से संतानहीनता से ग्रस्त हर पुरुष इस यक्ष प्रश्न का उत्तर चाहता रहा है कि वह संतानोत्पत्ति में सक्षम है या नहीं। पूर्ण पुरुष उसे ही माना जा रहा है, जो विवाह उपरांत संतानोत्पत्ति कर सके। संतान की उत्पत्ति के लिए शुक्राणु और अंडाणु का सफल निषेचन होना चाहिए। संतानहीनता की स्थिति में पति और पत्नी दोनों के मन में यह उथल-पुथल रहती है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है। 

पूर्ण रूप से स्वस्थ एवं विकसित पुरुष भी संतानोत्पत्ति करने में सक्षम ही हो यह जरूरी नहीं है। यह भी जरूरी नहीं कि पूर्ण रूप से अविकसित पुरुष संतानोत्पत्ति न कर सके। पुरुष संतानहीनता के कई कारण होते हैं। इनमें से कई का निवारण किया जा सकता है। 

मुख्य कारण 
 - वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या एवं गुणवत्ता में कमी एवं नपुंसकता।
-शुक्राणु की गतिशीलता में कमी।
-शुक्राणु का गतिशील न होना।
-शुक्राणु का मृत एवं विकृत होना।
-शुक्राणुओं का न होना।
-वीर्य में संक्रमण एवं एंटीबॉडीस्‌ का होना।
-वीर्य का न बनना एवं बाहर न जा पाना।
-सेक्स ज्ञान का अभाव एवं संतानोत्पत्ति के लिए प्रजनन समय ज्ञान का अभाव। 
इनके अलावा कई और भी कारण हो सकते हैं।

क्या आप जानते हैं?
-पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या १०० से १५० लाख प्रति मिली लीटर होती है।
-जिन पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या २० लाख है, वे भी प्राकृतिक रूप से पिता बन सकते हैं।
-जिन पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या १ लाख से कम है, वे कृत्रिम गर्भाधान की आईव्हीएफ पद्धति अपना सकते हैं।
-जिन पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या २० लाख से कम है, वे भी प्राकृतिक रूप से पिता बन सकते हैं बशर्ते उनमें शुक्राणुओं की गुणवत्ता अच्छी हो अन्यथा ये पुरुष वर्ग कृत्रिम गर्भाधान की आईयूआई पद्धति अपना सकते हैं।  

अनुपस्थित शुक्राणु 
कई पुरुषों में शुक्राणु अनुपस्थित रहते हैं। उनके मन में ये सवाल उठते हैं कि -क्या मैं पिता बन सकता हूँ? -क्या मैं अपने शुक्राणुओं से ही अपनी संतान का पिता बन सकता हूँ? आज से तीन-चार दशक पहले इसका जवाब "नहीं" था। पर आज इन प्रश्नों का जवाब "हाँ" में है। पहले तकनीक की सफलता दर २० से ३० प्रतिशत थी, किंतु आजकल ७० प्रतिशत है। जिन पुरुषों के वीर्य में शुक्राणु नहीं है वे टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक-इक्सी, मिक्सी एवं पिक्सी अपनाकर स्वयं के शुक्राणुओं से ही पिता बन सकते हैं। 

किसे होगा इससे फायदा 
इसके लिए संतानहीन पुरुषों का जनेन्द्रिय परीक्षण, सोनोग्राफी, कलर डॉप्लर, रक्त में विशेष हारमोन्स का स्तर एवं अंडकोष की बॉयप्सी कर इसका कारण पता लगाना जरूरी होता है। इन सारी जाँचों के दुरुस्त पाए जाने पर ये इस तकनीक का फायदा उठा सकते हैं।

महत्वपूर्ण जाँचें 
महत्वपूर्ण जाँचें, जो पुरुष संतानहीनता के सभी मरीजों के लिए बेहद जरूरी है-
-वीर्य की उच्च स्तरीय जाँच विशेषज्ञ द्वारा -संक्रमण होने पर कल्चर की जाँच -पुरुष हारमोन्स के स्तर की जाँच
-एंटीबॉडीज के स्तर की जाँच 
- गुप्तांगों की सोनोग्राफी एवं कलर डॉप्लर की जाँच, जरूरत होने पर अंडकोष की बॉयप्सी। 

उपचारः 
शुक्राणु की संख्या, गुणवत्ता, गतिशीलता की कमी एवं संक्रमण, एंटीबॉडीस्‌ का विशेषज्ञों द्वारा नियमित उपचार काफी हद तक इन कमियों को दूर कर सकता है। दूसरी बात खान-पान, योग, संयमित एवं नशारहित जीवन एवं सेक्स का पूर्ण ज्ञान संतानोत्पत्ति के लिए काफी लाभदायक सिद्ध हुआ है। तनावपूर्ण जीवन, शराब, सिगरेट, ड्रग्स, अत्यधिक मोबाइल, कम्प्यूटर, लेपटॉप का उपयोग, शुक्राणुओं की संख्या एवं गुणवत्ता संतानहीनता के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। इसके कारण पुरुष संतानहीनता में निरंतर वृद्धि हो रही है। सभी प्रयासों एवं कृत्रिम गर्भाधान की तकनीकों को अपनाकर अगर आप पिता बनने में सक्षम नहीं हैं और आप कृत्रिम गर्भाधान की आधुनिकतम तकनीक के लिए भी उपयुक्त नहीं हैं तो भी निराश होने की जरूरत नहीं है। पुरुष संतानहीनता के क्षेत्र में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान कई तरह के सफल समाधान प्रस्तुत करता है(डॉ. अजय जैन,सेहत,नई दुनिया,फरवरी प्रथमांक 2012)।

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शनिवार, 14 जनवरी 2012

प्रौढावस्था की एक प्रक्रिया है प्रोस्टेट वृद्धि

प्रत्येक पुरुष जब ५० की उम्र पार करता है तो, उसे प्रोस्टेट नाम परेशान करने लगता है और इस समय से वह प्रोस्टेट से संबंधित विभिन्न अनुभवों पर आधारित कहानियाँ सुनता है और उलझन में पड़ जाता है कि इससे छुटकारा कैसे पाया जाए। पहले यह समझना होगा कि प्रोस्टेट क्या है? चिकित्सा विज्ञान के अनुसार प्रोस्टेट शरीर के जननांगों में से एक महत्वपूर्ण अंग है। इसका निर्माण भ्रूणावस्था में ही हो जाता है। प्रोस्टेट से निकलने वाला पदार्थ उसकी प्रजनन शक्ति के लिए आवश्यक होता है। 

पुरुष के शरीर में हर अवस्था में विभिन्न अंगों में परिवर्तन होते हैं। उसी तरह से प्रोस्टेट ग्रंथि में एवं मूत्राशय में भी परिवर्तन होते हैं। इन कारणों से उम्र के साथ-साथ मूत्र विसर्जन की प्रक्रिया में भी बदलाव आता है। इन बदलावों के कुछ दूसरे कारण भी हो सकते हैं- जैसे मूत्राशय की नली में खराबी, पेशाब रोकने की क्षमता में कमजोरी एवं शरीर की अन्य बीमारियाँ जैसे मधुमेह इत्यादि। 

मूत्र विसर्जन की प्रक्रिया में हुए परिवर्तन जैसे- बार-बार जाना, रात में बार-बार जाना, मूत्र का अचानक आ जाना, पेशाब एक बार में न हो पाना, मूत्र की धार पतली होना या मूत्रत्याग करने में समय ज्यादा लगना इत्यादि हैं। ऐसी अवस्था में मूत्र रोग विशेषज्ञ से उचित सलाह लेकर पूर्ण जाँच करवाकर इन परिवर्तनों के विभिन्न कारणों को जाना जा सकता है एवं उचित कारण मिलने पर उचित इलाज किया जा सकता है। मूत्र से संबंधित लक्षणों के कारण पुरुष का सामाजिक जीवन प्रभावित होने लगता है जैसे ज्यादा सफर न कर पाना, सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल न हो पाना इत्यादि। अतः इनका निदान आवश्यक हो जाता है। मूत्र प्रक्रिया में आए इन सब परिवर्तनों में प्रोस्टेट का अंग भी शामिल है। प्रोस्टेट में हुए बदलाव कुछ पुरुषों में कोई परेशानी नहीं करते, कुछ में कम और कुछ में ज्यादा परेशानी पैदा करते हैं। इसी कारण से प्रोस्टेट से संबंधित लक्षणों का इलाज भी सामान्य निरीक्षण से लेकर दवाईयाँ एवं शल्यक्रिया सम्मिलित हैं। हर अवस्था में कौन सा विकल्प कब और कहाँ तक उचित है यह मूत्र रोग विशेषज्ञ से सलाह लेकर तय किया जा सकता है।

प्रोस्टेट से संबंधित शल्यक्रिया की बात करें,तो प्रोस्टेट में बढ़ी हुई गठान को मुख्यतया दो प्रकार से निकाला जाता है। चीरा लगाकर उसे एक बार में ही पूरा निकाला जा सकता है। दूरबीन पद्धति से गठान को कई टुकड़ों में करके बाहर निकाला जाता है। दूरबीन पद्धति में गठान को टुकड़ों में बदलने के लिए एवं खून के स्राव को रोकने के लिए दो तरह की ऊर्जा स्रोत का उपयोग किया जाता है। पहली विद्युत ऊर्जा एवं दूसरी लेजर ऊर्जा। विकसित देशों में चिकित्सा विज्ञान में हो रहे कुछ अध्ययनों में लेसर ऊर्जा के उपयोग से होने वाले लाभ विद्युत ऊर्जा के उपयोग से होने वाले लाभों की समानता में आ रहे हैं। 

विकसित देशों में अभी भी स्वर्णिक मानदंड विद्युत ऊर्जा ही है। दोनों के उपयोग में होने वाले ख़र्च में काफी अंतर है,पर उससे होने वाले लाभों में ज्यादा अंतर नहीं है। अतः,मूत्र रोग विशेषज्ञ की सलाह पर आप इनमें से उचित तरीक़े से इलाज़ ले सकते हैं(डॉ. राकेश पाराशर,सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर पंचमांक 2011)

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बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

स्वप्नदोष में आयुर्वेद

यौन-जीवन तभी सफल हो सकता है जब स्त्री और पुरूष दोनों स्वस्थ हों। पुरुषों के शरीर में वीर्य लगातार बनता रहता है। वीर्य को रखने के लिए स्थान की कमी पड़ जाती है। इसलिए, अंडकोष वीर्य को बाहर कर नए वीर्य बनाने के लिए पुराने वीर्य को बाहर कर देते हैं। इस तरह की क्रिया होना सामान्य है। लेकिन बार-बार स्वप्नदोष होने से पुरुषों को कई प्रकार की शारीरिक या मानसिक कमजोरी हो सकती है। बहुत अधिक स्वप्न दोष होने पर उसे निम्न उपायों से रोका जा सकता हैः

- आंवलें का मुरब्बा रोज खाने से स्वप्नदोष में लाभ होता है। 
- कांच के गिलास में बीस ग्राम पिसा हुआ सुखा आंवला डाले। इसमें साठ ग्राम पानी भरें और फिर बारह घंटे भीगने दें। फिर छानकर इस पानी में एक ग्राम पीसी हुई हल्दी मिलाएं और पीएं। 
- पिसे हुए अनार के छिलके पांच ग्राम सुबह और शाम लेने से स्वप्न दोष नहीं होता। 
- केला स्वप्न दोष और प्रमेह में लाभदायक है। दो केले खाकर ऊपर से एक पाव गरम दूध तीन महीनें तक रोज पीएं। 
- लहसुन की दो कुली टुकड़े करके पानी से निगल जाएं। इससे स्वप्नदोष नहीं होगा। यह प्रयोग रात को सोते समय हाथ-पैर धोकर रोज करें। 
- प्याज दस ग्राम सफेद प्याज का रस, अदरक का रस आठ ग्राम, शहद पांच ग्राम, घी तीन ग्राम मिलाकर रात्रि को सोते समय पीने से स्वप्नदोष नहीं होता। 
- धनिये को पीसकर मिश्री मिलाकर ठण्डे जल से लेने से स्वप्नदोष नहीं होता। 
- तुलसी की जड़ के छोटे-छोटे टुकड़े पीसकर पानी में मिलाकर पीने से लाभ होता है। 
- सुखा धनिया कूट, पीसकर छान लें। इसमें समान मात्रा में पीसी हुई चीनी मिलाएं। सुबह भूखे पेट रात के पानी से एक चाय की चम्मच फक्की लें और एक घंटे तक कुछ न खाएं पीएं(दैनिक भास्कर,उज्जैन,12.10.11)।

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सोमवार, 25 जुलाई 2011

नपुंसकताःकारण,मिथक और निवारण

प्राइवेट पार्ट में पर्याप्त तनाव न आने या पर्याप्त तनाव आने के बाद भी सही तरीके से सहवास न कर पाने को नपुंसकता कहा जा सकता है। आजकल नपुंसकता या इम्पोटेंसी की बजाय इरेक्टाइल डिसफंक्शन (सही तनाव का अभाव) कहा जाता है।

पुरुष के सेक्स चक्र में चार चरण होते हैं। कामेच्छा, इंद्रिय में पर्याप्त तनाव, स्त्री जननांग में प्रवेश और चरम सीमा। कई बार कामेच्छा की कमी तो कई बार नर्वस सिस्टम की गड़बड़ी की वजह से उत्तेजना में कमी आ सकती है। 65-70 साल की उम्र के बाद कई बार पुरुष हॉर्मोंस की कमी से भी यह समस्या उठ खड़ी होती है। एक आदमी को एक अवस्था में पर्याप्त उत्तेजना आती है जैसे कि सुबह के वक्त, पेशाब करते समय या मास्टरबेशन के वक्त, पर उसे दूसरी अवस्था में उत्तेजना नहीं आती तो यह समस्या मानसिक मानी जाएगी, शारीरिक नहीं। विशेष रूप से डायबीटीज के मरीजों में यह समस्या अक्सर पाई जाती है।

शुगर नपुंसकता का एक बड़ा कारण है। डायबीटीज के मरीजों के सेक्स चक्र में कामेच्छा और चरम/ स्खलन अवस्था तो नॉर्मल ही बनी रहती है, पर प्राइवेट पार्ट के तनाव में अक्सर कमी आ जाती है। ऐसे मरीजों को शुगर कंट्रोल में करनी चाहिए ताकि समस्या ज्यादा न बढ़े। अगर शुगर के कंट्रोल में होने के बाद भी तनाव में हुई कमी बनी रहती है तो ऐसी अवस्था में देसी वायग्रा या वायग्रा कारगर साबित हो सकती है। यह गोली 50 या 100 मिलीग्राम की मात्रा में उपलब्ध है, जिसे सहवास से एक घंटा पहले लेना चाहिए। खाली पेट यह गोली ज्यादा कारगर साबित होती है। चौबीस घंटों में यह गोली ज्यादा-से-ज्यादा एक बार ही लेनी चाहिए। कई बार शारीरिक नपुंसकता के साथ-साथ मानसिक नपुंसकता भी जुड़ी रहती है। यह गोली दोनों अवस्थाओं में काम करती है।

शुक्राणुओं की कमी की वजह से कभी नपुंसकता नहीं आती। यहां तक कि नपुंसकता के मामले में शुक्राणुओं की जांच कराना बेकार है। नपुंसकता के शारीरिक कारण तो बहुत हैं, जैसे नर्व्स में गड़बड़, पुरुष हॉर्मोंस की कमी या एक बार नाकाम होने के बाद दिमाग में नाकामी का डर बैठ जाना। यहां मरीजों को यह समझना जरूरी है कि नाकामी सामान्य बात है। इसका मतलब अंत नहीं है। जैसे, एक क्रिकेटर पहली पारी में डबल सेंचुरी लगाए और दूसरी पारी में जीरो पर आउट हो जाए तो इसका मतलब यह नहीं कि बाद में वह कभी सेंचुरी मार ही नहीं सकता। ऐसे मरीज अपना आत्मविश्वास बढ़ाकर समस्या से छुटकारा पा सकते हैं(डॉ. प्रकाश कोठारी
सेक्सोलॉजिस्ट ,नवभारत टाइम्स,24.7.11)

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मंगलवार, 28 जून 2011

कामकाजी वर्ग में बढ़ रहा है बांझपन

मोबाइल फोन के अत्यधिक उपयोग से नपुंसकता की बात नई नहीं है, लेकिन दिल्ली के एक टेस्ट्यूबबेबी सेंटर के क्लिनिकल शोध में इसकी बहुत हद तक पुष्टि हुई है। क्लिनिक में बच्चे की चाहत लेकर पहुंचने वाले दंपत्तियों में से ३५ से ४० फीसदी पुरूषों के वीर्य में शुक्राणुओं की मात्रा कम पाई गई है। इनके शुक्राणुओं की क्षमता में ३० फीसदी तक कमी देखी गई। इनमें अधिकांश ऐसे पुरूष हैं जो बीपीओ, कॉल सेंटर, मार्केटिंग, मेडिकल रिप्रजेंटेटिव और जनसंपर्क के क्षेत्र में काम करने वाले लोग हैं।

दिल्ली में कैलाश कालोनी स्थित आईसस आईवीएफ सेंटर की निदेशक डॉ. शिवानी सचदेव गौड़ ने बताया कि हर महीने करीब ३० जोड़े बांझपन की शिकायत लेकर आते हैं। इसमें ४० फीसदी मामलों में पुरूषों में, ४० फीसदी मामलों में महिलाओं में और २० फीसदी मामलों में दोनों में ही कमियां पाई गई हैं। जिन पुरूषों के वीर्य में शुक्राणुओं की कमी होती है या शुक्राणुओं की गति कम होती है उनमें अधिकांश मोबाइल का अधिक उपयोगकर्ता पाए गए हैं।

डॉ. शिवानी के अनुसार, ऐसे पुरुषों के मोबाइल उपयोग का संदेह इससे भी होता है कि शुक्राणुओं के कमजोर या कम होने के बारे में अन्य सभी तरह का जांच कराने पर सबकुछ सामान्य आता है। फिर ऐसा लगता है कि इनके बांझपन का कारण टॉक्सिन है, जो फोन पर अधिक बात करने के कारण हो सकता है। 


डॉ. शिवानी के अनुसार, हाल ही में कनाडा की क्विंस यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने एक शोध किया, जिसमें यह पाया कि मोबाइल फोन के अत्यधिक प्रयोग से पुरूषों के शुक्राणुओं में कमी हो जाती है और वे कमजोर हो जाते हैं। यही नहीं, मोबाइल फोन के अत्यधिक प्रयोग से गतिशीलता व एकाग्रता में भी कमी आती है, जिससे प्रजनन क्षमता पर असर पड़ता है। इससे शुक्राणुओं की गुणवत्ता में भी कमी आती है। 

वैज्ञानिकों ने अपने शोध में यह भी पाया है कि जो लोग सेल फोन का उपयोग अधिक करते थे उनके हार्मोन भी निचले स्तर के थे। इन हार्मोन का काम मस्तिष्क के पिट्यूटरी ग्रंथि के स्तर को बनाए रखता है, जो दिमाग को संतुलित रखते हैं। सेल फोन से जो विद्युत चुंबकीय किरणें निकलती है उससे हार्मोन का स्तर और प्रजनन क्षमता दोनों गिर जाता है(नई दुनिया,दिल्ली,28.6.11)।

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रविवार, 13 मार्च 2011

भारतीय वैज्ञानिकों ने ढूंढा नपुंसकता का इलाज

भारतीय वैज्ञानिकों ने अब पुरुषों में नपुंसकता दूर करने का तोड़ ढूढ़ लिया है। इरेक्टाइल डिसफंक्शन (ईडी) से पुरुषों में होने वाले इस समस्या को दूर करने लिए एंजियोप्लास्टी थेरेपी का इस्तेमाल होगा। ईडी समस्या में पुरुषों में यौन उत्तेजना उत्पन्न करने वाली नसों में रक्त का बहाव धीमा हो जाता है। जिसे एंजियोप्लास्टी थेरेपी के माध्यम से खून के जमाव वाली धमनी के ऊपरी हिस्से पर एक कृत्रिम नलिका लगा दी जाती है। नतीजतन रोगी की स्थिति पहले जैसी सामान्य हो जाती है। इस विधि से45 की आयु पार करने वाले 100 पुरुषों पर किए गए अन्तिम ट्रायल के शत प्रतिशत परिणाम मिले हैं जिसकी रिपोर्ट इंडियन मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हो चुकी है। एशिया पेसिफिक वैस्कुलर इंटरवेंशनल कोर्स के चेयरमैन एवं अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डा. एनएन खन्ना ने यहां चल रहे तीन दिवसीय वास्कुलर इंटरवेंशन सम्मेलन के दौरान यह जानकारी दी। 

डा. खन्ना ने कहा कि इस विधि का रोगियों पर प्रयोग करने के लिए भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद, स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद(आईसीएमआर), औषध नियंत्रक को केस हिस्ट्री भेजा गया है। उम्मीद है कि वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर अधिकृत एजेंसियां अपनी जल्द ही स्वीकृति देगी। इस समस्या से देश में 45 की उम्र पार करने वाले 20 फीसद रोगी हैं। जिन्हें यह समस्या है उन्हें बाद में हार्ट अटैक या दिल की बीमारियां होने का खतरा होता है। यह मामला साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है। मधुमेह, उच्च रक्तचाप की दवाएं लेने वाले पुरुषों में ईडी रोग होने की सामान्य रोगियों की अपेक्षा 80 फीसद तक ज्यादा संभावनाएं रहती है। इस विधि के इस्तेमाल से यह तय है कि पुरुषों की आयु सीमा बढ़ेगी। डा. खन्ना ने कहा धमनियों की लाइलाज बीमारियों का इलाज अब आसान हो गया है। लेजर सर्जरी, स्टेंट थेरेपी और एंजियोप्लास्टी जैसी वैस्कुलर इंटरवेंशन के क्षेत्र में विकसित नई तकनीकों की मदद से अब सर्जरी के बिना ही धमनियों की उन बीमारियों का उपचार संभव हो गया जिनके उपचार के लिए पहले सर्जरी ही एक मात्र विकल्प होती थी। मल्टी लेर्यड, एंजियोप्लास्टी एवं लेजर थेरेपी नई तकनीकों में प्रमुख है।
(राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,13.3.11)

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शनिवार, 1 जनवरी 2011

बच्चों में फायमॉसिसःसमस्या और समाधान

स्मेग्मा क्या है?
प्रिप्युस के प्राकृतिक रूप से खुलने की प्रक्रिया के दौरान कभी-कभी चमड़ी और लिंग के मध्य पुट्टी के जैसा सफेद पदार्थ जमा हो जाता है। अक्सर पालक इसे मवाद या वीर्य समझकर भयभीत हो जाते हैं। दरअसल, यह चमड़ी की झड़ती हुई कोशिकाओं से बना होता है, जिसे स्मेग्मा कहते हैं।

सरकम सीजन क्या है?
यदि फायमॉसिस की वजह से बालक को समस्याएँ हो रही हों तो निश्चेतना की अवस्था में प्रिप्युस की चमड़ी को सावधानीपूर्वक काटकर निकाल दिया जाता है। इससे उसके लिंग का अग्रभाग स्थायी रूप से खुला रहता है और उसे पेशाब संबंधी या (युवावस्था में) संभोग संबंधी कोई समस्या नहीं होती है। आजकल यह ऑपरेशन "डे केयर सर्जरी" के रूम में किया जाता है और बालक को ऑपरेशन के कुछ घंटों बाद ही छुट्टी दे दी जा सकती है।

फायमॉसिस कब एक समस्या है?
१. मूत्र में जलन या मवाद का आना।

२. लिंग के अग्र भाग में सूजन या खुजली होना।

३. मूत्र के समय चमड़ी का फूलना।

४. पतली धार या बूँद-बूँद कर मूत्र गिरना।

उपरोक्त में से किसी समस्या के न होने पर भी यदि बालक की आयु ३-४ वर्ष से अधिक हो, तब भी इसे असामान्य माना जाता है, क्योंकि इस आयु के बाद प्राकृतिक रूप से चमड़ी खुल जाने की संभावना कम होती जाती है। बाल्यावस्था में ही इस समस्या का निदान एवं उचित उपचार न होने पर कभी-कभी पुरुष युवावस्था में संभोग संबंधी समस्या या फिर वृद्धावस्था में कैंसर जैसी समस्या का सामना कर सकते हैं।

क्या करें?
हर उम्र के शिशु की चमड़ी पूर्ण रूप से खुल जाना आवश्यक नहीं है। यदि शिशु की उम्र ३-४ वर्ष से कम है और उसे पेशाब या लिंग संबंधी कोई तकलीफ नहीं है तो ऐसे फायमॉसिस के लिए सामान्य देखभाल (चिकित्सक की सलाह) ही पर्याप्त है।

क्या न करें?
स्मेग्मा को मवाद समझकर उस पर डेटॉल या अन्य कोई दवा न लगाएँ। भूलकर भी चमड़ी को जोर लगाकर खोलने का प्रयत्न न करें। यह बालक के लिए काफी दर्दनाक होता है और इसके कारण सूजन आने की वजह से चमड़ी अधिक गंभीर रूप से चिपक सकती है। इसे पैथॉलॉजिकल फायमॉसिस कहा जाता है(डॉ. राहुल तनवानी,सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर,2010 तृतीय अंक)।

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सोमवार, 19 अप्रैल 2010

विकृत मूत्रांग के इलाज़ में नई क्रांति

छोटे बच्चों के मूत्रांग की जन्मजात विकृतियों या कंजेनाइटिल एनामली को ठीक कर फिर से प्राकृतिक अवस्था में लाने की दिशा में एक भारतीय डाक्टर ने ब्रेक-थ्रू डेवलपमेंट किया है। ये कारनामा हुआ है बीकानेर के एस.पी.मेडिकल कॉलेज के यूरोलॉजी विभाग के डाक्टर अमीलाल भट्ट की बदौलत। प्रख्यात यूरोलॉजिस्ट डा.वारेन स्नॉडग्रेस ने अमेरिकन यूरोलॉजिकल एसोसिएशन की प्रतिष्ठित जर्नल "द जर्नल ऑफ यूरोलॉजी" में डाक्टर भट्ट की ईजाद पर "ए फेयरवैल टू कॉर्डी" यानी ऑपरेशन की पुरानी तकनीक को अलविदा शीर्षक से संपादकीय लिखा है। । कैलेलिस एंड बेलमैन की "टैक्स्ट बुक ऑफ पीडिएट्रिक यूरोलॉजी" के नए संस्करण में भी "डा.भट्ट्स टैक्नीक ऑफ कार्डी करेक्शन" को शामिल किया गया है। इसके ऑपरेशन पहले भी होते थे मगर बाद में कई जटिलताएं सामने आती थीं-खासकर संतान उत्पत्ति में सक्षम न रह जाने जैसी स्थिति उत्पन्न होने की आशंका। पारंपरिक रूप से इसके इलाज़ के लिए पाइप स्टेम यूरीथ्रा बनाया जाता है । मगर, डाक्टर भट्ट ने,जिन ऊतकों को बेकार फाइब्रस सेल बताकर काटकर हटा दिया जाता था, उसी का उपयोग कर डायनैमिक यूरीथ्रा विकसित किया। "भट्ट्स टैक्नीक ऑफ कॉर्डी करेक्शन" तकनीक को अब पूरी दुनिया ने मान्यता दे दी है। इस कार्डी करेक्शन तकनीक का आलेखों में तो संदर्भ दिया ही जाता है, पाठ्यपुस्तक में भी इसे शामिल किया गया है। डाक्टर भट्ट इस तकनीक से अब तक लगभग आठ सौ ऑपरेशन नई कर चुके हैं। उन्होंने एक एल्गोरिद्म भी तैयार कर दी है जिसके विजुअल इफेक्ट के सहारे दुनिया कहीं भी बैठा सर्जन ऑपरेशन कर सकता है। इस विषय में दैनिक भास्कर में आज छपी धीरेन्द्र आचार्य की खबर कहती है कि डाक्टर भट्ट की शुरूआती ईजाद को कपोलकल्पना मानकर, जर्नल ने छापने से मना कर दिया था। उनकी पहल को पहली बार 2005 में,कांग्रेस ऑफ द इंटरनेशनल सोसायटी ऑन हाइपोस्पेडियाज एंड इंटरसेक्स डिसॉर्डर में गंभीरता से लिया गया। द जर्नल ऑफ यूरोलॉजी में इस तकनीक के प्रकाशन के बाद दुनिया भर के सर्जन ने इस तकनीक को अपनाना शुरु किया और हाइपोस्पेडियाज पर होने वाले हर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में डाक्टर भट्ट को बुलाया जाने लगा। पिछले साल ब्रिटेन में 28-29 मई को हुए एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में डाक्टर भट्ट को उनके काम के लिए रेड कार्पेट दिया गया जो एक भारतीय डाक्टर को दुनिया का सलाम था।

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शुक्रवार, 12 मार्च 2010