मलेरिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मलेरिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

मलेरिया से मरते हैं दो गुने

एक अध्ययन ने उजागर किया है कि मलेरिया से मरने वालों का जो पहले अनुमान लगाया गया था उससे दो गुना मरीज़ मर रहे हैं। मलेरिया फैलाने वाला मच्छर एक ऐसा हत्यारा है जो बच्चों और बड़ों के साथ ग़रीब और अमीर के बीच भेद नहीं करता। इस अध्ययन ने इस मान्यता को भी चुनौती दी है कि केवल ० से ५ साल तक के बच्चे ही मलेरिया की चपेट में आते हैं। यह एक ऐसी बीमारी है जिसकी रोकथाम की जा सकती है। 

शोध अध्ययन के मुताबिक वर्ष २०१० में मलेरिया से पूरे विश्व में १२ लाख से भी अधिक लोग मर चुके हैं। मलेरिया के संक्रमित परजीवी मच्छर के जरिए संक्रमण एक से दूसरे तक फैलता है। राष्ट्रीय मलेरिया अनुसंधान संस्थान ने मलेरिया के रोग परीक्षण, निदान एवं इलाज के लिए एक गाइडलाइन जारी की है। 

क्या हैं लक्षण 
- नाक बहना, खाँसी तथा श्वास संबंधी अन्य परेशानियाँ होना

-पेशाब में जलन होना तथा पेडू के निचले हिस्से में तीखा दर्द उठना। दस्त /पेचिश होना।

-त्वचा पर चकत्ते होना या कोई संक्रमण होना।

-ज़ख्म होकर मवाद पड़ना। 

- जोड़ों का सूजना और दर्द होना।

- कानों में से मैल का रिसाव होना।  

निदान 
रक्त पट्टिकाओं का माइक्रोस्कोप से परीक्षण करना मलेरिया के निदान का सर्वश्रेष्ठ एवं मानक परीक्षण माना जाता है। माइक्रोस्कोप का फायदा यह है कि मलेरिया के परजीवी रोगाणु अगर कम घनत्व में भी हों तो इसकी पकड़ में आ जाते हैं। 

रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट 
इस टेस्ट से तत्काल सुनिश्चित नतीजा निकल आता है। कई बार फील्ड से लैब तक सैंपल पहुँचाने में वक्त लग जाता है। इस टेस्ट से मलेरिया का इलाज जल्दी शुरु किया जा सकता है। मलेरिया के संक्रमण की जाँच इसलिए ज़रूरी है क्योंकि इसके बाद मरीज़ का पूर्णतः इलाज आसान हो जाता है। इसके अलावा मरीज़ को मलेरिया की अन्य जटिलताओं से मुक्त किया जा सकता है। चूँकि मलेरिया का संक्रमण मच्छरों के ज़रिए एक से दूसरे तक पहुँचता है इसलिए संक्रमित मरीज़ का इलाज तुरंत शुरु कर के मलेरिया के संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है। परीक्षण और जाँचों से इस नतीजे तक भी पहुँच सकते हैं कि मरीज़ के शरीर में संक्रमण ने दवाओँ के प्रति प्रतिरोधक शक्ति तो विकसित नहीं कर ली है। 

इलाज 
क्लोरोक्वीन या कुनैन की गोलियों का पूरा कोर्स करने से मलेरिया से मुक्ति मिल जाती है। कुछ मरीज़ों को कुनैन की गोलियों का एक समय अंतराल के बाद पुनः कोर्स कराया जाता है। कुनैन की गोलियों का सेवन खुद अपने मन से अथवा केवल केमिस्ट के कहने पर न करें। गर्भवती महिलाओं को मलेरिया होने की दशा में अपने चिकित्सक की सलाह से इलाज कराना चाहिए(डॉ. अनिल भदौरिया,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल तृतीयांक 2012)।

आगे चलें...

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

टीबी, मलेरिया से बना हुआ है भारत को खतरा

पोलियो, कुष्ठ रोग और एड्स से निपटने में काफी हद तक सफलता पाने के बावजूद भारत को टीबी, मलेरिया और कालाजार जैसी बीमारियों से लगातार खतरा बना हुआ है। देश में होने वाली कुल बीमारियों के 30 फीसदी हिस्से पर यही हावी हैं। मेडिकल जर्नल लैंसेट ने भारत पर आधारित अपनी प्रकाशन श्रृंखला में कहा है कि भारत में हैजा और टाइफाइड जैसी बीमारियां उपेक्षित हैं और उनकी सही तरीके से निगरानी भी नहीं होती। जर्नल में स्वास्थ्य विशेषज्ञों टी जैकब जॉन और विनोद पी शर्मा ने एक लेख लिखा है, जिसमें कहा गया है कि भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा तंत्र संक्रामक बीमारियों से पूरी तरह पराजित है, जिसके चलते बहुत से परिवारों को निजी क्षेत्र की शरण लेनी पड़ती है, जहां उपचार की कीमत बहुत ज्यादा है। कुछ ही संक्रामक बीमारियों को केंद्र सरकार द्वारा चलाए जाने वाले रोकथाम कार्यक्रमों के तहत प्राथमिकता पर लिया जाता है। यहां तक कि इनमें से भी सिर्फ एचआइवी और कुष्ठ रोग पर ही सफलता मिलती दिखाई दे रही है, तपेदिक, मलेरिया व कालाजार पर नहीं। लेखकों ने कहा है कि सभी संक्रामक बीमारियों पर प्रभावशाली तरीके से लगाम कसने के लिए सार्वजनिक व निजी क्षेत्रों में स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा बीमारियों की निगरानी केस स्टडी पर आधारित होनी चाहिए। इसके अलावा, सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा विकसित करने के तौर पर जिला स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया की सख्त जरूरत है। लेख में कहा गया है कि नियंत्रित की जा सकने वाली संक्रामक और अन्य बीमारियों के सामने सार्वजनिक क्षेत्र का स्वास्थ्य नेटवर्क कारगर साबित नहीं हो पा रहा है। इससे अनियमित निजी क्षेत्र को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन मिल रहा है और वह लोगों की जेबों से खूब पैसे ढीले कर रहा है। बीमारियों पर नियंत्रण के लिए जरूरी है कि जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर सार्वजनिक स्वास्थ्यकर्मियों का औपचारिक कैडर बनाया जाए, पूरे तंत्र का पुनर्गठन किया जाए और पर्याप्त प्रशिक्षण कार्यक्रमों को चलाया जाए। साथ ही इस प्रयास को गैर संक्रामक बीमारियों और चोटों के बढ़ते बोझ पर नियंत्रण से जोड़ा जाए, जो हर साल होने वाली मौतों और आर्थिक क्षति का बड़ा कारण बन चुकी हैं। लेख के मुताबिक, 1897 के लोक स्वास्थ्य अधिनियम में कोई बदलाव नहीं किया गया है और इसलिए बहुत सी बीमारियों का पता ही नहीं चल पाता। बीमारियों की सस्ती, वास्तविक और कुशल निगरानी, जिनसे महामारी की पहचान हो सके, को सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों के अस्पतालों में अनिवार्य रूप से उपलब्ध होनी चाहिए। इसमें कहा गया है कि संक्रामक बीमारियों का एक संभावित स्रोत जांच प्रयोगशालाएं भी हैं। हालांकि प्राथमिक और द्वितीयक लोक स्वास्थ्य सुरक्षा नेटवर्क की पहुंच माइक्रोबायोलॉजी प्रयोगशालाओं तक ही नहीं है। लेखकों के अनुसार कानूनन अंतिम संस्कार के पहले मृत्यु पंजीकरण जरूरी होता है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में इन नियमों का उल्लंघन होता है। लगभग 70 फीसदी लोगों की मौत घरों में हो जाती है और बहुत से लोग इनके बारे में जानकारी नहीं देते(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,मकर संक्रांति-2011)।

आगे चलें...

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

मलेरिया

देश में मलेरिया के बढ़ते प्रकोप के बारे में एक नई रिपोर्ट आई है। मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में मलेरिया से हर साल दो लाख लोग मरते हैं। यह आंकड़ा विश्व स्वास्थ्य संगठन के आकलन (15 हजार मौतें) से 13 गुना और खुद हमारे नैशनल मलेरिया कंट्रोल प्रोग्राम के अनुमान (औसतन एक हजार मौतें) से 200 गुना ज्यादा है। इस हिसाब से मलेरिया हमारे लिए किसी महामारी से कम नहीं है। लैंसेट के शोधकर्ताओं ने आंकड़ों में इतने बड़े फर्क की वजह इस बीमारी से घरों में हो जाने वाली मौतों को न गिना जाना बताया है। मच्छर काटने की वजह से होने वाली डेंगू, चिकुनगुनिया, मस्तिष्क ज्वर आदि बीमारियों की जैसी खबरें इधर कुछ सालों में आई हैं, उन्हें देखते हुए मलेरिया पर नए दावे को खारिज करना आसान नहीं है। सवाल यह है कि इलाज आसान होने के बावजूद देश में मलेरिया की स्थिति इतनी गंभीर क्यों है? इसके पीछे दवाओं के बेअसर होने, बीमारी की अनदेखी करने और देश में सामुदायिक चिकित्सा की उचित व्यवस्था नहीं होने जैसे कई कारण हैं। पिछले दिनों खबर आई थी कि मलेरिया की सबसे कारगर दवा आर्टेमिसिनिन के खिलाफ मच्छरों में प्रतिरोधी क्षमता विकसित हो गई है। क्लोरोक्विन और सल्फाडॉक्सीन आदि दवाएं पहले ही कमजोर पड़ गई थीं। दूसरी समस्या यह है कि मलेरिया में अक्सर लोग घरेलू इलाज आजमाते हैं या फिर घर पर ही बुखार-सिरदर्द की आम दवाएं मरीज को दे दी जाती हैं। गांव-देहात में तो समय से इस बात की जांच भी नहीं हो पाती कि बुखार की वजह कहीं मलेरिया तो नहीं। देश में सामुदायिक चिकित्सा का उचित प्रबंध न होने का आशय यह है कि सरकार और प्रशासन के स्तर पर मच्छरों, पिस्सुओं आदि से होने वाली बीमारियों की रोकथाम या बचाव का कोई प्रयास नहीं किया जाता। अखबार में खबर छप जाने पर जब-तब फॉगिंग की रस्म अदायगी जरूर कर दी जाती है, लेकिन यह खानापूरी मच्छरों पर कोई स्थायी असर नहीं छोड़ पाती। विदेशी मदद से चलने वाले एंटी पोलियो कैंपेन के तहत लगभग हर महीने घर-घर जाकर पोलियो ड्रॉप पिलाने की व्यवस्था करने वाली सरकार ने मच्छरों से पैदा होने वाली बीमारियों से जूझने का जिम्मा लोगों पर ही छोड़ रखा है। चिकित्सा सेवाओं के निजीकरण के इस दौर में गरीब और मध्य वर्ग कहां जाए, जिसके लिए अब लगभग सभी अस्पतालों के दरवाजे बंद रहने लगे हैं। बिल गेट्स फाउंडेशन का कहना है कि स्मॉलपॉक्स की तरह दुनिया मलेरिया से भी हमेशा के लिए छुटकारा पा सकती है, लेकिन हमारे देश में जिस तरह महामारी बनते मलेरिया की अनदेखी की जा रही है, उसमें फिलहाल इससे कोई राहत मिलती नजर नहीं आती। नई रिपोर्ट को अपने आंकड़ों से झुठलाने की बजाय सरकार इसे एक चेतावनी की तरह ले और डेंगू-मलेरिया के खिलाफ एक बड़ा अभियान छेड़े(संपादकीय,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,22.10.2010)।

आगे चलें...

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

मच्छर और मलेरिया से मुक्ति के उपाय

मानसून के दिनों में जो बीमारी आमतौर पर देखने को मिलती है, उनमें मलेरिया का नाम प्रमुख है। मलेरिया का प्रमुख कारण प्लाज्मोडियम परजीवी है। इससे संक्रमित मादा एनाफिलिज मच्छर के काटने से प्लाज्मोडियम मरीज की लाल रक्त कणिकाओं को तेजी से प्रभावित करता है, और लिवर में इस परजीवी की संख्या तेजी से बढ़ती चली जाती है। 12 से 24 घंटों के भीतर इसका प्रभाव संक्रमित व्यक्ति पर तेज बुखार, थकान, नाक बहने, सिर दर्द व उल्टी के तौर पर देखने को मिलता है। खुले गटर, पानी के गड्ढे, पानी भरी होदियां, ये सब गंदगी के स्रोत हैं। शहरों में कूलर, पानी की खुली टंकियां, टॉयर आदि का खुला कबाड़ भी मच्छरों के कुनबे बढ़ाता है। बरसात के ठहरे हुए पानी को मादा एनाफिलिज की ब्रीडिंग के लिए सटीक माना जाता है। प्लाज्मोडियम परजीवी की चार प्रजातियां हैं, प्लाज्मो-डिपम वाईवेक्स, प्लाज्मोडियम फैलसिपेरम, प्लाज्मोडियम मलेरियाई और प्लाज्मोडियम ओवेल। इसमें वाइवेक्स आम है जबकि फैलसिपेरम सबसे ज्यादा खतरनाक है जो सीधे मस्तिष्क को प्रभावित करता है। इसके अलावा यह यकृत, गुर्दे और आंतों के अलावा लाल रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करता है।

ये बनते हैं जल्दी शिकार छोटे बच्चें, गर्भवती महिलाएं, एचआईवी प्रभावित पुरुष व महिलाएं

लक्षण ज्यों ही प्लाज्मोडियम परजीवी मानव शरीर में पहुंचता है, तो उनकी संख्या तेजी से बढ़ने लगती है। आमतौर पर इसका ठिकाना लिवर यानी यकृत होता है। इसके बाद यह लाल रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करने लगता है। शुरुआत में शरीर का तापमान तेजी से बढ़ने लगता है। ठंड लगना और कंपकंपी का प्रभाव देखने को मिलता है। तेज सिरदर्द होता है और उल्टियां को यह क्रम कई बार दस से पन्द्रह दिनों तक देखने को मिलता है। अगर खून की जांच कर रोग पकड़ में आ जाए तो तत्काल ईलाज होना चाहिए वरना परजीवी शरीर के प्रमुख अंगों में रक्त प्रवाह रोक देता है, जो कि जानलेवा साबित हो सकता है। सेरिब्रल मलेरिया जो मस्तिष्क को सीधा प्रभावित करता है और भी गंभीर स्थिति पैदा करता है । बच्चों में तो इसका प्रभाव अधिक भयंकर होता है। तेज बुखार उनमें ऐंठन पैदा कर उन्हें मनोरोगी बना देता है। शुरुआती स्तर पर ईलाज प्रारंभ होने से बुखार नियंत्रित हो जाता है और मरीज गंभीर समस्या का सामना करने से बच जाता है।

जांच मलेरिया जांच के लिए रैपिड टैस्ट जांच जरूरी है, जिसमें रक्त में फैलसिपेरम प्लाज्मोडियम की उपस्थिति को आरबीसी के आधार पर गिना जाता है। पीसीआर (पॉलिमेरेज चेन रिएक्शन) टेस्ट भी किया जाता है। जांच के दौरान संक्रमण की गंभीरता के अनुसार कई तरह के परिणाम देखने को मिलते हैं। किडनी फंक्शनिंग टेस्ट, में सीरम क्रेटाइन व ब्लूरूबिन का 3एमजी/डीएल से कम होना होता है। गंभीर रूप से एनेमिक पाया जाना, जिसमें रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा 5 डीएल/एमजी से कम हो जाती है। एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम जांच का पॉजिटिव आना। हाइपोग्लीसिमिया की स्थिति, जिसमें प्लाज्मा ग्लूकोज की स्थिति 40एजी/डीएल से अधिक पाई जाती है। रक्तचाप वयस्कों में 80 एमएमएचजी से अधिक तथा बच्चों में 70 एमएम एचजी से अधिक गंभीर लक्षण हैं।

उपचार एम्स के कम्यूनिटी मेडिसन विभाग के डॉ. बीर सिंह के अनुसार साधारण मलेरिया में क्लोरोक्वीनिन दवाई को मलेरिया की जांच पॉजिटिव आने के बाद दिया जाता है, लेकिन मलेरिया अनुसंधान संस्थान द्वारा मलेरिया की वैक्सीन भी लांच की गई है। क्लोरोक्वीनिन दवाई को फैलसिपेरम प्लाज्मोडियम ‘पी’ में अधिक कारगर नहीं माना जाता, इसलिए दवा का इस्तेमाल करने से पूर्व मलेरिया प्लाज्मोडियम की जांच जरूरी है।

घरेलू इलाज - दीये में नीम का तेल जलाने से मच्छर भागता है। - घर में तुलसी का पौधा लगाने से भी मच्छर के प्रकोप से बचा जा सकता है। - तुलसी, काली मिर्च और लोंग की चाय मरीज को फायदा करती है। - औषधि मिश्रित धुआं करने से घर तथा वातावरण स्वच्छ तथा मच्छर रहित रहता है। - पानी एकत्र करने वाली जगहों पर मिट्टी का तेल छिड़कने से भी मच्छर भाग जाते हैं। - आयुर्वेद में नीम, वासा, पिप्पली, सोंठ, हींग, करंज, तुलसी, आंवला, गिलोय तथा गेहूं का जावरा को मलेरिया सहित हर तरह के बुखार को दूर करने के लिए उपयोगी औषधियों में गिना गया है। इनका सेवन औषधियां अनुभवी चिकित्सक की देख-रेख और सलाह के अनुसार करना चाहिए। डॉ़ सुनील कुमार आर्य वरिष्ठ आयुर्वेदाचार्य, नई दि. नगर पालिका परिषद

(हिंदुस्तान,दिल्ली,21.9.2010)


आगे चलें...

बुधवार, 15 सितंबर 2010

मच्छरों से ज़रा बच के

बरसात के साथ ही डेंगू और मलेरिया का आतंक बढ़ गया है। महानगरों के अस्पतालों में डेंगू के मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। शोध बताते हैं कि गत कुछ वर्षो से मच्छरों से होने वाले रोगों में इजाफा हुआ है जबकि शासन के पास उन्हें रोकने का कोई कारगर उपाय सामने नहीं आ पाया है। मानवीय लापरवाही और शहरी गंदगी के कारण ये रोग हो रहे हैं। तो क्या है उपाय? कैसे बचें? प्रस्तुत है मुकम्मल जानकारी:

जैसे-जैसे मनुष्य ने मच्छरजनित रोगों पर काबू पाने के उपाय किए हैं, वैसे-वैसे मच्छर भी दिनोंदिन बलशाली होता जा रहा है। उसने तमाम मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रमों को धता बताते हुए ‘न मच्छर रहेंगे, न मलेरिया’ जैसे मानवीय दावों की हवा निकाल दी है। मलेरिया के अलावा कुछ और रोग भी बेबस मनुष्य की झोली में मच्छर ने डाल दिए हैं।

मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों के बढ़ते प्रकोप को रोकने के उपाय किए गए तो खबर आई कि चिकनगुनिया का मच्छर तो साफ पानी में पाया जाता है और रात में नहीं दिन में काटता है। तब इनसे बचाव के भी कई उपाय सामने आए अगरबत्ती, टिकिया, लोशन, मगर मच्छर का मुकाबला पूरी तरह हो नहीं पाया।

दवा खा कर पहले मरा पर बाद में मच्छर फिर से खून पी-पी कर इतना ताकतवर हो गया कि मलेरिया की कारगर क्लोरोक्वीन जैसी दवाएं नाकारा कर दीं। दो मिलीग्राम से भी कम भार वाले इस खतरनाक जीव ने आज भी मनुष्य का जीना दूभर कर रखा है। दुनियाभर में सबसे खतरनाक जीव नन्हा मच्छर करोड़ों को काट कर रोगी बना रहा है।

मोटे तौर पर देखा जाए तो रोगों का वाहक मच्छर गंदगी में पनपता है। देश में आज भी बड़े भाग में शौचालय की सुविधाएं विशेषकर उसके निकास के तरीके उचित नहीं हैं जो गंदगी फैलाते हैं। वहीं दूसरी ओर खुले गटर, गड्ढे पानी भरी होदियां, नालियां सब कुछ खुला है और गंद लाता है। उस पर शहरों में कूलर, पानी की खुली टंकियां, टायर जैसा अन्य कबाड़ मच्छरों के इस परिवार को बढ़ाता है। यह सब कुछ बस्तियों के पास और घर के अंदर भी है, तो भला मच्छर क्यों न पनपें और रोग क्यों न फैले।

वैज्ञानिक रॉनल्ड रॉस ने जब पहली बार यह बात उजागर की कि मलेरिया फैलाने के पीछे केवल मादा मच्छर का डंक है तो लोगों को हैरानी हुई थी। तब और शोध सामने आए पता चला कि मच्छर तो निमित्त मात्र है, वह केवल वाहक है। मलेरिया का दोषी तो कोई और ही है जो उसको और मनुष्य को अपना ठिकाना बनाए हुए है। मच्छर ने जब स्वस्थ मनुष्य को काटा तो यह आराम से उसके खून में उतर गया और अपना कहर दिखा गया। इसके बाद जब किसी रोगी को मच्छर ने काटा तो फिर परजीवी मच्छर के अंदर जा पहुंचा। इस तरह से मच्छर और मनुष्य के बीच दूषित रक्त का आदान-प्रदान होता रहा और आराम से रोग बढ़ता-फैलता रहा। इस परजीवी की चार प्रजातियां हैं, प्लाज्मो-डिपम वाईवेक्स, प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम, प्लाज्मोडियम मलेरियाई और प्लाज्मोडियम ओवेल।

इनमें वाइवेस्ट्रा आम है जबकि फाल्सीपेरम सबसे ज्यादा खतरनाक है जो सीधे मस्तिष्क को प्रभावित करता है। इसके अलावा, यह यकृत, गुर्दे और आंतों के अलावा लाल रक्त कोशिकाओं को भी बरबाद कर डालता है। ज्यों ही परजीवी मानव शरीर में पहुंचता है, वह अपना प्रभाव तेजी से बढ़ाने लगता है। आमतौर पर इसका ठिकाना लिवर यानी यकृत होता है। इसके बाद यह लाल रक्त कोशिकाओं में घुस जाता है और उन्हें प्रभावित करता है। इसकी शुरुआत होते ही शरीर का तापमान बढ़ता चला जाता है। भरी गर्मी में भी ठण्ड लगती है और कंपकंपी आती है। इस कारण तेज सिरदर्द होता है और उल्टियां आती हैं। यह सब कुछ दस से पन्द्रह दिन तक चलता है। अगर खून की जांच कर रोग पकड़ में आ जाए तो तत्काल इसका उपचार किया जाना चाहिए।

सेरेब्रल मलेरिया जो मस्तिष्क को सीधा प्रभावित करता है और भी गंभीर स्थिति पैदा करता है। चिकित्सकों का कहना है कि अगर दो तीन दिन के अंदर रोग काबू में न आए तो बेहोशी के साथ मृत्यु तक हो जाती है। बच्चों में तो इसका प्रभाव और भी गंभीर होता है। तेज बुखार उनमें ऐंठन पैदा कर उन्हें मनोरोगी बना देता है। अगर जल्द ही दवा का असर हो जाए और बुखार उतर जाए तो रोग काबू में आ जाता है और जान बच जाती है।

आमतौर पर इससे बचाव की सलाह दी जाती है यानी पहली दशा में तो मच्छरों के प्रजनन को रोकने की बात। दूसरी सलाह होती है मच्छरदानी लगा कर सोने की ताकि मच्छर काट ही न पाएं। तीसरा है लोशन या मच्छर भगाऊ या मच्छर मार दवाओं का प्रयोग और अगर मलेरिया हो जाए तो तत्काल डॉक्टर की सलाह और कड़वी कुनैन, क्लोरोक्वीन जैसी दवाओं का प्रयोग। मगर दुखद पहलू यह भी है कि आज मच्छर और परजीवी दोनों पर दवाएं बेअसर भी साबित हो रही हैं।

मच्छरों का यह कहर वर्षो से चला आ रहा है। लाख कोशिशों के बाद भी मच्छर वही है, मनुष्य भी और रोग भी वही है, बल्कि रोग है कि महामारी बन रहे हैं। इनसे निबटने के लिए शोध कार्य भी लगातार चल रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि कोई कारगर समाधान भी सामने आएगा जो लोगों को मच्छरजनित रोगों और मौत से बचाने में पूरी तरह कारगर सिद्ध होने वाला होगा।

डेंगू बुखार मच्छर की ही देन डेंगू बुखार भी है। इससे प्रभावित रोगी को रोज बुखार आता है, तेज सिरदर्द होता है, इसके अलावा, आंखों और मांसपेशियों में असहनीय पीड़ा होती है। यही नहीं, रोगी के शरीर पर जगह-जगह लाल चकत्ते बनने लगते हैं। रोगी का जी मिचलाता है और लगातार उलटी आती है। गंभीर दशा में संक्रमण फेफड़ों में जा पहुंचता है, साथ ही रक्त परिभ्रमण व्यवस्था लड़खड़ाने लगती है।

रक्तचाप तेजी से गिरने लगता है और बेहोशी आती है। ऐसे में अगर रक्त कोशिकाओं की संख्या घटने लगती है तो जिंदगी खतरे में पड़ जाती है। हमारे स्वस्थ शरीर में औसतन डेढ़ से चार लाख तक प्लेटलैट्स होती हैं जब यह संख्या घटते घटते 30,000 जा पहुंचती है तो खतरे की स्थिति हो जाती है, तब बाहर से प्लेटलैट्स पहुंचाना जरूरी हो जाता है।

पानी में है डेंगू से राहत डेंगू की कोई कारगर दवा अभी तक सामने नहीं आई है, इसलिए रोग का सहयोगी उपचार किया जाता है। चिकित्सकीय सलाह है कि चूंकि इसके संक्रमण से शरीर में तेजी से पानी की कमी होने लगती है, इसलिए रोगी को खूब पानी पिलाना चाहिए। भले ही कोई कारगर दवा न हो, मगर जो भी है उससे रोग पर काबू पाना संभव है।

डेंगू बुखार एडीज़ इजिप्टी मच्छरों के काटे जाने से फैलने वाली वाइरल डिजीज़ है। ये मच्छर इनसानी बस्तियों में खुले और साफ पानी में पैदा होते हैं, जैसे कि बगैर ढक्कन वाली टंकियां, टूटे फूटे सामान, कबाड़ और पुराने और बेकार पड़े टायरों में भरा पानी। ये मच्छर दिन के समय काटते हैं।

खासकर सुबह और शाम व रात होने से पहले के कुछ घंटे इनके काटने का समय है। डेंगू फैलाने वाले चार वाइरस- डेन वन, डेन टू, डेन थ्री और डेन फोर इम्युनोलॉजी के लिहाज से आपस में संबंधित हैं, लेकिन एक दूसरे के प्रति क्रॉस प्रोटेक्शन की इम्युनिटी नहीं देते। दुनिया की करीब ढाई अरब आबादी इस बीमारी की आशंका वाले इलाकों में रहती है।

बचाव में ही सुरक्षा डेंगू से बचाव के लिए कोई सटीक टीका उपलब्ध नहीं है। इसलिए जहां तक हो सके मच्छर के काटने से खुद को बचा कर रखें। - शरीर का कोई अंग खुला न छोड़ें। पूरी बाजू के कपड़े पहनें। - मच्छर मारने वाली दवा का प्रयोग करें। डेंगू होने पर बुखार को काबू में करने के लिए डॉक्टर एसिटामिनोफेन देते हैं। - डेंगू में एस्पिरिन और आइबूप्रोफेन नहीं लेना चाहिए। खासकर बच्चों को तो एस्पिरिन बिलकुल नहीं देनी चाहिए। - डेंगू के मरीज़ को भरपूर आराम करना चाहिए और तरल पदार्थो का सेवन करना चाहिए। - डेंगू बिगड़ने पर मरीज को बुखार के साथ-साथ तेज पेट दर्द होता है। - डेंगू बुखार में शरीर के रक्त में तेजी से प्लेटलेट्स का स्तर कम होता है, इसलिए बुखार में भूल कर भी एस्प्रीन दवाएं, डिस्प्रीन या फिर क्रोसिन नहीं देनी चाहिए, जबकि पैरासिटामोल का सेवन बुखार में सुधार ला सकता है। -जरूरी नहीं हर तरह के डेंगू में प्लेटलेट्स चढ़ाए जाएं, केवल हैमरेजिक और शॉक सिंड्रोम डेंगू में प्लेटलेट्स की अनिवार्यता बताई गई है, जबकि साधारण डेंगू में जरूरी दवाएं काम करती हैं। - लगातार उल्टियां और चिड़चिड़ापन, सुस्ती और विभ्रम जैसी मानसिक परेशानियां भी हो सकती हैं। - ऐसे में मरीज को तुरंत अस्पताल में भर्ती करके ग्लूकोज चढ़ाना ज़रूरी हो जाता है।

डेंगू मरीजों का खान-पान डेंगू के मरीजों को प्लेटलेट्स बढ़ाने के लिए डाइट में लिक्विड की मात्र ज्यादा रखनी चाहिए। लिक्विड में सबसे ज्यादा मात्र जूस की होनी चाहिए। हालांकि लस्सी, दूध, नारियल पानी, वेजिटेबल सूप, मट्ठा वगैरह भी डेंगू के मरीजों के लिए बेहतर है। बैलेंस्ड डाइट के अलावा उन्हें एक दिन में कम से कम तीन लीटर तक तरल पदार्थ का सेवन करना चाहिए। डॉ. माला मनराल (डायटीशियन), अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली

(हिंदुस्तान,दिल्ली,14.9.2010)


आगे चलें...

बुधवार, 25 अगस्त 2010

डेंगू,मलेरिया और स्वाइन फ्लू

बारिश के साथ डेंगू का खतरा भी चार गुना बढ़ गया है। राजधानी सहित अन्य शहरों से डेंगू के साथ मलेरिया के मरीजों की भी सूचना मिल रही है। चिकित्सकीय भाषा में हालांकि डेंगू के लिए अभी तक कोई इलाज स्वीकृत नहीं किया गया है। इसके बावजूद कुछ साधारण सावधानियां इस्तेमाल कर बीमारी से बचा जा सकता है, जिसमें प्रमुख रूप से बुखार होने पर एस्प्रिन दवाओं का सेवन न करना माना गया है। इसके साथ ही साफ पानी के जमा न होने पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए।

डेंगू बुखार : मादा एडीस मच्छर के काटने का असर डेंगू बुखार के रूप में सामने आता है। डेंगू को मुख्य रूप से तीन प्रकार में विभाजित किया जा सकता है, जिसमें साधारण डेगू, हैमरेजिक और शॉक सिंड्रोम डेंगू प्रमुख हैं। रक्त में संक्रमण होने से पांच से छह दिन के अंदर यह बुखार अपना असर दिखाना शुरू करता है।

साधारण डेंगू -अचानक तेज बुखार के साथ सिर में दर्द। -मांसपेशियों के साथ जोड़ों में तेज खिंचाव व दर्द होना। -अत्यधिक कमजोरी का महसूस होना, भूख न लगना। -मुंह के लार्वा प्रभावित होने से स्वाद खत्म होना। -पेट में असहनीय दर्द का अनुभव होना, बिना किसी कारण -गला सूखने का एहसास होना, उपरोक्त के साथ शरीर में लाल व गुलाबी रंग के चकत्तों का बनना साधारण डेंगू के लक्षण हैं।

डेंगू हैमरेजिक फीवर नाक, मुंह व दांतों में रक्तस्राव के साथ तेज बुखार होना डेंगू हैमरेजिक बुखार के लक्षण हैं, इसमें मरीज के बुखार का स्तर 105 डिग्री फारेनहाइट तक भी जा सकता है, जिसका सीधा असर मस्तिष्क पर भी पड़ता है। डीएचएस पॉजीटिव जांच के बाद मरीज को प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत होती है।

डेंगू शॉक सिंड्रोम डेंगू की गंभीर व तीसरी अवस्था को डेंगू शॉक सिंड्रोम कहा जाता है, जिसके तेज कंपकंपाहट के साथ मरीज को पसीने आते हैं। इस अवस्था में इलाज की देरी मरीज की जान ले सकती है। शॉक सिंड्रोम की स्थिति आने तक मरीज के शरीर पर लाल चकत्ते के दाग स्थाई हो जाते हैं, जिनमें खुजली भी होने लगती है।

क्या बरतें सावधानी -मादा एनाफिलिज मच्छर का म्यूटेशन (प्रजनन) क्योंकि साफ पानी में ही होता है, इसलिए घर के किसी भी कोने या बर्तन में साफ पानी को जमा न होने दें, इससे एक से दो दिन के बीच में ही मच्छर पनपने लगते हैं। -साफ पानी में मच्छरों के पैदा होने से बचाव के लिए गंबूश मछली या फिर कुनैन टैबलेट्स का प्रयोग किया जा सकता है। गंबूश मछलियां एडीस के लार्वा को खा जाती हैं।

-मादा मच्छर क्योंकि दिन में ही काटता है, इसलिए दोपहर में मच्छरों से बचाव पर पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए।

और जरूरी एहतियात -डेंगू बुखार में शरीर के रक्त में तेजी से प्लेटलेट्स का स्तर कम होता है, इसलिए बुखार में भूल कर भी एस्प्रीन दवाएं, डिस्प्रीन या फिर क्रोसिन नहीं देनी चाहिए, जबकि पैरासिटामोल का सेवन बुखार में सुधार ला सकता है।

-जरूरी नहीं हर तरह के डेंगू में प्लेटलेट्स चढ़ाए जाएं, केवल हैमरेजिक और शॉक सिंड्रोम डेंगू में प्लेटलेट्स की अनिवार्यता बताई गई है, जबकि साधारण डेंगू में जरूरी दवाओं के साथ मरीज को ठीक किया जा सकता है। इस दौरान ताजे फलों का जूस व द्रव्य चीजों का अधिक सेवन तेजी से स्थिति में सुधार ला सकता है।

मलेरिया मानसून की आम बीमारियों में दूसरा नाम मलेरिया का है। चालीस से पचास प्रतिशत मलेरिया का कारण प्लाज्मोडियम फैलसिपेरम को माना जाता है। मादा मच्छर एनाफिलीज के काटने से प्लाज्मोडियम मरीज की लाल रक्त कणिकाओं को तेजी से प्रभावित करता है। रक्त में पहुंच कर प्लाज्मोडियम 12 से 24 घंटे के बीच तेजी से सेल्स को प्रभावित करना शुरू कर देता है, जिसका असर थकान, तेज बुखार और नाक बहने के रूप में सामने आता है। बरसात के ठहरे हुए पानी को मादा एनाफिलीज की ब्रीडिंग के लिए सटीक माना जाता है।

लक्षण -श्वांस लेने में तकलीफ होना, तेजी से नाक का बहना। -बुखार का रुक-रुक कर आना, शरीर में कंपकंपाहट महसूस होना। -भूख का निरंतर कम होना व कमजोरी का बने रहना। -पेट में असहनीय दर्द होना आदि मलेरिया के प्रमुख लक्षण हैं।

जांच सिवियर और साधारण मलेरिया जांच के लिए रैपिड टैस्ट जांच को जरूरी बताया गया है, जिसमें रक्त में फैलसिपेरम प्लाज्मोडियम की उपस्थिति को आरबीसी के आधार पर गिना जाता है। हालांकि पीसीआर (पॉलिमेरेज चेन रिएक्शन) टेस्ट को भी सही माना जाता है।

क्लीनिकल बदलाव -केएफटी (किडनी फंक्शनिंग टेस्ट) में सीरम क्रेटाइन व ब्लूरूबिन का 3एमजी/डीएल से कम होना। -सिवियर एनेमिक पाया जाना, जिसमें रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्र 5 डीएल/एमजी से कम पाया जाना। -एक्यूट रेस्पायरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम जांच का पॉजिटिव आना। -हाइपोग्लीसीमिया की स्थिति, जिसमें प्लाज्मा ग्लूकोज की स्थिति 40एजी/डीएल से अधिक पाया जाना। -रक्तचाप वयस्क में 80 एमएमएचजी से अधिक होना तथा बच्चों में 70 एमएम एचजी से अधिक पाया जाना गंभीर अवस्था का लक्षण है।

इलाज साधारण मलेरिया में हालांकि क्लोरोक्वीनिन दवाई को जांच पॉजिटिव आने के बाद दिया जाता है, लेकिन वर्ष 2008 में मलेरिया अनुसंधान संस्थान द्वारा मलेरिया की वैक्सीन को भी लांच किया गया। क्लोरोक्वीन दवाई हालांकि फैलसिपेरम प्लाज्मोडियम ‘पी’ में अधिक कारगर नहीं मानी गई। इसलिए दवा से पहले मलेरिया प्लाज्मोडियम की जांच जरूरी है।

(उपरोक्त जानकारी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के कम्यूनिटी मेडिसन विभाग के डॉ. बीर सिंह और गैस्ट्रोइंटोलॉजिस्ट डॉ. अमिताभ यादव द्वारा दी गई। )

क्या हो इस मौसम का आहार -तापमान में गिरावट के साथ ही विशेषज्ञ विटामिन सी को खाने में प्रमुखता की सलाह देते हैं, जिसके लिए आंवला व नीबू के साथ ही विटामिन सी की दवाओं को भी शामिल किया जा सकता है।

-बारिश के साथ मौसम में आद्रता के बने रहने से शरीर में पानी की कमी हो सकती है, इसके लिए फलो के ताजे जूस को भोजन में शामिल किया जाना जरूरी है।

-साधारण भोजन के अलावा मानसून में 200 से 300 कैलोरी इंटेक किया जा सकता है, हालांकि इसके साथ ही शारीरिक श्रम को अनुपात बनाए रखना भी जरूरी है।

-हरी सब्जियों के अलावा, न्यूट्रिशियन व पाइथोन्यूट्रिट को शामिल किया जा सकता है।

-रसदार फलों का सेवन करें। आँवले का सेवन जरूर करें। यह विटामिन सी से भरपूर होता है। डिब्बा बंद आँवले का शरबत भी खरीद सकते हैं। डॉ. रितिका सामदार, डायटिशियन, मैक्स अस्पताल

घरेलू इलाजः स्वाइन फ्लू से बचने के उपाय रोज सुबह उठकर 5 तुलसी की पत्तियाँ धोकर खाएँ। गिलोय देशभर में बहुतायत से मिलता है। इसकी एक फुट लंबी डाल का हिस्सा, तुलसी की पाँच-छह पत्तियों के साथ 15 मिनट तक उबालें। स्वाद के मुताबिक सेंधा नमक या मिश्री मिलाएं। कुनकुना होने पर इस काढ़े को पीएं। यह आपकी रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ा देगा।

हमदर्द, बैद्यनाथ या किसी अच्छी आयुर्वेदिक दवा कंपनी का गिलोय भी ले सकते हैं। महीने में एक या दो बार कपूर की गोली पानी के साथ लें। बच्चों को केले अथवा उबले हुए आलू में मिलाकर दे सकते हैं। याद रखें कपूर रोज नहीं लेना है, मौसम में एक बार या महीने में एक या दो बार ले सकते हैं। लहसुन की दो कलियां रोज सुबह खाली पेट कुनकुने पानी के साथ जरूर लें। इससे रोग प्रतिरोधक शक्ति में इजाफा होगा।

रात को सोते समय हल्दी का दूध अवश्य पीएं। थायमल, मेंथल, केर्फर (कपूर) को बराबर मात्र में मिला कर तैयार श्यू वायरल के घोल की बूंदों को अगर रुमाल या टिश्यू पेपर पर डालकर लोग सूंघें तो भीड़ में मास्क पहन कर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

पान के पत्ते पर दवा की तीन बूंदें डालकर 5 दिन तक दिन में दो बार खाने पर स्वाइन फ्लू से बचाव हो सकता है। 100 मि़ ली़ पानी में तीन ग्राम नीम, गिलोय, चिरैता के साथ आधा ग्राम काली मिर्च और एक ग्राम सोंठ का काढ़ा बना कर पीना भी काफी लाभदायक रहता है।

इन चीजों को पानी के साथ तब तक उबालना है जब तक वह 60 मिलिग्राम न रह जाए। इसे एक सप्ताह के लिए रोज सुबह खाली पेट पीने पर स्वाइन फ्लू से लड़ने के लिए शरीर में जरूरी परिरक्षण क्षमता (इम्यूनिटी) पैदा हो जाएगी।

त्रिफला, त्रिकाटू, मधुयास्ती और अमृता को समान मात्र में लेकर उसे एक चम्मच लेने से प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। यह दवा खाना खाने के बाद दो बार लेने से फायदा होगा।

कॉमन फ्लू वायरस से मुकाबला करने में होम्योपैथिक औषधियाँ चमत्कारिक रूप से असरकारक मानी जाती हैं। किसी योग्य चिकित्सक से दवा ले सकते हैं।

-ग्वारपाठे का एक चम्मच गूदा रोज पानी के साथ लें। इससे जोड़ों के दर्द कम होने से साथ-साथ रोगों से लड़ने की क्षमता भी बढ़ेगी।

-दिन में कई बार अपने हाथ एंटिबायोटिक साबुन से जरूर धोएं। इसके लिए एल्कोलिक क्लींजर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

-रोज प्राणायाम करें। अपने फिटनेस लेवल को बढ़ा कर रखें ताकि किसी भी बैक्टीरिया अथवा वायरस के हमले का सामना कर सके। श्वास प्रणाली की कसरत से यह तंत्र मजबूत होता है। (प्रियंका,प्रस्तुतिःअरविंद ऋतुराज,हिंदुस्तान,दिल्ली,24.8.2010)


आगे चलें...

सोमवार, 23 अगस्त 2010

ज्यादा असरदार नहीं रहीं मलेरिया की पुरानी दवाएं

मलेरिया होने पर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की ओर से दी जाने वाली दवाएं क्लोरोक्यून और प्राइमक्यून ज्यादा असरदार नहीं रही। दोनों दवाओं के प्रति मलेरिया का कारक 'प्लाजमोडियन' प्रतिरोधी हो गया है। अब सरकार भी मलेरिया के रोगी को आरटी माइसिन (सुमेट)समूह की गोलियां देगी। नेशनल ड्रग पॉलिसी ऑन मलेरिया 2010 ने इसकी गाइडलाइन जारी कर दी है। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों के अनुसार वर्तमान में सरकारी स्तर पर मलेरिया के रोगी को क्लोरोक्यून और प्राइम क्यून की गोलियों की खुराक दी जाती है। क्लोरोक्यून शरीर को मलेरिया प्रतिरोधी बनाने और प्राइम क्यून मलेरिया के वायरस को नष्ट करती है। दोनों दवाएं पिछले 20साल से दी जा रही हैं। इससे पूर्व मलेरिया एंटी के रूप में कुनैन दी जाती थी। इससे चक्कर आने, उल्टी, सिर दर्द होने व रक्तचाप आदि दुष्प्रभाव होने लगे थे। जल्द दवाएं देने की गाइड लाइन: भारत सरकार की ओर से मलेरिया पर जारी ड्रग पॉलिसी में मलेरिया का रोगी चिह्नित होने पर उसे जल्द दवाएं देने की गाइड लाइन दी गई है। चिकित्सकों के अनुसार आरटी माइसिन ग्रुप की दवाओं का आविष्कार चीन में हुआ था। निजी चिकित्सक इसका उपयोग कर रहे हैं। इस समूह की दवाओं के प्रति अभी तक मलेरिया का कारक प्लाजमोडियन प्रतिरोधी नहीं हुआ है(दैनिक भास्कर,श्रीगंगानगर,23.8.2010)।

आगे चलें...

सोमवार, 16 अगस्त 2010

मलेरिया की वापसी

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में इस साल जनवरी से जुलाई तक मलेरिया से 31 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि 17,136 लोग पीडि़त हुए। इस संबंध में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि मलेरिया की रोकथाम के बजाए उस पर राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही हैं। कुपोषण, गंदगी और पीने के साफ पानी की कमी मलेरिया को आमंत्रित करते हैं, लेकिन मलेरिया के विरुद्ध लड़ाई में ये मुद्दे गायब हैं। दरअसल प्लालजमोडियम परजीवी द्वारा फैलने वाला मलेरिया एक संक्रामक रोग है। प्रत्येक वर्ष यह 50 करोड़ से अधिक लोगों को प्रभावित करता है तथा लगभग दस लाख लोगों को मौत की नींद सुला देता है। मलेरिया को आमतौर पर गरीबी से जोड़ कर देखा जाता है किंतु यह खुद अपने आपमें गरीबी का कारण है तथा आर्थिक विकास का प्रमुख अवरोधक भी है। जिन क्षेत्रों में यह व्यापक रूप से फैलता है वहां यह अनेक प्रकार के नकारात्मरक आर्थिक प्रभाव डालता है। प्रति व्येक्ति जीडीपी की तुलना यदि 1995 के आधार पर करें तो मलेरिया मुक्त क्षेत्रों और मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में पांच गुना अंतर नजर आता है। जिन देशों में मलेरिया फैलता है उनके जीडीपी में 1965 से 1990 के मध्य प्रतिवर्ष केवल 0.4 फीसदी की वृद्धि हुई वहीं मलेरिया से मुक्त देशों में यह 2.4 फीसदी रही। संक्रमण रोकने तथा इलाज करने के प्रयासों के होते हुए भी 1992 के बाद इसके मामलों में बढ़ोतरी होती जा रही है। यदि मलेरिया की वर्तमान प्रसार दर बनी रही तो अगले 20 वषरें में मृत्यु दर दोगुनी हो सकती है। इस मामले में खासतौर पर भारत जैसे देशों को अधिक सावधानी बरतने की जरूरत है, जहां लगभग हर जगह मलेरिया के विषाणुओं के पनपने की स्थितियां मौजूद हैं। अतीत में भारत पर मलेरिया का काफी आतंक रहा है। इसी को देखते हुए आजादी के तुरंत बाद राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम और राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम के तहत युद्धस्तर पर इस रोग पर काबू पाने की कोशिशें हुईं। इसके परिणाम सकारात्मक रहे। 1953 में जहां भारत में 7.5 करोड़ मामले दर्ज हुए और आठ लाख लोगों की मौत हुई वहीं 1965 में मलेरिया के मात्र एक लाख मामले सामने आए थे और कोई मौत नहीं हुई थी। यह सफलता तीन दशक तक जारी रही। लेकिन इसके बाद मलेरिया की चपेट में आने वालों की संख्या बढ़ने लगी और पिछले डेढ़ दशक से यह फिर हमारे लिए चिंता कारण बन गया है। इसका कारण है कि मच्छर अब कीट प्रतिरोधी बन गए हैं और उनके व्यवहार में भी बदलाव आया है। मलेरिया के परजीवी अब अपने को मारने वाली दवाओं से भी नहीं मरते। तापमान में बढ़ोतरी और भूजल के दोहन से धान की खेती के विस्तार ने ग्रामीण क्षेत्रों में मलेरिया को फैलाने का काम किया तो शहरी क्षेत्रों में झुग्गी-झोपडि़यों के विस्तार ने मलेरिया को खाद-पानी की आपूर्ति की। भले ही देश में मलेरिया के मामले बढ़ रहे हों लेकिन सरकारी आंकड़े कुछ और ही बयां कर रहे हैं। उदाहरण के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार 2006 में मलेरिया के 18 लाख मामले प्रकाश में आए और 1700 लोगों की मौत हुई। दूसरी ओर विश्व मलेरिया रिपोर्ट-2008 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के हवाले से बताया गया है कि 2006 में भारत में एक करोड़ छह लाख लोग मलेरिया से पीडि़त हुए और पंद्रह हजार मौतें हुईं। 2008 में भारत में मलेरिया से मरने वालों की तादाद चालीस हजार के आसपास थी। मलेरिया से पीडि़त होने और उससे होने वाली मौतों का सटीक अनुमान लगाना कठिन है। इसका कारण है कि मलेरिया से पीडि़त लोगों की संख्या के बारे में प्रामाणिक आंकड़ों का अभाव रहा है। मलेरिया की पहचान के जो तरीके अपनाए जा रहे हैं वे कारगर नहीं हैं। फिर मलेरिया के ज्यादातर रोगी ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। वे न तो चिकित्सालय जाते हैं और न ही उनके मामलों का लेखाजोखा रखा जाता है। स्पष्ट है कि मलेरिया पर राजनीति करने के बजाए इससे निपटने के अभियान के अलावा इसके पीछे काम कर रहे सामाजिक कारकों को दूर करने के कारगर प्रयास करने होंगे(रमेश दुबे,दैनिक जागरण,16.8.2010)।

आगे चलें...

रविवार, 25 जुलाई 2010

पश्चिम बंगाल में काल बना मलेरिया, दवा बेअसर

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में मलेरिया काल का रूप धारण कर गया है। अलीपुरद्वार, नागराकाटा व कालचीनी समेत 15 ब्लॉक मलेरिया के रेड जोन के रूप में चिह्नित किए गए हैं। यहां पर वर्षो से कारगर मलेरिया की दवाएं बेअसर हैं। क्लोरोक्वीन दवा मलेरिया रोकने में असफल रही है। यह बताया है खुद स्वास्थ्य विभाग ने। हालत यह कि मलेरिया से मरने वालों की संख्या में निरंतर इजाफा हो रहा है। हालात से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग जिले में सेकेंड लाइन ट्रीटमेंट शुरू कर रहा है। विभाग के अनुसार मानसून के दौरान मलेरिया का प्रकोप बढ़ जाता है। पिछली बार बाढ़ के कारण उपचारात्मक उपाय करने में काफी दिक्कत हुई थी लेकिन इस बार प्रशासन सतर्क है और बचाव के इंतजाम किए जा रहे हैं। जिले में प्लाजमोडियम फेलसीफेरम (पीएफ) से पीडि़तों की संख्या अधिक है। फिलवक्त डुवार्स के विभिन्न इलाकों में फ‌र्स्ट लाइन ट्रीटमेंट (मलेरिया की दवाएं क्लोरोक्वीन व प्राइमाक्वीन) काम नहीं कर रही हैं। इसी कारण से वैकल्पिक विशेष इलाज का सहारा लिया जा रहा है। चालू वर्ष में मलेरिया से पांच लोगों की मौत हो चुकी है। पीडितों की संख्या 2620 है, जिसमें पीएफ मरीजों की संख्या 980 है। पीएफ मलेरिया से ज्यादातर पीडित अलीपुरद्वार, कुमारग्राम, नागराकाटा, कालचीनी व मालबाजार ब्लॉक में हैं। वनबस्ती बहुल इलाके में व नागराकाटा में पीडितों की संख्या 421 है। जलपाईगुड़ी के मुख्य जिला स्वास्थ्य अधिकारी राधारमण बनिक ने कहा है कि सेकेंड लाइन ट्रीटमेंट से कुछ राहत मिलने की उम्मीद है लेकिन प्रकोप को देखते हुए भविष्य में नई चुनौती सामने आ सकती हैं(अभिजीत बोस,दैनिक जागरण,जलपाईगुड़ी,25.7.2010)।

आगे चलें...

रविवार, 25 अप्रैल 2010

दुनिया की आधी आबादी पर मलेरिया का संकट

आज विश्व मलेरिया दिवस है। मलेरिया संक्रमित मादा एनोफिलिस मच्छर(प्लाज्मोडियम) के काटने से होने वाला घातक रोग है। 2008 में,मलेरिया के मामले 108 देशों में सामने आए। टीबी की ही तरह मलेरिया भी भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। पिछले वर्ष ही,भारत में ही, मलेरिया के 10 लाख 53 हजार मामलों का पता चला। वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है क्योंकि अनेक मामले दर्ज ही नहीं हो पाते। पूर्ण समन्वित यह मच्छर केवल रात में ही काटता है। इसका फैलाव कितनी तेजी से होगा यह मच्छर के अतिरिक्त संबंधित व्यक्ति और माहौल पर समग्र रूप से निर्भऱ करता है। 2008 में,दुनिया भर में मलेरिया के 24 करोड़ 70 लाख मामले सामने आए जिनमें से 10 लाख लोग मारे गए । इनमें से अधिकतर मौतें अफ्रीका में हुईं। अफ्रीका में प्रति 45 सेकेंड पर एक मौत मलेरिया से होती है। इसलिए आज का दिन अफ्रीकी मलेरिया दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। दुनिया की लगभग आधी आबादी पर मलेरिया का शिकार होने का ख़तरा है। मलेरिया चार तरह का होता हैः • Plasmodium falciparum • Plasmodium vivax • Plasmodium malariae • Plasmodium ovale Plasmodium falciparum और Plasmodium vivax सबसे कॉमन हैं जिनमें Plasmodium falciparum सबसे घातक है। इसे आपातकालीन मामला माना जाता है तथा मरीज को पूर्णतया स्वस्थ होने तक चिकित्सकीय निगरानी मे रखना अनिवार्य माना जाता है। मलेरिया के लक्षण,संक्रमित मच्छर के काटने से लगभग 10-15 दिन बाद दिखने शुरू होते हैं। बुखार,सिरदर्द,ठंढ लगना और उल्टी इसके सामान्य लक्षण हैं। अगर 24 घंटे के भीतर इलाज न हो,तो खासकर P. falciparum मलेरिया इतनी तेजी से फैलता है कि प्रायः मृत्यु हो जाती है। यदि गर्भवती को मलेरिया हो जाए तो उसके गर्भपात की संभावना 60 प्रतिशत तक बढ जाती है। गर्भावस्था में मलेरिया होने से कम वजन का बच्चा पैदा होने की संभावना रहती है। गर्भावस्था के दौरान मलेरिया के कारण प्रतिवर्ष 2 लाख नवजातों की मौत हो जाती है। प्लैसेंटा में मलेरिया का संक्रमण होने पर नवजात को भई एचआईवी होने का खतरा रहता है। इससे बचाव और इसका इलाज़-दोनो बिल्कुल संभव हैं। प्रारंभ में ही पता चल जाने पर रोग और मौत-दोनो की संभावना तो घटती ही है,किसी और में इसके फैलाव की संभावना भी समाप्त हो जाती है। Artemisinin आधारित combination therapy (ACT)को,खासकर P. falciparum malaria का सर्वोत्तम इलाज माना जाता है। सही जांच के बाद ही मलेरिया की दवा दी जानी चाहिए। सही जांच बस कुछ मिनटों की बात होती है। मलेरिया के लक्षणों में कमी आते ही रोगी दवा लेना बंद कर देता है जबकि मलेरिया के परजीवी खून में मौजूद ही रहते हैं। ऐसे मामलों में दुबारा इलाज शुरू करने के लिए एक और दवा देनी होती है और अगर उस दवा की पूरी खुराक न ली जाए,तो मलेरिया घातक हो जाता है क्योंकि उसकी कोई दवा उपलब्ध नहीं है। घर में कीटनाशी का छिड़काव 3 से 6 माह तक प्रभावी रहता है।डीडीटी का छिड़काव 9से 12 महीनों तक असरकारक रहता है। दवा से भी मलेरिया का बचाव संभव है। यात्रियों को कीमोप्रोफिलैक्सिस लेने की सलाह दी जाती है। Plasmodium falciparum के मामले में, अब पारंपरिक दवाओं का असर नहीं होता। क्लोरोक्विन,सल्फाडोक्सिन-पाइपीमिथामाइ या अन्य मलेरिया रोधी दवाओं का असर कम हो गया है। मलेरियारोधी दवाओं के बेअसर होने के मामले तेजी से बढ रहे हैं जिससे मलेरिया नियंत्रण के प्रयासों को झटका लगा है। भारत में,पूरे पूर्वोत्तर और आँध्रप्रदेश,छत्तीसगढ,झारखंड,मध्यप्रदेश और उड़ीसा में मलेरिया-बहुल 117 जिलों में मलेरिया के एक खास प्रकार पर क्लोरोक्विन का असर काफी कम हो जाने की रिपोर्टें आई हैं। लिहाजा,विश्व स्वास्थ्य संगठन का सुझाव है कि एक से अधिक मलेरिया-रोधी दवाओं, का एक साथ इसतेमाल किया जाए। मसलन, artemisinin का उपयोग अन्य मलेरियारोधी दवा के साथ। फिलहाल,यही मलेरिया का सबसे कारगर इलाज है। यह falciparum malaria के 95 प्रतिशत मामलों का समाधान कर देता है। रोगी का शरीर इस दवा को आसानी से पचा लेता है और यह दवा मलेरिया संक्रमण के फैलाव को रोकने में भी कारगर होती है। दूसरे सबसे कॉमन मलेरिया Plasmodium vivax malaria के मामले में भी यह विधि बहुत उपयोगी है। फिर भी कई देशों में,अब भी क्लोरोक्विन का इस्तेमाल किया जा रहा है क्योंकि अधिकतर मामलों में क्लोरोक्विन अब भी प्रभावी है। होम्योपैथी में मलेरिया के उपचार के लिए मलेरिया ऑफ़िशिनलिस, मलेरिया नोसोड, चाइना सल्फ़ और नैट्रियम म्युरियाटिकम जैसी औषधियाँ उपलब्ध हैं। अनेक चिकित्सकों का मानना है कि मलेरिया जैसी गंभीर बीमारी का इलाज एलोपैथिक दवाओं से ही किया जाना चाहिये, क्योंकि ये वैज्ञानिक शोध पर आधारित हैं। यहाँ तक कि ब्रिटिश होमियोपैथिक एसोसिएशन भी सलाह देता है कि मलेरिया के उपचार के लिए होम्योपैथी पर निर्भर नहीं करना चाहिए। आयुर्वेद में मलेरिया को विषम ज्वर माना गया है। मलेरिया के उपचार के लिए आयुर्वेद में अफ्संथिन, आंवला, नीम, कुटकी एवं शिकाकाई देने का प्रावधान है। इन औषधियों के मेलजोल से बने अनेक चूर्ण, वटी इत्यादि उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त मरीज को हल्का खाना खाने, हरी पत्तेदार सब्जियाँ खाने और दूध पीने के साथ-साथ ठंडी तासीर की वस्तुओं, मेवों और मसालेदार भोज-पदार्थों से परहेज रखने की सलाह दी जाती है।

आगे चलें...