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शनिवार, 13 नवंबर 2010

फाइलेरिया के लिए वैक्सीन

पैरों में सूजन और दर्द देने वाली बीमारी फाइलेरिया पर नियंत्रण के लिए काशी हिंदू विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक उपाय खोज लिया है जो फाइलेरिया के मरीजों को दर्द से निजात दिलाने में कामगार साबित होगा । उन्होंने ऐसी वैक्सीन ईजाद की है जो इस बीमारी में प्रतिरोधी का काम करेगी । वैज्ञानिकों ने फाइलेरिया के विषाणुओं में ही पोटेंशियल वैक्सीन प्रोटीन पाया है जो इसके खात्मे में सहायक हो सकता है । बायोके मिस्ट्री विभाग की प्रो. सुषमा राठौर के नेतृत्व में यह वैक्सीन तैयार की गई है । चूहों पर इसके प्रयोग के सार्थक परिणाम भी मिले हैं । प्रो. राठौर ने बताया कि फाइलेरिया की जांच के लिए अभी तक रक्त के नमूने रात में लिए जाते रहे हैं लेकिन उन्होंने ऐसी विधि विकसित की है जिससे इस रोग की जांच दिन में भी संभव हो सकेगी । इस दिशा में शोध को और गति दी जा रही है(नई दुनिया,दिल्ली,13.11.2010) ।

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रविवार, 7 नवंबर 2010

फाइलेरिया के इलाज में कारगर होगी कीमोथैरेपी

स्वस्थ्य मनुष्य को विकलांग बनाने वाले रोग फाइलेरिया के इलाज में वैज्ञानिकों को नई सफलता मिलने की उम्मीद है। प्रारंभिक स्तर पर इस रोग का इलाज कीमोथैरेपी के माध्यम करने का प्रयास किया जा रहा है। शुरूआती अवस्था में रोग की पुष्टि होते ही परिजीवियों का स्तर जानकर उन्हें निष्क्रिय किया जा सकेगा। इसके लिए वैज्ञानिकों को कुछ हद तक सफलता भी मिली है। शोधकताओं ने रोगी के शरीर से पैरासाइट्स निकाल उसके गुणसूत्रों को समझकर रोग को जड़ से नष्ट करने कवायद शुरू कर दी है। फाइलेरिया जिसे लोग फीलपांव अथवा हाथीपांव भी कहते हैं, मनुष्य को एक अवधि के बाद असहाय पीड़ा देता है। यह रोग मनुष्य के जिस हिस्से को संक्रमित करता है वहां पर मांस का स्तर काफी मात्रा में बढ़ जाता है। मच्छर के काटने के बाद यह रोग लगभग दस वर्ष के बाद अपना असर दिखाना शुरू करता है। इस अवधि के अंदर यह शरीर के ग्लूकोस एवं प्रोटीन के माध्यम से पनपता रहता है। अब तक दुनिया के किसी भी हिस्से में इसका निश्चित इलाज नहीं खोजा गया है। लखनऊ में केंद्रीय औषधि शोध संस्थान में इस रोग के निवारण हेतु विशेष शोध कार्य शुरू किया गया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जन्तु विज्ञान विभाग के प्रो. एसके मेहरोत्रा का कहना है कि कहना है कि इस रोग के चिकित्सा जगत में फाइलेरिया के लिए अब तक मात्र दो ही दवाएं ही कारगर साबित हुई हैं। इसमें फाइलेरिया डाफाइल एवं कारबोनीन आइवर मैक्टिन हैं, लेकिन यह औषधियां निर्धारित अवधि तक ही मरीज को फायदा पहुंचाती हैं। रात में दस बजे से भोर चार बजे के आसपास जब फाइलेरिया के परिजीवी सक्रिया होते हैं तो ये दवाएं भी काम करना बंद कर देती हैं। यह समय मरीज के लिए अत्यंत पीड़ादायक होता है। सेंट्रल ड्रग इंस्टीट्यूट में चल रहे रिसर्च में वैज्ञानिक प्रयासरत हैं कि मूल परजीवियों को औषधियों के माध्यम से खत्म किया जा सके। नये शोध में इस बात का विशेष ध्यान रखा जा रहा है कि समस्त प्रक्रिया में रोगी को शारीरिक हानि न हो(दैनिक जागरण,इलाहाबाद,6.11.2010)।

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