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गुरुवार, 31 मई 2012

गुटका और सिगरेट हैं ओरल कैंसर की जड़

क्या आप तंबाकू, सिगरेट, पान मसाला, पान, गुटखा आदि के बगैर रह नहीं सकते? क्या इस कारण आपके मुंह में तकलीफ रहने लगी है? सावधान हो जाइए, विशेषज्ञ कहते हैं कि यह ओरल यानी मुंह का कैंसर हो सकता है। धर्मशिला हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के सर्जिकल ओनकोलॉजिस्ट डॉ. अंशुमन कुमार और डॉ. मुदित अग्रवाल बता रहे हैं कि ओरल कैंसर क्या है, यह कैसे होता है और इससे कैसे बच सकते हैं। 

ओरल कैंसर यानी मुख का कैंसर, कैंसर के कारणों में आठवां प्रमुख कारण है। इसमें मुंह तो प्रभावित होता ही है, होंठ और जुबान पर भी इसका असर पड़ता है। वैसे यह गाल, मुंह के तालु, मसूड़ों और मुंह के ऊपरी हिस्से में होता है। इसके लक्षण आमतौर पर पकड़ में नहीं आते। 

प्रारम्भिक जांच 
ओरल कैंसर की जांच के दौरान सबसे पहले रोगी के स्वास्थ्य की पूर्व परेशानियों का पता लगाया जाता है। इसके बाद रोगी की धूम्रपान की आदतों का अध्ययन किया जाता है कि वह तंबाकू का आदी है या शराब का अधिक प्रयोग करता है या सिगरेट पीता है। विशेषज्ञ होठों, ओरल कैविटी, फारनेक्स (मुंह के पीछे, चेहरा और गर्दन) में शारीरिक परीक्षण द्वारा किसी भी तरह की सूजन, असामान्य या धब्बे वाले टिश्यू और घाव की जांच कर यह निर्णय लेते हैं कि कि कैंसर का कारण क्या है और वह किस स्थिति में है। 

कई बार में होती है जांच 
कोई भी जख्म या अल्सर मिलता है तो बायोप्सी की जाती है, जिसके बाद एनडोस्कोपिक परीक्षण और इमेजिंग इन्वेस्टिगेशन्स (कम्प्यूटिड टोमोग्राफी यानी सीटी), मैगनेटिक रिसोनेन्स इमेजिंग (एमआरआई) और अल्ट्रासोनोग्राफी द्वारा बीमारी की स्टेज जांची जाती है। 

उपचार का तरीका 
इसका उपचार हर मरीज के लिए अलग होता है। यह मुख्य रूप से पांच बातों पर निर्भर करता है। रोगी की उम्र, सामान्य स्वास्थ्य और उसका पिछला मेडिकल इतिहास, कैंसर का प्रकार, आकार व स्थान, कौन सा उपचार संभव है, पहले से मौजूद छुपी हुई बीमारियों का असर क्या होगा और क्या-क्या सुरक्षा जरूरी है।

शुरुआती अवस्था में ही ओरल कैंसर की पहचान हो जाए तो उपचार आसान हो जाता है। पीड़ित व्यक्ति के उपचार के लिए सर्जरी, कीमोथेरेपी और या रेडियोथेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है। सर्जरी की सहायता से टय़ूमर टिश्यू को पूरी तरह मिटाने और साथ वाले टिश्यू को सुधारने का काम किया जाता है ताकि कैंसर की समस्या फिर से पैदा न हो। 

अब तो पहचानें दुश्मन को 
अधिकतर ओरल कैंसर का कारण तंबाकू का प्रयोग है, इसलिए रोगियों को सख्त चेतावनी दी जाती है कि धूम्रपान छोड़ दें। रोगी धूम्रपान छोड़ देता है तो सिर, गर्दन और फेफड़ों के कैंसर के पनपने की आशंका से मुक्ति पाई जा सकती है जिसकी आमतौर पर आशंका रहती है। 

उपचार 
कन्जरवेटिव रिसेक्शन्स 
कन्जरवेटिव रिसेक्शन्स ओरल कैविटी के कैंसर के शुरुआती लक्षणों में होती है। इसका मुख्य काम होता है अंग को बचा कर रोगी को बेहतर जीवन प्रदान करना। इसमें एक छोटा सा ऑपरेशन किया जाता है। प्रारम्भिक स्थिति के लिए यही उपचार पर्याप्त होता है। 

कम्पोजिट रिसेक्शन्स 
एडवांस टय़ूमर ऑफ ओरल कैविटी के लिए यह सर्जरी की जाती है जो थोड़ी बड़ी होती है। तंबाकू चबाने वालों में यह समस्या सामान्य बात होती है। इसमें जबड़े का कुछ हिस्सा या पूरे जबड़े के साथ लगी गाल की अंदरूनी लाइनिंग के साथ में या इसके बिना गाल की त्वचा ही निकाल दी जाती है। 

मैक्सिलेक्टमी 
गाल की हड्डी (मैक्सिला) के कैंसर में रेडिकल मैक्सिलेक्टमी की जाती है। इसमें गाल की हड्डी के खराब हिस्से को निकाला जाता है। 

मेन्डिब्ल आर्क एंड फ्लोर ऑफ माउथ रिसेक्शन्स 
यह चुनौतीपूर्ण सर्जरी जबड़े के लोको-रिजनल टय़ूमर्स के लिए होती है। इसमें टय़ूमर को जबड़े सहित सावधानी पूर्वक हटाने के लिए ऑपरेशन किया जाता है और रोगी की टांग की हड्डी की सहायता से जबड़े का पुनर्निर्माण किया जाता है। 

कीमोथेरेपी 
सबसे जानी-पहचानी क्रिया है कीमोथेरपी। यह सुनियोजित किस्म का उपचार है जो सारे शरीर के सेल्स पर असर डालने वाला है। इसमें असामान्य विकास को रोकने और कैंसर पीड़ित सेल्स को अलग हटाने या उन्हें मारने के लिए दवा का प्रयोग किया जाता है। इस उपचार के बाद कैंसर सेल्स को फिर से बनने का कोई मौका भी नहीं मिलता। कई बार कीमोथेरपी के साथ सर्जरी और रेडिएशन थेरेपी का भी इस्तेमाल किया जाता है। 

रेडिएशन थेरेपी 
इसमें कैंसर पीड़ित सेल्स को समाप्त करने के लिए हाई एनर्जी रे या पार्टिकल्स प्रयोग किया जाता है। इसका मकसद कैंसर पीड़ित टिश्युओं को समाप्त करना और स्वस्थ टिश्युओं को बचाना होता है(हिंदुस्तान,दिल्ली,30.5.12)। 


नोटःइसी विषय पर आज इस और इस ब्लॉग पर दो महत्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुए हैं।

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शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

नशे का अड्डा बनता जा रहा है देश

बीते दिनों दिल्ली में नशीले पदार्थो की बरामदगी के दो बड़े मामले सामने आए। उनमें से एक में, दिल्ली में महिपालपुर स्थित एक कोरियर कंपनी के दफ्तर पर छापा मारकर इंटेलिजेंस विभाग के अधिकारियों ने एक पार्सल बरामद किया, जिसमें से 14 किलों से अधिक हशीश थी। इसे कोलकाता से हांगकांग भेजा जा रहा था। दूसरे मामलें में मायापुरी स्थित एक कोरियर कंपनी के दफ्तर पर इंटेलिजेंस विभाग के छापे में करोड़ों की हेरोइन बरामद की गई। पुलिस के मुताबिक इस काले धंधे में एक नाइजीरियाई नागरिक भी शामिल था। वह पार्सल के बीच में हेरोइन छिपाकर अमेरिका भेजने की फिराक में था। इस तरह नशीले पदार्थो की बरामदगी अब रोजमर्रा की बात हो गई है। पिछले दिनों दिल्ली में सीमा शुल्क एवं केंद्रीय उत्पाद शुल्क के मुख्य आयुक्तों और महानिदेशकों के सम्मेलन में एक नए तथ्य का खुलासा हुआ कि देश में आतंकी गतिविधियों में संलिप्त आतंकियों का पेट पालने के लिए सीमा पार बैठे उनके आका देश में चोरी छिपे ड्रग्स भेज रहे हैं। देश में आतंकियों को फंडिग के लिए ड्रग्स के कारोबार को मुख्य जरिया बना दिया गया है। ड्रग्स तस्करी के इस नए पैटर्न ने सुरक्षा एजेंसियों के होश उड़ा दिए हैं। कारण पाकिस्तान और अफगानिस्तान से अवैध मादक पदार्थो की खेप की मात्रा हर साल तेजी से बढ़ रही है और उस पर कोई अंकुश नहीं लग पा रहा है। हर साल पाकिस्तान से अफगान निर्मित हशीश हजारों किलो की मात्रा में देश में लाई जाती है। ऐसा भी नहीं कि वह पकड़ी न जाती हो। बीते साल ही डीआरआइ ने 1267 किलोग्राम प्रतिबंधित केटामाइन हाइड्रोक्लोराइड जब्त किया था जो तीन साल पहले के मुकाबले दो गुना ज्यादा है। केटामाइन के अलावा एसेटिक एनहाइड्राइड की तस्करी में भी पिछले सालों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। नारकोटिक्स के अधिकारियों का कहना है कि सबसे ज्यादा तस्करी पाकिस्तान और अफगानिस्तान से हेरोइन की होती है, जिसका मुख्य केंद्र भारत-पाक सीमा है। तस्करी के इस कारोबार में सबसे ज्यादा दिल्ली में रहने वाले अफ्रीकी और अफगानी शामिल हैं। जिस तरह दिल्ली में आए-दिन मारी मात्रा में ड्रग्स की बरामदगी होती है उसे देखकर लगता है कि ड्रग तस्कर इसे ट्रांजिट प्वाइंट के बतौर इस्तेमाल कर रहे हैं। सुरक्षा एजेंसियों को चकमा देकर न केवल वह अवैध तरीके से भारी मात्रा में नशीले पदार्थ दिल्ली लाने में कामयाब हो रहे हैं, बल्कि वह ड्रग्स को यहां से नेपाल, बांग्लादेश और पूर्वी एशियाई देशों व दुनिया के अन्य मुल्कों को छोटे-छोटे पैकेट बनाकर भेज रहे हैं। इसमें आतंकी संगठनों का भी उन्हें पूरा सहयोग मिल रहा है। देश में कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता जब देश के किसी हिस्से से करोड़ों की हशीश या हेरोइन के पकड़े जाने का समाचार न मिलता हो। यह सबूत है कि देश में नशे का कारोबार किस सीमा तक फैला हुआ है। असलियत में आज कोई एक देश नहीं, समूची दुनिया नशे की गिरफ्त में है। जहां तक दक्षिण एशियाई देशों का सवाल है भारत, पाक, अफगानिस्तान व म्यांमार अवैध मादक पदार्थो के बीस शीर्ष उत्पादकों में शामिल हैं और भारत में पश्चिम बंगाल और उत्तरांचल के कुछ भागों में अफीम की अवैध खेती निर्बाध गति से जारी है। गौरतलब है कि बोलिविया, वेनेजुएला और म्यांमार नशीले पदार्थो की तस्करी के लिए कुख्यात हैं। हमारे देश में मादक पदार्थो की तस्करी मुख्यत: पाकिस्तान, अफगानिस्तान और नेपाल से होती है। विश्व में अफगानिस्तान अफीम पैदा करने वाला सबसे बड़ा देश है। एक अनुमान के अनुसार आज वहां चार-साढे़ चार हजार मीट्रिक टन अफीम हर वर्ष पैदा होती है। मेथाकुआलोन जैसी नशीली दवा के उत्पादन में भारत शीर्ष पर है। आइसीबी के अनुसार भारत से सबसे ज्यादा तादाद में दक्षिण अफ्रीका को अफीम का निर्यात होता है। जहां तक गांजा पीने वालों का सवाल है देश में इनकी तादाद तकरीब 90 लाख है, जबकि इसको 90 हजार के करीब किसान पैदा करने में लगे हैं। दवाओं के निर्माण को लें तो इसमें तकरीब 100 मीट्रिक टन पदार्थो का उपयोग होता है, जबकि शेष अमेरिका और अन्य देशों को निर्यात किया जाता है। सीबीएन की मानें तो कानूनन अफीम की खेती के लिए यूपी, एमपी व राजस्थान जाने जाते हैं, जबकि गैर-कानूनी तौर पर इन राज्यों सहित अरुणाचल, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में भी अफीम की खेती होती है। असलियत में पिछले कुछ वर्षो से अफीम, चरस, हेरोइन, स्मैक, हशीश व अन्य मादक पदार्थो के अलावा भारत कोकीन आपूर्ति का नया केंद्र बनता जा रहा है। गौरतलब है कि यह दुनिया का सबसे महंगा मादक पदार्थ है जो ब्राजील, मैक्सिको, कोलंबिया, पनामा और वेनेजुएला जैसे लैटिन अमेरिकी देशों में बहुतायत में पाए जाने वाले कोकोवा प्लांट की पत्तियों से बनती है। इन देशों में इसकी कीमत पांच सौ से सात सौ रुपये प्रति ग्राम होती है और जैसे ही यह अफ्रीकी देशों में पहुंचती है इसकी कीमत दोगुनी हो जाती है। भारत पहुंचने पर इसकी कीमत छह से आठ गुना तक बढ़ जाती है और पांच-साढ़े पांच हजार रुपये प्रति ग्राम तक हो जाती है। इस कारोबार में लगे लोग इसे अफ्रीकी देशों के जरिये समुद्री रास्ते से पानी के जहाजों में छुपाकर भारत व अन्य एशियाई देशों में पहुंचाते हैं और फिर यहां से अपने नेटवर्क और कैरियर के जरिये यूरोपीय देशों में पहुंचाते हैं। नारकोटिक्स विभाग के अनुसार अकेले देश की राजधानी दिल्ली में हर साल बीस से पच्चीस किलो से ज्यादा कोकीन का कारोबार होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि कार से लेकर बार रेस्टोरेंट तक यह उपलब्ध है। इसे बड़े अमीर लोगों के मजे का शगल बताया जाता है। फिर भी इतनी बड़ी तादाद में इसकी आपूर्ति चिंता की बात है। नशों के आदी लोगों की संख्या एक फीसदी भी नहीं हैं। देश में इसकी सबसे ज्यादा खपत मुंबई, दिल्ली और गोवा में है और इस धंधे में दो दर्जन से ज्यादा गिरोह लगे हैं। ये कोकीन, हेरोइन, स्मैक, चरस व अफीम का कारोबार राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों से चलाते हैं। इसके अलावा वे हाईडोज टैबलेट के प्रसार में नाइजीरियन, अफगानी व कश्मीरियों का इस्तेमाल करते हैं। नारकोटिक्स विभाग की मानें तो वे अपना नेटवर्क फैलाने में पुरुषों के साथ महिलाओं का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं और माल की आपूर्ति के लिए वे अपनी सुरक्षा व सहूलियत का ध्यान रखते हुए स्थान भी खुद ही तय करते हैं। इस तरह वह अपने नेटवर्क के जरिये समूचे देश में मादक पदार्थो की आपूर्ति करते हैं और इस काम में उन्हें नेता, नौकरशाह और पुलिस अधिकारियों तक का हरसंभव सहयोग मिलता है। इसके बलबूते ही वह मादक पदार्थो के कारोबार को बखूबी अंजाम देते हैं। पुलिस, सुरक्षा बलों और नारकोटिक्स विभाग की तमाम चौकसी के बावजूद दिनोंदिन यह धंधा सुरसा की मुंह की तरह बढ़ता जा रहा है। यदि इस कारोबार पर नकेल नहीं कसी जाती है तो अपराध पर नकेल लगाना मुश्किल होगा(ज्ञानेंद्र रावत,दैनिक जागरण,1.7.11)।

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बुधवार, 1 जून 2011

आवश्यक दवा की सूची में निकोटिन के शामिल होने के आसार

सिगरेट सहित तंबाकू की लत छु़ड़ाने के लिए निकोटिन को आवश्यक दवा की सूची में शामिल किए जाने की संभावना है। स्वास्थ्य मंत्रालय के इस प्रस्ताव पर रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय गंभीरता से विचार कर रहा है। आवश्यक दवा की सूची में शामिल किए जाने के बाद ही निकोटिन सस्ता हो सकेगा।

स्मोकिंग छो़ड़ने के लिए प्रेरित करने के लिए इस थेरेपी का सस्ता होना जरुरी है। सिगरेट सहित तम्बाकू उत्पादों की लत छु़ड़ाने की विधि "निकोटिन रिप्लेसमेंट थेरेपी" की सिफारिश विश्व स्वास्थ्य संगठन ने की है। दवा की कीमत पर नियंत्रण करने वाले केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि नैशनल फार्मास्यूटिकल्स प्राइसिंग अथॉरिटी के पास स्वास्थ्य मंत्रालय का यह प्रस्ताव आया है। कई कंपनियां इस थेरेपी के तौर पर निकोटिन की टेबलेट लांच करने की तैयारी में है। एक कंपनी पिछले साल उसे लांच भी कर चुकी है लेकिन वह महंगी है। माना जा रहा है कि अथॉरिटी निकोटिन के बाजार को नियंत्रित करे तभी भारत में यह प्रभावी हो सकेगा। तंबाकू लॉबी की ताकत के सामने बेबस स्वास्थ्य मंत्रालय ने अब लत छु़ड़ाने पर अधिक जोर दिया है। सरकार पर तंबाकू लॉबी के प्रभाव की वजह से तंबाकू नियंत्रण के सारे प्रयास निष्प्रभावी साबित हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इस थेरेपी से दुनिया में लाखों लोगों की जान बच रही है। सिगरेट के खतरों से वाकिफ लोग आदत को छो़ड़ना तो चाहते हैं लेकिन दवा के बिना ऐसा करना आसान नहीं है। स्टडीज के अनुसार ४ से ७ प्रतिशत लोग ही बिना मेडिसिन के स्मोकिंग छो़ड़ने में सफल हो पाते हैं । वैसे विशेषज्ञों के अनुसार सबसे अच्छी विधि है बिना किसी दवा की सहायता के तंबाकू के सेवन को अचानक छो़ड़ देना। इसे "कोल्ड टर्की" विधि कहते हैं। निकोटिन रिप्लेसमेंट थेरेपी में दवा के तौर पर निकोटिन दी जाती है जिससे तंबाकू उत्पादों की "भूख" मिट जाती है। एक अनुमान के अनुसार भारत में १२ करो़ड़ लोग स्मोकिंग करते हैं । वयस्कों की आबादी में ३५ प्रतिशत किसी न किसी तंबाकू उत्पाद का सेवन करते हैं(धनंजय,नई दुनिया,दिल्ली,1.6.11)।

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मंगलवार, 31 मई 2011

तंबाकू की लत छुड़ाने वाली दवा हो सकती है सस्ती

तंबाकू की लत छोड़ने की जिद्दोजहद में लगे लोगों को यह जान कर राहत मिल सकती है कि इस कोशिश में मदद करने वाली दवाओं की कीमत घटाने की कोशिश की जा रही है। स्वास्थ्य सचिव के. चंद्रमौलि ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य नियंत्रण प्राधिकरण (एनपीपीए) के अध्यक्ष को पत्र लिख कर इस संबंध में तुरंत कदम उठाने को कहा है। बीड़ी, सिगरेट और गुटखा सहित सभी तरह के तंबाकू उत्पादों की लत छुड़ाने की दवा इस समय काफी महंगी हैं। निजी क्षेत्र की दो बड़ी कंपनियां निकोटिन रिप्लेसमेंट थेरेपी की यह दवाएं बनाती हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय ने तंबाकू की लत से मुक्ति दिलाने में इन दवाओं के प्रभाव को देखते हुए इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों की पहुंच में लाने की कोशिश शुरू कर दी है। इसके लिए एनपीपीए को अनुरोध किया गया है। एनपीपीए रसायन और उर्वरक मंत्रालय के तहत आता है। यह आवश्यक दवाओं की श्रेणी में शामिल दवाओं के मूल्य की निगरानी करता है। साथ ही आवश्यक दवाओं की सूची के बाहर की दवाओं की कीमत भी बहुत अधिक नहीं हो, यह सुनिश्चित करता है। कुछ समय पहले स्वास्थ्य मंत्रालय ने ऐसी दवा बनाने वाली कंपनियों के अधिकारियों के साथ बैठक भी की थी। इस दौरान भी उनसे अनुरोध किया गया था कि वे इन दवाओं की कीमत कम करें(दैनिक जागरण,दिल्ली,31.5.11)।

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बुधवार, 27 अप्रैल 2011

एम्स का शोधः तंबाकू से सिकुड़ रहीं दिल की धमनियां

अभी तक तंबाकू सेवन के कारण कैंसर जैसी घातक बीमारी पर बहस हो रही थी लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि तंबाकू खाने वालों की धमनियां सिकुड़ रही हैं। इसका खुलासा एम्स के कार्डियोलॉजी विभाग के डॉक्टरों के शोध से हुआ है। शोधकर्ताओं ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि दिल के मरीजों को तंबाकू का सेवन न करने की नसीहत देना डॉक्टर भी भूल जाते हैं। दिल पर तंबाकू के असर को लेकर किए जाने वाला यह पहला शोध है। एम्स के शोध को अमरीकन जर्नल ऑफ कार्डियोवास्कुलर ड्रग्स में प्रमुखता के साथ स्थान दिया गया है।
देश में तंबाकू सेवन करने वालों की तादाद सबसे ज्यादा है। आंकड़ों के अनुसार एक तिहाई भारतीय युवा धूम्रपान करते हैं। जबकि आधे तंबाकू या इसके अन्य रूपों का सेवन करते हैं। लगभग सात लाख लोग तंबाकू के कारण प्रति वर्ष मरते हैं। आम लोगों में यह धारणा बनी हुई है कि धूम्रपान के कारण दिल के रोग का खतरा बढ़ता है। जबकि तंबाकू के सेवन करने वालों में यह खतरा समान रूप से उपस्थित है। एम्स के कार्डियोलॉजी विभाग के डॉ. बलराम भार्गव के नेतृत्व में डॉ. सिवासुब्रमण्यिन रामकृष्णन, डॉ. राजेंद्र थंगजम, डॉ. अंबुज राय, डॉ. संदीप सिंह, डॉ. लक्ष्मी रामकृष्णन, डॉ. संदीप सेठ, डॉ. राजीव नारंग ने तंबाकू का सेवन करने वाले औसत ५१ वर्ष के १२ पुरुषों पर तंबाकू के असर का अध्ययन किया गया। इनमें से दो मधुमेह से पीड़ित थे जबकि छह हाईपरटेंशन के और चार एंजाइना के शिकार थे। एंजियोग्राफी के समय सभी लोगों को एक ग्राम तंबाकू के पत्ते चबाने के लिए दिए गए। डॉ. बलराम भार्गव ने बताया कि मात्र दस मिनट के अंदर दिल की धमनियों का व्यास ३.१७ मिलीमीटर से घटकर २.७९ मिलीमीटर हो गया। तंबाकू का असर १२ से १३ मिनट में चरम पर पहुंच गया। उन्होंने बताया कि धमनियां सिकुड़ने के कारण धड़कन प्रति मिनट ६८ से बढ़कर ८० पर पहुंच गई। साथ ही, कार्डिएक आउटपुट ३.८ से बढ़कर ४.७ पर पहुंच गया। तंबाकू के असर का पता लगाने के लिए एक घंटे तक शोध किया जाता रहा। तंबाकू में मौजूद निकोटिन रक्त में शामिल होकर दिल तक पहुंच जाता है और दिल के काम करने पर ज्यादा भार दे देता है। खास बात यह है कि तंबाकू की लत के शिकार जब डॉक्टर के पास जाते हैं तो उन्हें तंबाकू छोड़ने की सलाह देना डॉक्टर भूल जाते हैं(अमर उजाला,दिल्ली,27.4.11)।

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शनिवार, 16 अप्रैल 2011

बीड़ी-सिगरेट से मुक्ति के लिए हर्बल तंबाकू

तंबाकू उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने में असमर्थ सरकार अब धूम्रपान छुड़वाने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। निकोटिन प्रतिस्थापन थैरेपी और होमियोपैथी पद्धति का लिटमस टेस्ट कर सरकार विकल्प तलाश रही है। इसी कड़ी में कैंसर जैसी बीमारी का शिकार बनाने वाले सिगरेट-बीड़ी से मुक्ति की चाहत रखने वालों के लिए अब स्वदेशी हर्बल तंबाकू भी उपलब्ध है। पूरी तरह निकोटिन मुक्त तंबाकू का दावा करने से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय इसकी क्षमता का पता लगाने के लिए परीक्षण कराने जा रहा है। मानकता के पैमाने पर खरे उतरने के बाद इसे सिगरेट व बीड़ी के विकल्प के रूप में स्थापित किया जाएगा। देश में धूम्रपान से लगभग आठ लाख लोग मरते हैं।
उच्चतम न्यायालय में तंबाकू उत्पादक व विरोधियों के बीच चल रही लड़ाई के बीच केंद्र सरकार ने आयुष विभाग को क्वीटोबैक का परीक्षण करने का आदेश दिया है। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यदि परिणाम सकारात्मक सामने आए तो सरकार हर्बल फार्मूलेशन को भारी संख्या में पहुंचाकर सिगरेट-बीड़ी पीने वालों के लिए गांव-गांव तक पहुंचाया जाएगा। अधिकारी ने कहा कि यह गोली धूम्रपान करने वालों तक काफी किफायती मूल्य पर उपलब्ध होगी। हर्बल से तैयार गोली को निकोटिन का विकल्प होने का दावा किया जा रहा है। यस्तीमधु, खादिर, लवंग, इला, तुलसी जैसी आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां इसमें शामिल हैं। धूम्रपान की आदत को छोड़ने वालों के लिए हर्बल उत्पाद को कारगर माना जा रहा है। लवंग में यूजेनॉल मौजूद है जो निकोटिन को कॉटिनाइन में बदलने में मदद करता है। दिमाग के रिसेप्टर तक पहुंचे निकोटिन के मेटाबोलाइट पेशाब के माध्यम से बाहर निकालेगा। इसके अतिरिक्त हर्बल तंबाकू का कोई दुष्प्रभाव भी नहीं है। आंवला जैसी सामग्री एंटी ऑक्सीडेंट, विटामिन सी और टैनोइड से भी लाभ मिलेगा। ब्राह्मी और शंखपुष्पी जड़ी बूटियां सुस्त पड़े मस्तिष्क को सक्रिय करेगा(अमर उजाला,दिल्ली,16.4.11)।

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मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

शराब और लिवर सिरोसिस

महानगरों की बिगड़ती जीवनशैली, जंक फूड पर निर्भरता, तनावभरी जिंदगी और प्रतिस्पर्द्घा नई-नई बीमारियों को बढ़ा रही है। लोगों ने शराब के सेवन को अपने जीवनशैली का हिस्सा बना लिया है। अधिक शराब का सेवन हर तरह से खतरनाक है। इससे लिवर सिरोसिस (जिगर का सिकुड़ना) जैसी जानलेवा बीमारी के शिकार होने की आशंका रहती है। विदेशी सर्वेक्षणों का सहारा लेकर कई डॉक्टर यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि प्रतिदिन ६० एमएल शराब का सेवन किया जा सकता है, लेकिन भारतीय परिस्थितियों में यह अत्यंत हानिकारक है। यहाँ सप्ताह में एक या दो दिन से अधिक शराब का सेवन हानिकारक है। भारत पश्चिम की अपेक्षा अधिक गर्म देश है, इसलिए यहाँ कोशिश करनी चाहिए कि सप्ताह में ६० एमएल से अधिक शराब का सेवन न किया जाए।

शराब आदि के अधिक सेवन की वजह से जिगर क्षतिग्रस्त होने लगता है। बार-बार क्षतिग्रस्त होने के कारण जिगर में रेशा (फाइब्रोसिस) बनने लगता है जिससे जिगर सिकुड़ने लगता है। उसमें छोटी-बड़ी गाँठ पड़ जाती है। यह लिविर सिरोसिस है। यदि लिवर में सिर्फ सूजन आए, लेकिन रेशे में न बदले तो उस अवस्था को हेपेटाइटिस कहा जाता है। सिरोसिस के १५ से २० कारण हैं। परंतु शराब का लगातार सेवन, वायरल हेपेटाइटिस (विशेषकर हेपेटाइटिस बी व सी) नामक बीमारी और फैटी लिवर नामक बीमारी की वजह से लिवर सिरोसिस के मामले सामने आते हैं। पिछले एक दशक में फैटी लिवर के मामले तेशराब आदि के अधिक सेवन की वजह से जिगर क्षतिग्रस्त होने लगता है। बार-बार क्षतिग्रस्त होने के कारण जिगर में रेशा (फाइब्रोसिस) बनने लगता है जिससे जिगर सिकुड़ने लगता है। उसमें छोटी-बड़ी गाँठ पड़ जाती है। यह लिविर सिरोसिस है। यदि लिवर में सिर्फ सूजन आए, लेकिन रेशे में न बदले तो उस अवस्था को हेपेटाइटिस कहा जाता है। सिरोसिस के १५ से २० कारण हैं। परंतु शराब का लगातार सेवन, वायरल हेपेटाइटिस (विशेषकर हेपेटाइटिस बी व सी) नामक बीमारी और फैटी लिवर नामक बीमारी की वजह से लिवर सिरोसिस के मामले सामने आते हैं। पिछले एक दशक में फैटी लिवर के मामले तेजी से बढ़े हैं।

लिवर सिरोसिस बहुत खतरनाक व जानलेवा बीमारी है। इसका पता एक बार में नहीं चलता। माना जाता है कि पहली बार इस बीमारी का पता चलने के बाद अगले पाँच साल में अधिकांश मरीजों की मौत हो जाती है। यदि १०० लोग इस बीमारी के शिकार हैं तो ८० लोग पाँच साल के भीतर कभी भी मौत के मुँह में समा सकते हैं। लिवर सिरोसिस में तबीयत लगातार बिगड़ती चली जाती है, व्यक्ति सुस्त पड़ जाता है, किसी भी काम में वह जल्दी थक जाता है, सारा बदन टूटता रहता है, हड्डियों में तेज दर्द रहता है, जी मिचलाता रहता है, भूख नहीं लगती, वजन कम होता चला जाता है। इसमें लंबे समय तक हल्का बुखार (९९ डिसे) रहता है। यदि बुखार लगातार पाँच से छः महीने तक है तो तत्काल डॉक्टर से मिलने की जरूरत है।



लिवर विकार के लक्षणः
  • नियमित मद्यपान और खाली पेट मद्यपान
  • क्रोध,भय,तृष्णा और शोक से पीड़ित अवस्था
  • बहुत अधिक जल पीना तथा भूख से अधिक भोजन करना
  • ऊष्णता से त्रस्त रहने पर वेगों को रोकना
मरीज इन लक्षणों को लगातार नजरअंदाज करता चला जाता है। वह डॉक्टरों के पास तभी पहुँचता है, जब इस बीमारी की जटिलता उभरनी शुरू होती है। ज्यों-ज्यों बीमारी बढ़ती है मरीज में बेहोशी के लक्षण, पेट में पानी आना, पेट के पानी में सेप्टिक बनना(एसाइटिस),खून की उल्टी और काला पाखाना आने लगता है। यह स्थिति बेहद ख़तरनाक है। साधारण खून की जांच,लिवर फंक्शन टेस्ट और अल्ट्रासाउंड की जांच से लिवर सिरोसिस का पता चल जाता है।

उपचार
  • इलाज़ से परहेज हमेशा बेहतर उपचार है।
  • शराब का लगातार सेवन बहुत अधिक हानिकारक है।
शराब पिएं भी तो सप्ताह में 60 एमएल से अधिक नहीं।
हैपेटाइटिस-बी और सी से बचें।
फैटी लिवर से बचने के लिए मधुमेह और मोटापे पर नियंत्रण ज़रूरी है।
  • तला भोजन न करें।
  • कसरत नियमित रूप से करें।
  • सुबह-शाम तेज़ कदमों से टहलें।
आयुर्वेद में लिवर का उपचार
आयुर्वेद में लिवर (जिगर) के विकारों का संपूर्ण इलाज संभव है। लिवर हमारा खाना पचाने से लेकर बुनियादी प्रोटीन तक का निर्माण करता है। शरीर के मुख्य प्रोटीन एल्बिमिन का निर्माण यही करता है। वास्तव में लिवर का शरीर के लिए मुख्य रूप से पाँच कार्य होता है। पहला कार्य हमारे शरीर के खून को जमाने के लिए प्रोटीन का निर्माण करना है। यदि लिवर प्रोटीन का निर्माण न करे तो हमारा खून कभी जम ही न पाए। लिवर का दूसरा कार्य खाए हुए भोजन को शरीर के लिए ऊर्जा में परिवर्तित करना है। खाने से यदि ऊर्जा बने ही नहीं तो वह खाना हमारे लिए व्यर्थ है। लिवर का तीसरा कार्य शरीर के जहरीले पदार्थ के जहर को खत्म कर उसे शरीर के लिए उपयुक्त बनाना है। लिवर का चौथा कार्य शरीर के गंदे पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना है। यदि शरीर में विषैला व गंदा पदार्थ रह जाए तो शरीर जहरीला हो जाए। लिवर का पाँचवाँ कार्य पित्त का निर्माण और भोजन के वसा का पाचन है।
लिवर के इन कार्यों और उससे संबंधित बीमारी के आधार पर ही इलाज़ किया जाता है। आयुर्वेद में त्रिदोषों और धातुओं में विकार के आधार पर लिवर की बीमारी का पता चलता है। लिवर की बीमारी में वात-पित्त-कफ तीनों में दोष उत्पन्न हो जाता है। इसके अलावा,रस और रक्त में भी दोष आ जाता है जिससे लिवर अपना मुख्य कार्य करना बंद कर देता है। आयुर्वेद में त्रिदोषों का शमन करते हुए लिवर का इलाज़ किया जाता है।


आयुर्वेद से उपचार
  • शराब के परित्याग के लिए प्रेरित करना
  • जिस दोष(वात,पित्त अथवा कफ) की अधिकता है,पहले उसका उपचार किया जात है। तीनों दोषों में समता होने पर पहले कफ,फिर पित्त और आखिर में वात का इलाज़ किया जाता है।
  • अनुवासन और यापन वास्ति का प्रयोग तथा वातनाशक लैतभ्यंग और उबटन का प्रयोग। वातनाशक पौष्टिक पथ्य देना चाहिए।
  • यदि बल-मांसादि से क्षीण हो गई हो तो संशमन उपचार करें।
  • स्नेहन,स्वेदन,विरेचन कराएं। तत्पश्चात् शमन चिकित्सा करें।
(डॉ. कैलाश सिंघला और डॉ. आकाश परमार,सेहत,नई दुनिया,मार्च तृतीयांक,2011)

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शनिवार, 19 मार्च 2011

युवा हैं नशीली दवाओं की गिरफ्त में

छात्रों में नशीली दवाओं के सेवन की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता का विषय बनती जा रही है और इसे रोकने के प्रयासों को तेज करने की जरूरत है। केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने मादक द्रव्य नियंत्रण ब्यूरो के रजत जयंती समारोह में कहा कि कॉलेज और स्कूल के छात्रों में नशीली दवा के सेवन की बढ़ती प्रवृत्ति गंभीर चिंता की बात है। पिछले कुछ बरसों में स्थिति काफी बिगड़ी है और इस प्रवृत्ति को रोकने के प्रयासों में तेजी लानी होगी। गृहमंत्री ने अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा कि देश में नशीली दवाओं के अवैध व्यापार में काफी बढ़ोतरी हुई है। छात्रों को इस तरह की दवाएं बेचा जाना आंतरिक सुरक्षा के लिए भी गंभीर समस्या है। पार्टियों में नशीली दवाओं का खुलेआम इस्तेमाल हो रहा है। कोकीन और नशीली दवाओं का प्रचलन बढऩा इस बात का संकेत है कि इसे रोकने के प्रयास नाकाफी रहे हैं।

व्हाइटनर पर प्रतिबंध के लिए इच्छाशक्ति जरूरी

नशे के लिए व्हाइटनर के बढ़ते प्रचलन पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है और कहा है कि चूंकि यह आसानी से उपलब्ध होती है इसलिए बच्चों के बीच इसका प्रयोग ज्यादा होता है और इसकी ब्रिकी पर रोक लगाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। बेसहारा बच्चों के लिए काम करने वाले एक गैर सरकारी संगठन चेतना के निदेशक संजय गुप्ता ने कहा किव्हाइटनर की बिक्री पर कोई नियंत्रण नहीं है। स्टेशनरी, पान और अन्य सामान्य दुकानों पर यह आसानी से उपलब्ध होती है।

बच्चे भी इसे आसानी से खरीद सकते हैं, क्योंकि उन्हें बढिय़ा जेबखर्च मिलता है। गौरतलब है कि साल 2008 में चेतना ने एक अध्ययन किया था जिसमें यह पाया गया था कि प्रतिदिन व्हाइटनर की बिक्री 27 लाख से 67 लाख तक है। यह अध्ययन सिर्फ सड़कों पर रहने वाले बच्चों पर किया गया था अगर इसमें स्कूली बच्चों को भी जोड़ दिया जाता तो यह संख्या और भी ज्यादा होती। दूसरी तरफ सलाम बालक ट्रस्ट की निदेशिका किरण ज्योति ने कहा कि एक बोतल व्हाइटनर की कीमत दिन में 25 रुपया प्रति शीशी होती है, लेकिन रात होते-होते इसकी मांग बढ़ जाती है और यह 35 से 40 रुपया प्रति शीशी बिकती है। यह साफ है कि व्हाइटनर के लती बच्चों के कारण ही इसकी मांग बढ़ती है(राज एक्सप्रेस,17.3.11)।

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रविवार, 2 जनवरी 2011

शराब की लत का होम्योपैथी में इलाज़

यह एक ऐसे अधेड़ व्यक्ति का केस है जिसे लगभग दस साल से कब्ज की गंभीर शिकायत थी। कब्ज की शुरुआत सामान्य बदहजमी से हुई थी। पहले-पहल मरीज को पेडू में भारीपन के साथ मलत्याग करने में परेशानी महसूस हुई थी। इसे सामान्य घटना मानते हुए उसने अपने आपको दिलासा दे दिया कि पिछली रात अधिक मात्रा में मसालेदार भोजन करने के कारण उसे यह समस्या हुई होगी। कुछ दिनों तक बदहजमी बनी रही और बाद में ठीक हो गई। कुछ दिन बीतने के बाद उसे फिर से बदहजमी महसूस हुई। इस बार पेडू में भारीपन पहले की अपेक्षा अधिक था। अब भी इलाज के नाम पर कुछ नहीं किया गया। थोड़े समय बाद कब्ज की समस्या गायब हो गई। मरीज बदहजमी को टालता रहा और इसके प्रति लापरवाह रहा। धीरे-धीरे बीमारी के लक्षण बढ़ते जा रहे थे, अब मरीज को पेडू में भारीपन के साथ दर्द भी रहने लगा। इसी के साथ उसे मितली आने की शिकायत भी बढ़ गई। इस बार मरीज ने भारी और मसालेदार भोजन पर लगाम लगा दी। इससे मर्ज थोड़ा काबू में आया लेकिन पूरी तरह ठीक नहीं हुआ। मरीज ने पारिवारिक चिकित्सक को दिखाया। चिकित्सक ने एंटासिड खाने की सलाह दी। औषधि से समस्या का कुछ समय के लिए निराकरण हो गया।

कुछ हफ्तों बाद मरीज को पुनः कब्ज ने चपेट में ले लिया। मुलायम मल निकलता था लेकिन मरीज को पूर्ण मलत्याग हो गया है ऐसा संतुष्टि का भाव नहीं पैदा होता था। पूरी तरह मलत्याग के लिए उसे दिन में कई बार संडास जाना पड़ता था। ऐसा एक साल तक चला और बाद में कब्ज फिर से रहने लगा। मरीज को अब एक-दो दिन तक मलत्याग की इच्छा नहीं होती थी। पेडू में भारीपन के साथ मितली आने की शिकायत जरूर बनी रही। कभी-कभी उल्टियाँ भी हो जाती थीं। दिनोदिन बीमारी के लक्षण गंभीर होते जा रहे थे। मरीज के परिजनों ने पेटरोग विशेषज्ञ की सलाह ली। पेटरोग विशेषज्ञ ने कब्ज साफ होने की दवा के साथ एंटासिड भी खाने के लिए कहा। जब तक दवाएँ चलीं, तब तक सब कुछ ठीक रहा लेकिन दवाएँ बंद होते ही समस्या गंभीर हो गई। ६ महीने बाद परिजनों ने शहर के पेटरोग विशेषज्ञ को दिखाया। परीक्षणों के नतीजों में कोई सुधार न होते देखकर पेटरोग विशेषज्ञ ने छोटी और बड़ी आँत में किसी खराबी की पड़ताल के लिए एंडोस्कोपी करने का निर्णय लिया। इस परीक्षण से भी कुछ भी सामने नहीं आया।

पेट रोग विशेषज्ञ ने मरीज़ को अपनी जीवन-शैली में सुधार करने की सलाह दी। इलाज़ के दौरान मरीज़ ने पेटरोग विशेषज्ञ को बताया कि वह शराब पीने का आदी है। चिकित्सक ने तत्काल शराबखोरी बंद करने की सलाह दी। मरीज़ चूंक लत का शिकार हो चुका था इसलिए कुछ नहीं हो पाया। चिकित्सक के अधिक दबाव देने पर मरीज़ ने इलाज़ बीच में ही छोड़ दिया और आयुर्वेदिक इलाज़ शुरू कर दिया। चूंकि आयुर्वेदिक इलाज़ के साथ शराबखोरी चलती रही,इसलिए विशेष फायदा नहीं हुआ। कुछ अर्से बाद कब्ज इतनी बढ़ गई कि दो-तीन दिन में एक बार सख़्त मल का त्याग हो रहा था। परिजनों ने शराब छुड़वाने की बहुतेरी कोशिशें की मगर कोई फायदा नहीं हुआ। अंतिम उपाय के तौर पर होम्योपैथी को आजमाना तय हुआ।

मरीज़ की हिस्ट्री लेने के साथ ही तय हो गया कि वह आदतन शराबी है और इससे छुटकारा पाना चाहता है। हमने एसिडिटी और क़ब्ज़ की समस्या के निदान के लिए नक्स वोम नामक दवा से इलाज़ शुरू किया। इलाज़ के साथ शराब पर सख्ती से रोक लगाने को कहा। सात-आठ महीनों को सतत इलाज के बाद मरीज की कब्ज की समस्या में सुधार आने लगा। मरीज़ को पुरानी दवा बन्द कर सल्फ्यूरिकम एसिडम नामक दवा शुरू की गई। इससे मरीज़ के मन में शराब के प्रति अरूचि पैदा हो गई। बीच-बीच में हम मरीज को नक्स वोम दवा भी दे रहे थे। दो साल के इलाज़ के बाद मरीज शराब की लत से मुक्त हो चुका था। इसी के साथ उसकी असाध्य कब्ज की भी छुट्टी हो गई(डॉ. कैलाशचंद्र दीक्षित,सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर,2010 तृतीय अंक)

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सोमवार, 13 दिसंबर 2010

गुटखा और मुख-स्वास्थ्य

तंबाकू में मौजूद निकोटिन का असर पूरी बॉडी पर प़ड़ेगा। इससे पेट और गले का कैंसर हो सकता है। आपकी सेहत का राज छिपा है आपके दांतों में। अगर आपके दांत तंदुरुस्त नहीं हैं तो समझिए बॉडी भी तंदुरुस्त नहीं। युवाओं में गुटखा खाने का चलन ब़ढ़ता जा रहा है जिसका नतीजा दांतों और मसू़ढ़ों को भुगतना प़ड़ता है। लगातार गुटखे के सेवन से सबम्यूकस फाइब्रोसिस हो जाता है जिससे मुंह खुलना बंद हो जाता है। मुंह नहीं खुलेगा तो दांतों और मसू़ड़ों की सफाई कैसे होगी। मुंह नहीं खुलना कैंसर से ठीक पहले के लक्षण हैं।

आजकल लोग १२ से १३ साल की उम्र में गुटखा खाना शुरू कर देते हैं जिससे उनके दांत अधे़ड़ लोगों की तरह घिस जाते हैं। दांतों पर लगा इनेमल घिस जाता है और दांत संवेदनशील बन जाते हैं। दांतों के पेरिओडोंटल टिश्यू (दांत की हड्डी) क्षतिग्रस्त हो जाते हैं और दांत ढीले हो जाते हैं। भारत में ७० फीसदी लोग तंबाकू का सेवन करते हैं। दांतों की गंदगी और नियमित साफ-सफाई न होने के कारण ७०० तरह के बैक्टीरिया खून में पहुंच जाते हैं जो दिल की बीमारी का कारण बनते हैं। लगातार तंबाकू के इस्तेमाल से दांत का रंग भी काला हो जाता है। तंबाकू को लगातार मुंह में रखने से गाल का वह हिस्सा गल जाता है जहां तंबाकू रहता है। तंबाकू में मौजूद निकोटिन और चूना गाल के टिश्यूज को जला देता है यह टिश्यू जलकर कैंसर का कारण बन जाते हैं। शारीरिक रूप से कमजोर युवाओं पर गुटखेका असर सबसे ज्यादा प़ड़ता है। संतुलित खान-पान न होने से गुटखा इन युवाओं में जहर का काम करता है। लगातार गुटखे के सेवन से दांतों के जरिए युवाओं में मुंह का कैंसर, पेट का कैंसर और दिल की बीमारी हो जाती है। 
दांतों पर असर
लगातार गुटके के इस्तेमाल से दांत समय से पहले ढीले व कमजोर हो जाएंगे
पेरिओडोंटल टिश्यू क्षतिग्रस्त होंगे जो कैंसर का कारण बने सकता है
तंबाकू के इस्तेमाल से बैक्टीरिया दांतों में अपनी जगह बना लेंगे जिससे दांत गल सकते हैं(डॉ. बी.के.शिवा,नई दुनिया,दिल्ली,12.12.2010)

ओरल सबम्यूकल फायब्रोसिस का खतरा ४०० गुणा ज्यादा
आज गुटखा माउथफ्रेशनर के लिए एक आम नाम बन गया है। इसमें तंबाकू, सुपारी के साथ कई अन्य खतरनाक पदार्थों को बारीक कर प्लास्टिक पाउच में बेचा जाता है। गुटखे के सेवन से मुख कैंसर के अलावा एक और गंभीर बीमारी होती है जिसे ओरल सबम्यूकस फायब्रोसिस कहते हैं। इस बीमारी में मुंह में तंतु एक फीते की तरह ब़ढ़ता है, जिससे म्यूकस अपना लोच खो देता है और मुंह खोलने की क्षमता कम हो जाती है। कभी-कभी तो ऐसा होता है कि मुंह पूरी तरह बंद हो जाता है जिसे बाहरी युक्ति द्वारा खोला जाता है। कैंसर को मुंह में पनपने के लिए यह बीमारी बहुत ज्यादा जिम्मेदार होती है लेकिन इस बीमारी के बारे में जानकारी कम ही है। गुटखा न चबाने वालों की तुलना में गुटखा लेने वाले लोगों में इस बीमारी का खतरा ४०० गुणा ज्यादा होता है।

भारत में पान मसाला का उपयोग माउथ फ्रेशनर की तरह होता है। पान मसाला में मुख्य रूप से सुपारी, खैर, इलाइची, चूना और कई तरह के खूशबू देने वाले कुदरती पदार्थ मौजूद होते हैं। गुटखा पान मसाला का ही एक रूप है जिसमें तंबाकू को पान के फ्लेवर के साथ चबाया जाता है। भारत में पान को लोग भोजन के बाद खाते थे।

ऐसा माना जाता था कि इसमें पाचनकारी गुण पाए जाते हैं लेकिन बदलते जीवनशैली के साथ पान की जगह गुटखा ने ले ली है जो स्वाभाविक रूप से एक आदत सी बन जाती है। पान मसाला की पैठ ८.६ प्रतिशत की दर से शहरों में और ६.६ फीसदी की दर से ग्रामीण इलाकों में ब़ढ़ रही है।

तम्बाकू उत्पादों के ख़तरेः
अत्यधिक हार्ट अटैक
लकवा की संभावना
सभी तरह के कैंसर
महिलाओं में समय से पहले बु़ढ़ापा और प्रजनन शक्ति में ह्रास
पुरुषों में इरेक्टाइल डिसफंक्शन
पेप्टिक अल्सर
डिमेंशिया(डॉ.के.के. अग्रवाल,नई दुनिया,दिल्ली,12.12.2010)

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रविवार, 12 दिसंबर 2010

प्लास्टिक से ज्यादा खतरनाक है तंबाकू

सुप्रीम कोर्ट ने गुटखा और पान मसाला की प्लास्टिक पाउच में बिक्री पर प्रतिबंध लगाने का फैसला सुनाया है। फैसला स्वागत योग्य है लेकिन इससे तंबाकू के उपयोग, उससे होने वाली स्वास्थ्य हानि और ब़ढ़ते खतरनाक रोगों में कोई कमी आ जाएगी ऐसा नहीं लगता। सर्वोच्च न्यायालय ने कागज के पैकेट में बेचे जाने वाले सिगरेट को अपने इस फैसले से बाहर रखा है। जाहिर है इससे यह सवाल उठेगा कि प्लास्टिक ज्यादा खतरनाक है या तंबाकू?

आजादी की ल़ड़ाई के दौरान नशाबंदी को सबसे अहम मुद्दा मानने वाले महात्मा गांधी और अन्य समाजकर्मियों की लगातार कोशिशों का नतीजा ढाक के तीन पात ही निकला। पूर्ण नशाबंदी लागू नहीं हो पाई और निकट भविष्य में ऐसी कोई संभावना भी नहीं दिखती। सर्वोच्च न्यायालय के इस ताजा फैसले का निष्कर्ष यह है कि "तंबाकू को प्लास्टिक पाउच में न बेचा जाए बेशक उसे कागज के पाउच में बेचें।" सिगरेट लॉबी चूंकि ताकतवर है इसलिए इसके गिरेबान तक किसी कानून का हाथ नहीं पहुंचता। शराब की तो बात ही न करें। तथाकथित सभ्य समाज में स्टेट्स सिंबल बन चुके सिगरेट और शराब अब एक अलग इज्जत प्राप्त कर चुके हैं।"

बहरहाल तंबाकू के खतरे को नजरअंदाज करना न सिर्फ भयानक होगा बल्कि आत्मघाती भी होगा। तंबाकूजनित कुछ आंक़ड़ों पर भी गौर कर लें। विश्व स्वास्थ्य संगठन का आंक़ड़ा कहता है कि १९९७ के मुकाबले वर्ष, २००५ तक तंबाकू निषेध कानूनों के लागू करने के बाद वयस्कों में तंबाकू सेवन की दर में २१ से ३० प्रतिशत की कमी आई थी, लेकिन इसी दौरान हाईस्कूल जाने वाले १८ वर्ष से कम उम्र के बच्चों में तंबाकू का सेवन ६० प्रतिशत ब़ढ़ गया था। अमेरिकन कैंसर सोसायटी का आंक़ड़ा है कि प्रत्येक १० तंबाकू उपयोगकर्ता में से ९ महज १८ वर्ष की उम्र से पहले तंबाकू का सेवन शुरू कर चुके होते हैं। दुनिया में होने वाली हर ५ मौतों में से एक मौत तंबाकू की वजह से होती है। तंबाकू जनित रोगों में सबसे ज्यादा मामले फेफ़ड़े और रक्त से संबंधित रोगों के हैं जिनका इलाज न केवल महंगा बल्कि जटिल भी है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि सन २०५० तक २.२ अरब लोग तंबाकू या तंबाकू उत्पादों का सेवन कर रहे होंगे। इस आकलन से अंदाजा लगाया जा सकता है कि तंबाकू के खिलाफ कानूनी और गैर सरकारी अभियानों की क्या गति है और उसका क्या हश्र है। प्रत्येक ८ सेकेंड में होने वाली एक मौत तंबाकू और तंबाकू जनित उत्पादों के सेवन से होती है। फिर भी तंबाकू के उपभोग में कमी न होना मानव सभ्यता के लिए एक गंभीर सवाल है। तंबाकू के ब़ढ़ते खतरे और जानलेवा दुष्प्रभावों के बावजूद इससे निपटने की हमारी तैयारी इतनी लचर है कि हम अपनी मौत को देख तो सकते हैं लेकिन उसे टालने की कोशिश नहीं कर सकते। यह मानवीय इतिहास की एक त्रासद घटना ही कही जाएगी कि कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका की सक्रियता के बावजूद स्थिति नहीं संभल रही। क्या तंबाकू के खिलाफ इस जंग में हमें हमारी नीयत ठीक करने की जरूरत नहीं है?(डॉ.ए.के.अरूण,नई दुनिया,दिल्ली,12.12.2010)

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बुधवार, 3 नवंबर 2010

सबसे खराब नशा

शराब आज सोशल ड्रिंक जरूर बन गया है लेकिन ब्रिटेन के वैज्ञानिकों का कहना है कि यह लोगों को अनसोशल विहेवियर करने के लिए प्रेरित करता है। हाल ही में हुए शोध में उन्‍होंने पाया है कि शराब हीरोइन, कोकीन और गांजा से भी कहीं ज्यादा खतरनाक है।
ब्रिटेन मादक पदार्थ सलाहकार प्रोफेसर डेविड नट के नेतृत्व में हाल में किये गए एक शोध से यह बात सामने आयी कि शराब कोकीन और तम्बाकू से तीन गुना अधिक खतरनाक होती है। हिरोइन और कोकिन शराब के बाद क्रमश: दूसरा और तीसरा हानिकारक मादक पदार्थ हैं। शोधकर्ताओं ने कहा कि यदि मादक पदार्थों को उनसे होने वाली हानि के आधार पर वर्गीकृत किया जाए तो शराब ‘ए’ श्रेणी में आती है जबकि हेराइन और कोकीन उसके बाद आते हैं। खुद वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने हिसाब लगाया था कि शराब पीने से एक साल में लगभग 25 लाख लोगों की दिल, लीवर की बीमारियों, कैंसर, सड़क हादसों और सूइसाइड से मौत हो जाती है। यह दुनिया भर में होने वाली मौतों का 3.8 प्रतिशत है। इसके अलावा यह दुनिया भर में असामयिक मृत्यु और विकलांगता के लिए जिम्मेदार तीसरा बड़ा फैक्टर है। इसी बारे में देखिए आज नवभारत टाइम्स का संपादकीयः नशे के बारे में दुनिया की समझ बदल रही है। ताकतवर सरकारी और निजी स्वार्थ आड़े न आए तो इस स्थगित प्रश्न पर शायद दोबारा विचार शुरू हो कि किसी समाज से उसके पारंपरिक नशे छीनकर उस पर कोई और नशा आरोपित करना वहां कैसी-कैसी सामाजिक और व्यक्तिगत आपदाओं का कारण बन जाता है। डेढ़-दो सौ साल पहले तक भारत में ही नहीं, संसार के लगभग सारे पारंपरिक समाजों में स्थानीय नशे प्रचलित थे। भारत में भांग, गांजा, ताड़ी, गुड़ या महुए की शराब और मुगलों की लाई अफीम मुख्यधारा के नशे समझे जाते थे जबकि चावल, काजू आदि को फर्मेंट करके निकाली जाने वाली हंडि़या, छंग या फेनी जैसी शराबें आदिवासी और मेहनतकश समुदायों की पहचान मानी जाती थीं। यूरोप में अंगूर से निकलने वाली वाइन और जौ के पानी से बनी बियर का चलन था, जबकि प्राचीन अमेरिकी सभ्यताओं में उत्सवों के मौके पर तंबाकू और कोको के पत्ते चबाने का रिवाज था। फिर पासा ऐसा पलटा कि दुनिया में हर जगह डिस्टिल्ड शराब और कागज में लपेट कर सिगरेट की शक्ल में बेचे जाने वाले तंबाकू का जलवा हो गया और सिर्फ यूरोप को छोड़कर बाकी सभी जगहों के स्थानीय नशे एक झटके में गैरकानूनी घोषित कर दिए गए। कुछ समाजविज्ञानी नशे के मामले में आए इस बदलाव का सीधा रिश्ता यूरोपीय साम्राज्यवाद से जोड़ते हैं। उनका कहना है कि फैक्टरी में बनने वाली शराब और सिगरेट तीन-चौथाई दुनिया पर डेढ़-दो सौ साल चली ब्रिटिश हुकूमत की देन है। आज भी सिर्फ ये ही दो नशे दुनिया के किसी भी देश के किसी भी बाजार में खड़े-खड़े खरीदे जा सकते हैं। सीधे वनस्पतियों के रूप में उपलब्ध भांग और गांजा या पौधों से आसानी से निकाली जा सकने वाली अफीम, चरस और कोकीन अलग-अलग देशों में सख्त सरकारी निगरानी में बिकते हैं, जबकि रासायनिक प्रक्रिया में बनने वाली हिरोइन, क्रैक कोकीन, एलएसडी, मेथ और एक्सटेसी जैसे पदार्थ गैरकानूनी ड्रग्स के रूप में जाने जाते हैं और इनकी बिक्री संसार में हर जगह प्रतिबंधित है। ब्रिटिश डॉक्टर और शोधकर्ता डेविड नट ने हाल में अपने एक शोध के जरिये यह साबित करके ब्रिटेन और अमेरिका में हलचल मचा दी है कि इन सारे कानूनी और गैरकानूनी नशों में सबसे ज्यादा खतरनाक शराब है। अपनी रिसर्च के लिए उन्होंने नशों से होने वाले नौ तरह के व्यक्तिगत और सामाजिक नुकसानों की सूची बनाई और हर नशे से इन सभी तरह के नुकसानों के लिए अलग-अलग अंक निर्धारित किए। इन अंकों को जोड़कर तैयार किए गए पैमाने पर शराब का मुकाम हिरोइन जैसे जानलेवा नशों से भी ऊपर पाया गया। इस शोध का यह तात्पर्य कतई नहीं है कि पारंपरिक या रासायनिक प्रक्रिया में तैयार होने वाले नशे व्यक्ति या समाज के लिए कम नुकसानदेह हैं और उनके प्रति किसी तरह की नरमी बरती जानी चाहिए। लेकिन शराब की बिक्री को आधुनिकता का पर्याय समझ लेने वाली सरकारों के लिए इस शोध में एक संदेश जरूर मौजूद है।

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शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

देश की सेहत बिगाड़ रहा तंबाकू

हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने वैश्विक वयस्क तंबाकू सेवन सर्वेक्षण की रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि तंबाकू उत्पादों के सेवन से भारत में हर साल दस लाख से ज्यादा लोग असमय मौत का शिकार हो रहे हैं। सर्वेक्षण रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि तमाम चेतावनियों और सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध कर देने के बावजूद ३५ फीसदी वयस्क तंबाकू उत्पादों का सेवन करते हैं। इनमें एक-चौथाई लड़कियां हैं जो १५ साल की उम्र से पहले ही तंबाकू का किसी न किसी रूप में सेवन शुरू कर देती हैं। हैरानी की बात है कि तंबाकू की लत के शिकार लोगों में ६० फीसदी तो नींद खुलने के साथ ही तंबाकू उत्पादों का सेवन करने लगते हैं। फिर विकसित देशों में कड़ी पाबंदी के चलते बड़ी कंपनियां अपने तंबाकू उत्पादों की बिक्री के लिए भारत व दूसरे विकासशील देशों पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं। तंबाकू के धुएं से सिर्फ उन्हीं लोगों को नुकसान नहीं हो रहा है जो इसका सेवन कर रहे हैं बल्कि देश में ५२ फीसदी वयस्क हिंदुस्तानियों को दूसरे द्वारा पी गई बीड़ी-सिगरेट के धुएं का शिकार होना पड़ता है।
चीन के बाद भारत में दुनिया के सबसे अधिक तंबाकू सेवन करने वाले लोग रहते हैं। तंबाकू सेवन करने वालों में बीड़ी पीने वालों का अनुपात ८५ फीसदी है। सरकार तंबाकू के उत्पादन को नियंत्रित कर इसके दुष्प्रभाव को कम करना चाहती है परंतु तंबाकू की खेती और तंबाकू उत्पादों से जुड़े उद्योगों में लगे लाखों किसानों-मजदूरों की आजीविका आड़े आ रही है।
विशेषज्ञ तंबाकू से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए इस पर टैक्स बढ़ाने का सुझाव देते रहे हैं। उनके अनुसार यदि देश में बीड़ी- सिगरेट पर लगने वाले टैक्स को अंतरराष्ट्रीय मानकों के स्तर पर ला दिया जाए, तो सरकार को न केवल प्रतिवर्ष १८,००० करोड़ रुपए का अतिरिक्त राजस्व हासिल होगा अपितु लाखों लोगों को असमय मौत के मुंह में जाने से बचाया भी जा सकेगा। बीड़ी-सिगरेट से हो रहे भारी नुकसान के बावजूद देश में लोकप्रिय तंबाकू उत्पादों पर कर की दरें बहुत कम हैं। उदाहरण के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सिगरेट पर ६५ से ८५ फीसदी कर लगाने का सुझाव दिया है जबकि भारत में कर की दर २५ से ४० फीसदी है। यदि सिगरेट की खुदरा बिक्री पर कर को बढ़ाकर ७८ फीसदी कर दिया जाए, तो तंबाकू से होने वाली ३४ लाख मौतों को कई वर्ष तक टालने में सफलता मिलेगी। इससे सरकारी खजाने में १४,६३० करोड़ रुपए की भी बढ़ोत्तरी होगी। बीड़ी की फुटकर बिक्री पर नौ फीसदी से भी कम कर है। यदि इस दर को ४० फीसदी कर दिया जाए तो डेढ़ करोड़ लोगों को अकाल मौत से बचाया जा सकेगा और ३,६९० करोड़ रुपए का राजस्व लाभ होगा। इसके अलावा बीमारी पर होने वाले खर्च में भी कमी आ जाएगी(नई दुनिया,दिल्ली,29.10.2010)।

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बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

गुटखा पर भी वैधानिक चेतावनी प्रकाशित होःसुप्रीम कोर्ट

गुटखा की पुड़िया में प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल से चिंतित सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि देश में इसकी बिक्री पर पाबंदी लगनी चाहिए। अदालत का मत था कि सिगरेट के पैकैट की तरह ही गुटखा के पैकेट पर भी वैधानिक चेतावनी प्रकाशित होनी चाहिए, क्योंकि इसके सेवन से भी लोगों को गंभीर बीमारियां हो रही हैं। न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और अशोक कुमार गांगुली की दो सदस्यीय खंडपीठ ने मंगलवार को गुटखा की पुड़िया में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने के राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान ये टिप्पणी की। न्यायाधीशों ने गुटखा के इस्तेमाल से होने वाले दुष्प्रभावों का जिक्र करते हुए कहा कि इसके सेवन से कैंसर जैसी घातक बीमारी हो सकती है और देश में अनेक लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं। इससे पहले, सालीसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम ने अदालत को सूचित किया कि सरकार ने गुटखा की पुड़िया में प्लास्टिक के इस्तेमाल के दुष्प्रभावों के अध्ययन के लिए एक समिति गठित की है। उन्होंने कहा कि इस समिति की रिपोर्ट पेश करने के लिए सरकार को कुछ समय चाहिए। अदालत ने संक्षिप्त सुनवाई के बाद केंद्र सरकार को समिति की रिपोर्ट पेश करने के लिए चार सप्ताह का समय प्रदान कर दिया। इस मामले में अदालत अब दो दिसंबर को आगे विचार करेगी। इस पर न्यायाधीशों ने कहा कि सरकार संवदेनशील मामलों में समिति गठित करने के अलावा कुछ नहीं करती है। गुटखा में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पाबंदी की राय से सहमति व्यक्त करते हुए न्यायाधीशों ने कहा कि इस प्लास्टिक के कारण यमुना नदी की स्थिति सबके सामने है। देश के सभी शहरों और नगरों में प्लास्टिक की इन थैलियों ने नाले नालियों को जाम कर रखा है(नई दुनिया,दिल्ली,20.10.2010)।

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तंबाकू और महिलाएं

महिलाएं तंबाकू की लत के भंवर में तेजी से फंसती जा रही हैं। ७२ हजार घरों में पूरे देश में किए गए अब तक के सबसे बड़े सर्वे में मिला यह तथ्य भारी चिंता में डालने वाला है कि तंबाकू की लत में फंसी महिलाओं की संख्या बढ़कर दोगुनी हो गई है। धुआं उड़ाने वालों की संख्या घटी है, वहीं तंबाकू चबाकर थूकने वालों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं पर तंबाकू का ज्यादा बुरा असर होता है। मंगलवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने यह रिपोर्ट जारी की। मंत्रालय की चीफ मेडिकल ऑफिसर एवं टुबैको कंट्रोल अभियान में बढ़ चढ़कर भाग लेने वाली डॉ. जगदीश कौर ने कहा कि यह बेहद चिंता की बात है कि देश की आधी आबादी में तंबाकू का सेवन इतनी तेजी से बढ़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार तंबाकू के लत की शिकार महिलाओं की सख्या पहले १०.८ प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर सीधे २० प्रतिशत हो गई है। हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल ने कहा कि महिलाओं में तंबाकू के लत के दो बड़े खतरे हैं। एक यह कि उनकी सुंदरता चली जाती है, दूसरे उन पर बांझ होने का जोखिम बढ़ जाता है। रिपोर्ट के अनुसार सार्वजनिक स्थलों पर किए गए स्मोकिंग नियंत्रण के प्रयास नहीं के बराबर प्रभावी हुए हैं। २९ प्रतिशत भारतीयों पर घर के बाहर सिगरेट के धुएं से प्रभावित होने का जोखिम मंडरा रहा है। इससे आधे लोगों को घर के भीतर यह खतरा है। इनमें महिलाएं एवं बच्चे शामिल हैं। स्मोकिंग करने वालों की तुलना में तंबाकू चबाने वालों की संख्या काफी अधिक हो गई है। स्मोकिंग करने वालों की संख्या १४ प्रतिशत है, वहीं गुटखा व खैनी जैसे पदार्थों का उपयोग करने वाले २६ प्रतिशत हो गए हैं। जो रिपोर्ट जारी की गई है उसका नाम - ग्लोबल अडल्ट टुबैको सर्वे (गैट्स)- इंडिया २०१० है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तत्वावधान में मुंबई स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पाप्युलेशन साइंसेज ने यह सर्वे १९ भाषाओं में किया है। हर साल पूरी दुनिया में ५५ लाख लोग तंबाकू के उपयोग से मौत के मुंह में चले जाते हैं। इनमें नौ लाख भारत के लोग होते हैं(नई दुनिया,दिल्ली,20.10.2010)।

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शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

कैंसर का शुरूआती लक्षण है ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस

पान, पान मसाला, तंबाकू, बहुत गर्म और मिर्च मसालेदार खाना पसंद करने वाले लोगों को ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस की शिकायत हो सकती है और अगर सही समय पर इसका इलाज न हो तो यह बीमारी कैंसर का रूप ले लेती है। डॉ अरविंद गुप्ता ने को बताया मुंह में होने वाली बीमारियों में से एक ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस है जिसमें मुंह की त्वचा में पाए जाने वाले सबम्यूकस ऊतकों में तेज जलन होती है और छाले आ जाते हैं। यह समस्या उन लोगों को होती है जो पान, पान मसाला, तंबाकू, बहुत गर्म और मिर्च मसालेदार खाने का सेवन करते हैं। इससे मुंह के ऊतक ही क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। इसे कैंसर का शुरूआती लक्षण माना जा सकता है क्योंकि ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस कैंसर का रूप ले सकता है। डॉ जिगीश डी. शाह कहते हैं कि इस बीमारी की वजह से व्यक्ति को मुंह खोलने में दिक्कत होती है। बाद में स्थिति यह हो जाती है कि मिर्च मसाले वाला भोजन और गर्म भोजन का सेवन असंभव हो जाता है। ऐसे लोगों को कैंसर हो सकता है। मुंह में लगातार जलन होती रहती है। लार अधिक मात्रा में बनती है। कई बार मुंह में लगातार शुष्कता का अहसास होता है। डॉ. गुप्ता कहते हैं कि शुरूआती अवस्था में इस बीमारी का इलाज किया जा सकता है लेकिन देर होने पर यह बीमारी कैंसर का रूप ले सकती है। डॉ. गुप्ता के अनुसार, ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस से पीडि़त व्यक्ति के कान में दर्द होता है, उन्हें कम सुनाई देता है और उनकी आवाज ऐसी लगती है मानो वह नाक से बोल रहे हैं। कभी कभी तो मरीजों को खाने का वास्तविक स्वाद महसूस नहीं होता बल्कि खाना फीका सा लगता है। दक्षिण पूर्वी एशिया और भारत में हजारों वर्षों से पान के सेवन का चलन है। इसके दुष्प्रभाव वैसे ही होते हैं जैसे पश्चिमी देशों में तंबाकू के सेवन से होते हैं। पान और तंबाकू के सेवन से दांत खराब होना और मुंह से दुर्गंध आना ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस के शुरुआती लक्षण हैं। बेहतर होगा कि पान, पान मसाला, तंबाकू, बहुत गर्म और मिर्च मसालेदार खाने से परहेज किया जाए। वह कहती हैं कि पान में लगाया जाने वाला चूना और कत्था मुंह के उूतकों की अम्लीयता बढ़ा देता है जिसकी वजह से छाले आ जाते हैं। छालों का समय पर इलाज नहीं होने पर वह अल्सर का रूप ले लेते हैं। ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस की शुरूआत में लार की मात्रा कम या ज्यादा होने लगती है। इस बीमारी के बढ़ने पर म्यूकोसा पूरी तरह समाप्त हो जाता है और कठोरता महसूस होने लगती है(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,9.10.2010)।

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सोमवार, 5 जुलाई 2010

पान मसाला के साथ खिलाया जा रहा तंबाकू

अगर आप पान मसाला खाने के शौकीन हैं तो यह खबर पढ़कर आपको सावधान हो जाना चाहिए। हो सकता है कि आप अनजाने में पान मसाला के साथ तंबाकू का सेवन भी कर रहे हों। कुछ पान मसाला कंपनियां ग्राहक को अपने प्रोडक्ट का मुरीद बनाने के लिए उसमें तंबाकू मिला रही हैं। पंजाब के पान मसाला शौकीनों में प्रचलित हो चुकी दो प्रमुख कंपनियों के उत्पादों में निकोटिन मिला है। गाजियाबाद की सेंट्रल फूड लैब ने इसकी पुष्टि की है। रिपोर्ट मिलने के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथारिटी ने फूड सेफ्टी कमिश्नरों को आगाह कर दिया है। उन्हें पान मसाला उत्पादों की विशेष जांच कराने को कहा गया है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को पान मसाला उत्पादों में तंबाकू मिलाए जाने का संदेह था। मंत्रालय ने हाल ही में नेशनल टोबेको कंट्रोल प्रोग्राम के तहत देश के कई प्रमुख ब्रांड के पान मसाला के सैंपल भरवाए। सभी सैंपल गाजियाबाद की सेंट्रल फूड लेबोरेटरी भेजे गए। वहां इनमें निकोटिन, पीएच व मैगिनजियम कार्बोनेट की जांच की गई। जांच रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से दो प्रमुख कंपनियों के पान मसाला में निकोटिन पाया गया। विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि इन उत्पादों के सैंपलों में निकोटिन मिलने की वजह सिर्फ तंबाकू ही है जबकि प्रीवेंशन आफ फूड अडल्ट्रेशन एक्ट के तहत पान मसाला में तंबाकू मिलाने पर पाबंदी है।
अब फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथारिटी के असिस्टेंट डायरेक्टर जनरल डा.धीर सिंह ने राज्यों को पान मसाला की विशेष जांच शुरू करने के निर्देश दे दिए हैं। उन्हें कहा गया है कि बाजार में बिक रहे विभिन्न ब्रांड के सैंपल भरकर आर्टीफिशियल स्वीटनर, कलरिंग मैटर, निकोटिन व स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह अन्य तत्वों की जांच कराई जाए। पंजाब के स्वास्थ्य निदेशालय ने सभी सिविल सर्जनों को पान मसाला के सैंपल भरकर चंडीगढ़ स्थित पब्लिक हेल्थ लैब भेजने को कहा है। सिविल सर्जनों को पंद्रह दिन में जवाब भेजने को कहा गया है कि उन्होंने निर्देशों के बाद कितने सैंपल भरकर जांच कराए।
-ब्रांड की लत लगाने के लिए कर रहे ऐसा: डा.पुष्पिंदर
लुधियाना में आस किरण नशा छुड़ाओ केंद्र के इंचार्ज व गुरु गोबिंद सिंह स्टडी सर्किल के प्रतिनिधि डा.पुष्पिंदर सिंह के मुताबिक ये कंपनियां उत्पाद की पैकिंग व विज्ञापन में उनके नॉन टोबेको प्रोडक्ट होने का दावा करती हैं। अगर वे उसमें तंबाकू मिला रही हैं तो यह उन ग्राहकों के विश्वास व सेहत के साथ धोखा है, जो उसे नॉन टोबैको प्रोडक्ट समझकर सेवन कर रहे हैं। कंपनियों को पैकिंग पर ही स्पष्ट कर देना चाहिए कि उसमें तंबाकू है। उनके मुताबिक पान मसाला में तंबाकू सिर्फ ग्राहक को उसकी लत लगाने के लिए मिलाया जाता है। डा.पुष्पिंदर के मुताबिक छात्रों में पान मसाला काफी प्रचलित है, और अगर इसमें तंबाकू मिलाया जा रहा है तो छात्रों का नशे के आदी होने का खतरा ज्यादा है। इसमें सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए(विपन जूंद,दैनिक भास्कर,लुधियाना,5.7.2010)।

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बुधवार, 27 जनवरी 2010

चाय है गुटखे से भी ज्यादा नुकसानदेह

(नई दुनिया,दिल्ली,25.1.10)
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