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मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

मधुमेह से मुक्ति के पांच अनुभवसिद्ध प्रयोग-2

3. किसी मिट्टी के पात्र में पावभर शुद्ध कुएं का या गंगाजल रख लें। इस जल में पलाशपुष्प पांच नग डाल लें जो हर जगह आसानी से मिल जाता है। सुबह उस फूल को उसी जल में मलकर छान लें और एक ही बार में बासी मुंह पी जाएं। हर हफ्ते फूल की मात्रा एक-एक करके बढ़ाते जाएं। चार सप्ताह में रोग निर्मूल हो जाएगा। अनुराधा नक्षत्र में तोड़े गए पुष्पों से और भी जल्दी लाभ होता है। इस प्रयोग से प्रमेह में भी लाभ होता है। मूत्रकृच्छ तथा सूजाक तक के रोग भी ठीक होते देखे गए हैं। 

नोटःयह अनुभव डॉ. पन्नालाल गर्ग जी का है जिनका पता हैःअध्यक्ष,पलाश प्रयोगशाला,पीरपुर हाउस,लखनऊ(उत्तरप्रदेश)। 

4. जामुन के 1 हरे पत्ते,नीम के 2 हरे पत्ते,बिल्वपत्र(बेल) के 3 हरे पत्ते तथा तुलसी के 8 हरे पत्ते सुखा लें। अलग-अलग लेकर समभाग में सूखे पत्तों को पीसकर मिला लें। रोज़ चाय की चम्मच से एक चम्मच पाउडर सुबह पानी के साथ पी लें।लेने से पहले रोगी अपने शक्कर की जांच करवा लें,यदि यह 300-400 रहा हो,तो 150 पर आ जाएगा। इसे लेते रहने से शरीर में चीनी नियंत्रित रहती है। 

5. सहदेई(सहदेवी) नामक पौधे को खोदकर ले आएं। उसकी जड़ को अलग निकालकर एक तोला एवं एक पाव जल(ताज़ा या बासी) के साथ इस प्रकार पीसें जिससे वह जल के साथ एकदम घुलमिल कर एक हो जाए। उसे सुबह-शाम दोनों समय पीएं। तीस दिनों तक ऐसा करने से रोग नष्ट हो जाता है। यह अचूक औषधि है। इससे पेट की खराबियां,रक्तदोष,ज्वर आदि रोगों में भी मुक्ति मिलती है। 

नोटःचौथा और पांचवा अनुभव क्रमशः श्री बजरंगलालजी सिंघानिया तथा परसराम जी का है। पांचो अनुभव कल्याण में प्रकाशित हैं)।

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बुधवार, 28 नवंबर 2012

मधुमेह से मुक्ति के पांच अनुभवसिद्ध प्रयोग-1

1.बड़े आकार का पांच सेर करेला लें। उन्हें लम्बे दावसे बीचोबीच काटकर एक के दो-दो टुकड़े कर लें। फिर,किसी कपड़े पर उन्हें सूखने के लिए बिछा दिया जाए। ध्यान रहे कि उन्हें छाया में सुखाना है। धूप बिल्कुल नहीं लगने देनी चाहिए। इनमें से आधे सूख जाएंगे और दानेदार छिलका चाकू से रगडकर-उतारकर उसे पीसकर बारीक कर लिया जाए। यह बारीक चूर्ण एक तोला प्रातःकाल खाली पेट और एक तोला रात्रि को सोने पूर्व, पानी के साथ लेना चाहिए। 15 दिन या मास भर लेने से रोग नष्ट हो जाता है। 

नोटःयह अनुभव श्री मनोहरलाल अग्रवाल जी का है जिनसे जे.पी. रामशरणम,18वां मार्ग,चेम्बूर,मुंबई-71 पर पत्राचार किया जा सकता है। 

2. उड़हल(जशवन्ती,जाशीन) के फूल की कलिका सवेरे खाली पेट एक या दो चबाकर एक सप्ताह तक खाएं। यदि रोग अधिक पुराना हो तो एक महीने तक खाएं। इससे अधिक दिन खाने पर भी खराबी कोई नहीं होगी,केवल लाभ ही होगा। इससे पेशाब में शर्करा आना बिल्कुल बंद हो जाएगा। औषधि सेवन से पहले और बाद में,पेशाब की जांच करा लें। नतीज़ा अवश्य ही लाभकारी मिलेगा। इस दौरान परहेज यह रखें कि चीनी,चावल और आलू न खाएं।

नोटःयह अनुभव डॉ. रामलखन विश्वकर्मा जी का है जिनसे पोस्ट-अम्बा,ज़िला-गया(बिहार) के पते पर सम्पर्क किया जा सकता है। 

                                                                                                                                               जारी....

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शुक्रवार, 25 मई 2012

मधुमेह का सीधा संबंध जीवन-शैली से है

मधुमेह (डायबिटीज) आज बच्चों, महिलाओं और पुरूषों सभी को अपना शिकार बना रही है। महिलाओं में डायबिटीज होने पर कई भयंकर बीमारियां होने की आशंका बढ़ जाती है। आइए जानते हैं,डायबिटीज के कारण महिलाओं को और कौन-कौन सी परेशानी हो सकती हैं- 

डायबिटीज का सबसे अधिक खतरा शहरों में रहने वाली महिलाओं को होता है। महिलाओं में डायबिटीज से ग्रस्त होने पर शारीरिक कमजोरी अधिक होती है। जैसे हाथ-पैरों में कंपकपी होना, कंधों में दर्द या अकड़न महसूस होना। मसूढ़ों में सूजन, आंखों से कम दिखने लगना या धुंधला दिखना, चीजें रखकर भूलना या फिर बातें भूल जाना, बहरेपन की शिकायत या कम सुनाई देना जैसी प्रमुख स्वास्थ्य समस्याएं डायबिटीज के कारण हो सकती हैं। छोटी-सी खरोंच लगने पर जख्म हो जाना, जख्म का देर से भरना या न भरना जैसी लंबे समय तक रहने वाली समस्याएं डायबिटीज के कारण हो सकती हैं। डायबिटीज के दौरान मोटापा बढ़ने लगता है, लेकिन डायबिटीज से ग्रस्त कुछ महिलाओं का वजन कम भी होने लगता है। 

डायबिटीज के कारण 
शरीर में मौजूद पेंक्रियाज ग्रंथी के ठीक से काम ना कर पाने के कारण या फिर इसके बेकार होने के कारण डायबिटीज हो जाती है। डॉक्टर शर्मीली राज के मुताबिक, वर्तमान में डायबिटीज का मुख्य कारण महिलाओं की लाइफस्टाइल और खान-पान है। इसके साथ ही शारीरिक रूप से बढ़ती निष्क्रियता भी महिलाओं में डायबिटीज होने का मुख्य कारण है। डायबिटीज अनुवांशिक भी होती है। इसके अलावा समय पर खाना ना खा पाना, बहुत अधिक जंकफूड का सेवन करना, वजन ज्यादा होना, रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित न होना, बहुत अधिक मीठा खाना, नियमित रूप से बाहर का खाना, पानी बहुत कम पीना, व्यायाम ना करना, शारीरिक रूप से निष्क्रिय होना, खाने के बाद तुरंत सो जाने आदि से भी डायबिटीज की आशंका बढ़ जाती है। 

क्या कहते हैं शोध 
हाल ही में आए शोध के मुताबिक, मछली में पाया जाने वाला विषाक्त पदार्थ जब शरीर में ज्यादा मात्र मे प्रवेश कर जाता है, तब डायबिटीज होने की आशंका बढ़ जाती है। दरअसल, जो लोग मछली ज्यादा खाते हैं, उनके खून में डीडीई केमिकल की मात्रा बढ़ जाती है, जो डायबिटीज के खतरे को बढ़ाता है। 

अमेरिका में हुए एक अध्ययन के मुताबिक, ज्यादा या कम सोने से डायबिटीज का जोखिम बढ़ जाता है। जो लोग 9 घंटे से ज्यादा सोते हैं और ऐसे लोग जो 5 घंटे से कम सोते हैं उन्हें मधुमेह का खतरा अधिक होता है। इसके अलावा एक दूसरे अध्ययन से यह पता चला है कि बहुत कम नींद लेने से शरीर की जैविक क्रियाएं बहुत प्रभावित होती हैं, जिससे डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। हाल ही में इंग्लैंड में डायबिटीज पर हुए एक शोध के मुताबिक कई दवाएं भी डायबिटीज के लिए जिम्मेदार होती हैं। 

डायबिटीज से बचाव 
डायबिटीज के बारे में शक होते ही जल्दी से खून और पेशाब की जांच करवाकर इस रोग के बारे में जानना चाहिए। अगर शुरुआत में ही इस रोग के बारे में मालूम हो जाए तो किसी अच्छे चिकित्सक की सलाह से दवाइयों, खाने-पीने और रहन-सहन में बदलाव लाकर डायबिटीज को काबू में किया जा सकता है। डॉक्टर शर्मीली राज के मुताबिक, कुछ और उपायों को अपनाकर डायबिटीज से बचा जा सकता हैं- 

-स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं। 

-नियमित रूप से व्यायाम करें। 

-संतुलित भोजन लें। 

-अधिक से अधिक कामों सक्रिय रहें। 

-अधिक मात्रा में तरल पदार्थ लें और पानी पिएं। 

-एल्कोहल, तंबाकू और नशीले पदार्थों से दूर रहें। 

-समय-समय पर शुगर की जांच करवाएं(सविता गर्ग,हिंदुस्तान,दिल्ली,16.5.12)।

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बुधवार, 9 मई 2012

मधुमेह और इंसुलिन

इंसुलिन शरीर में बनने वाला एक हारमोन है, जो पेंक्रियाज़ ग्रंथि से बनता है। हमारा भोजन कार्बोहाइड्रेट, वसा एवं प्रोटीनयुक्त होता है। कार्बोहाइड्रेट आँतों में जाकर ग्लूकोज में परिवर्तित होता है, यह ग्लूकोज इंसुलिन की उपस्थिति में कोशिकाओं में प्रवेश कर ऊर्जा प्रदान करता है। डायबिटीज़ के रोगियों में इस इंसुलिन हारमोन की कमी के कारण ग्लूकोज कोशिकाओं में न जाकर रक्त में ही रह जाता है। रक्त में ग्लूकोज की बढ़ी हुई इस मात्रा को ही डायबिटीज़ या मधुमेह कहते हैं। 

यह एक रासायनिक विकार है (मेटाबोलिक डिसऑर्डर), जिसका निदान प्रामाणिक वैज्ञानिक पद्धति से ही किया जा सकता है न कि अप्रामाणिक या मिथ्या मान्यता से। मधुमेह रोगियों को जो दवाई (ओरल हाइपो ग्लाइसिमिक एजेंट) दी जाती है वह इंसुलिन नहीं है, वे इंसुलिन को (रासायनिक क्रियाओं द्वारा) खींचकर रक्त में लाती है और ग्लूकोज़ को ऊर्जा में परिवर्तित करती है, जिससे रक्त में शकर की मात्रा नियंत्रित रहती है। यह दवाइयाँ तब तक ही कार्य करती हैं, जब तक शरीर में इंसुलिन बनता रहता है। लंबे समय की डायबिटीज़ में दवाइयों का असर कम होने लगता है या फिर इंसुलिन बनना बंद हो जाता है। ऐसे रोगियों को शकर की मात्रा नियंत्रित करने के लिए बाहर से इंसुलिन देना पड़ता है। इंसुलिन एक प्रोटीन है, यह गोली या सिरप के रूप में नहीं बनता, उसे इंजेक्शन द्वारा ही दिया जाता है। 

लोगों को ऐसी भ्रांति होती है कि इंसुलिन लेने से उसकी आदत पड़ जाती है या फिर एक बार शुरू करने पर हमेशा लेना पड़ेगा। इंसुलिन लेने की नौबत तब आती है जब शरीर इसे नहीं बना पाता है। इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाएँ प्रायः समाप्त हो चुकी हैं या बहुत कम बना रही होती हैं, जो शरीर की ज़रूरत से बहुत कम होता है। बाहर से इंसुलिन पहुँचा कर यदि शकर की मात्रा नियंत्रित की जा सके और मधुमेह के दुष्प्रभाव से शरीर के अंगों को बचाया जा सके तो इंसुलिन बाहर से लेने में डर कैसा? इंसुलिन शरीर की ज़रूरत है, इसके बिना जीवन संभव नहीं है। मधुमेह भी उच्च रक्तचाप, कैंसर, थायरॉइड, कोलेस्ट्रॉल एवं हृदय रोग की तरह वंशानुगत बीमारी है, ५० से ६० प्रतिशत तक वांशिक कारण व ४० से ५० प्रतिशत तक दिनचर्या, खान-पान एवं कुछ पेंक्रियाज़ की बीमारी के कारण होती है। 

मधुमेह रोगियों को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए

- आहार : नियमित समय पर संतुलित आहार घी/ तेल से कम और फाइबर युक्त चीज़ें अधिक लें। ये रोगी सब कुछ खा सकते हैं केवल उन्हें अपने भोजन में कैलोरीज़ की मात्रा का ध्यान रखना चाहिए, जितनी उनकी दिनचर्या के हिसाब से शरीर की आवश्यकता है।

व्यायाम : ३०-४५ मिनट तक नियमित त़ेज पैदल घूमना या व्यायाम करना, इससे हमारे शरीर की कोशिकाएँ इंसुलिन के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं।

दवाइयाँ : मधुमेह की दवाइयों का सेवन करने से कोई दुष्प्रभाव नहीं होता। इन दवाओं का काम केवल इंसुलिन को रक्त में लाने का होता है। 

कई रोगियों की यह धारणा रहती है कि कुछ मीठा या ज़्यादा खा लेंगे तो कोई फर्क नहीं पड़ता, दवाई की मात्रा बढ़ा लेंगे किंतु यह सोच बिलकुल गलत है, क्योंकि कुछ गोलियाँ केवल इंसुलिन के स्राव को बढ़ाती हैं, हो सकता है यह बढ़ा हुआ इंसुलिन रक्त में शकर की मात्रा को इतना कम कर दे कि मरीज़ हाइपोग्लाइसीमिया की स्थिति में पहुँच जाए। यह एक आपातकालीन स्थिति होती है, जिसमें समय रहते शकर की मात्रा नियंत्रित न की जाए तो वह बेहोश हो सकता है या कोमा में भी जा सकता है।ऐसे में शरीर के कई अंगों को नुकसान होता है। चिकित्सक मरीज़ के रक्त में शकर की मात्रा के अनुसार दवाई की खुराक तय करता है, इसे अपने मन से बढ़ाना या घटाना घातक हो सकता है। मरीज़ को डॉक्टर द्वारा बताए गए समय एवं मात्रा का ध्यान रखना चाहिए।

आधुनिक ग्लूकोमीटर (रक्त में शकर की जाँच करने वाली मशीन) बाज़ार में उपलब्ध है। इससे घर पर ही शकर की जाँच की जा सकती है। कुछ लोगों का भ्रम है कि ग्लूकोमीटर शकर की मात्रा ज़्यादा बताता है, किंतु ऐसा नही है। उँगली से लिया हुआ एक बूँद खून पेरीफेरी केपीलरी का होता है और लेबोरेटरी की जाँच के लिए खून को वेन से लिया जाता है, इसलिए कुछ अंतर आना स्वाभाविक है। विश्व के सभी डायबिटीज़ संगठन ग्लूकोमीटर से ली गई शकर की जाँच को प्रामाणिक मानते हैं।

मधुमेह रोगियों में अक्सर ब्लड प्रेशर एवं अधिक कोलेस्ट्रॉल की समस्या भी पाई जाती है, जिससे किडनी एवं हृदय रोग की आशंका बढ़ जाती है। इसलिए शकर के नियंत्रण के साथ-साथ ब्लड प्रेशर व कोलेस्ट्रॉल को भी नार्मल रखने के लिए प्रयास करना चाहिए(डॉ. अजीत के. जैन,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल चतुर्थांक 2012)।

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सोमवार, 7 मई 2012

मधुमेह रोगियों के लिए लाभदायक है 'दालचीनी'

सभी घरों की रसोइयों में आमतौर पर पाया जाने वाला एक मसाला दालचीनी मधुमेह को पनपने नहीं देता है और इसके दुष्प्रभाव को रोक सकता है। एक छोटा चम्मच भर दालचीनी का पावडर संतरे के रस या कॉफी के साथ लेना चाहिए। मधुमेह के चलते दुनिया भर में हर साल लाखों लोग असमय ही अपनी जान गंवा देते हैं। मधुमेह के कारण रक्त में ग्लूका़ेज कर मात्रा बढ़ जाती है और उन्हें थकान, वजन कम होना तथा धुँधली दृष्टि जैसी बीमारियाँ सतानेसभी घरों की रसोइयों में आमतौर पर पाया जाने वाला एक मसाला दालचीनी मधुमेह को पनपने नहीं देता है और इसके दुष्प्रभाव को रोक सकता है। एक छोटा चम्मच भर दालचीनी का पावडर संतरे के रस या कॉफी के साथ लेना चाहिए। मधुमेह के चलते दुनिया भर में हर साल लाखों लोग असमय ही अपनी जान गंवा देते हैं। मधुमेह के कारण रक्त में ग्लूका़ेज कर मात्रा बढ़ जाती है और उन्हें थकान, वजन कम होना तथा धुँधली दृष्टि जैसी बीमारियाँ सताने लगती है। दालचीनी में मिथाइल हाइड्रोक्सी चालकोन पालिमर (एमएचसीपी) नामक तत्व होता है। यह तत्व वसा कोशिकाओं को इंसुलिन के प्रति प्रतिक्रियाशील बनाता है और यह सुनिश्चित करता है कि ग्लूकोज़ को हटाने या कम करने का संदेश कोशिकाओं तक पहुंच सके। प्रयोग के लिए जब मधुमेह से ग्रस्त रोगियों को एमएचसीपी की खुराक दी गई तो उनके रक्त में ग्लूकोज़ की मात्रा में काफी कमी आई। उनका रक्तसंचार भी सामान्य रहा। अतः,मधुमेह रोगियों के लिए दालचीनी बहुत गुणकारी औषधि है(सेहत,नई दुनिया,अप्रैल चतुर्थांक 2012)। 


मधुमेह के कुछ प्राकृतिक उपचार यहां हैं।

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शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

मधुमेह के लिए स्टीविया

जीवन भर हम करते रहते हैं, खुशियों की तलाश। इस तलाश में हमें कभी भूलना नहीं चाहिए कि जीवन की सभी खुशियों का बस एक आधार है, वह है स्वस्थ शरीर। अगर शरीर स्वस्थ न हो तो चिंता का प्रसन्न रहना मुश्किल है। मगर जिस युग में हम जी रहे हैं, उस युग में पूर्ण स्वस्थ रहना भी एक बड़ी चुनौती है। कई ऐसे रोग हैं, जिनसे हर किसी का सामना कभी न कभी होता ही है। ऐसा ही एक रोग है — मधुमेह, जिसे लोग डायबिटीज के नाम से भी जानते हैं। आज की इस भागम-भाग वाली ज़िंदगी में संयमित खानपान व नियमित दिनचर्या को अपनाना अधिकतर लोगों के लिए संभव नहीं होता और इसका नतीजा निकलता है कि लोग इस लाइलाज बीमारी के शिकार हो जाते हैं। मधुमेह एक मेटाबॉलिक रोग है। इसमें शरीर इन्सुलिन का या तो उत्पादन नहीं कर पाता या कोशिकाएं शरीर द्वारा बनाए गए इन्सुलिन को ग्रहण नहीं कर पातीं, जिस कारण खून में चीनी की मात्रा अनियमित हो जाती है। 

मधुमेह के मुख्य लक्षण यह हैं कि इससे पीड़ित व्यक्ति को सामान्य से अधिक भूख व ह्रश्वयास लगती है, लघुशंका के लिए बार-बार जाना होता है और रोगों के प्रति उसकी प्रतिरोधक क्षमता नष्ट होती रहती है। एक बार अगर किसी को मधुमेह हो जाए तो मुक्ति पाना लगभग नामुमकिन होता है, फिर जीवन भर लोग इस रोग को नियंत्रित करने की कोशिश में लगे रहते हैं। जमाना बदल रहा है, विज्ञान ने प्रकृति की ताकत को समझते हुए कुछ ऐसे आविष्कार किए हैं, जो लोगों की ज़िंदगी में महत्वपूर्ण बदलाव लाए हैं। ऐसी ही एक पहल की है, जयपुर के हैनीमैन चेरिटेबल मिदान सोसायटी द्वारा संचालित सनराइज एग्रीलैंड डवलपमेंट एंड रिसर्च प्रा.लि. के निदेशक अतुल गुह्रश्वता ने। उन्होंने दावा किया है कि वर्षो के लगातार शोध के बाद यह पता लगाया जा चुका है कि स्टीविया नाम की एक बूटी है, जिससे मधुमेह पर पूरी तरह से काबू पाया जा सकता है। स्टीविया सामान्य चीनी से 300 गुना अधिक मीठी होती है, पर इसके नियमित इस्तेमाल से मधुमेह के कष्टों से आज़ादी मिल सकती है। इस बूटी का इस्तेमाल चीनी की जगह मिठास के लिए किया जाता है, लेकिन चीनी की तरह इसमें गैर जरूरी कैलोरीज़ की मात्रा नहीं होती। गौरतलब है कि मधुमेह के अलावा स्टीविया दांतों, उच्च रक्तचाप, त्वचा, हृदय संबंधी बीमारियों से भी निजात दिलाने में कारगर है(अहा ज़िंदगी,11.3.12)।

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बुधवार, 21 मार्च 2012

मधुमेह में आयुर्वेद

आयुर्वेद के अनुसार मधुमेह आसाध्य रोग है। अधिक आलसी या सुखभोगी लोगों में यह रोग होना सामान्य बात है। अधिक बार मूत्र प्रवृत्ति होना तथा गंदलापन इसके प्रमुख लक्षण हैं। अन्य बीमारियों के मरीज का शिकार होना आम बात है। प्रायः मधुमेह वंशानुगत होता देखा गया है। 

ये करें 
-सुबह सैर करें, नियमित व्यायाम की आदत डालें।

-करेला, गुलर, जामुन, गुडुची (परवल), सुरजना, मैथीदाना आदि का प्रयोग दैनिक जीवन में करने पर मधुमेह से बचा जा सकता है, जिन्हें वंशानुगत मधुमेह है, वे अवश्य ध्यान दें। खाने में चकनाई कम लें ।

-ध्यान, प्राणायाम से मानसिक एकाग्रता रहती है।

ये न करें 
- इनका सेवन न करें

- शराब, दूध, तेल, घी, मैदा, सीरप, दही।

-गन्नो का रस, गुड़, शकर आदि। अधिक मात्रा में भोजन।

-पेशाब रोकना। अधिक सोना, आराम तलब जीवनशैली। 

इनसे बढ़ता है जोखिम
-आलस्य, सुस्त, आरामदायक जीवनशैली।

-देर तक सोते रहना और दिन में भी सोना।

-अनुचित (फास्टफुड) भोजन करना।

-शारीरिक श्रम बिलकुल नहीं करना।

-मानसिक तनाव होना, गुड़, चीनी, खांडसारी, मिठाइयों और तली हुई चीजों का अत्यधिक मात्रा में सेवन करना और व्यायाम भी न करना।

औषधियों से रोकथाम 

कोई भी उपचार चिकित्सक की सलाह के बिना नहीं करना चाहिए, परंतु इनमें से कोई भी एक प्रयोग करके मधुमेह से बचने का प्रयास कर सकते हैं या मधुमेह पर नियंत्रण कर सकते हैं-

-हल्दी का चूर्ण ३ ग्राम प्रतिदिन सुबह-शाम।

-गुडूची सत्व २ ग्राम सुबह-शाम।

-त्रिफला चूर्ण ३ से ६ ग्राम या त्रिफला क्वाथ १९०-२० मिलि।

-शुद्ध शिलाजित १ ग्राम दूध में घोलकर।

-गुड़मार की पत्तियाँ पीसकर उसका रस निकालकर पिलाएँ।

-बकायन के बीजों की मिंगी २ ग्राम, पानी से सुबह-शाम।

-नीम, बिल्वपत्र अथवा आँवला का रस १० मिलिग्राम प्रतिदिन।

-विजयसार की लक़डी का पानी पीने से भी लाभ होता है(डॉ. विनोद बैरागी,सेहत,नई दुनिया,मार्च,2012 द्वितीयांक)।  


दो संगत आलेख यहां हैं- 


1. मधुमेह पर आयुर्वेद का मत

2. आयुर्वेद रक्त शर्करा को विनियमित करने के लिए हर्बल उपचार
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गुरुवार, 8 मार्च 2012

विश्व गुर्दा दिवस विशेषः मधुमेह और रक्तचाप हैं गुर्दे के दुश्मन

मधुमेह और उच्च रक्तचाप दो ऐसे हत्यारे हैं जो पीठ के पीछे से वार करते हैं। अक्सर मरीज़ को इन बीमारियों के प्रारंभिक लक्षणों का पता नहीं चलता। गुर्दे इन दोनों बीमारियों के सबसे अधिक जोखिम पर होते हैं। गुर्दों की जाँच का मौका तभी आता है जब वे क्षतिग्रस्त हो चुके होते हैं। देश में अब तक बीमारी हो चुकने के बाद इलाज की जद्दोजहद पर ही ध्यान केंद्रित है। बीमारी की रोकथाम के लिए कभी पहल नहीं की गई। मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसे घातक हमलावरों की पहचान समय रहते होना सभी के हित में है। इन दोनों बीमारियों से खड़ी होने वाली समस्याओं के निराकरण में समाज और परिवार का मूल्यवान धन नष्ट होता है। 

रोगों से बचाव के लिए एक रणनीति की जरूरत होती है। स्वास्थ्य को लेकर देश में अभी हम इतना सुदृड़ ढांचा तैयार नहीं कर सके हैं कि मधुमेह या उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों की रोकथाम समय रहते कर सकें। चिकित्सा विज्ञान की पुस्तकों में दर्ज है कि चालीस साल की उम्र के बाद उच्च रक्तचाप और मधुमेह की नियमित जांच करना चाहिए, लेकिन ये मानक हमारे देश की आबादी पर लागू नहीं होते। पहले ही हमें मधुमेह की राजधानी का दर्जा हासिल है। किशोरावस्था से ही मधुमेह और उच्च रक्तचाप शरीर में घर कर लेते हैं। टीन एज में जहाँ किसी मनपसंद ब्रांच पाने का तनाव होता है वहीं युवावस्था में कैरियर का चुनाव तनावग्रस्त कर देता है। मनमुआफिक लक्ष्य हासिल नहीं कर पाने के कारण तनावग्रस्त युवा उच्च रक्तचाप और मधुमेह के जोखिम के नज़दीक पहुंच जाते हैं। 

दरअसल कॉलेजों में ही उच्च रक्तचाप और मधुमेह की स्क्रीनिंग की जानी चाहिए। इससे न सिर्फ इन बीमारियों को शुरूआती स्तर पर पकड़ने में मदद मिलेगी बल्कि गुर्दों को क्षतिग्रस्त होने से बहुत पहले बचाया जा सकेगा। आज दुनिया के धनाढ्य देश भी अपने नागरिकों को मुफ्त डायलिसिस की सुविधा नहीं मुहैया करा पाते। हमारे जैसे विकासशील देश पर गुर्दों के रोगों का बोझ असहनीय है(संपादकीय,सेहत,नई दुनिया,मार्च प्रथमांक,2012)।

मधुमेह से प्रभावित होती हैं किडनी 
विश्वभर में कैंसर और हृदय रोगों के बाद किडनी रोग मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है। भारत में ही हर साल किडनी फेल होने की वजह से २ लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है। यही नहीं हर साल गंभीर किडनी रोगियों की संख्या के साथ १ लाख नए रोगी जुड़ जाती है। इन सभी को इलाज की ज़रुरत होती है। किडनी रोगियों में से ९ लाख मरीज़ों को डायलिसिस की ज़रुरत होती है लेकिन इनमें से केवल २ प्रतिशत डायलिसिस करवा पाते हैं और ५ प्रतिशत में ही ट्रांसप्लांट हो पाता है। मध्यमवर्गीय मरीज़ों में डायलिसिस का प्रतिमाह का खर्च पूरे परिवार की मासिक आय जितना हो सकता है या फिर इससे अधिक भी हो सकता है। इसका मतलब ये हुआ कि लगभग ९० प्रतिशत मरीज़ इलाज का खर्च वहन नहीं कर पाते।

कारण पर ध्यान दें  
मधुमेह और उच्चरक्तचाप जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ १० में से ६ किडनी रोगियों में गंभीर किडनी रोगों का कारण बनती हैं। भारत को विश्वभर में मधुमेह की राजधानी कहा जाता है इसलिए यहाँ स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। यहाँ के युवा भी इस बीमारी के शिकार होते जा रहे हैं जिससे पूरी स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है। 

मधुमेह रोगियों में किडनी रोगों की आशंका बढ़ जाती है। मधुमेह अनियंत्रित होने पर रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ जाता है। लंबे समय तक इसके बढ़ा हुआ रहने के कारण किडनी में मौजूद बारीक-बारीक रक्तवाहिनियाँ क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। समय के साथ इससे किडनी की कार्य क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ने लगता है। क्षतिग्रस्त होने पर इन रक्तवाहिनियों में रिसाव होने लगता है। फलस्वरुप खून में रहने के बजाय थोड़ी-थोड़ी मात्रा में प्रोटीन पेशाब के ज़रिए शरीर से बाहर निकलने लगता है। इसे माइक्रो एलब्यूमिनयूरिआ कहते हैं।  

माइक्रो एलब्यूमिनयूरिआ किडनी रोग की शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण अवस्था होती है। यदि समय रहते इसका पता लगने पर तुरंत ही इलाज शुरु होने से बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। ध्यान न देने पर समय के साथ रोग बढ़ता ही जाएगा और पेशाब में प्रोटीन की मात्रा बढ़ती चली जाएगी। पेशाब में प्रोटीन की बहुत अधिक मात्रा को मेक्रो एलब्यूमिनयूरिआ कहते हैं। इसके बाद कभी भी किडनी फेलियर की अवस्था आ सकती है। गंभीर किडनी रोग हो जाने के बाद किडनी फिर से पहले की तरह स्वस्थ तो नहीं हो सकती लेकिन कुछ सावधानियाँ बरतने से बीमारी के बढ़ने की दर धीमी हो सकती है। ग्लुकोज़ की मात्रा को नियंत्रित करने के अलावा मधुमेह रोगियों को हर साल एस्टिमेटेड ग्लोमेरुलर फिल्टरेशन रेट (ईजीएफआर) टेस्ट करवाना चाहिए ताकि किडनी की कार्यक्षमता का अंदाज़ा लगाया जा सके। किडनी की कार्यक्षमता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जाता है कि यह प्रतिमिनिट कितना खून फिल्टर करती है। यह ६० मिलिमीटर प्रतिमिनिट से कम हो तो किडनी रोग होने की आशंका होती है। खाने-पीने में सतर्कता बरतने और सक्रिय बने रहने से किडनी रोगों का जोखिम घट जाता है। आहार में प्रोटीन, शक्कर और नमक की मात्रा नियंत्रित रखना चाहिए। स्वस्थ जीवनशैली अपनाने पर मधुमेह और उच्चरक्तचाप जैसे रोगों से बच सकेंगे।

इन बातों का भी रखें ध्यान 
-शक्कर की मात्रा सीमित करने के अलावा मधुमेह रोगी इन बातों का भी ध्यान रखें ताकि किडनी रोग का जोखिम घट सके

-फल, सब्ज़ी और साबुत अनाज, वसा-रहित डेयरी उत्पाद से भरपूर पोषक आहार लें। सैच्युरेटेड फैट, ट्रांस फैट और सोडियम व शक्कर की अधिकता वाले पदार्थों से परहेज़ करें।

-प्रोटीन की मात्रा कम होने से किडनियों का भार कम हो जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि प्रोटीन से पूरी तरह परहेज़ कर लिया जाए। थोड़ी-थोड़ी मात्रा में नियमित रुप से प्रोटीन लेना चाहिए।

-सप्ताह में कम से कम ५ दिनों में ३० से ६० मिनिटों तक शारीरिक श्रम करें। व्यायाम शुरु करने या सक्रियता बढ़ाने से पहले अपने चिकित्सक से सलाह ज़रुर लें।

-दवाओं का डोस अपने मन से निर्धारित न करें। चिकित्सक के निर्देशानुसार ही दवाएँ लें, ख़ासकर वे दवाएँ जो मधुमेह, उच्चरक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने के लिए दी गई हों।

-रक्तचाप नियंत्रित होना चाहिए।

-शराब, तंबाकू और धूम्रपान से दूर रहें। इसके आदि हों तो जल्द से जल्द छुटकारा पाने के प्रयास शुरु कर दें(डॉ. अश्विनी गोयल,सेहत,नई दुनिया,मार्च प्रथमांक 2012)।

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मंगलवार, 6 मार्च 2012

इंसुलिन पंप: इंजेक्शन से मिलेगा छुटकारा

डायबीटीज के मरीजों के लिए गुड न्यूज है। अब इंडिया में भी इंसुलिन पंप थेरेपी आ गई। इसके मदद से आपको डेली इंसुलिन इंजेक्शन लेने से मुक्ति मिल जाएगी। 

फोर्टिस हॉस्पिटल के कंसलटेंट एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. अजय अग्रवाल बताते हैं कि इंसुलिन पंप एक लेटेस्ट मेडिकल डिवाइस है, जो कि देखने में बिल्कुल पेजर की तरह है। इसे पेशेंट की बेल्ट या पॉकेट पर लगाया जाता है। इस डिवाइस से एक प्लास्टिक की नली अटैच है। यह नली एंटी-एब्डॉमिनल से नीडल से अटैच होती है, जिसे कैनुअला कहते हैं। इससे पेशेंट की बॉडी एक फिकस्ड क्वॉन्टिटी में इंसुलिन जाता रहता है। यह इंसुलिन पंप थेरेपी खासकर डायबीटीज टाइप 1 और टाइप 2 के लिए फायदेमंद है। पेशेंट को एक महीने में पंप से सिर्फ 6 से 8 बार इंजेक्शन लेना होगा, जबकि इंजेक्शन से इंसुलिन के लिए पेशेंट को 90 से 120 बार इंजेक्शन लेना पड़ता है।  

वहीं, महाराजा अग्रसेन हॉस्पिटल के कंसलटेंट फिजिशियन और डायबटोलॉजिस्ट डॉ. राजीव चावला के बताते हैं, 'डायबीटीज पेशंट्स के लिए इंसुलिन पंप एक वरदान है। खासतौर पर बच्चों के लिए, तो यह बहुत बढि़या है। इसे लगाकर बच्चे कुछ भी खा सकते हैं, बल्कि अपने फेवरिट गेम्स भी खेल सकते हैं।' 

इस पंप की कॉस्ट 1 लाख रुपये से साढ़े तीन लाख रुपये के बीच है। जबकि, इंसुलिन पर हर महीने करीब साढ़े 4 हजार रुपये खर्च होते हैं। गौरतलब है कि वर्ल्ड में करीब ढाई लाख लोग इंसुलिन पंप का फायदा उठा रहे हैं और इंडिया में इसके यूजर्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है। 

डॉ . अजय कहते हैं कि पहले 10 से 12 दिन तक पेशेंट की डायबीटीज चेक की जाती है। उसके बाद यह पंप लगाया जाता है। साथ ही , पेशेंट को इसे लगाना भी सिखाया जाता है। दरअसल , हर तीसरे दिन इस पंप की नीडल चेंज की जाती है , जिसे पेशंट खुद चेंज कर सकते हैं(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,28.2.12)।

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मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

जीवनशैली की विकृतियों से अनियंत्रित होता मधुमेह

दुनिया भर में भले ही मधुमेह को बहुत खतरनाक रोग माना जाता हो, लेकिन ऐसा लगता है जैसे भारत के लोगों को यह उतना नहीं डराता। जिस तरह से इसके लगातार प्रसारित होने के बावजूद लोगों में जागरूकता का अभाव है उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि यहाँ के लोगों को इसका कोई भय नहीं है। वरना भारत में यह रोग जिस तरह की महामारी की शक्ल लेता जा रहा है उसके मद्देनजर अब तक तो इसे लेकर सारे देश को पहले ही सचेत हो जाना चाहिए था। 

दुनिया भर में सबसे अधिक मधुमेह रोगी भारत में ही रहते हैं और मरीज़ों की संख्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है। यही वजह है कि दुनिया भारत को मधुमेह की राजधानी कहकर बुलाने लगी है। मधुमेह होने पर शरीर को भोजन से जो ऊर्जा मिलनी चाहिए थी उसे पाने में कठिनाई होती है। इसके बावजूद भोजन के ग्लूकोज में बदलने की प्रक्रिया जारी रहती है। ग्लूकोज रक्त में तो जाता है, लेकिन इंसुलिन के अभाव में यह कोशिकाओं तक नहीं पहुँच पाता। इसी कारण ग्लूकोज की अधिकतर मात्रा रक्तधारा में ही बनी रहती है जिसे उच्च रक्त ग्लूकोज कहते हैं। चूँकि कोशिकाओं में पर्याप्त ग्लूकोज नहीं रह जाता इसलिए वे उतनी ऊर्जा नहीं पैदा कर पातीं जिससे शरीर की गतिविधियाँ सामान्य रूप से संचालित हो सकें।

विभिन्न अध्ययनों से यह बात ग़लत साबित हो चुकी है कि मधुमेह अधिक मीठा खाने से होता है। ऐसे लोग बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं जिन्हें मीठा पसंद नहीं है लेकिन इसके बावजूद वे मधुमेह के शिकार हैं। मधुमेह मीठा खाने के कारण नहीं होता लेकिन एक बार यह हो जाए तो मरीज़ को मीठे से दूर रहना पड़ता है। आधुनिकता के प्रसार के साथ-साथ हमारी जीवनशैली में अनेक विकृतियाँ आ गई हैं। अब लोग शारीरिक श्रम न के बराबर करते हैं। भोजन भी ऐसा जो मधुमेह और हृदय रोग के खतरे को बढ़ा देता है। 

तनाव, फास्ट फूड, आपाधापी का जीवन, मानसिक अशांति, इस सबकी सबसे बड़ी कीमत शरीर को ही चुकानी पड़ती है। भारत में मधुमेह के चौतरफा प्रसार को लेकर जो अध्ययन हुए हैं वे स्पष्ट रूप से बताते हैं कि तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण, आधुनिक युग के तनाव, खानपान व रहन-सहन की शैली में परिवर्तन, पश्चिमीकरण व शारीरिक परिश्रम की कमी के कारण ही मधुमेह पसरता जा रहा है। इस रोग के कारण रक्त में ग्लूकोज़ की मात्रा सामान्य से अधिक हो जाती है। वैसे तो यह किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन भारत में ९५ प्रश से ज़्यादा वयस्क ही इसकी चपेट में आते हैं। 


लक्षण 
 -बार-बार पेशाब आना 
 - त्वचा में खुजली होना 
 -दृष्टि से संबंधित परेशानी होना 
 -हमेशा ही थकान का अनुभव होते रहना 
 -कमज़ोरी अनुभव करना
 -बार-बार पैरों में सुन्नापन महसूस होना 
 -लगातार ही प्यास लगते रहना 
 -ज़ख्म भरने में समय लगना 
 -हमेशा भूख लगते रहना 
 -वज़न में कमी आना और त्वचा का संक्रमित हो जाना 

ये सभी मधुमेह के प्रमुख लक्षण हैं जो इस बात की ओर संकेत देते हैं कि व्यक्ति पर मधुमेह का खतरा मँडरा रहा है। इन लक्षणों के प्रकट होते ही चिकित्सक से परामर्श लेकर आवश्यक जाँचें करवाएँ। इन लक्षणों के साथ-साथ यदि त्वचा के रंग या मोटाई में बदलाव नज़र आए,संक्रमण के प्रारंभिक चिह्न जैसे लाली,सूजन,यौन अंगों के नीचे तथा उंगलियों के बीच खुजली हो तो तत्काल चिकित्सक को दिखाएं। 

निस्संदेह यह एक बेहद घातक रोग है जो शरीर को अंदर ही अंदर खोखला बनाता रहता है लेकिन यदि नियमित दवा खाने के साथ कुछ सावधानियां बरती जाएँ और जीवनशैली में परिवर्तन किया जाए तो इस रोग को नियंत्रण में रखा जा सकता है। वजन बढ़ा हुआ है तो उसे घटाना बहुत ही ज़रूरी है। चिकित्सककों का कानना है कि व्यक्ति अगर अपने वज़न को चिकित्सक के बताए अनुसार कम कर ले,तो उसे मधुमेह का ख़तरा 50 प्रतिशत तक कम हो जाता है। ध्यान देने योग्य बात ये है कि वज़न घटाना ही एकमात्र समाधान नहीं है। जीवन-शैली को सम्पूर्ण रूप से बदलना ज़रूरी है। व्यायाम,पैदल चलना और योग जैसे व्यायाम रोज़ कम से कम आधा घंटा तो करना ही चाहिए(डॉ. मीना छाबड़ा,सेहत,नई दुनिया,फरवरी द्वितीयांक 2012) (डॉ. मीना छाबड़ा,सेहत,नई दनिया,फरवरी द्वितीयांक 2012)।


मधुमेह पर डा. टी.एस. दराल साहब का एक उपयोगी आलेख यहां है।

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शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

शकर का हिसाब

भले ही आप मीठे के शौकीन न हों, लेकिन आपके दिन की शुरुआत तो आप मीठी चाय, कॉफी या दूध के साथ ही करते हैं। फिर नाश्ते में ब्रेड-बटर या घी-तेल से बने पराठे। दिनभर चाय-काफी और सॉफ्ट ड्रिंक आदि का दौर चलता है। इसके अलावा रात को खाने के बाद कई बार मीठा खाने की इच्छा हो ही जाती है। कई लोगों को मिठाइयों का तो शौक नहीं होता है, लेकिन चॉकलेट को ये मना नहीं कर पाते। 

इस तरह जो लोग "मीठे के शौकीन" नहीं होते, वे भी अपने दिनभर के आहार में कई तरह से शकर ले लेते हैं। सिर्फ कहने की बात रहती है कि "हम ज़्यादा मीठा नहीं खाते।" कई चीज़ों में शकर छिपी हुई होती है, इसलिए गिनती में नहीं आती, जैसे डिब्बाबंद और प्रसंकृत आहार व कई पेयों में शकर का हिसाब लगाना मुश्किल होता है। कम या ज़्यादा तो तुलनात्मक रूप से कहा जाता है, लेकिन कितनी शकर लेनी चाहिए और किन-किन खाद्य पदार्थों से ये प्राप्त होती है? इसकी जानकारी होना बहुत आवश्यक है, नहीं तो आप दिनभर में ज़रूरत से ज़्यादा शकर ले लेंगे, जो सेहत के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। 

शकर कई प्रकार ही होती है- सुक्रोज़, फ्रुक्टोज़, ग्लूकोज़ या लैक्टोज़। किसी न किसी प्रकार की शकर लगभग हर खाने की चीज़ में मौजूद होती है। सॉस, जैम, जैली, केक, पुडिंग, बिस्किट, चॉकलेट, ऑइसक्रीम आदि में खूब शकर होती है, अतः ये सभी कैलोरी के भंडार हैं। 

अधिक कैलोरी लेने से मोटापे की आशंका बढ़ जाती है, जो अपने साथ मधुमेह और हृदय रोग जैसी कई बीमारियों को साथ लाता है। हाँ, अगर आप खूब शारीरिक श्रम करते हैं और ढेरों कैलोरी जलाते हैं तो आपको इस बारे में फिक्र करने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन यदि ऐसा नहीं है तो फिर इस ओर ध्यान देना चाहिए। मधुमेह रोगियों को विशेष रूप से शकर और कार्बोहाइड्रेट का ध्यान रखकर ही कोई भी चीज़ खाना चाहिए, नहीं तो बीमारी पर नियंत्रण रखना काफी मुश्किल हो जाता है। बाहर का खाना या डिब्बाबंद खाने की अधिकता और सॉफ्टड्रिंक्स की आदत मुश्किल में डाल सकती है। इस तरह के खाद्य पदार्थों में इतनी शकर होती है कि दिनभर के खाने का हिसाब लगाया जाए तो वो 20 चम्मच भी हो सकती है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार,एक सामान्य व्यक्ति अधिकतम 12 चम्मच(48 ग्राम) शकर ले सकता है। सामान्य व्यक्ति को दिनभर के आहार से 2.200 कैलोरी प्राप्त होनी चाहिए। इस तरह,शकर से प्राप्त होने वाली कैलोरी पूरे आहार की 9 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। 

कैसे करें नियंत्रित 
खाने की चीजों में(खासकर ताज़े फलों में) शकर प्राकृतिक रूप से मौजूद होती है,इसलिए,ऊपर से डालने की ज़रूरत नहीं होती। शरीर में हर प्रकार की शकर ग्लूलोज़ में परिवर्तित हो जाती है। ऊर्जा की आवश्यकता होने पर शरीर ग्लूकोज का इस्तेमाल करता है। अमरीकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार,महिलाओं को एक दिन में 6 छोटे चम्मच शकर(100 कैलोरी) से ज़्यादा नहीं लेना चाहिए। पुरुषों के लिए यह मात्रा 9 छोटे चम्मच(150 कैलोरी) निर्धारित की गई है। 

पैकेज्ड चीज़ों को खरीदने से पहले उनका लेबल चैक करें। डिब्बे पर दी गई जानकारी में कार्बोहाइड्रेट पर ध्यान दें। इनके अलावा,जिन शब्दों के अंत में ओज़ या ओल लिखा हो,उन पर भी ध्यान दें,जैसे-ग्लूकोज़,फ्रुक्टोज़,डेक्सट्रोज़,माल्टोज़,सुक्रोज़,लैक्टोज़,सॉर्बिटॉल आदि। ये सभी शकर के प्रकार हैं। इस तरह आप जान सकेंगे कि आप जो ले रहे हैं,उसमें कितनी शकर है(डॉ. योगेश साह,सेहत,नई दुनिया,फरवरी प्रथमांक 2012)

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बुधवार, 25 जनवरी 2012

डायलसिस क्यों होता है ज़रूरी

स्वस्थ गुर्दे रक्त को शुद्ध रखते है और शरीर से अतिरिक्त तरल पदार्थ और नमक को निकाल बाहर करते हैं। साथ ही शरीर के विषैले तत्वों को भी बाहर कर देते हैं। जब गुर्दे काम करना बंद कर देते हैं तब शरीर में अपशिष्ट पदार्थ जमा होने लगते हैं, रक्तचाप ब़ढ़ जाता है और तरल पदार्थ जमा होने लगते हैं। गुर्दों के ठप पड़ जाने की दशा में डायलिसिस कराना प़ड़ता है। कई गंभीर अवस्था में पहुँच चुके मरीज़ों को गुर्दों का प्रत्यारोपण कराने की भी सलाह दी जाती है। डायलिसिस गुर्दों के इलाज की रक्षापंक्ति में पहले पायदान पर होता है। दो तरह की होती है

-हीमोडायलिसिस।

-पेरिटोनियल डायलिसिस। 

दोनों ही तरह की डायलिसिस दो सामान्य गुर्दों की कार्यक्षमता का केवल 5 प्रतिशत विकल्प ही उपलब्ध करा पाती हैं। 

पेरिटोनियल डायलिसिस 
इस तरह की डायलिसिस १९८० के बाद अस्तित्व में आई। इस मशीन का इस्तेमाल घर, ऑफिस अथवा कहीं भी किया जा सकता है। इसमें एक मुलायम कैथेटर पेडू को डायलिसिस सॉल्यूशन से भर देता है। पेडू के इस खोखले हिस्से की सतह पेरिटोनियम से घिरी रहती है। विषैले पदार्थ एवं अतिरिक्त तरल पदार्थ जिसमें नमक भी शामिल है, पेरिटोनियम से होते हुए डायलिसिस सॉल्यूशन में पहुँचते हैं। जब डायलिसिस सॉल्यूशन को शरीर से बाहर निकाला जाता है, तब ये सभी विषैले पदार्थ भी बाहर निकल आते हैं। डायलिसिस सॉल्यूशन भरने एवं निकालने को "एक्सचेंज" प्रोसेस भी कहा जाता है। इसमें ३०-४० मिनट लगते हैं। एक दिन में अधिकतम ४ एक्सचेंज किए जा सकते हैं। इस प्रक्रिया में किसी मशीन की ज़रूरत नहीं होती। मरी़ज़ शरीर के इस खोखले हिस्से में डायलिसिस सॉल्यूशन भर कर अपना रोज़मर्रा का काम भी कर सकता है। एक चीरे के जरिए केथेटर शरीर के अंदर उतारा जाता है। 

कौन सी प्रक्रिया बेहतर 
दरअसल किसी भी मरीज़ के लिए डायलिसिस की स्थिति तक पहुंचना ही एक ब़ड़ी विसंगति है क्योंकि दोनों से ही गुर्दे ठीक नहीं होते। दोनों प्रक्रियाएँ गुर्दों का केवल ५ प्रतिशत विकल्प ही प्रस्तुत कर पाती हैं। बेहतर तो यही होगा कि गुर्दे बचे रहें। डायलिसिस जैसी गंभीर स्थिति ही निर्मित न हो। 

कैसे जिएँ डायलिसिस के साथ 
ख़राब गुर्दों के कारण उठ रही परेशानियों और डायलिसिस में लगने वाला वक्त किसी भी मरी़ज़ के लिए भारी होता है। लगभग हर मरी़ज़ यह सोचने लगता है कि उसकी ऊर्जा खत्म हो रही है। कई मरी़ज़ डायलिसिस शुरु होने के पहले अवसाद में चले जाते हैं। कुछ अपने काम और घरेलू जिंदगी में कई परिवर्तन कर लेते हैं। ऐसी स्थिति में मरी़ज़ का अपने चिकित्सक से सलाह लेना ठीक होता है। गुर्दारोग विशेषज्ञ हर महीने अथवा हर तीन महीने में जाँचकर यह पता लगते हैं कि डायलिसिस का असर हो रहा है या नहीं(सेहत,नई दुनिया,जनवरी द्वितीयांक 2012)।

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मंगलवार, 24 जनवरी 2012

मधुमेह रोगियों को संक्रमण का ख़तरा अधिक होता है

मधुमेह रोगियों में दूसरों के मुकाबले संक्रमण का जोखिम ६ गुना अधिक होता है। इसकी वजह यह है कि उनकी रोग प्रतिरोधक प्रणाली मधुमेह के कारण कमज़ोर पड़ जाती है। मधुमेह के रोगियों को बाहरी संक्रमण से बचने के हर संभव उपाय करना चाहिए। 

बार-बार बुखार आना, सिरदर्द, गला खराब होना और खाँसी आने का कारण सिर्फ मौसम का बदलाव नहीं होता। दरअसल ये सभी वायरल और बैक्टीरियल संक्रमण के लक्षण होते हैं जो उन लोगों में ज़्यादा दिखाई देते हैं जिनके खून में शर्करा का स्तर अधिक हो। एक अंतर्राष्ट्रीय शोध अध्ययन में यह बात सामने आई है। इस अध्ययन में मधुमेह से पीड़ित एवं जिन्हें मधुमेह नहीं था उन लोगों में इंफ्लुएंज़ा वायरस के चपेट में आने की दर का अध्ययन किया गया। इससे सामने आया कि मधुमेह रोगियों को इंफ्लुएंज़ा का खतरा छः गुना अधिक होता है। 

रक्त में शर्करा का स्तर अधिक होने और संक्रमण की दर अधिक होने के बीच जो संबंध है उस पर कई शोध किए जा रहे हैं। इसका कारण जानना वर्तमान में किए जा रहे शोध का विषय है। एक अध्ययन के अनुसार रक्त में ग्लूकोज़ की मात्रा अधिक होने की वजह से शरीर को संक्रमण की मौजूदगी पता नहीं चलता है। इसीलिए यह इसके खिलाफ को प्रतिक्रिया नहीं करता है। संक्रमणकारी बैक्टीरिया व वायरस की बाहरी परत और शक्कर की संरचना मिलती-जुलती होती है। रक्त में शक्कर की मात्रा अधिक होने पर प्रतिरक्षा प्रणाली वायरस की बजाय शर्करा पर हमला करती है। इसीलिए वायरस को फलने-फूलने और संक्रमण फैलाने का मौका मिल जाता है। 

सावधानियाँ 
मधुमेह रोगी कुछ विशेष बातों का ध्यान रखें तो इस तरह के संक्रमण से बच सकते हैं 

शर्करा के स्तर को नियंत्रित रखना पहली और सबसे ज़रुरी सावधानी है। इसके लिए आहार का ध्यान रखना और परहेज़ का पालन करना बहुत ज़रुरी है साथ ही व्यायाम और समय पर दवा लेना भी उतना ही आवश्यक है। रक्त में शर्करा के स्तर की नियमित रुप से जाँच कराना चाहिए। मधुमेह प्रबंधन कार्यक्रम के ज़रिए रोगियों को इस तरह की जटिलताओं से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण बातें बताई जाती हैं ताकि वे अपनी देखभाल कर सकें। बचाव के लिए उन्हें इंफ्लुएंज़ा के खिलाफ टीका भी लगाया जाता है। 

अधिक कैलोरीयुक्त आहार और शारीरिक श्रम की कमी, इन दो बड़े कारणों की वजह से मधुमेह का जोखिम बढ़ जाता है। पैन्क्रियाज़ यदि पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन का निर्माण न करे या शरीर की कोशिकाएँ इंसुलिन का उपयोग ठीक से न कर पाए तो उसका नतीजा मधुमेह होता है। इंसुलिन हारमोन रक्त में मौजूदअधिक कैलोरीयुक्त आहार और शारीरिक श्रम की कमी, इन दो बड़े कारणों की वजह से मधुमेह का जोखिम बढ़ जाता है। पैन्क्रियाज़ यदि पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन का निर्माण न करे या शरीर की कोशिकाएँ इंसुलिन का उपयोग ठीक से न कर पाए तो उसका नतीजा मधुमेह होता है। इंसुलिन हारमोन रक्त में मौजूद शर्करा का उपयोग करने के लिए अत्यावश्यक होता है। इस हारमोन के ज़रिए ही शरीर की विभिन्न कोशिकाएँ अपना-अपना कार्य करने के लिए ऊर्जा प्राप्त कर पाती है। लेकिन चूंकि मधुमेह रोगियों में इंसुलिन पर्याप्त मात्रा में नहीं होता,उनके रक्त में शर्करा का स्तर अक्सर ज़्यादा रहता है। अनियंत्रित मधुमेह के कारण हृदय,गुर्दे आदि अन्य अंग भी प्रभावित होने लगते हैं। इसीलिए,मधुमेह रोगियों को अपने खान-पान और जीवन-शैली का विशेष ध्यान रखना चाहिए। तरह-तरह के संक्रमणों से व्यक्ति का जीवन प्रभावित होने लगता है(डॉ. योगेश शाह,सेहत,नई दुनिया,जनवरी द्वितीयांक 2012)

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मंगलवार, 3 जनवरी 2012

मधुमेह रोगी चेहरे पर नहीं,पांव पर ध्यान दें

मधुमेह के इलाज का मतलब सिर्फ शुगर पर नियंत्रण नहीं है। मधुमेह के कारण और भी बहुत से रोग जन्म ले लेते हैं। इतना ही नहीं मधुमेह से पीड़ित मरीजों के पांवों को भी नुकसान हो सकता है। अगर पैरों का ख्याल न रखा जाए तो इन्हें काटने की नौबत भी आ सकती है। इसलिए मधुमेह में पैरों की देखभाल पहले जरूरी है। मृदुला भारद्वाज का आलेखः 

आज 50 हजार से भी अधिक मधुमेह मरीजों को अपने पैर खोने पड़ते हैं। और पैरों के बिना मधुमेह का इलाज असंभव है क्योंकि शुगर पर कंट्रोल के लिए टहलना बहुत जरूरी है। इसलिए मधुमेह का इलाज भी पैरों से शुरू होता है और सबसे ज्यादा ख्याल भी पैरों का ही रखा जाता है। जैसे-जैसे मधुमेह बढ़ता है वैसे ही पैरों की नसों पर प्रतिकूल असर भी बढ़ता जाता है। इसलिए मधुमेह के मरीजों को खुद भी सचेत रहना चाहिए। 

लक्षण 
-पैरों की संवेदना इतनी कम हो जाती है कि किसी भी तरह की चुभन का अहसास नहीं होता। 
-पैरों में गर्म चीजों का अहसास नहीं होता। 
-बिना जोड़ों में सूजन के पैर सुन्न पड़ जाते हैं। 
-पैरों की संवेदना खत्म हो जाती है। 
-पैरों में सूजन पैरों में खुला घाव आदि 
-पैरों के नाखूनों के आसपास बदलाव पैरों की संरचना और रंग में बदलाव 
-पैरों में कंपन या झनझनाहट 
-पैरों में बहुत ज्यादा थकान महसूस होना 
-पैरों में जलन 

बरतें ये सावधानियां 
-हमेशा जुराब पहनें। जुराब हमेशा मोटे और अच्छे हों। याद रहे कि हमेशा धुला हुआ जुराब ही पहनें। 

-जूता पहनने से पहले अवश्य देख लें कि कहीं कोई चुभने वाली चीज जूते के अंदर न हो। जूते टाइट न हों। टाइट जूते पहनने से पैरों में घाव हो सकता है। मधुमेह रोगी हमेशा शाम के समय ही जूता खरीदें, क्योंकि डायबिटीज के मरीजों के पैर दिन भर चलने के कारण थोड़े फूल जाते हैं। इसलिए मरीजों को उसी समय और उसी साइज के जूते खरीदने चाहिए। 

-अपने नाखूनों को काटने में सावधानी बरतें। 

-सर्दी में गर्म पानी की बोतल पर पांव कतई न रखें और न ही गर्म पानी में अपने पैर डालें। हमेशा गुनगुने पानी से ही पैरों की सफाई करें। पैरों को अच्छी तरह से साफ करें और उन्हें सूखा रखें। 

-किसी भी तरह के तंबाकू के सेवन से दूर रहें। 

-उच्च रक्तचाप व उच्च कोलेस्ट्रॉल वाले मधुमेह रोगियों को अपने पैरों का खास ख्याल रखना चाहिए। 

-पैरों पर ज्यादा दबाव न पड़ने दें। और पैरों को लटकाकर न बैठें। उन्हें ऊंचा रखें। 

-किसी भी तरह के तंग कपड़े न पहनें जिससे खून के प्रवाह में रुकावट आए। 

-शुगर लेवल को कंट्रोल करने के लिए नियमित टहलें और व्यायाम करें। 

-सूखी और परतदार त्वचा पर माइश्चराइजर जरूर लगाएं और हमेशा कॉटन की जुराबें ही पहनें। 

-अपने पैरों की नियमित जांच करें। 

-पैरों में पड़े कट्स, क्रेक और नाखूनों की अच्छे से जांच करें। पैरों की अंगुलियों के बीच और तलवों को अवश्य देखते रहना चाहिए। 

-अगर संभव हो तो किसी अन्य से भी अपने पैरों की जांच करवाएं। 

-मधुमेह के मरीज कभी भी नंगे पैर न घूमें। इससे आपके पैरों में चोट लग सकती है और घाव होने पर कीटाणु आपके शरीर में आसानी से प्रवेश कर सकते हैं। 

-हमेशा आरामदायक जूते ही पहनें और पंजों पर दबाव न पड़ने दें। नियमित अंतराल पर जूते-चप्पल-जुराब बदलते रहें। 

-हवाई चप्पल किस्म के फुटवियर न पहनें। फुटवियर में पंजे की तरफ का हिस्सा खुला हुआ और चौड़ा होना चाहिए। 

-मधुमेह के मरीजों के लिए आईने में चेहरा निहारना इतना जरूरी नहीं है, जितना कि पैर। मधुमेह का कोई भी लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें(हिंदुस्तान,दिल्ली,29.12.11)।

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शनिवार, 10 दिसंबर 2011

मधुमेह और हाइपोग्लायसीमिया

मधुमेह रोगियों के खून में आमतौर पर शकर सामान्य से ज़्यादा रहती है। परिभाषा के अनुसार रक्त में खाली पेट शकर की मात्रा १२६ से नीचे तथा खाना खाने के २ घंटे बाद २०० से नीचे होना चाहिए। 

आमतौर पर इसे खाली पेट ११० के नीचे और भरे पेट १४० से नीचे रखते हैं, यह एक आदर्श स्थिति होती है। चिकित्सक भी मरीज़ को यही सलाह देते हैं तथा दवाइयाँ इसी तरह से एडजस्ट की जाती हैं कि मरीज़ का शुगर लेवल सामान्य रहे। कभी-कभी या तो दवाओं के ओवर डा़ेज की वजह से या मरीज़ के भूखे रहने या अत्यधिक मेहनत के कारण रक्त में शर्करा का स्तर कम हो जाता है। इस स्थिति को हायपोग्लायसीमिया कहते हैं। सामान्य व्यक्ति के रक्त में शकर का स्तर ५० के लगभग हो जाए तो भी सामान्य बना रहता है परंतु मधुमेह के मरीज़ के रक्त में शकर का स्तर ७०-८० भी हो तो भी उसे लो शुगर के लक्षण महसूस होने लगते हैं जैसे-

-पसीना आना, बेचैनी होना एवं हाथ पैर काँपना। -दिल की धड़कन तेज़ हो जाना।

-कभी-कभी तो मिर्गी का दौरा भी आ सकता है या मरीज़ बेहोश हो सकता है। दिल पर इसका विपरीत असर हो सकता है। 

रक्त में शर्करा का स्तर सामान्य से कम होने पर शरीर में कुछ ऐसे हारमोन स्त्रावित होते हैं जो तुरंत उसे सामान्य स्थिति में लाने की कोशिश करते हैं। ये हारमोन हैं ग्लूकेगोन, कार्टिसोन, एड्रिनलिन, थायरॉइड आदि। इन्हीं हारमोन की वजह से लो शुगर के लक्षण सामने आते हैं। ऐसी स्थिति में उसे तुरंत शकर या कोई मीठी चीज़ दे दें। इसके अलावा इन हारमोन का इंजेक्शन लगाने पर भी उसकी स्थिति सामान्य हो जाती है। इस स्थिति से बचने के लिए कुछ ऐसे उपाय ज़रूरी हैं जिससे कि शकर की मात्रा सामान्य बनी रहे।

-अपनी बीमारी का रिकॉर्ड रखें। सामान्य से ज़्यादा मेहनत न करें।

-नियमित जीवनशैली। भोजन में बहुत ज्यादा गेप न दें। यदि इंसुलिन इंजेक्शन लेते हैं तो उसकी मात्रा नियमित करते रहनी चाहिए।

-कभी-कभी लोग पार्टी में जाकर वहाँ दवाई लेने के बजाय घर से ही दवाई ले लेते हैं या इंजेक्शन लगा लेते हैं। किसी वजह से अंतराल ज़्यादा होने पर शुगर लो होने का खतरा रहता है। अतः व्यावहारिक निर्णय लें और अपनी दवाई उचित तरीके से ही लें। 

 - अपनी बीमारी के बारे में परिजनों, दोस्तों व साथ वालों को अवश्य बताएँ ताकि आपातकालीन स्थिति में उपचार तुरंत शुरू किया जा सके। 

ज़्यादा शुगर तो खतरनाक है ही, कम शुगर भी उतनी ही खतरनाक स्थिति पैदा करती है। मधुमेह रोगियों और उनके परिजनों को इससे बचने और निपटने के तरीकों की जानकारी होनी ही चाहिए(डा. मनीष बंदिष्ठे,सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर प्रथमांक 2011)।

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रविवार, 4 दिसंबर 2011

मधुमेह में पैरों की देखभाल

मधुमेह के रोगियों को सबसे अधिक जोखिम पैरों की ख़ैरियत का होना चाहिए, क्योंकि इस बीमारी में पैरों में शुद्ध रक्त की आपूर्ति कम हो जाती है। 

अगर आप मधुमेह के मरीज हों तो कहीं ऐसा तो नहीं होता है कि थोड़ी दूर चलने पर पैरों व टाँगों में दर्द शुरू हो जाता हो, पर रुक ने पर दर्द गायब हो जाता हो। ऐसा भी हो सक ता है कि आपके पैरों, उँगलियों व तलवे में बराबर झनझनाहट बनी रहती हो, जो विशेषकर सर्दी के दिनों में बढ़ जाती हो। क भी ऐसा भी हो सकता है कि आपसे एक कदम भी चलना कठिन हो। और तो और, रात में बिस्तर पर लेटते समय टाँगों में दर्द उभरता हो जिसकी वजह से आप रात में ठीक से सो नहीं पाते हों। क भी ऐसा भी होता होगा कि अचानक आपकी नींद खुल गई और पाया कि पैरों में दर्द हो रहा है। पैरों को लटकाकर बैठे रहने या थोड़ा-सा चले तो दर्द कम हो गया। आपके साथ शायद यह भी होता हो कि हर समय पैरों में दर्द बना रहता हो और कभी-कभी यह दर्द असहनीय हो जाता हो। यदि आपको इनमें से कोई एक लक्षण भी है तो लापरवाही बिलकुल न करें, क्योंकि समस्या गंभीर हो सकती है और पैर खोने की नौबत आ सकती है। समय रहते कि सी-वैस्क्युलर या कार्डियो वैस्क्युलर सर्जन की सलाह लें। अनदेखी खतरनाक हो सकती है। 

डायबिटीज के मरीजों में पैर कटने का खतरा बिना डायबिटीज वाले लोगों की तुलना में लगभग डेढ़ गुना ज्यादा होता है। लंबे समय से चल रही डायबिटीज खून में शुगर की अनियंत्रित मात्रा, धूम्रपान, पेशाब में एल्ब्युमिन का होना, आँखों में रोशनी का कम होना, पैरों में झनझनाहट व संवेदनहीनता का होना तथा पैरों में खून आपूर्ति कम होने से पैर काटना पड़ सकता है। 

क्यों होता है दर्द और झनझनाहट 
न्यूरोपैथी के कारण पैरों में दर्द व झनझनाहट रहती है, विशेषकर पैरों के तलुओं व एड़ी में। पैरों की मांसपेशियाँ क मजोर हो जाती हैं जिससे पैरों के जोड़ों पर अनावश्यक दबाव पड़ने लगता है। इन सबकी मिला-जुला असर यह होता है कि पैरों में दर्द व झनझनाहट की शिकायत हमेशा बनी रहती है। पैदल चलने से दर्द और बढ़ जाता है। दूसरा सबसे बड़ा कारण पैरों में जाने वाले शुद्ध खून की मात्रा में कमी हो जाना है। टाँगों व पैरों की ऑक्सीजन युक्त शुद्ध खून ले जाने वाली खून की नली के अंदर निरंतर चर्बी व कैल्शियम जमा होता रहता है जिसके परिणामस्वरूप खून की नली में सिकुड़न आ जाती है जिससे शुद्ध खून की आपूर्ति में बाधा पहुंचती है। शुरूआती दिनों में बरती गई लापरवाही के कारण खून की यह नली पूरी तरह बंद हो जाती है। इस दिशा में डायबिटीज के मरीज के पैरों में दर्द शुरू हो जाता है। अगर किसी वैस्क्युलर या कार्डियो वैस्क्युलर सर्जन से सलाह न ली जाए,तो पैर कटवाने तक की नौबत आ सकती है। पैर की त्वचा की रक्त आपूर्ति कम हो जाने में एक और महत्वपूर्ण कारण ऑटोनोमिक सिमपैथेटिकन्यूरोपैथी है। इसकी वजह से शु्द्ध खून पैर की त्वचा में स्थित अपने गंतव्य स्थान तक नहीं पहुंच पाता क्योंकि खून की शॉर्ट सर्किटिंग हो जाती है। पैरों के गुलाबी रंग से भ्रमित न हों और जल्दबाज़ी में इस नतीज़े पर न पहुंचें कि पैरों में खून का बहाव सामान्य और पर्याप्त है। 

स्वयं करें परीक्षण 
लेटकर पैरों को छाती से दो फुट ऊपर एक मिनट तक रखें। अगर पैरों का रंग गुलाबी से बदलकर पीला दिखने लगे तो समझ जाइए कि पैरों में शुद्ध खून की सप्लाई कमा है। होशियार हो जाइए कि आपके पैरों में घाव बनने की आशंका बहुत ज्यादा है। तुरंत किसी वैस्क्युलर सर्जन से सम्पर्क करें। पैरों पर अधिक खतरा क्यों डायबिटीज में ऑटोनोमिक न्यूरोपैथी कीवजह से पसीने को पैदा करने वाली त्वचा को चिकना बनाने वाली ग्रंथियां ठीक से काम करना बंद करत देती हैं जिसके परिणामस्वरूप पैरों की त्वचा बहुत ज्यादा खुश्क हो जाती है। इससे त्वचा फटने लगती है और गड्ढे बन जाते हैं जिससे बहुत जल्दी संक्रमण फैलने का जोखिम होता है। इसी बीमारी की वजह से मांसपेशियां कमज़ोर हो जाने के कारण हड्डियों पर दबाव बढ़ जाता है। दबाव वाले स्थानों पर गोखरू का निर्माण हो जाता है(डाक्टर के के पांडेय,सेहत,नई दुनिया,नवम्बर चतुर्थांक,2011)।

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बुधवार, 29 जून 2011

मधुमेह में व्यायाम की सावधानियाँ

(सेहत,नई दुनिया,जून 2011 चतुर्थांक)

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शुक्रवार, 20 मई 2011

युवाओं में तेज़ी से बढ़ रहा है मधुमेह

असंतुलित जीवन के चलते मधुमेह बड़ी तेजी से लोगों को अपना शिकार बनाता जा रहा है। बुजुर्ग ही नहीं, युवा वर्ग भी तेजी से इसकी चपेट में आता जा रहा है।

वर्तमान में पांच करोड़ से अधिक भारतीय इस बीमारी से ग्रस्त हैं और यह आशंका भी जताई जा रही है कि अगले दो दशकों में ही यह आंकड़ा दोगुना हो जाएगा, लेकिन अगर इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की मानें तो फिलहाल इससे परेशान होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ये आंकड़े बेमानी हैं और सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं के पास इस बीमारी से संबंधित सटीक जानकारी ही नहीं है।

आईसीएमआर में छपे एक लेख में खुलासा किया गया है। इसके मुताबिक मधुमेह की जडें़ काफी गहरी हैं। ढाई हजार वर्ष पहले भी इस बीमारी के साक्ष्य भारत में मिले हैं, लेकन साठ के दशक से इस बीमारी ने गति पकड़ी और अब महामारी की ओर अग्रसर है। लेकिन, बीमारी किस स्तर तक पहुंच गई है इसके लिए अब तक राष्ट्रीय स्तर कोई भी न तो कोई अध्ययन किया गया है और न ही कोई सर्वे।

बीते पचास वर्षो में बहु-स्थानीय स्तर पर केवल छह सर्वे किए गए हैं। वर्ष 1970 में आईसीएमआर ने ऐसा ही एक सर्वे किया था, लेकिन इसमें केवल छह स्थानों को ही शामिल किया गया था। जबकि, बीते चालीस वर्षो में भारत की आबोहवा और जनसंख्या का प्रारुप भी काफी बदल गया है। ऐसे में इस सर्वे के आंकड़ों का अब कोई औचित्य नहीं रह गया है।


वर्ष 2001 में नेशनल अरबन डाइबिटिक सर्वे संस्था द्वारा भी एक सर्वे किया गया था, लेकिन इसका दायरा भी सीमित था। इसी प्रका, वर्ष 2004 में द प्रिवेलेंस ऑफ डाइबिटीज इन इंडिया और वर्ष 2008 में विश्व स्वास्थ्य संगठन व आईसीएमआर ने संयुक्त रूप से रिस्क फैक्टर सर्विलांस स्टडी की थी। 

लेकिन, कोई भी सर्वे राष्ट्रीय स्तर पर नहीं किया गया है, यानि इनमें सभी राज्यों, शहरों और गांवों को शामिल नहीं किया गया है। लेख के मुताबिक इन अध्ययनों में कई तरह की खामियां हैं, मसलन अध्ययन में शामिल लोगों की संख्या सीमित होना, जांच रिपोर्टों के विभिन्न मानक, परिणामों का अपूर्ण लेखा-जोखा, शारीरिक प्रारूप व भोजन पैटर्न के विश्व स्तरीय मानकों को नजरअंदाज करना आदि। इतना ही नहीं, बीमारी की जटिलताओं से संबंधित जनसंख्या आधारित कोई विस्तृत अध्ययन भी नहीं किया गया है। 

सही आंकड़ों के अभाव के चलते बीमारी की गंभीरता और इसकी जटिलताओं के बारे स्पष्ट में आंकलन करना काफी मुश्किल है। साथ ही बीमारी पर काबू पाने के लिए योजनाएं बनाना भी काफी कठिन हो रहा है।

"कुछ महीने पहले ही राष्ट्रीय स्तर पर एक अध्ययन शुरू किया गया है। उत्तर-पूर्वी राज्यों के साथ ही चंडीगढ़ व झारखंड में अध्ययन इस वर्ष पूरा हो जाएगा। इसमें सभी राज्यों के शहरी एवं ग्रामीण इलाकों को शामिल किया जा रहा है।"

डॉ. वीएम कटोच,
आईसीएमआर के महानिदेशक
(धनंजय कुमार,दैनिक भास्कर,दिल्ली,20.5.11)

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शनिवार, 5 मार्च 2011

बहुत तेज़ी से फैल रहा है मधुमेह

डायबीटीज का जाल केवल भारत में ही नहीं, बल्कि कई अन्य विकसित देशों में भी तेजी से फैलता जा रहा है। मिडल एज ग्रुप में बढ़ रही डायबीटीज की बीमारी खासतौर पर चिंता का सबब बनी हुई है। हाल ही में डायबीटीज को लेकर लंदन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी द्वारा कॉर्डिनेट की गई एक स्टडी से सामने आई बातें और भी चौंकाने वाली हैं।

इस स्टडी के मुताबिक मिडल एज में डायबीटीज का शिकार हुए लोगों की उम्र सामान्य से 10 साल कम हो जाती है। डायबीटीज की वजह से हार्ट स्ट्रोक और हार्ट अटैक का खतरा तो डबल हो ही जाता है, लेकिन स्टडी से पता चला है कि टाइप-2 डायबीटीज के मरीजों में कैंसर, कई तरह के इन्फेक्शन, मेंटल डिसऑर्डर, लिवर, किडनी, फेफड़ों और पेट से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बहुत बढ़ जाता है, जो जल्दी ही मौत की वजह बन जाता है।

डायबीटीज के भारतीय विशेषज्ञों ने भी इस स्टडी के रिजल्ट से सहमति जताई है। सीनियर डायबेटॉलजिस्ट और दिल्ली डायबीटीज रिसर्च सेंटर के अध्यक्ष डॉ. ए. के. झिंगन के मुताबिक यह स्टडी हमारे लिए और भी मायने रखती है, क्योंकि यहां खतरा अन्य देशों के मुकाबले कहीं ज्यादा है। इसकी वजह देश में डायबीटीज को लेकर एजुकेशन, जागरूकता और सतर्कता का अभाव है।

यहां खतरा ज्यादा
डॉ. झिंगन के मुताबिक विदेशों मंे आमतौर पर 50 से 60 साल की उम्र में लोग डायबीटीज का शिकार होते हैं, लेकिन हमारे देश में 30 से 40 साल के दौरान ही लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं। चिंता की बात यह है कि इससे हमारे देश की प्रोडक्टिव लाइफ पर भी सीधा असर पड़ता है। देश में डायबीटीज के मरीजों की संख्या 5 करोड़ से ज्यादा है, लेकिन 50 प्रतिशत लोग ही इसका इलाज करवाते हैं। कई लोगों को तो लंबे समय तक इसका पता ही नहीं चलता। इससे बीमारी कंट्रोल से बाहर हो जाती है और उम्र 10 साल तक कम हो जाती है।

हो जाएं अलर्ट
डायबीटीज का सामान्य पैरामीटर (एचबी ए-1 सी : ग्लाइकोसिलेटेज हीमोग्लोबिन) 4 से 6 पर्सेंट के बीच है, लेकिन डायबीटीज के मरीजों में यह 6 पर्सेंट से ज्यादा बढ़ जाता है। 8 या 9 पर्सेंट का मतलब है कि डायबीटीज कंट्रोल से बाहर हो रही है। अगर लोग समय रहते सही तरीके से इसका इलाज करवाएं और डायबीटीज का स्तर 8 से 7 या 7 से 6 तक ले आएं और इस 1 पर्सेंट की कमी जिंदगी के 10 साल बढ़ा सकती है और डायबीटीज की वजह से होने वाली मौतों की संख्या में भी 14 पर्सेंट तक कमी आ सकती है।

चलेगा जागरूकता अभियान
फोर्टिस हॉस्पिटल के डायबीटीज विभाग के हेड और नैशनल डायबेटिक ओबेसिटी एंड कोलेस्ट्रॉल फाउंडेशन के चीफ डॉ . अनूप मिश्रा ने बताया कि अन्य देशों के मुकाबले भारत में डायबीटीज की वजह से हार्ट अटैक , हार्ट स्ट्रोक और किडनी फेल होने के चलते 5 गुना ज्यादा लोगों की मौत होती है। उन्होंने बताया कि नैशनल डायबेटिक ओबेसिटी एंड कोलेस्ट्रॉल फाउंडेशन डायबीटीज पर देश के 50 प्रमुख शहरों में जागरूकता अभियान चला रहा है जिसकी शुरुआत पुणे से शनिवार को हो रही है(प्रशांत सोनी,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,5.3.11)।

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सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

बच्चों में मधुमेह की वजह सॉफ्ट ड्रिंक

आपका बच्चा यदि सॉफ्ट ड्रिंक का शौकीन है तो उसे रोकना होगा। कोला या फिर किसी भी एनर्जी ड्रिंक को मधुमेह की प्रमुख वजह माना गया है। दरअसल इनमें शामिल काब्रोहाइड्रेट शरीर में जरूरत से अधिक ग्लूकोज की मात्रा पहुंचाता है,जिससे मेटाबॉलिक डिस्आर्डर सिंड्रोम सामने आ रहा है। दिल्ली डायबिटिक रिसर्च सेंटर के अध्ययन के अनुसार, दिन भर में दो से तीन दिन पर 150 एमएल कोल्ड ड्रिंक या एनर्जी ड्रिंक से टाइप-टू मधुमेह का खतरा 25 फीसदी बढ़ सकता है। दिन में नियमित दो बार साफ्ट ड्रिंक एक साल में 10 पाउंड वजन बढ़ा सकता है। राजधानी दिल्ली के 1500 स्कूली बच्चों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि 59 प्रतिशत बच्चों का वजन उनकी उम्र से अधिक है। मोटे बच्चों में 10 प्रतिशत बच्चे मधुमेह के शिकार है, जबकि 2 प्रतिशत बच्चों में मधुमेह का कारण जेनेटिक देखा गया है। डीडीआरएस के प्रमुख डॉ. अशोक कुमार झिंगन कहते हैं कि सॉफ्ट ड्रिंक में साधारण पेय की अपेक्षा 12 प्रतिशत अधिक सूक्रोज और काब्रोहाइड्रेट होता है। अप्रैल से जून माह में बच्चों में कोल्ड ड्रिंक की खपत 40 फीसदी बढ़ जाती है। अधिक कैलोरी और ग्लूकोल की अपेक्षा शारीरिक श्रम कम होता है, जिसका असर मेटाबॉलिक डिस्आर्डर सिंड्रोम है। इसमें केवल मधुमेह ही नहीं, इससे जुड़ी अन्य बीमारियां जैसे सीएचडी(कोरोनरीहार्ट डिसीसी), किडनी व लिवर भी शामिल हैं(निशि भाट,हिंदुस्तान,दिल्ली,21.2.11)।

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