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मंगलवार, 28 अगस्त 2012

कई रोगों का इलाज़ हो रहा है फोटोथैरेपी से

फोटोथैरेपी त्वचा संबंधी परेशानियों में लाभकारी हो सकती हैं। अब विशेषज्ञ रोशनी का उपयोग विभिन्न रोगों के इलाज के लिए कर रहे हैं। इन दिनों स्ट्रोक, मुँह की दुर्गंध और कैंसर जैसे रोगों के इलाज के लिए भी रोशनी को उपयोग में लिया जा रहा है। शुरूआत में त्वचा रोग विशेषज्ञ लाइट थैरेपी का उपयोग सोराइसिस के इलाज के लिए करते थे। इसके बाद सर्दी के मौसम में होने वाले सीज़नल डिप्रेशन के उपचार के लिए भी इसका उपयोग किया गया। अब विभिन्न तकलीफों में राहत के लिए लाइटथैरेपी का इस्तेमाल किया जा रहा है।

कमर दर्द 
कमर दर्द से निजाद दिलाने के लिए चिकित्सक नीली रोशनी का उपयोग कर रहे हैं। सफेद रोशनी के बिखरने पर इसके सात अलग-अलग रंगों को देखा जा सकता है। नीली रोशनी बहुत शक्तिशाली होती है, यह ऊतकों को नुकसान पहुँचााए बिना शरीर पर प्रभाव डालती है। इसीलिए इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के उपचार के लिए किया जा रहा है। युनिवर्सिटी हॉस्पिटल ऑफ हेडिल्बर्ग के चिकित्सकों ने नीली रोशनी उत्सर्जित करने वाला पैच विकसित किया है। इस पैच को दर्द की मदद से चिकित्सक दर्द का उपचार कर रहे हैं। 

यह पद्धति शुरूआती अध्ययनों पर आधारित है जिनमें यह सामने आया था कि रोशनी से शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड का उत्पादन बढ़ता है। नाइट्रिक ऑक्साइड माँसपेशियों के तनाव को दूर करता है। इससे रक्त धमनियाँ चौड़ी हो जाती है जिससे रक्त संचार बेहतर होता है। हेडिल्बर्ग में पैच पर अध्ययन जारी है, नई ट्रायल में १४ दिनों में पैच का उपयोग ५ बार किया जाएगा। मरीज़ों को इसे हर बार आधे घंटे के लिए लगाया जाएगा। अमेरिका में रोशनी के ज़रिए ओस्टियोआर्थ्राइटिस के कारण घुटने में होने वाले दर्द का इलाज खोजा जा रहा है। एक अन्य शोध से सामने आया कि कंधे का दर्द दूर करने के लिए फोटोथैरेपी असरदार है, वो भी बिना किसी दुष्प्रभाव के।  

पेट के छाले 
पेट के छालों के इलाज के लिए एक ऐसा उपकरण मददगार हो सकता है जिसके ज़रिए पेट के अंदर तक नीली रोशनी पहुँचाई जा सके। इस रोशनी के प्रभाव से अल्सर के लिए ज़िम्मेदार बैक्टीरिया नष्ट होने लगते हैं। यह तकनीक पेट के कैंसर के इलाज में भी फायदेमंद हो सकती है। अध्ययन बताते हैं कि प्रभावित हिस्से पर एक घंटे से भी कम समय के लिए यदि नीली रोशनी डाली जाए तो यह हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने के लिए पर्याप्त होती है। ख़ास बात यह है कि इससे बैक्टीरिया तो नष्ट हो जाता है लेकिन शरीर के स्वस्थ ऊतकों पर कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है। यह नया उपकरण हाल ही में विकसित किया गया है और इसपर शोध-अध्ययन व ट्रायल जारी हैं। अमेरिका में हुए शोध बताते हैं कि इस इलाज के बाद बैक्टीरिया की संख्या में ९१ प्रतिशत तक की कमी देखी गई है।

मिर्गी 
मिर्गी के उपचार के लिए फोटोथैरेपी को विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। जिन मरीज़ों को मिर्गी-रोधी दवाओं से ख़ास फायदा नहीं होता है, उनके लिए फोटोथैरेपी फायदेमंद साबित हो सकती है। युनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में हुई एक ट्रायल में मिर्गी के मऱीजों को तीन महीने तक रोज़ ३० मिनिट के लिए लाइट-बॉक्स से एक्सपोज़ किया गया। इस लाइट बॉक्स से तेज़ सफेद रौशनी निकलती है। मिर्गी का यह उपचार पहले हुए शोध-अध्ययनों पर आधारित है जिससे यह पता चलता है कि जिन दिनों में बादल छाए रहते हैं, तब मरीज़ों को मिर्गी के दौरे अधिक पड़ते हैं। जिन दिनों में तेज़ धूप निकलती है, तब मरीज़ों को कम दौरे पड़ते हैं। कुछ वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि तेज़ रोशनी के प्रभाव से विटामिन-डी और मेलाटोनिन आदि का स्तर बढ़ जाता है जिससे दिम़ाग में दौरों को नियंत्रित करने वाले रसायन स्त्रावित होने लगते हैं।

घाव  
मधुमेह रोगियों के पैरों में बने गंभीर घाव, अधिक दबाव पड़ने पर बनने वाले घाव व अन्य प्रकार के गंभीर घावों के इलाज के लिए लाइट थैरेपी असरकारी है। स्टॉकहोम में हुए इस शोध अध्ययन के अनुसार लाल रोशनी और इंफ्रारेड रोशनी के कॉम्बिनेशन से घाव तेज़ी से भरते हैं। इससे प्रेशर अल्सर ५४ प्रति तेज़ी से ठीक हो गए थे। प्रेशर अल्सर का ९० प्रतिशत हिस्सा केवल ५ हफ्तों में ही भर गया था। जिन मरीज़ों को लाइट थैरेपी नहीं दी गई थी, उनमें घाव भरने के लिए ९ हफ्तों का समय लगा था। 

मुँह की दुर्गंध  
जेरूसलम की हीब्रू युनिवर्सिटी के डेंटल स्कूल के अध्ययनकर्ताओं ने एक शोध में पाया कि नीली रोशनी से मुँह की दुर्गंध को कम किया जा सकता है। दंत चिकित्सक अक्सर दाँतो को सफेद बनाने के लिए इन पर दो मिनिट तक नीली रोशनी डालते हैं। नीली रोशनी न सिर्फ दाँतों को सफेद बनाती है बल्कि थूक में मौजूद दुर्गंधकारी बैक्टीरिया भी इससे ख़त्म होते हैं। इसीलिए अब इसे मुँह की दुर्गंध के इलाज के रूप में देखा जा रहा है। अध्ययनकर्ताओं ने थूक के ५० नमूनों पर शोध कर पाया कि इनपर नीली रोशनी डालने पर दुर्गंध काफी कम हो जाती है। उन्होंने पाया कि रोशनी डालने के बाद थूक के नमूनों में दुर्गंधकारी बैक्टीरिया की संख्या काफी कम हो गई थी। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने शोध अध्ययन में पायाका कि नीली रोशनी से मसूड़ों में बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया को ख़त्म किया जा सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह रोशनी मुंह में होने वाले पेरियोडोन्टिस नामक संक्रमण से बचाव और उपचार के लिए भी असरकारी हो सकती है। इस संक्रमण से दांत और हड्डियां क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। 

शोध प्रमुख डॉ. निकोस सूकोज के अनुसार,रोशनी डालने पर मुंह में मौजूद कई नुकसानकारी बैक्टीरिया कुछ सेकेंड्स में ही ख़त्म हो जाते हैं। रोशनी से बैक्टीरिया का सुरक्षा-कवच नष्ट हो जाता है जिससे ये नष्ट होने लगते हैं। 

कैंसर का इलाज़ 
लाइट के उपयोग से कैंसर के इलाज के लिए एक विशेष प्रकार के ट्रीटमेंट का उपयोग किया जा रहा है, इसे फोटो-डायनामिक थैरेपी कहा जाता है। इसका सबसे अधिक उपयोग त्वचा कैंसर के इलाज के लिए किया जाता है। इस ट्रीटमेंट में रौशनी के साथ ही एक विशेष प्रकार के ड्रग का इस्तेमाल किया जाता है। यह ड्रग कैंसर की असामान्य कोशिकाओं को रोशनी के प्रति संवेदशील बनाता है। कैंसर के मरीज़ों को दिए जाने वाले इस ड्रग की विशेषता यह है कि इसे केवल कैंसर की कोशिकाएँ ही अवशोषित करती हैं। 

इसके बाद मरीज़ के प्रभावित हिस्से पर नीली रोशनी डाली जाती है। रोशनी के प्रभाव में कैंसर कोशिकाओं द्वारा अवशोषित यह ड्रग एक विशेष प्रकार की ऑक्सीजन उत्सर्जित करने लगता है, जिससे कैंसर की कोशिकाएँ मरने लगती हैं। यह ट्रीटमेंट ट्यूमर को सिकोड़ने और नष्ट करने के लिए प्रभावी है। शरीर के भीतरी हिस्सों में मौजूद कैंसर के लिए ऑप्टिक फाइबर द्वारा रोशनी को शरीर के अंदरूनी हिस्सों में भेजा जा सकता है(सेहत,नई दुनिया,अगस्त,2012 द्वितीयांक)।

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शनिवार, 25 अगस्त 2012

मुखरोग का सीधा संबंध तनाव से है

तनाव का असर पूरे शरीर पर पड़ता है। यह मुंह की सेहत भी खराब कर देता है। तनाव की अधिकता की वजह से सिरदर्द, पेटदर्द या उच्च रक्तचाप होने के साथ-साथ ही दाँतों, मसूड़ों और मुँह में छाले भी हो जाते हैं।

तनाव और बेवजह की चिंताओं से मुँह की अंदरूनी सतह पर खराशें पड़ सकती हैं। केंकर सोर या कोल्ड सोर हो सकते हैं। दाँत भींचने की भी शिकायत हो सकती है। दाँत भींचने और सोते समय दाँत पीसने से दाँत खराब हो सकते हैं या मुँह में घाव हो सकते हैं। दाँतों की नियमित सफाई न होने एवं नियत समय पर भोजन न कर पाने के कारण मुँह में संक्रमण हो सकता है। केंकर सोर संक्रामक नहीं होते। 

क्या करें 
केंकर सोर आमतौर पर १० दिन में अपने आप खत्म हो जाते हैं। राहत पाने के लिए केमिस्ट से पूछकर छालों की कोई क्रीम लगाई जा सकती है। खुजली से बचने के लिए तीखा मसालेदार, बहुत गर्म या टमाटर जैसे अम्लीय खाद्य पदार्थों का सेवन न करें।

कोल्ड सोर 
ये हर्पीज सिम्पलेक्स वायरस के संक्रमण की वजह से होते है तथा एक से दूसरे तक पहुँचते हैं। ये ऐसे छाले होते हैं जिनमें तरल पदार्थ भरा रहता है। ये अक्सर मुंह के आसपास होठों के किनोर पर उभरते हैं। ये नाक के नीचे और ठोड़ी के आसपास भी हो जाते हैं। भावनात्मक तनाव की अधिकता के कारण इनकी संख्या बढ़ जाती है। एंटीवायरल औषधियाँ से राहत मिलती है। जैसे ही कोल्ड सोर की शुरूआत हो उनका इलाज चालू कर दें। इससे संक्रमण को सीमित करने में मदद मिलेगी और घर के दूसरे सदस्य इससे बच सकेंगे। 

दाँत किटकिटाना 
तनाव के कारण दाँत भींचना एक आम लक्षण है। कई लोग तनाव को सोते समय भी दूर नहीं रख पाते और दाँत किटकिटाते हैं। गंभीर अवस्था में मरीज दिन में ही अनजाने में दाँत किटकिटाने लगते हैं। दाँत किटकिटाने की समस्या के कारण जबड़े के जोड़ पर अनावश्यक दबाव पड़ता है और दर्द रहने लगता है। चिकित्सक की सलाह से दाँत भींचने और किटकिटाने की समस्या से निजात मिल सकती है।

मुँह से दुर्गंध आना 
अतिरिक्त तनाव के कारण मरीज का मूड भी ठीक नहीं रहता, इस वजह से वह रोज सुबह टूथब्रश वगैरह पर ध्यान नहीं दे पाता। अधिक समय तक टूथब्रश करने या कुल्ले करने जैसी आवश्यक क्रियाओं से मुँह मोड़ने से मुँह के स्वास्थ पर बुरा असर पड़ता है। मसूड़े सड़ने लगते हैं और सूज जाते हैं। यदि पायरिया पहले से ही हो तो समस्या और गंभीर हो जाती है। तनाव के कारण नियमित भोजन करने की आदतें भी बिगड़ जाती हैं। तनावग्रस्त लोग आलू की चिप्स जैसे अस्वास्थप्रद स्नैक्स खाते हैं, कोला ड्रिंक्स पीते हैं और जंकफूड खाते हैं। इसकी वजह से दाँतों में समय से पहले खराबी आने लगती है। मुँह की नियमित साफ सफाई की आदतें पुर्नस्थापित करें। नियमित कसरत करने की आदत डालें। इससे तनाव कम करने में मदद मिलेगी। कसरतों से शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली को ताकत मिलती है।

मसूड़ों की बीमारी 
एक शोध अध्ययन के मुताबिक अतिरिक्त तनाव भले ही अल्प समय के लिए ही हो लेकिन इसके कारण दाँतों में प्लॉक बनने की शिकायत होती है। लंबे समय तक तनाव बना रहे तो मसूड़ों से खून रिसने एवं जिंजीवाइटिस जैसी समस्याएं खड़ी होने का जोखिम रहता है। यह स्थिति मसूड़ों के स्वास्थ के लिए खतरनाक है। याद रखें कि नियमित रूप से संतुलित आहार लेना और दंत रोग विशेषज्ञ से समय-समय पर जाँचें कराते रहने से मुँह की सेहत भी बनी रहती है। दिन में दो बार टूथब्रश करना याद रखें। एंटीबैक्टेरियल माउथ रिंस से प्लॉक बनाने वाले बैक्टेरिया की सफाई हो जाती है। इसलिए दिन में एक बार इससे गरारे करना ना भूलें।

ताकि स्वस्थ रहें दाँत :  
पाचन क्रिया मुँह से ही शुरू हो जाती है। खाने को ठीक से पचाने के लिए इसका स्वस्थ होना काफी ज़रूरी होता है। यह खाना पचाने के लिए होता है और कार्बोहायड्रेट का पाचन भी यहीं से शुरू हो जाता है। दाँत खाने को चबाकर पचने में आसान बनाते हैं। लेकिन कई लोग इन्हें खाना चबाने के अलावा भी कई तरह के कामों के लिए उपयोग करते हैं, जिससे ये कमज़ोर पड़ने लगते हैं। दाँतों को स्वस्थ रखने के लिए इनका उपयोग कभी भी इस तरह से न करें : 

-बर्फ का चूरा करने के लिए

-प्लायर एवं हैंगर से दाँत खुरचना

-चिप्स के पैकेट खोलने के लिए

-कठ्ठी गठाने खोलने के लिए

-ट़ेढे-मेढ़े छुरी-कांटों को सीधा करने के लिए

-धूम्रपान से बचें : यह दाँतों और मुँह के लिए काफी नुकसानकारी हैं।

-हर २-३ महीने में टूथब्रश बदलते रहें।ज़्यादा समय तक एक ही ब्रश का इस्तेमाल करने से इसमें बैक्टीरिया पनपने लगते हैं।

-सुबह उठते ही व सोने से पहले दाँतों को ब्रश करना बेहद ज़रुरी है । इससे मुँह में बैक्टीरिया पनपने की दर व दाँतों पर प्लाक बनने की प्रक्रिया को नियंत्रित किया जा सकता है(सेहत,नई दुनिया,अगस्त द्वितीयांक 2012)।

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शुक्रवार, 18 मई 2012

दाँतों का रक्षाकवच है एनामल

एनामल दाँतों का रक्षाकवच होता है। इसका क्षरण कई कारणों से हो सकता है। क्षरण हो जाने के बाद यह कभी दोबारा नहीं आता है। एनामल के हटने के साथ ही दाँतों की कई समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं। कई खाद्य पदार्थ एवं पेय ऐसे हैं जिनसे दाँतों का एनामल क्षतिग्रस्त हो जाता है।  

ऐसी मान्यता है कि शक्कर दाँतों के एनामल की सबसे बड़ी दुश्मन है लेकिन यह सच नहीं है। झागदार कोला ड्रिंक्स में मौजूद एसिड दाँतों के एनामल के क्षरण के लिए सबसे अधिक ज़िम्मेदार है। इनमें फॉस्फोरिक, मैलिक, साइट्रिक और टार्ट्रिक एसिड होते हैं जो इतने शक्तिशाली होते हैं कि इनके संपर्क से धातु की ऊपरी सतह तक नष्ट हो जाती है। एक अध्ययन से मालूम हुआ है कि नींबू के स्वाद वाली झागदार ड्रिंक पीने से कोला ड्रिंक्स की बनिस्बत ५ गुना अधिक एनामल का क्षरण होता है। यह जानने की कोशिश करें कि सोडा ड्रिंक्स पीने से आपके रक्तचाप, रक्त शर्करा और रक्तवसा का क्या हाल होता है।  

स्पोर्ट्स ड्रिंक्स/एनर्जी ड्रिंक्स 
कसरतों के दौरान पानी पीते रहना महत्वपूर्ण है लेकिन कई लोग बिना करसत किए ही स्पोर्ट्स ड्रिंक्स पीते हैं। स्पोर्ट्स ड्रिंक्स के साथ पाँच अलग- अलग किस्म के कोला और फ्रूट जूस पर हुए एक शोध अध्ययन से पता चला है कि स्पोर्ट्स ड्रिंक्स से दाँतों के एनामल को सबसे अधिक नुकसान पहुँचता है।  

फलों का रस 
संतरा, सेबफल, अंगूर एवं अन्य दूसरे फलों के रस में कई तरह के एसिड शामिल किए जाते हैं, इनसे दाँतों के एनामल को ज़बर्दस्त क्षति पहुँचती है। यह सही है कि फलों के डिब्बाबंद रसों से विटामिन्स और एंटिऑक्सीडेंट्स हासिल होते हैं लेकिन इनकी मात्रा न्यूनतम रखी जा सकती है। फलों का रस घर पर तैयार किया जा सकता है। इसके अलावा फलों को ऐसे ही खाया जा सकता है ताकि दाँतों और मसूड़ों की कसरत भी हो सके। रस पीने के बाद सादे पानी से कुल्ले करें।  

सिरका 
चायनीज़ फूड के साथ सिरका भी लोकप्रिय हुआ है। एक शोध अध्ययन के मुताबिक कई बार सिरका युक्त खाद्य पदार्थ खाने से किशोर/किशोरियों के दाँतों का एनामल क्षतिग्रस्त होने के ३०-८५ प्रतिशत अवसर बढ़ जाते हैं। किशोरावस्था में दाँतों का एनामल पूरी तरह परिपक्व नहीं होता इसलिए इसके खराब होने का जोखिम अधिक होता है।  

इन आदतों से बची रहेगी आपकी मुस्कान 
-दो मुख्य भोजनों के बीच के अंतराल में नाश्ता न लें ताकि एसिड के हमलों को कम से कम किया जा सके।

-किसी भी कोला ड्रिंक को मुंह में रखकर कुल्ले जैसा न करें। इससे पेय पदार्थ अधिक देर तक दाँतों के संपर्क में रहेगा। कोला ड्रिंक्स को स्ट्रॉ से सिप करें ताकि पेय दाँतों के संपर्क में न आ सके।

-एसिड के दौरे को हानि रहित बनाने के लिए भोजन के बाद पानी से कुल्ले करें या शक्कर रहित चुईंगगम चबाएँ।

-भोजन से पहले अथवा भोजन के दौरान दूध या पनीर लेते रहें ताकि एनामल को पुनः मजबूती मिल सके।

-अगर आपने एसिड की अधिकता वाला भोजन किया हो या कोला ड्रिंक्स पिया हो तो ३० मिनट तक ब्रश न करें।

-हमेशा प्लोराइडयुक्त टूथपेस्ट से ब्रश करें। -दंत चिकित्सक से नियमित रूप से चैकअप कराते रहें।  

ताकि दाँत रहें स्वस्थ 

-सिगरेट पीना फेंफड़ों के साथ ही आपके दाँतों के लिए भी हानिकारक है। इससे दाँत पीले पड़ने लगते हैं। बहुत अधिक चाय-काफी जैसे पेय पदार्थों से भी दाँत पीले पड़ने लगते हैं।

-हर २-३ महीने में टूथब्रश बदलते रहें। ज़्यादा समय तक एक ही ब्रश का इस्तेमाल करने से इसमें बैक्टीरिया पनपने लगते हैं और दाँतों को ब्रश करने के दौरान यह आपके दाँतों में लगकर इन्हें खराब कर सकते हैं। यानी पुराने ब्रश के इस्तेमाल से दाँत साफ होने के बजाय संक्रमित हो सकते हैं।  

- ब्रश करने का सबसे अच्छा तरीका है टूथब्रश को मसूड़ों से 45 डिग्री के एंगल पर रखकर ब्रश किया जाए। ब्रश हल्के से करें,दांतों पर बहुत अधिक न घिसें। आगे-पीछे घिसने के बजाए ब्रश को दांतों पर गोलाई में घुमाएं। 

-डिटर्जेंट फूड खाएं- कुछ खाद्य पदार्थों को चबाने से दांत साफ हो जाते हैं। उदाहरण के लिए,सेवफल जिसे प्राकृतिक टूथब्रश भी कहा जाता है। इसके अलावा,आप कच्ची गाजर या पॉपकॉर्न भी चबा सकते हैं। 

-सुबह उठते ही और सोने से पहले दांतों को ब्रश करना बेहद ज़रूरी है। दांतों पर ब्लाक बनने की प्रक्रिया लार के कारण धीमी पड़ जाती है। मुंह में दिन भर थूक बना रता है,लेकिन सोने के बाद मुंह में लार नहीं बनती। इसलिए,सोने से पहले और सुबह उठते ही ब्रश करना ज़रूरी होता है(सेहत,नई दुनिया,मई द्वितीयांक 2012)

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सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

दाँत की बीमारियों के आधुनिक उपचार

दाँतों की सड़न
जब दाँतों की ऊपरी सतह अर्थात एनामल एवं डेंटीन में सड़न हो तो उसे फीलिंग करके ठीक कर दिया जाता है। आजकल कांपोजिट मटीरियल फीलिंग की जाती है। यह फीलिंग दाँत के रंग की होती है एवं इसमें ड्रीलिंग भी कम करनी पड़ती है। जब सड़न दाँत की जड़ तक पहुँच जाती है, तो मरीज को बेहद दर्द होता है। ऐसे दाँतों को रूट केनाल ट्रीटमेंट के द्वारा ठीक कर दिया जाता है। जबकि पहले दाँतों को निकाल दिया जाता था। आजकल यह ट्रीटमेंट मशीन द्वारा एक ही सिटिंग में कर दिया जाता है।

दंतविहीन मरीज 
एक या अधिक दाँत नहीं होने पर आस-पास के दाँतों का सहारा लेते हुए अत्याधुनिक जिरकोनियम का ब्रिज लगा दिया जाता है। यह पूर्णतः धातु रहित, दाँत के कलर का, भारविहीन एवं बेहद मजबूत होता है। कई मरीजों को डेंटल इम्प्लांट की सहायता से दाँत लगा दिया जाता है।

पूर्णतः दंत विहीन- मरीजों के लिए फ्लैक्सिबल डेंचर बनाया जाता है। यह गिरने पर टूटता नहीं है। जिन मरीजों को कृत्रिम दाँत की बत्तीसी नहीं पहनना है, उन्हें सर्जरी के माध्यम से फिक्स दाँत लगा दिए जाते हैं।

काले-पीले, बदरंग, बाहर निकले हुए, एक-दूसरे के ऊपर चढ़े हुए, दो दाँतों के बीच में गेप अथवा सभी दाँतों के बीच में गेप को आधुनिक चिकित्सा की मदद से पूर्णत सुंदर एवं सफेद बना दिया जाता है। 

आर्थोडोंशियाः दंत चिकित्सा की एक अतिविशिष्ट उपचार तकनीक है, जिसमें ब्रेसेस एवं स्टीनलैस स्टील के तारों का उपयोग किया जाता है। इसी से टेढ़े-मेड़े, बाहर की ओर निकले हुए, एक दूसरे पर चढ़े हुए दाँतों को एवं दाँतों के बीच गेप को पूर्णतः ठीक किया जा सकता है। स्ट्रेट वायर अत्याधुनिक तकनीक है। आजकल मेटालिक ब्रेसेस के स्थान पर सिरेमिक ब्रेसेस का चलन है। ये ब्रेसेस दाँत के कलर के होते हैं एवं दिखाई नहीं देते हैं। अत्यधिक पीले दाँतों एवं पान, तंबाकू खाने से बदरंग हुए दाँतों को ब्लीचिंग द्वारा पूर्णतः सफेद एवं चमकदार कर दिया जाता है। 

फ्लोरोसिस : देश के कई शहरों के पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण दाँतों का रंग बदरंग हो जाता है। उनमें ऊपर पीले एवं सफेद चिकत्ते दिखाई पड़ते हैं। ऐसे दाँतों को जिरकोनियम कांपोजिट लेमिनेट्स एवं सिरेमिक लेमिनेट्स से सफेद एवं सुंदर बना दिया जाता है(डॉ.लीना श्रीवास्तव,सेहत,ऩई दुनिया,फरवरी द्वितीयांक 2012)।

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सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

मसूड़े रहें दमदार,तभी मुस्कान होगी सवा लाख की

मसूड़े स्वस्थ हैं तो दांत भी स्वस्थ रहेंगे। लेकिन हम इस बात को समय रहते नहीं समझ पाते। नतीजतन मसूड़ों की समस्या पैदा हो जाती है और दांतों में भी तकलीफ होने लगती है। दांतों और मसूड़ों की इस तकलीफ से बचने के लिए शुरू से ही सावधानी बरतनी चाहिए और अगर तकलीफ शुरू हो ही जाए तो इलाज कराने में लापरवाही बिल्कुल भी न बरतें। 

दांत और मसूड़ों का स्वास्थ्य एक-दूसरे पर निर्भर करता है। अगर मसूड़े स्वस्थ नहीं होंगे तो दांत भी स्वस्थ नहीं रह पाएंगे। इसलिए स्वस्थ दांतों के लिए स्वस्थ मसूड़े बहुत जरूरी हैं। मसूड़ों के स्वास्थ्य की देखभाल बच्चों के दांत निकलने के पहले ही शुरू कर देनी चाहिए। फीडिंग कराने के बाद मसूड़ों को गीले कपड़े से साफ करना चाहिए ताकि मसूड़ों में बैक्टीरिया न पनपें। बच्चे के दांत निकलने के बाद से ही दांतों की सफाई का विशेष ध्यान रखें ताकि उनके मसूड़े स्वस्थ रहें। 

क्यों होती है यह समस्या 
मसूड़ों की बीमारी का सबसे प्रमुख खारण प्लॉक होता है। इसके अलावा कई बीमारियां जैसे कैंसर, एड्स और डायबिटीज महिलाओं में किशोरावस्था, गर्भावस्था, मोनोपॉज और पीरियड्स के समय होने वाला हार्मोन परिवर्तन भी मसूड़ों पर संक्रमण की आशंका बढ़ा देते हैं। धूम्रपान भी मसूड़ों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। वैसे मुंह की साफ-सफाई का ख्याल न रखना मसूड़ों की समस्याओं का सबसे प्रमुख कारण है। 

मसूड़ों की बीमारियां 
मसूड़ों की बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है। पर हाल के कई अध्ययनों में यह बात उभरकर आई है कि 35 वर्ष की उम्र के बाद मसूड़ों की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। इस उम्र में हर चार में से तीन लोग मसूड़ों की किसी-न-किसी बीमारी से पीड़ित होते हैं। 

सबसे आम है जिन्जीवाइटिस 
यह मसूड़ों की सबसे आम समस्या है। इसमें मसूड़े सूखकर लाल हो जाते हैं और कमजोर पड़ जाते हैं। कई लोगों में दांतों के बीच में उभरा हुआ तिकोना क्षेत्र बन जाता है जिसे पेपीले कहते हैं। इसका मुख्य कारण सफेद रक्त कोशिकाओं का जमाव, बैक्टीरिया का संक्रमण और प्लॉक हो सकता है। जिन्जीवाइटिस से बचने के लिए जरूरी है कि मुंह की साफ-सफाई का खास ख्याल रखा जाए। प्रतिदिन 1,000 मिलीग्राम विटामिन सी का सेवन इस रोग में बहुत लाभदायक है। विटामिन सी के लिए प्राकृतिक स्नोतों पर ही निर्भर रहना बेहतर होगा। 

पायरिया 
अगर ब्रश करने या खाना खाने के बाद मसूड़ों से खून बहता है तो यह पायरिया के लक्षण हैं। इसमें मसूड़ों के ऊतक सड़कर पीले पड़ने लगते हैं। इसका मुख्य कारण दांतों की ठीक से सफाई न करना है। गंदगी की वजह से दांतों के आसपास और मसूड़ों में बैक्टीरिया पनपने लगते हैं। पायरिया से बचने के लिए जरूरी है कि मुंह की सफाई का विशेष ध्यान रखा जाए। कुछ भी खाने के बाद ब्रश करने की आदत डाल लें। 

पीरियोडोंटिस 
यदि समय रहते जिन्जीवाइटिस का उपचार नहीं किया जाता है तो यह गंभीर रूप लेकर पीरियोडोंटिस में बदल जाती है। पीरियोडोंटिस से पीड़ित व्यक्ति में मसूड़ों की अंदरूनी सतह और हड्डियां दांतों से दूर हो जाती हैं और पॉकेट बन जाते हैं। दांतों और मसूड़ों के बीच स्थित इस छोटी-सी जगह में गंदगी इकट्ठी होने लगती है और मसूड़ों और दांतों में संक्रमण फैल जाता है। यदि ठीक से उपचार न किया जाए तो दांतों के चारों ओर मौजूद ऊतक नष्ट होने लगते हैं। इससे दांत गिरने लगते हैं। 

मसूड़ों का रखें ख्याल 
दिन में दो बार ब्रश करें। कुछ भी खाने के बाद कुल्ला जरूर करें। अधिक गर्म चीजें न खाएं। ज्यादा कड़क ब्रिसल वाले ब्रश से दांत साफ न करें। विटामिन ‘सी’ का सेवन अधिक करें। इसके लिए फलों और सब्जियों का सेवन करें। इससे मसूड़े स्वस्थ रहते हैं। काबरेनेटेड और अन्य पेय पदार्थों का सेवन कम करें। 

डायबिटीज भी बड़ा कारण 
दांत और मसूड़ों की समस्या किसी को भी हो सकती है, लेकिन डायबिटीज के मरीजों में इसकी आशंका अधिक रहती है। ऐसे मरीजों में ब्लड ग्लूकोज का स्तर अधिक होता है। इससे दांतों पर जमे प्लॉक में बैक्टीरिया तेजी से पनपने लगते हैं। इससे मसूड़े कमजोर हो जाते हैं। ब्लड ग्लूकोज का स्तर यदि हमेशा ज्यादा बना रहता है तो दांतों के गिरने की आशंका भी बढ़ जाती है। अगर 45 वर्ष से अधिक उम्र के डायबिटीज से पीड़ित व्यक्ति धूम्रपान करते हैं तो उनका दांत और मसूड़ों की बीमारी से बचना लगभग असंभव हो जाता है(शमीम खान,हिंदुस्तान,दिल्ली,25.1.12)।

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बुधवार, 14 दिसंबर 2011

मुंह की सफाई का खयाल रखना है जरूरी

संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए दांतों का स्वस्थ होना भी बेहद जरूरी है। दांत न केवल हमारे स्वास्थ्य को, बल्कि लुक को भी प्रभावित करते हैं, इसलिए मुंह में होने वाली किसी भी समस्या को नजरअंदाज न करें। मुंह की समस्याओं से बचने के लिए सिर्फ ब्रश करना ही काफी नहीं होता। मुंह की स्वच्छता के लिए दांतों की नियमित जांच भी जरूरी है। 

हाल ही में हुए कुछ सर्वेक्षणों से ये पता चला है कि मुंह की स्वच्छता का नाता हमारे पूर्ण स्वास्थ्य से होता है। आमतौर पर लोग मुंह की स्वच्छता का मतलब सिर्फ दांतों की सफाई, ताजा सांसों से ही लेते हैं, लेकिन इसका अर्थ है मुंह की अच्छी तरह से सफाई रखना। मुंह स्वच्छ न होने पर दांतों के आस-पास प्लाक व टारटर जमा होने लगता है, जो दांतों के लिए बेहद हानिकारक साबित होता है। 

अगर मुंह में होने वाली समस्या का ध्यान न रखा जाए तो इसका असर पूरी सेहत पर पड़ता है। तभी तो कहा जाता है कि व्यक्ति की सेहत का खुलासा उसके दांतों से ही हो जाता है। अध्ययन बताते हैं कि मुंह की समस्या की वजह से स्ट्रोक, दिल की बीमारियां, डायबिटीज, ओरल कैंसर, पाचन से संबंधित बीमारियां, आंत की बीमारियां, बैक्टीरियल निमोनिया और पेरियोडोन्टिस से ग्रसित गर्भवती महिलाओं को तो बच्चों को जन्म देने में कई परेशानियां तक हो सकती हैं। मुंह के संक्रमण का शरीर की अन्य बीमारियों से कोई न कोई संबंध जरूर होता है। मसूढ़ों से खून आना, मसूढ़ों की बीमारियां, मुंह से दरुगध आना, मुंह का स्वाद बिगड़ना आदि कई तरह के संक्रमण से अन्य बीमारियां हो सकती हैं। मुंह में या दांतों और दांतों के आस-पास पाए जाने वाले बैक्टीरिया खून में शामिल होकर बीमारियां फैलाते हैं और शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं। 

कई रोगों का कारण है यह -
दांतों में मौजूद बैक्टीरिया के कारण मसूढ़ों का संक्रमण होता है, जिससे अर्थेस्कनलेरॉसिस नामक हृदय रोग हो सकता है। 

 -पाचन प्रक्रिया मुंह में कई रासायनिक प्रतिक्रियाओं के साथ शुरू होती है। अगर हमारे दांत हमारे भोजन को अच्छी तरह से चबाने में असफल रहेंगे तो आंत भी ठीक ढंग से भोजन पचाने में असमर्थ रहेगी। ऐसे में पाचन संबंधी कई विकारों की आशंका बढ़ जाती है। 

 -एक रिसर्च से पता चला है कि जिनके मसूढ़ों में सूजन या रक्त निकलने की समस्या होती है, उनकी स्मरणशक्ति या कॉग्निटिव स्किल कमजोर हो सकती है। 

 -व्यक्ति की मुस्कान ही उसकी सबसे पहली अभिव्यक्ति होती है। यदि ऐसे में दांत स्वस्थ नहीं होंगे तो व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी होना स्वाभाविक है। 

-अगर किसी व्यक्ति को उच्च रक्तचाप की समस्या है तो उसके पीरिओडेंटल से पीड़ित होने की आशंका भी अधिक होती है। 

 -कमजोर दांतों और अन्य ओरल प्रॉब्लम्स की वजह से विभिन्न प्रकार के संक्रमणों का खतरा अधिक होता है। मसूढ़ों की बीमारी और आर्थराइटिस के बीच भी गहरा संबंध होता है। ऑटोइम्यून दांतों की वो बीमारी है, जिसके कारण शरीर के जोड़ों में सूजन व दर्द जैसी शिकायतें होने लगती हैं। 

सबसे ज्यादा समस्या 
-दांतों में कैविटी 
-मसूढ़े की समस्या 
-विटामिन की कमी 
-ओस्टियोपोरोसिस 
-डायबिटीज या ओरल कैंसर 

बचाव के उपाय 
-फ्लॉस या किसी और प्रकार के इंटरडेंटल क्लीनर से एक बार दांत जरूर साफ करें। 

-डेंटिस्ट से संपर्क करके मुंह की स्वच्छता के लिए एंटीमाइक्राबियल माउथरिंज का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। 

-संतुलित भोजन लें और फास्ट फूड का कम सेवन करें। 

-दांतों की नियमित जांच कराएं। इससे आपका समय, पैसा तो बचेगा ही, साथ ही आप मुंह में होने वाली समस्याओं से भी सुरक्षित रहेंगे। 

-दांतों से कैलकलस या टारटर हटाने के लिए प्रोफेशलन क्लीनिंग का सहारा लें। इससे प्लेग के बैक्टीरिया भी निकल जाते हैं। 

-तंबाकू का सेवन न करें, इससे ओरल कैंसर होने का खतरा बना रहता है। 

-हमेशा सॉफ्ट टूथब्रश का इस्तेमाल करें, नहीं तो इससे आपके मसूढ़े छिल जाएंगे और जख्म से खून आने लगेगा। 

-काबरेनेटिड और अन्य पेय पदार्थो का सेवन भी कम करें। 

-ज्यादा से ज्यादा पानी पीएं। इससे मुंह की दरुगध कम होती है। दूध, चाय, कॉफी आदि में कम चीनी डालें। 

-मुंह की ड्राइनेस को कम करने के लिए शुगर फ्री गम चबाएं, ताकि स्लाइवा बनता रहे। 

 -खाने के बीच में स्नैक्स आदि न लें। 

-ऐसी कोई दवा न लें, जिससे दांतों का क्षरण हो। कोई भी दवा लेने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें(मृदुला भारद्वाज,हिंदुस्तान,दिल्ली,7.12.11)।

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सोमवार, 12 दिसंबर 2011

क्यों लगता है दांतों में ठंडा-गरम?

दाँतों में ठंडा गरम लगना एक बहुत आम समस्या है। हाजमा दुरुस्त नहीं रहने के कारण एसिडिटी इसकी एक बड़ी वजह है। बहुत अधिक एसिडिटी हो जाने पर पेट का एसिड खट्टे पानी के रूप में मुँह में आता रहता है। कैल्शियम से बने दाँत की परत एसिड के संपर्क में आने से गलने लगती है। दाँत का सुरक्षा कवच गलकर निकल जाने से ही दाँतों में ठंडा या गरम महसूस होता है। 

खाने-पीने की खराब आदतों एवं बढ़ते तनाव की वजह से एसिडिटी बढ़ती चली जा रही है। साथ ही सवाल उठता है कि दाँत में ऐसा क्या हो जाता है कि उसे ठंडा पानी बर्दाश्त नहीं होने लगता है। दाँत के भीतर के संवेदनशील भागों की रक्षा के लिए सबसे ऊपर एक परत होती है जिसे एनेमेल कहते हैं। लेकिन हमारी विभिन्न बुरी आदतों की वजह से वह परत पतली होती चली जाती है। एनेमेल के भीतर की परत को डेंटीन कहते हैं। डेंटीन तक तो ठीक है लेकिन जैसे ही डेंटीन की परत घिस जाती है तो पल्प आ जाता है जिसके भीतर नर्व (तंत्रिका) होता है। जब डेंटीन का आवरण भी घिस कर खत्म हो जाता है तो फिर नर्व के पानी के संपर्क में आने से इसमें दर्द होने लगता है। खाने, पीने, चबाने की अपनी खराब आदतों से दाँत की रक्षा के लिए बनी ऊपरी परत को नुकसान पहुँचाने वालों के लिए भारी कष्ट का मौसम आ गया है। जाड़े में इन "नंगे" हुए दाँतों को जो ठंड लगती है, उसके दर्द से पूरा शरीर सिहर उठता है। सुबह उठते ही ठंडे पानी से कुल्ला करते ही दाँत में दर्द होने लगता है। 

दाँतों के लिए ऊपरी परत समझिए एक "स्वेटर" की तरह ही है। कोल्ड ड्रिंक्स भी इस समस्या की वजह बन रही है। कोल्ड ड्रिंक्स (सभी एयरेटेड ड्रिंक्स) में भी अम्ल होता है। वह भी एनेमेल को एसिडिटी की तरह ही नुकसान पहुँचाता है। आज कल छोटे-छोटे बच्चे इस समस्या के साथ आने लगे हैं। 

नींबू और संतरे के रस भी एनेमेल को नुकसान पहुँचाते हैं, लेकिन उतना नहीं। सुपारी खाने की आदत से भी दाँत घिस जाते हैं। बहुत लोग होते हैं जो दिन भर सुपारी चबाते रहते हैं। इससे एनेमेल घिस जाता है। बहुत पान खाने वाले जब पान खाना छोड़ देते हैं तो उनको दाँतों में ठंडा लगने लगता है। 

कई तरह से लगती है सुरक्षा कवच में सेंध 
दरअसल होता यह है कि पान के साथ सुपारी चबाते रहने से उनका नर्व तो बाहर निकल आता है। लेकिन कत्थे की परत पानी से नर्व को बचाती रहती है। पान खाना छोड़ते ही पानी सीधे नर्व के संपर्क में आ जाता है। कुछ लोगों को नींद में दाँत किटकिटाने की आदत होती है। इससे भी एनेमेल झड़ता है। हमेशा च्यूंगम चबाते रहने, पेंसिल चबाते रहने से जैसी आदतें भी एनेमेल को क्षति पहुंचती है। सबसे पहले,एनेमल घिसने के कारणों पर रोकथाम लगाएं। दवायुक्त टूथपेस्ट का प्रयोग करने से 60 प्रतिशत लोगों की यह समस्या इससे ही खत्म हो जाती है। माउथवाश भी फायदा करता है। डेंटीन के बाहर आ जाने पर फिलिंग कराना ज़रूरी होता है लेकिन जब डेंटीन की परत भी खत्म होकर नर्व बाहर आ जाता है,ते रूट कैनाल नामक इलाज़ कराना पड़ता है। 

इसे भी आजमाएं


विशेष टूथपेस्ट : संवेदनशील दाँतों के लिए विशेष टूथपेस्ट उपलब्ध हैं। साधारण टूथपेस्ट के बजाय इनका उपयोग करें। व्हाइटनरयुक्त टूथपेस्ट का उपयोग नहीं करें, यह दाँतों पर कठोरता से काम करते हैं। इनसे तकलीफ बढ़ जाती है।

ब्रश हो नरम : सॉफ्ट या एक्स्ट्रा सॉफ्ट ब्रश का ही उपयोग करें। कड़क ब्रिसल्स से दाँत घिसने लगते हैं। दाँत संवेदनशील होने पर अक्सर लोगों को ब्रश करते हुए दर्द उठता है। कड़क ब्रिसल्स प्राकृतिक रूप से होने वाली मरम्मत के काम में भी अवरोध पैदा करते हैं। दातों पर हल्के से ऊपर-नीचे ब्रश करें। ब्रश करने का तरीका ग़लत होने पर भी संवेदनशीलता बढ़ जाती है।  

खाना हो सामान्य ताप पर 
अधिक ठंडी या गर्म चीज़ें खाना पूरी तरह बंद कर दें। ठंडी और गर्म दोनों ही प्रकार की चीज़ें संवेदनशील दांत सहन नहीं कर सकते। इसलिए,यह सुनिश्चित कर लें कि आप जो भी खाएं वह सामान्य तापमान पर हो। नमक के पानी से कुल्ला करना दांत का दर्द दूर करने का एक आम उपाय है। लेकिन संवेदनशील दांतों में जो दर्द होता है,उस पर यह असरकारी नहीं रोता। उल्टा,इससे दर्द और बढ़ सकता है। 

एसिडिक चीज़ों से बचें 
मिठाइयां,नींबू,टमाटर,सॉफ्ट ड्रिंक और ऐसे अन्य अम्लीय चीज़ें न लें। यह दांतों को हुए नुक़सान को और बढ़ा देते हैं(डॉ. अनुपम भार्गव,सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर प्रथमांक 2011)

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बुधवार, 23 नवंबर 2011

कहीं आपके बच्चे को कैरीज़ तो नहीं?

बच्चों का पहला दाँत निकलने से ही कैरीज़ यानी दाँतों की सड़न की शुरुआत हो जाती है। अक्सर पालक भ्रमित रहते हैं कि इतने छोटे बच्चे के दाँतों की सड़न तो दूध के दाँत टूटने के साथ ही दूर हो जाएगी। कैरीज़ की समस्या लंबे समय तक पीछा नहीं छोड़ती। इससे निजात पाने के लिए समुचित इलाज के साथ-साथ मुँह की स्वच्छता पर लगातार ध्यान देने की जरूरत होती है। 

कैरीज या दाँतों में सड़न की शुरुआत बच्चे के पहला दाँत निकलने के साथ ही हो जाती है। पहला दाँत निकलने के साथ ही गीले कपड़े से रोज साफ किया जाना चाहिए। जब कुछ और दाँत निकल आएँ तो बहुत ही सॉफ्ट और छोटे ब्रश से साफ-सफाई की जा सकती है। बच्चा जब दो साल का हो जाए तब फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट से ब्रश कराया जा सकता है लेकिन इसके लिए दंत रोग विशेषज्ञ की सलाह जरूर ली जानी चाहिए। फ्लोराइड दाँतों की सड़न का मुकाबला करने में सक्षम होता है लेकिन इसके लिए पेस्ट की मात्रा बहुत ही कम रखनी चाहिए। छः साल से कम उम्र के बच्चे पेस्ट निगल भी सकते हैं। बच्चे को अपनी निगरानी में पेस्ट कराएँ और उन्हें यह आदत डलवाएँ कि ब्रश करने पर निकले झाग को थूकना है। बाद में अधिक पानी से कुल्ला भी करना है। सुबह और रात को सोते समय बच्चे को अपनी निगरानी में ब्रश कराएँ। शिशु के मुँह की स्वच्छता पर नज़र रखना अच्छा होता है। इसके लिए किसी विशेष ज्ञान की नहीं बल्कि सतर्कता की जरूरत होती है। 

बच्चे को दंत चिकित्सक के पास ले जाएँ 
 बच्चे हमेशा किसी रोल मॉडल की तलाश में रहते हैं। बच्चों के रोल मॉडल आप खुद हो सकते हैं। बच्चों के साथ खुद भी ब्रश करें। हर छः महीने में डेंटिस्ट का अपनाइंटमेंट लें। बच्चों को नियमित रूप से डेंटिस्ट के पास ले जाएँ। समय-समय पर बच्चे का मुँह खोलकर खुद ही उसके दाँत और मसूड़ों की खुद जाँच करें। दाँतों और मसूड़ों में दिखाई देने वाली असामान्यता आपकी नजरों से चूक भी जाए तो छः महीने बाद दंत चिकित्सक की सेवा मिल ही सकेगी। ऐसे में सड़न के गंभीर होने से पहले ही बच्चा दंत चिकित्सक के पास पहुँच जाएगा। अक्सर देखा गया है कि जो लोग बचपन में चेकअप के लिए भी दंत चिकित्सकों के पास नहीं जाते, वयस्क होने पर भी इनसे दूरी बनाए रखते हैं। सामान्यतौर पर लोग दंत चिकित्सा कराते समय सहज नहीं रह पाते(डाक्टर लीना श्रीवास्तव,सेहत,नई दुनिया,नवम्बर तृतीयांक 2011)। 

शाम चार बजे जानिएः 


क्या है मोटापे से छुटकारा दिलाने वाली बैरिएटिक सर्जरी

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मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

मुंह की दुर्गंध से ऐसे बचें

मुंह से निकली"खुशबूदार" हवा से कार चलाते किसी युवक पर कड़क युवती ट्रैफिक पुलिस अधिकारी के लट्टू हो जाने का दृश्य विज्ञापन के लिए तो ठीक है लेकिन वास्तविकता उतनी खुशगवार नहीं है । मुंह से बदबू न निकले, इसकी सारी कोशिशों पर भी जब पानी फिर जाता है तो समझ में आता है कि यह रोमांटिक दृश्य कितना कठिन है । आप सोचते हैं कि मैं नियमित ब्रश करता हूं, देर तक करता हूं लेकिन फिर भी यह बदबू पीछा नहीं छोड़ती । ऐसा इसलिए होता है कि आपके मुंह में ऐसे कई ठिकाने छूट जाते हैं जहां ब्रश पहुंच ही नहीं पाता । इसलिए मुंह की "रेकी"(टोह लेने) करने की जरूरत है । अब उन ठिकानों के "मार्कर" के रूप में गोलियां आ गई हैं । उन्हें चूस कर कुल्ला करें,बदबू के इन ठिकानों का भंडाफोड़ हो जाएगा । जहां-जहां गुलाबी रंग उभर आए समझिए वहां आपके ब्रश कभी पहुंचते ही नहीं । इनकी टोह नहीं ली तो रोज ब्रश कर मुंह के बदबू दूर करने की सारी कोशिशों पर पानी फिरेगा ही । कहते हैं न कि एक सड़ा आम पूरी टोकरी आम को खराब कर देता है ।

बात करते हुए आपके मुंह से निकली बदबू सामने वाले का मूड बिगाड़ देती है । फिर वह बीवी हो, प्रेमिका हो, बॉस हो या कोई भी, आपको मुंह लगाने से बिदकेंगे । आप सामाजिक संबंधों में "मुंह की न खाएं" इसलिए मुंह की बदबू के इलाज को प्राथमिकता दें । ठीक से ब्रश करना पहला तरीका तो है ही लेकिन यह रोग कभी-कभी इतना गंभीर होता है कि सर्जरी तक करने की जरूरत पड़ जाती है । सर्जरी से मसूड़ों में बने बदबू के पॉकेटों को हटाना पड़ता है । ऐसे एंटीबॉयटिक गोलियां भी आ गई हैं जो बैक्टीरिया मार कर बदबू से छुटकारा दिलाती हैं । ताजा है लेजर तकनीक लेकिन नियमित ब्रश का कोई विकल्प नहीं । डेंटिस्ट मरीज को सही तरह से ब्रश करने की ट्रेनिंग जरूर दें।

पेट के रोगों का संकेत है मुंह की दुर्गंध
श्वास में बदबू एक सामान्य परेशानी है । इसे चिकित्सा की भाषा में हालिटोसिस भी कहते हैं । दरअसल, श्वास में बदबू कई कारणों से हो सकती है । ज्यादातर मामलों में दांतों में सड़न, मसूड़ों से खून आना (पायरिया), मुंह में घाव, पेट की खराबी, एसिडिटी, पेट के रोग आदि वजहों से हालिटोसिस हो सकता है ।

दांतों पर प्लैक जमने से भी मुंह से बदबू आती है । इसकी वजह बैक्टीरिया होते हैं । कभी-कभी दांतों में खाए गए भोजन के कण फंसे रह जाते हैं और सड़कर वहीं बदबू पैदा करते हैं । दूसरी प्रमुख वजह है अपच या इनडाइजेशन । उपरोक्त सभी स्थितियों में मुंह या सांस से बदबू आती रहती है । इस बदबू से बचने के लिए लोग मुंह में सौंफ,पान मसाला या माउथ फ्रेशनर का इस्तेमाल करते हैं लेकिन यह उचित नहीं है । श्वास में बदबू को पेट अथवा मुंह के रोगों के लक्षण के रूप में देखना चाहिए । यदि श्वास की बदबू के साथ मुंह से खून आए या खून की उलटी हो, दांतों व मसूड़ों से लगातार खून आए और मसूडों में सूजन हो तो शीघ्र चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए ।

श्वास में सामान्य बदबू को दांतों व मसूड़ों की नियमित सफाई और देखभाल से ठीक किया जा सकता है । आजकल विभिन्न प्रकार के टूथपेस्ट भी दांतों को खराब करने के लिए जिम्मेदार हैं । हाल के वैज्ञानिक सर्वेक्षण में भारत में प्रयुक्त लगभग ८५ प्रतिशत टूथपेस्ट को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताया गया है । दांतों व मसूड़ों के स्वास्थ्य के लिए इनकी नियमित उंगली से मालिश एवं इन पर पिसा हुआ काला नमक व सरसों के तेल का लेप लगाना चाहिए । मसूड़ों के स्वास्थ्य के लिए नियमित विटामिन सी एवं बी कॉम्पलेक्स वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए । खट्टे रसदार फलों में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में होता है ।

यदि आप होम्योपैथिक दवाओं का सेवन करना चाहते हैं तो मुंह व श्वास में बदबू की मुख्य वजह का पता लगाकर रोग लक्षणों के आधार पर दवा ले सकते हैं । प्रमुख होम्योपैथिक दवाओं में बैप्टिशिया, आर्सेनिक अल्ब, क्रियोजोटम, मक्यूरियस सोल, इमेटिन, नाइट्रिक एसिड, फास्फोरस, सोराइनम, एल्फ्यूरिक एसिड, नक्सवोमिका, सल्फर आदि अच्छी व लाभकारी दवाएं हैं लेकिन इनमें से आपके लिए किसी कारगर दवा के लिए आपके होम्योपैथिक चिकित्सक ही परामर्श दे सकते हैं । लक्षणों का गंभीर अध्ययन करके ही आपकी रामबाण होम्योपैथिक दवा निर्धारित की जा सकती है इसलिए अपने होम्योपैथिक चिकित्सक से जरूर परामर्श करें ।


न करें नज़रंदाज़
सांसों की दुर्गंध के लिए मूल रूप से चार अंगों की समस्याओं को उत्तरदायी माना जाता है - मुंह, गला व पेट। ऐसे में इनसे संबंधित रोगों की सही समय पर पहचान और चिकित्सा बहुत आवश्यक है । हो सकता है कि सांस की बदबू भी इनसे संबंधित ही किसी रोग का लक्षण हो । सबसे पहले बात करते हैं मुंह से संबंधित रोगों की जिसकी वजह से भी सांसों में दुर्गंध हो सकती है । यदि मसूड़ों से अचानक खून बहे (पायरिया), मसूड़ों में सूजन, दांतों में कीड़ा, मसूडों में पस भर जाना आदि समस्याओं से भी मुंह व सांस से बदबू आ सकती है । जीभ की नियमित सफाई न होने से भी यह समस्या होती है । जीभ में सूजन, पस या संक्रमण से भी यह समस्या होती है । गले से संबंधित समस्याओं में संक्रमण, कफ व फेफड़ों में संक्रमण जैसी समस्याओं के कारण भी सांसों में बदबू होती है । इसी प्रकार पेट की गड़बड़ी भी मुंह व सांसों से दुर्गंध आने की बड़ी वजह है ।

सांसों में दुर्गंध अपने आप में समस्या तो है ही, साथ ही कई अन्य रोगों का संकेत भी है इसलिए इसकी उपेक्षा न करें । प्रतिदिन कैविटी हटाने के लिए दांतों की साफ-सफाई व गरारे करें । पेट व मुंह के रोगों की पर्याप्त चिकित्सा करवाएं । दिन में दो बार ब्रश करें व दांतों की मसाज करें । अधिक समस्या हो तो भोजन करने के बाद भी ब्रश करें । जीभ हमेशा साफ रखें । पेट से संबंधित किसी भी समस्या को गंभीरता से लें और सही समय पर उसका उपचार करवाएं (वैशाली स्थित पुष्पांजलि क्रॉसले के अत्याधुनिक सेंटर डेंटल ऑप्टिमा प्लस एवं प्रीत विहार,दिल्ली स्थित डेंटल प्लस की प्रमुख, वुमेन डेंटल काउंसिल की उपाध्यक्ष और कॉस्मेटिक व इंप्लांट डेंटिस्ट्री की जानी-मानी हस्ती डाक्टर मीरा वर्मा से धनंजय की बातचीत तथा एमडी व राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त होम्योपैथिक चिकित्सक और "द हेरिटेज" पत्रिका के प्रधान संपादक डॉ. ए.के. अरूण से प्रियंका पांडेय पाडलीकर की बातचीत तथा आयुर्वेद में एमबीबीएस की उपाधि प्राप्त डाक्टर आकाश परमार के विचारों पर आधारित यह आलेख संडे नई दुनिया के 2 अक्टूबर,2011 अंक में प्रकाशित है) ।

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मंगलवार, 30 अगस्त 2011

कई ब्रांडेड टूथपेस्ट भी हैं दांतों के लिए खतरनाक

सोने से पहले और सुबह उठकर दांतों की सफाई करने की डॉक्टर सलाह देते हैं, लेकिन बार-बार टूथपेस्ट के इस्तेमाल से दिल्लीवालों के दांत कमजोर हो रहे हैं। दरअसल, बाजार में बिक रहें कई ब्रांडेड टूथपेस्ट में मानक से तीन सौ गुना अधिक तक निकोटीन और फ्लोराइड पाया गया है। यह खुलासा दिल्ली इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल साइंस एंड रिसर्च (डिप्सार) के एक अध्ययन में हुआ है। डिप्सार ने दिल्ली और एनसीआर में बिक रहे उत्पादों का तीन बार सर्वे किया। वर्ष 2008 और 2009 के बाद इसी वर्ष, यानि 2011 में बाजार में बिक रहे उत्पादों पर अध्ययन किया गया। डिप्सार के प्रिंसिपल डॉ.एसएस अग्रवाल ने बताया कि इस बार टूथपेस्ट में निकोटीन के साथ-साथ फ्लोराइड की मात्रा की भी जांच की गई। इसमें पाया गया है कि लगभग सभी बड़ी कंपनियों के उत्पादों में फ्लोराइड की मात्रा तय मानक से काफी ज्यादा है। उन्होंने बताया कि 0.5-1 पीपीएम तक फ्लोराइड का इस्तेमाल सुरक्षित माना जाता है, लेकिन एक नामी ब्रांड के टूथपेस्ट में 2400 पीपीएम और एक अन्य बड़े ब्रांड में 1800 पीपीएम फ्लोराइड पाया गया है। डॉ. अग्रवाल कहते हैं कि इस वर्ष बाजार से 10 ब्रांड के उत्पादों को एकत्र किया गया था। इनमें से छह में निकोटीन पाया गया। एक ब्रांड के उत्पाद में तो 16 मिलीग्राम तंबाकू मिला जो 8 सिगरेट के बराबर है। गौरतलब है कि वर्ष 2008 में 8 ब्रांड के सैंपल लिए गए थे, जिनमें से 4 में निकोटीन पाया गया था। चिंताजनक बात यह है कि इन उत्पादों के पैकेट पर कोई भी खतरनाक चेतावनी के चित्र (पिक्टोरियल वार्निग) नहीं दिए गए थै, जबकि यह कानूनी रूप से गलत है। वर्ष 2009 में की गई अध्ययन में चार ब्रांडों के उत्पाद बाजार से उठाए गए थे, जिनमें से दो ब्रांड के उत्पादों में निकोटीन पाया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि जिन कंपनियों ने अपने टूथपेस्ट में 2009 में तंबाकू का इस्तेमाल बंद कर दिया था तो उन्होंने 2011 में दोबारा इस्तेमाल शुरू कर दिया। डॉ. आरएन कालरा कहते हैं कि निकोटीन किसी को भी किसी उत्पाद का आदी बना सकता है। फ्लोराइड से दांत और हड्डियां कमजोर हो सकती हैं। डॉ. कालरा कहते हैं कि लंबे समय तक फ्लोराइडयुक्त पदार्थो के इस्तेमाल से अपंगता तक हो सकती है(धनंजय कुमार,दैनिक भास्कर,दिल्ली,29.8.11)।

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शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

पायरिया में करें सरसों तेल की मालिश

पायरिया रोग मुख में होने वाला बहुत ही कष्टदायक रोग है। दांतों की ठीक प्रकार से सफाई न रखने के कारण यह रोग होता है जिसमें रोगी के दांत सड़ने लगते हें और मुख से दुर्गध आने लगती है। यदि इस रोग की शुरुआत हुई हो तो आयुर्वेद के कुछ घरेलू उपचार से बहुत लाभ मिलता है। सुबह दातुन या ब्रश करने के बाद राई का तेल और नमक मिलाकर उंगली से दांत व मसूड़ों पर धीरे-धीरे मालिश करें। इससे पायरिया में बहुत लाभ मिलेगा। पायरिया होने पर यदि मसूड़ों से खून आता हो तो नींबू के रस को मसूड़ों पर मलने से बहुत फायदा होता है। देशी घी में कपूर मिलाकर दांतों पर मालिश करें और लार गिराते रहें, ऐसा करने से इस रोग में आराम मिलता है। रेड़ी का तेल दो सौ मिली ग्राम, बांस कपूर का चूर्ण पांच ग्राम और सौ मिली ग्राम शहद मिलाकर उंगली से दांतों पर मले। इससे रोग में काफी फायदा होगा। इसके अलावा सेंधा नमक मैदे की तरह बारीक पीसकर कपड़े से छान लें। ऐसा नमक दो ग्राम लेकर चार गुना सरसों के तेल में मिला लें और फिर उंगली से मसूड़ों की रोजाना मालिश करें। इसके बाद गुनगुने पानी से कुल्ला कर लें। इस विधि को कुछ दिनों तक लगातार करने से पायरिया में बहुत लाभ होता है और दांत साफ व मजबूत होते हैं। साथ ही दांतों के कीड़े नष्ट हो जाते हैं। रात को नमक के पानी से गरारे करने और सुबह नीम की दातुन नियमित करते रहने से दांतों का कोई रोग नहीं होता। पायरिया से बचने के लिए दांतों की सफाई रखनी चाहिए और अधिक गर्म व ठंडे पदार्थो का सेवन करने से बचना चाहिए। गर्म खाना खाने के बाद ठंडा पानी न पिएं। आयुर्वेद में पंचकर्म के अंतर्गत नस्य कर्म इसमें बहुत लाभकारी है(डॉ. सर्वाश मालवीय,दैनिक जागरण,लखनऊ,18.2.11)

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शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

दांतों की सफाई-2

1 फरवरी,2011 के आलेख में आपने पढ़ा दांतों की सफाई के बारे में। आज पढ़ें आगे..
- माउथवश मुंह में अच्छी खुशबू का अहसास कराता है। हाइजीन के लिहाज से अच्छा है, लेकिन इसका ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

- दांतों पर जमा गंदगी को साफ करने के लिए स्केलिंग और फिर पॉलिशिंग की जाती है। यह हाथ और अल्ट्रासाउंड मशीन दोनों तरीकों से की जाती है। चाय, कॉफी, पान और तंबाकू आदि खाने से बदरंग हुए दांतों को सफेद करने के लिए ब्लीचिंग की जाती है। दांतों की सफेदी करीब डेढ़-दो साल टिकती है और उसके बाद दोबारा ब्लीचिंग की जरूरत पड़ सकती है।

- हर छह महीने में एक बार दांतों की पूरी जांच करानी चाहिए।

- सुंदर दांतों से जहां मुस्कराहट अच्छी होती है, वहीं मुस्कराहट से दांत अच्छे बनते हैं। तनाव दांत पीसने की वजह बनता है, जिससे दांत बिगड़ जाते हैं। तनाव से एसिड भी बनता है, जो दांतों को नुकसान पहुंचाता है।

- मीठी और स्टार्च आदि की चीजें कम खाएं और बार-बार न खाएं। मीठी चीजें खाने के बाद कुल्ला करें या ब्रश करें।

- मसूड़ों और दांतों की ढंग से सफाई न होने और उनमें सड़न व बीमारी होने पर मुंह से बदबू आती है। कुछ मामलों में पेट खराब होना या मुंह की लार का गाढ़ा होना भी इसकी वजह होती है। लौंग, इलायची चबाने से इससे छुटकारा मिल जाता है। थोड़ी देर तक शुगर-फ्री च्यूइंगगम चबाने से मुंह की बदबू के अलावा दांतों में फंसा कचरा निकल जाता है और मसाज भी हो जाती है।

बच्चों के दांतों की देखभाल: छोटे बच्चों को चॉकलेट और च्यूइंगम न खिलाएं। खाएं भी तो तुरंत कुल्ला करें। बच्चों को अंगूठा न चूसने दें। इससे दांत टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं। डेढ़ साल की उम्र से ही अच्छीतरह ब्रशिंग की आदत डालें। छह साल से कम उम्र के बच्चों को फ्लोराइड वाला टूथपेस्ट न दें।

कृत्रिम दांत: कृत्रिम दांतों को गीला रखना चाहिए। रोजाना इन्हें साफ भी करें। इन्हें गर्म पानी में नहीं डालना चाहिए, केवल कड़े बाल वाले ब्रश से साफ करें और बोरिक एसिड घोल या अन्य रोगाणुनाशक घोल में रखें। टूटे दांतों को इस्तेमाल न करें। नए दांत लगाने के बाद कुछ देर बोलने का अभ्यास करें। यदि दांत खटकें तो धीरे-धीरे बोलना चाहिए(हिंदुस्तान,दिल्ली,2.2.11)।

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मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

दांतों की सफाई-1

हमारे शरीर का अनमोल अंग हैं दांत। इन्हें स्वस्थ रखना उतना ही जरूरी है जितना कि शरीर के किसी भी अन्य अंग को। आइए, आज जानते हैं कि दांत को किन उपायों से साफ रखा जा सकता है।

आमतौर पर लोग जिस तरह से दांत साफ करते हैं , उससे 60-70 फीसदी ही सफाई हो पाती है। दांत को सही तरीके से ब्रश करके या दातुन इस्तेमाल करके साफ रखा जा सकता है। दांतों को हमेशा हल्के दबाव से धीरे-धीरे साफ करें। दांतों को तीन-चार मिनट ब्रश करना चाहिए। मुंह में एक तरफ से ब्रशिंग शुरू कर दूसरी तरफ जाएं। ऊपर के दांतों को नीचे की ओर और नीचे के दांतों को ऊपर की ओर ब्रश करें। दांतों के बीच में फंसे कणों को जरूर निकाले, इसमें 7-8 मिनट भी लगते हैं तो आलस्य न करें। दांतों और मसूड़ों के जोड़ों की सफाई भी ढंग से करें। उंगली या ब्रश से धीरे धीरे मसूड़ों की मालिश करने से वे मजबूत होते हैं। दांतों को बहुत जोर से न रगड़ें, इससे दांत घिस जाते हैं। इसके अलावा, माउथवॉश का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यों तो हर बार खाने के बाद ब्रश करना चाहिए, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। ऐसे में दिन में दो बार तो ब्रश जरूर करें और खाने के बाद कुल्ला भी करें।
- जीभ को टंग क्लीनर और ब्रश, दोनों से साफ किया जा सकता है। टंग क्लीनर का इस्तेमाल इस तरह करें कि खून न निकले।
- ब्रश सॉफ्ट और आगे से पतला होना चाहिए। करीब दो-तीन महीने में या फिर जब ब्रसल्स फैल जाएं, तो ब्रश बदल देना चाहिए।
- दांतों की सफाई में टूथपेस्ट की ज्यादा भूमिका नहीं होती। यह एक मीडियम है, जो लुब्रिकेशन, फमिंग और फ्रेशनिंग का काम करता है। असली एक्शन ब्रश करता है, लेकिन फिर भी अगर टूथपेस्ट का इस्तेमाल करें, तो उसमें फ्लोराइड होना चाहिए। यह दांतों में कीड़ा लगने से बचाता है। पिपरमिंट वगैरह से ताजगी का एहसास होता है। टूथपेस्ट मटर के दाने जितना लेना काफी होता है।
- टूथपाउडर और मंजन के इस्तेमाल से बचें। टूथपाउडर बेशक महीन दिखता है, लेकिन काफी खुरदुरा होता है। टूथपाउडर करें तो उंगली से नहीं, बल्कि ब्रश से।
- नीम के दातुन में बीमारियों से लड़ने की क्षमता होती है, लेकिन यह दांतों को पूरी सफाई नहीं करता। विकल्प ब्रश ही है। दातुन से पहले उसे अच्छी तरह चबाएं। अगला हिस्सा नरम हो तो उसमें दांत धीरे-धीरे साफ करें। सख्त दातुन दांतों पर जोर-जोर से न रगड़ें(हिंदुस्तान,दिल्ली,31.1.11)।

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शनिवार, 15 जनवरी 2011

मुंह की दुर्गन्धःकारण और निवारण

अधिकांश लोगों के मुँह से बदबू आती है। कई लोग इसे अनदेखा करते हैं। इसका कारण है मुँह में किसी स्थान पर बैक्टेरिया द्वारा प्रोटीन का विखंडन किया जाना है। श्वास नलिका, आहारनाल और पेट में कुछ समस्या होने के कारण भी बदबू आती है। आप जो भी खाते हैं आपकी साँस से उसी की बदबू आती है।

मुँह से बदबू आना एक आम समस्या है। आमतौर पर प्याज अथवा लहसुन की गंध मुँह से आती है और आस-पास बैठे लोग इसे अनदेखा करते हैं। मुँह करीब लाकर बात करने वालों को अक्सर मुँह से बदबू आने का उलाहना सुनना पड़ता है। भोजन पचने और रक्त में मिलने के बाद फेफड़ों की ओर स्थानांतरित होता है। यहाँ से उच्छवास के जरिए बदबू निकलती है। टूथ ब्रश, फ्लास और माउथवॉश करने से सिर्फ तात्कालिक राहत मिलती है। बदबू तब तक कायम रहती है जब तक शरीर पूरी तरह से भोजन को बाहर नहीं कर देता। जो लोग डाइट पर होते हैं या निर्जला उपवास करते हैं उनके मुँह से भी बदबू आती है।

यदि आप रोजाना टूथ ब्रश अथवा फ्लॉस का इस्तेमाल नहीं करते हैं तो यकीन जानिए कि आपके मुँह में भोजन के कण शेष रह जाते हैं और बदबू पैदा करते हैं। यदि आपकी पत्नी इस ओर इशारा नहीं कर रही है तो इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि आपके मुँह से बदबू नहीं आ रही है। दाँतों के बीच, मसूड़ों अथवा जबान पर रह गए भोजन कणों से बदबू पैदा होती है।
 
जिन लोगों के आंशिक अथवा पूरे डेंचर्स होते हैं उन्हें साफ सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए क्योंकि यहाँ रह गए भोजन कणों से तेज बदबू आती है।

मसूड़ों में सड़न की शुरूआत मुंह से बदबू आने से ही होती है। दूसरा लक्षण है मुंह में कड़वापन भी लगातार बना रहता है। मसूड़े सड़ने की वजह है-प्लॉक। यह रंगहीन चिपचिपी परत होती है जिसे बैक्टीरिया लगातार दांतों पर चढ़ाते रहते हैं। ये बैक्टीरिया ऐसे टॉक्सीन पैदा करते हैं जिससे मसूड़ों में खुजली होती है। एक ऐसी स्थिति आती है कि दाँत जड़ छोड़कर मसूड़ों से अलग होने लगते हैं। यदि मुंह में थूक किसी कारण से कम मात्रा में बनने लगे,तो बदबू आने लगती है। इसी तरह,तंबाकू के किसी भी उत्पाद से मुंह की त्वचा,मसूड़ों और दांतों को सिर्फ नुक़सान होता है। तंबाकू खाने वालों को किसी भी भोजन का स्वाद नहीं आता। उन्हें मुंह का कैंसर होने की आशंका दूसरों की बनिस्पत ज्यादा होती है। नाक,गला,श्वासनली और फेफड़ों में किसी तरह के संक्रमण के कारण अथवा असाध्य सायनाइटिस की वजह से भी मुंह से बदबू आती है। असाध्य खांसी,मधुमेह,चयापचय संबंधी समस्या व लिवर या किडनी की किसी बीमारी की वजह से भी बदबू आ सकती है।
क्या करें-
नियमित रूप से दंतचिकित्सक के पास मुंह की जांच कराते रहें। प्लॉक और सीमेंटेशन निकलवाते रहें। जिन खाद्य पदार्थों से मुंह में बदबू होती है,उन्हें आहार से निकाल दें। मुंह की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। दो बार ब्रश करें। जीभ को जीभी से साफ करें। दिन में एक बार फ्लास करें। दांतों के बीच के स्थान पर भोजन कणों को न रहने दें। यदि अस्थाई डेंचर का इस्तेमाल करते हैं तो उन्हें रात में निकाल दें। सुबह उनकी खूब अच्छी सफाई करें,फिर इस्तेमाल करें।
सड़न के कारण
दाँतों में सड़न
मसूड़े खराब होना
दाँतों के बीच भोजन कणों का बना रहना।
मुँह सूखा रहना
जबान पर बैक्टेरिया की अधिक गतिविधियाँ होना, पोस्ट नैजल ड्रिप होना
गले में किसी तरह का संक्रमण होना।
 
श्वास नलिका में संक्रमण के कारण
साइनुसाइटिस
पोलिप्स एवं सूखापन
बाहरी तत्व मुँह में बने रहना
श्वास प्रश्वास में रुकावट या म्यूकस फ्लो में रुकावट
असाध्य खाँसी एवं निमोनिया


आहारनली में संक्रमण होने के कारण
गेस्टराइटिस और फूड रिफ्लक्स एवं भोजन का आँतों में बने रहना।

माउथवाश : आमतौर पर दिखावटी असर वाले होते हैं। मुँह से बदबू आने की समस्या हो तो इनसे कोई फायदा नहीं होता। माँस, मछली खाने के बाद मुँह जरूर साफ करें(डॉ. अनिल कुमार शर्मा,सेहत,नई दुनिया,प्रथमांक,2011)

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शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

दूध के दांतों की देखभाल

हमारा स्वास्थ्य बहुत हद तक हमारे दांतों पर निर्भर करता है । यदि बचपने से ही दांतों पर ध्यान दिया जाए तो बहु त हद तक दांतों और मुंह की बीमारियों से बचा जा सक ता है । लोगों में बच्चों के दूध के दांत को लेकर कई तरह की भ्रांतियां देखने को मिलती है । यदि बच्चों के दूध के दांत की सफाई उचित तरीके से की जाए और उन्हें समय से पहले टूटने से बचाया जाए तो बाद में आने वाले दांत जो कि परमानेंट होते हैं हमेशा स्वस्थ और सुंदर दिखेंगे। दूध के दांत के गिरने का समय निर्धारित होता है प्राय: ऐसा देखा जाता है कि दूध के दांतों में कीड़े लग जाते हैं और माता-पिता ऐसा सोचते हैं कि ये तो दूध के दांत हैं , इन्हें निकलवा देने से ये फिर से आ जाएंगे। लेकिन उन्हें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि इन दांतो के गिरने का भी अपना समय निर्धारित होता है । जैसे, ऊपर के आगे के दो दांत सात वर्ष की उम्र में गिर जाते हैं । फिर परमानेंट दांत भी इसी उम्र में आ जाते हैं । 

बच्चों को डराए नहीं, प्यार से ब्रश करने की आदत डलवाएं । यदि दूध का दांत समय से पहले टूट जाता है या फिर समय बीत जाने के बाद भी मसूढ़े से लगा रहता है तो दोनों ही स्थिति में यह अच्छा नहीं माना जाता। ऐसा होने से दांत टेढ़े -मेढ़े और बदसूरत हो सकते हैं । और दांत यदि टेढ़े -मेढ़े होंगे तो उनकी सफाई अच्छी तरह से नहीं हो सकेगी और दांतों और मुंह की बीमारियां शुरू हो जाएंगी। जैसे, मुंह से बदबू आना, दांतों में कीड़े लगना, मसूढ़ों से खून आना, दांतों पर गंदगी का इकट्ठा होना आदि। इसलिए ,इन सारी परेशानियों से बचने के लिए माता-पिता को अपने बच्चों के दांतों पर शुरू से ध्यान देना चाहिए। उन्हें बच्चों को शुरू से ही दांतों को साफ रखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। दांतों को लेकर उन्हें डराना नहीं चाहिए। उन्हें ब्रश करवाने के लिए डेंटिस्ट या इंजेक्शन का डर नहीं दिखाना चाहिए। उन्हें प्यार से रोजाना दो बार ब्रश करवाने की आदत डलवानी चाहिए(डॉ. विनीता कुमारी,हिंदुस्तान,पटना,3.12.2010)।

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गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

सुंदर और चमकीले दांतों के लिए

चमकते खूबसूरत दांत केवल चेहरे की खूबसूरती ही नहीं बढ़ाते, बल्कि इन पर टिका होता है हमारी पूरी बॉडी की सेहत का जिम्मा। तुम से कभी न कभी किसी ने जरूर कहा होगा कि ठीक से चबाओ, नहीं तो यह काम आंतों को करना होगा। वास्तव में यह बात बिल्कुल ठीक है। दांत ठीक से काम न करें तो खाना ठीक से नहीं पचता। पर दूसरी ओर यह भी सही है कि खाना ठीक न हो तो दांत स्वस्थ नहीं रहते। खासतौर से तुम बच्चों की खान-पान की खराब आदतों का तो दांतों से एक खास रिश्ता है। बच्चों की मीठा अधिक खाने की आदतों के चलते दांतों में कैरीज अर्थात कीड़ा लग जाता है और दांत खराब होकर गिर जाते हैं।

अपोलो अस्पताल, बैंगलोर के पूर्व डेंटल सलाहकार और एमडीएस डेंटिस्ट डॉ. स्वप्निल सिंह के अनुसार, कैरीज को आम भाषा में दांत में कीड़ा लगना कहते हैं। यह वास्तव में कीड़ा नहीं होता, बल्कि दांतों के मैल को काफी समय तक साफ न करने के कारण बैक्टीरिया उत्पन्न होकर दांतों में सड़न पैदा करते हैं। यह सड़न दांतों की नसों तक पहुंच कर दांतों को खोखला कर दर्द पैदा करती है। दरअसल कैरीज ज्यादातर मीठा अधिक खाने और दांतों की सफाई ठीक प्रकार से नहीं करने के कारण होती है। यह अधिकतर चिपचिपा पदार्थ खाने से भी होती है, जिनमें बर्गर, पित्जा, चॉकलेट, टॉफी आदि शामिल हैं। खाने वाले पदार्थों की तुलना में मीठे पेय पदार्थ इतने नुकसानदेय नहीं होते, क्योंकि ये दांतों से चिपके बगैर सीधे पेट में चले जाते है। अधिक मात्र में कोल्ड ड्रिंक्स के सेवन से भी दांतों का रंग पीला पड़ जाता है और वे अपनी स्वाभाविक चमक खो बैठते हैं।

डॉ. सिंह का सुझाव है कि बच्चों को मैदे से बने फास्ट फूड और मीठी चीजों से परहेज या उनका सेवन कम मात्र में ही करना चाहिए, क्योंकि मैदे से बनी चीजें पेट के लिए भी लाभप्रद नहीं मानी जातीं। गन्ना दांतों के लिए नेचुरल बूस्टर माना जाता है। इसे साबुत खाने से दांतों की कसरत के साथ-साथ पाचन क्रिया को भी दुरुस्त रखने में मदद मिलती है। रॉ फूड खाने से मसूड़ों की मसाज व दांतों की सफाई होती है और उन्हें न्यूट्रीशियन भी मिलता है। इनमें गाजर, चुकंदर, खीरा, मूली, संतरा, मौसमी, सेब, नाशपाती व तरबूज जैसे फल हैं। खाने के बाद फल खाने से दांतों में छिपी गंदगी हट जाती है। मेवे कैल्शियम, मैग्नेशियम और फॉस्फोरस से युक्त होते हैं, इसलिए दांतों के लिए फायदेमंद होते हैं। खास तौर पर काजू, बादाम, मूंगफली और अखरोट। फल, वेजिटेबल्स और साबुत अनाज के साथ सीरियल्स खाना फायदेमंद होता है, साथ ही कैल्शियम रिच फूड, जैसे दही, दूध और चीज भी अच्छे रहते हैं।

दांत की सफाई और पाचन क्रिया का गहरा संबंध है। जिनके दांत साफ नहीं होते, उन बच्चों को कब्ज की शिकायत बनी रहती है, इसलिए दिन में दो बार सुबह और सोते समय ब्रश करना चाहिए और सोने से पहले मीठा खाने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे सांस में बदबू पैदा होती है। हर छह माह के अंतराल पर अपने दंत चिकित्सक से अवश्य मिलना चाहिए।

टिप्स
*पानी खूब पीएं।
*हर फूड ग्रुप से चुन कर पांच हैल्दी चीजें प्रतिदिन खाएं।
*दिन में दो बार ब्रश करें। सुबह उठ कर व सोने से पहले।
*ऐसे खाने-पीने की चीजों से परहेज करें, जिनमें मीठा ज्यादा हो।
*दो खानों के बीच दो से तीन घंटे का गैप रखें।
*डेंटिस्ट के पास नियमित विजिट करें।
*किसी कठोर चीज को दांतों से न चबाएं। कोल्ड ड्रिंक की बोतल का ढक्कन दांतों से खोलने जैसी गलती न करें।
*नॉनवेज खाने वालों को अपने दांतों की सफाई का खास ध्यान रखना होगा, क्योंकि यदि रात को उसके रेशे दांतों में फंसे रह गए तो बैक्टीरिया पैदा हो जाएंगे।
*ज्यादा चाय या कॉफी पीने से भी दांतों को नुकसान पहुंचता है(अनिल कुमार,हिंदुस्तान,दिल्ली,1.12.2010)।

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मंगलवार, 17 अगस्त 2010

किसी भी उम्र में दांत विकसित करने की तकनीक रोहतक में ईजाद

अब तक ये माना जाता रहा है कि बचपन के दांत गिरने के बाद जिंदगी में सिर्फ एक बार ही दांत आते हैं। यदि ये गिर या टूट गए तो ताउम्र नकली दांतों से काम चलाना पड़ेगा। अब बीते दिनों की बात होने जा रही है। रोहतक के डेंटल कालेज के प्राचार्य डॉ. संजय तिवारी ने ऐसी तकनीक ईजाद की है, जिससे दोबारा दांत विकसित करना संभव होगा। स्टेम सेल की मदद से खराब दांत की जगह नया दांत विकसित किया जा सकता है। डॉ. तिवारी लंदन में टूथ डेंटल पल्म स्टेम सेल एंड टूथ टिश्यू इंजीनियरिंग पर काम करके लौटे हैं। लंदन में उन्होंने स्टेम सेल कल्चर की विभिन्न विधियां सीखीं। उन्होंने चूहों पर अपनी तकनीक का प्रयोग किया, जहां उन्हें सफलता मिली। उनका मानना है कि चूहों पर स्टेम सेल तकनीक के लिए दांतों व नसों को फिर उगाने में सफलता मिलने के बाद मनुष्य में भी फिर से दांत व नसें विकसित करना संभव हो गया है। उल्लेखनीय है कि वह पिछले दिनों फेलोशिप पर लंदन गए थे। पांच महीने के लंदन प्रवास के बाद लौटे डॉ. तिवारी ने अपनी नई तकनीक के बारे में बताया। उनका दावा है कि इससे दोबारा दांत व नस उगाना संभव है। इसके लिए दांत से ही सेल लेकर दांत या नस में डालने होंगे। कुछ समय बाद फिर से दांत या नस विकसित हो जाएगी। अब तक या तो दंत चिकित्सक खराब दांत को निकालकर उसकी जगह कृत्रिम दांत लगाते या फिर नस निकालकर उसकी फिलिंग करते हैं। लेकन अब ऐसा नहीं करना होगा। उनका शोध स्टेम सेल तकनीक से रोगियों को राहत देगा, खासकर बच्चों को। बच्चों में अक्सर दांत खराब होने के मामले ज्यादा होते हैं। इसके अलावा बच्चों के दूध के दांत स्टेम सेल तकनीक में महत्वपूर्ण हैं। दूध के दांत से सेल लेकर दांत विकसित करना सरल और प्रभावी है। बड़ों में जबड़े का आखिरी दांत (अक्कल जाड़) से सेल ले कर दांत विकसित किया जा सकता है। हालांकि यह तकनीक काफी महंगी है और कालेज में अभी इस उपचार के लिए उपकरण भी नहीं हैं। लेकिन तकनीक आ गई है, उपकरण भी खरीदे जाएंगे। इसके बाद दंत रोगियों का उपचार रोहतक में ही किया जा सकेगा। डॉ. तिवारी ने बताया कि उन्हें लंदन के किंग्स कालेज की ओर से राष्ट्रमंडल फेलोशिप मिली थी। यहां उन्होंने 1 फरवरी से 30 जुलाई तक गाइज हास्पिटल किंग्स कालेज लंदन के क्रेनियो फेशियल डेवलपमेंट डिपार्टमेंट के अध्यक्ष व प्रोफेसर पाल शार्प डेकिन्सन की देखरेख में काम किया। यहां उनका विषय टूथ डेंटल पल्म स्टेम सेल एंड टूथ टिश्यू इंजीनियरिंग था। उनकी इस क्लिनिकल ट्रेनिंग के पूरा होने के बाद रॉयल कालेज आफ सर्जन्स इंग्लैंड की ओर से मान्यता भी दी गई है(विकास सैनी,दैनिक जागरण,रोहतक,17.8.2010)।

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सोमवार, 16 अगस्त 2010

टेढ़े-मेढ़े दांत

दोस्तो, अगर दांत सीधे न होकर टेढ़े-मेढ़े हों तो इसका नकारात्मक असर तुम्हारे पूरे व्यक्तित्व पर पड़ता है। ऐसे में कई बच्चे संकोची बन जाते हैं। कई बार ऐसे बच्चे दोस्तों के बीच में हंसी के पात्र भी बन जाते हैं, जिसका नकारात्मक प्रभाव बच्चों के दिमाग पर पड़ता है।

डॉ. अमूल्य चड्ढा के अनुसार बच्चों के टेढ़े-मेढ़े दांत जमने की कई वजहें हैं। कई बच्चों को बचपन से ही अंगूठा चूसने की आदत होती है, अगर यह आदत छह साल की उम्र के बाद भी लगातार रहती है तो बच्चों के दांत टेढ़े मेढ़े जम जाते हैं। जो बच्चे छोटी उम्र से अपने माता-पिता से दूर रहते हैं, उनको भी ज्यादा समय तक असुरक्षा की भावना होने से, अंगूठा चूसने की आदत हो जाती है। दूसरा, दूध के दांत यदि समय से पूर्व या देर से गिरते हैं तो भी सेकेंडरी अर्थात स्थायी दांत टेढ़े-मेढ़े जमते हैं। इसके अलावा अगर माता-पिता के दांत टेढ़े-मेढ़े जमे हों तो भी बच्चों के दांत टेढ़े-मेढ़े जमने की संभावना रहती है। टेढ़े-मेढ़े दांतों की सफाई अच्छी तरह से नहीं हो पाती है। इसकी वजह से जिंजिवाइटिस पेरियोडोंटाइटिस अर्थात् आम भाषा में दांतों का पायरिया रोग हो जाता है। इसमें दांतों की हड्डी गल जाने से दांत ढीले होकर गिर जाते हैं। ऐसे में ऑथरेडोंटिक ट्रीटमेंट के द्वारा दांतों में फिक्स्ड ब्रेसिज या स्पेशल तार लगाकर उन्हें सीधा किया जाता है। यह पूरी तरह से दर्दरहित प्रक्रिया है। इन ब्रेसिज को दस से बारह महीनों के लिए फिक्स कर दिया जाता है।

डॉ. चड्ढा हिदायत देते हुए बताते हैं कि टेढ़े-मेढ़े दांतों की समस्या को हल्के से नहीं लेना चाहिए, क्योंकि आगे जाकर ऐसे बच्चों को एंकरिंग, एयर होस्टेस तथा मॉडलिंग जैसे प्रोफेशन में जाने में बड़ी दिक्कत होती है। ऐसे बच्चों में हीन भावना उत्पन्न होने की संभावना भी अधिक रहती है। इलाज के दौरान ब्रेसिज लगने के बाद बच्चों को चिपचिपी चीजें, जैसे बर्गर, पित्जा, चॉकलेट, टॉफी तथा पास्ता आदि खाने से पूरी तरह से परहेज करना चाहिए। जितना जल्दी हो सके इस समस्या से निजात पाने के लिए अपने दांतों के डॉक्टर से जरूर मिलना चाहिए।

(इन्द्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल, नई दिल्ली के डेंटल सलाहकार एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जन प्रोफेसर डॉ. अमूल्य चड्ढा से अनिल कुमार की बातचीत पर आधारित,हिंदुस्तान,दिल्ली,12.8.2010))


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मंगलवार, 10 अगस्त 2010

स्वस्थ दाँतों के लिए....

मेरी मां की उम्र 48 वर्ष है। सुबह उठने परउनके मुंह में कड़वा लगता है। दांतों से खून भी आता है। मुंह में छाले की तकलीफ से भी पीडि़त हैं। क्या करूं। -कपिल, बंगलाबाजार, लखनऊ मुंह शरीर का आइना होता है। पेट खराब होने पर ऐसा होता है। उनके शरीर में विटामिन की कमी है। इसलिए गालों में जलन आदि की भी तकलीफ रहती होगी। आपको चाहिए कि तुरंत किसी चिकित्सक के पास जाकर उनका इलाज करायें। मेरी उम्र 68 वर्ष है। कई दांत निकलवा चुका हूं। बचे हुए दांत भी घिस गए हैं। कृपया इलाज बतायें। - विद्यासागर, राजाजीपुरम, लखनऊ इसके लिए आपको चिकित्सालय आना होगा। यदि आपके दांत ठीक होने लायक होंगे तो उनका इलाज किया जाएगा। सभी दांत खराब होने की स्थिति में पूरी बत्तीसी लगवानी पड़ेगी। मेरी मां की उम्र 50 वर्ष है। उनके मसूढ़ों में सूजन रहती है और खून भी आता है। क्या करना चाहिए? - अभिषेक, इंदिरानगर, लखनऊ मसूढ़ों में खून आना व सूजन होना पायरिया की निशानी है। इसके लिए उनके दांतों की स्केलिंग करवाने की जरूरत है। जरा भी लापरवाही न बरतते हुए तुरंत उन्हें दंत चिकित्सक के पास ले जाएं। मुंह के बायी तरफ के दांत में दर्द रहता है। ठंडा पानी भी लगता है लेकिन कीड़ा नहीं लगा है। मुझे क्या करना चाहिए? - प्रीति पाण्डेय, फैजाबाद आपको सबसे पहले अपने दांत का एक्सरे कराना चाहिए। दांतों में फैक्चर या जगह बन गई होगी। ऐसी स्थिति के निराकरण के लिए दांतों के लिए पेस्ट भी आते हैं। आपको चाहिए कि तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेकर इलाज शुरू करें। मेरा दस साल का बेटा है। उसके दांत में कीड़ा लगने से दर्द बना रहता है। दर्द निवारक दवाएं देती हूं। कृपया समाधान बतायें। -संध्या, फतेहपुर, बाराबंकी अभी बच्चे के दूध के दांत होंगे। उसका तुरंत इलाज कराते हुए सबसे पहले एक्सरे करवायें। उसके दांतों में पस भी भरा हो सकता है। सही इलाज न मिलने पर आगे निकलने वाले दांत भी खराब हो सकते हैं। इसलिए आपको चाहिए कि जरा भी कोताही न बरतते हुए निकट के सरकारी अस्पताल जाएं। मैने एक साल पहले बायीं तरफ का एक दांत खराब हो जाने की वजह से निकलवाया था। अब उस जगह से लसलसा पदार्थ निकलता रहता है। दर्द भी रहता है क्या करूं? - राम मोहन मिश्रा, फैजाबाद एक साल हो जाने पर सबकुछ ठीक हो जाता है लेकिन कभी-कभी दांत निकलवाने पर भी इसका कुछ हिस्सा रह जाता है। जिससे इंफेक्शन हो जाता है। ऐसे में दांत निकलवाने वाले चिकित्सक के पास इलाज कराएं। उस दांत का एक्सरे जरूर करा लें। मेरी उम्र 62 वर्ष है। बांयी ओर कई दांत निकल गए हैं और कुछ हिलते भी रहते हैं। क्या करूं? - केपी सिंह, लखनऊ आपके दांतों में पायरिया की शिकायत हो सकती है। कुछ दांत निकल जाने पर अन्य में जगह भी बन जाती है। इससे अन्य दांत हिलने लगते हैं। आप चिकित्सक से दांतों की सफाई अवश्य करवाएं। दिन में सुबह शाम ब्रश जरूर करें। प्रयास करें कि इलाज कर बचे दांतों को गिरने न दें। मेरी आठ वर्ष की बेटी के जबड़े में आगे के दांत नहीं गिरे हैं लेकिन पीछे के दांत आ गए हैं। क्या आगे कोई परेशानी हो सकती है? - अजय, हरदोई सामान्य तौर पर छह साल की उम्र तक सारे दांत गिर जाते हैं। ऐसी स्थिति में आगे निकलने वाले दांत टेढे़-मेढ़े हो सकते हैं। आपको तत्काल किसी वरिष्ठ चिकित्सक से आगे के दूध के दांत निकलवा दें। इससे नये निकलने वाले दांत खराब नहीं होंगे। मेरी पत्‍‌नी के पिछले तीन दिन से दर्द है। नीचे के दांत काले हो गए हैं। सूजन भी बनी हुई है क्या करूं? - योगेश चन्द्र योगी, फैजाबाद कीड़ा लगने पर दांत अंदर से खोखला हो जाता है। सामान्य स्थिति में केविटी भर कर इलाज किया जाता है। नसों तक इंफेक्शन हो जाने पर रूट कैनाल थेरेपी से इलाज संभव है। पत्‍‌नी को सरकारी अस्पताल ले जाकर तुरंत इलाज कराएं। बचपन में मेरे दांत टेढ़े-मेढ़े निकले थे। ये दिखने में खराब लगते हैं और दांतों को साफ करने में भी परेशानी होती है। कोई उपाय बतायें।-बुद्धराम शुक्ला, श्रावस्ती बचपन से टेढ़े-मेढ़े दांत की यह परेशानी आगे भी बनी रहेगी। आपको साल में दो बार जाकर चिकित्सक से दांतों की सफाई करानी चाहिए। इससे आपके दांत साफ रहा करेंगे। साथ ही दांत साफ करते समय मुलायम ब्रश का ही इस्तेमाल करें। मेरे मसूढ़ों से खून आता है। मुंह से बदबू भी आती है। मसूढ़े के पिछले दांत में पस बना हुआ है। कोई अच्छा मंजन भी सुझायें।- प्रभाकर, फैजाबाद आपके मसूढ़े में पायरिया है। किसी प्रशिक्षित चिकित्सक से इलाज व साल में दो बार अपने दांतों की सफाई कर अवश्य करवाएं। प्रतिदिन सुबह शाम ब्रश करना अपनी दिनचर्या में शुमार करें। साथ ही नमक व गुनगुने पानी से दिन में सात-आठ बार कुल्ला करें। इससे आपकी की साठ प्रतिशत तकलीफ खत्म हो जाएगी। मेरे मुंह के ऊपरी जबड़े में पीछे दर्द रहता है। वहां का कुछ हिस्सा काला दिखायी पड़ता है। यह तकलीफ पिछले कई दिनों से बनी हुई है। कृपया कोई समाधान बतायें। -पारुल, लखनऊ दांत को देखकर ही सही इलाज बताना संभव होगा। आप तत्काल चिकित्सक को दिखाकर कर इलाज शुरू करवाएं। शुरुआती दौर में फिलिंग से ठीक हो सकता है। गंभीर स्थिति में रूट कैनाल थेरेपी इसका इलाज है। अत: इसे नजरअंदाज बिल्कुल न करें। मेरी उम्र 62 वर्ष है। ब्लड प्रेशर की शिकायत है। मेरे मसूढ़ों के पीछे की तरफ दर्द व सूजन रहती है। दर्द की वजह से रात में सो नहीं पाती हूं। कृपया इलाज बतायें। - मधु श्रीवास्तव, राजाजीपुरम, लखनऊ ब्लड प्रेशर की तकलीफ होने पर भी मसूढे़ कमजोर हो जाते हैं। इसके लिए तुरंत दांत का एक्सरे कराकर किसी प्रशिक्षित चिकित्सक से इलाज कराएं। मेरे दांतों से खून आता है। मंजन करने के बाद भी मुंह से बदबू आती रहती है जबकि पान-मसाला आदि का सेवन नहीं करता हूं। क्या इलाज करें? -जावेद हुसैन, फैजाबाद आप पायरिया नामक बीमारी से पीडि़त हैं। इसके लिए हर साल नियमित रूप से दो बार दांतों की सफाई अवश्य करवाएं। घर में नमक मिले गुनगुने पानी से कई बार कुल्ला करें। आराम मिलेगा। इसके साथ ही किसी दंत चिकित्सक से इस बीमारी का इलाज भी कराएं। मसूढ़ों से खून आता है क्या करूं? यह भी बतायें कि हम अपने दांतों को स्वस्थ्य कैसे रख सकते हैं?-आरती, आलमनगर, लखनऊ मसूढ़ों से खून आता है तो इसके लिए तत्काल किसी चिकित्सक से सम्पर्क करें। दांतों को स्वस्थ और सुंदर रखने के लिए जैसे उंगलियों के नाखून काटना एक नियमित प्रक्रिया है उसी तरह दांतों की सफाई भी सामान्य बात है। दांतों को अच्छा बनाये रखने के लिए चॉकलेट व दांतों के बीच में फंसने वाली चीजों को खाने से भी परहेज करना चाहिए। मेरे मुंह के 75 प्रतिशत दांत हिल रहे हैं। दर्द होने के बाद तीन-चार दांत गिर भी चुके हैं। कृपया इलाज बतायें। - अरुण कुमार सिंह, ऐशबाग, लखनऊ 75 प्रतिशत दांत हिलने से यह प्रतीत होता है कि 50 प्रतिशत मसूढ़े खराब हो गए हैं। आप प्रतिदिन सुबह-शाम ब्रश अवश्य करें। नमक व गुनगुने पानी से कुल्ला करना अपनी आदत में शुमार करें। तत्काल किसी वरिष्ठ दंत चिकित्सक के पास जाकर इलाज जरूर करायें। मेरा ढाई साल का बेटा है जिसके सामने के दांत आगे की ओर भाग रहे हैं। उसकी अंगूठा चूसने की भी आदत है। हमें क्या करना चाहिए?- हुसैन जमाल, बलरामपुर यह बच्चे के लिए बड़ी समस्या है। इससे आने वाले समय में उसका जबड़ा यू के बजाय वी का आकार ले सकता है। इसलिए अंगूठा चूसने की आदत को छुड़ाने के लिए हैविट बे्रकिंग एप्लाइंस दी जाती है जिसमें छोटे-छोटे से कांटे होते हैं। उसके उपयोग से बच्चा यह आदत छोड़ देता है। दांतों का क्राउन घिस गया है। गरम-ठंडा दोनों लगता हैं। इसके लिए क्या कोई इलाज संभव है? - जेएस सोनी, गोंडा दांत के नीचे पीलापन होता है। इसके ऊपर सफेद एक परत होती है। परत उतर जाने पर दांत में गरम-ठंडा लगने लगता है। इसे बचने लिए इसकी कैपिंग की जाती है। इसके सिवा डी-सेस्टाइविंग मंजन भी आता है। इसे ब्रश करने से पांच मिनट पहले दांत में लगा दिया जाता है(दैनिक जागरण,लखनऊ,10.8.2010)।

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शनिवार, 24 अप्रैल 2010

पंजाब में डेंटल टूरिज्म की संभावना बढी

उत्तर भारत का पहला डैंटल इम्प्लांट सेंटर पंजाब में मोहाली के सिविल अस्पताल फेज-6 में खुल गया है। कल इसका उद्घाटन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने किया। इस सेंटर में बाजार कीमत से 50 फीसदी कम रेट पर और मैटल के बने दांत सक्रू के जरिए लगाए जाएंगे, जो आम दांतों से पांच गुणा अधिक ताकतवर होंगे। अनुमान है कि इस सेंटर से पंजाब में आप्रवासी भारतीय भी लाभान्वित होंगे। विदेशों में दांत इम्प्लांट करवाने पर चार से पांच हजार डॉलर (डेढ़ लाख रुपए) का खर्च आता है। भारत में भी प्राइवेट अस्पतालों में एक दांत इम्प्लांट करवाने पर 35 से 40 हजार रुपए का खर्च आता है लेकिन यही काम अब इस केंद्र पर महज 14 से 16 हजार रुपए में करवाया जा सकेगा। इससे डैंटल टूरिज्म बढने की संभावना भी व्यक्त की गई है। दांत लगाने की नई तकनीक के तहत, किसी व्यक्ति का दांत टूटने पर उस खाली जगह में ड्रिल मशीन से सुराख किया जाता है, जिसमें स्क्रूयुक्त टाइटेनियम मैटल का एक फोर्ट इम्प्लांट किया जाता है। इसके फिट किए जाने के कुछ दिनों बाद उस पर दांत लगा दिया जाता है। ये दांत सामान्य से पांच गुना तक मज़बूत होता है और आसपास के दांतों को भी सहारा देता है।

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