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बुधवार, 29 अगस्त 2012

परिवार और समाज के लिए भी फ़ायदेमंद है स्तनपान

पृथ्वी पर रहने वाला हर स्तनपाई अपने बच्चों को स्तनपान कराता है। इससे शिशुओं को ताकत व संरक्षण मिलता है। शिशुओं में जन्म से रोग प्रतिरोधक क्षमता नहीं होती। यह क्षमता उन्हें माँ के दूध से प्राप्त होती है। जन्म से ६ माह तक शिशु के लिए माँ का दूध सर्वोत्तम आहार होता है। स्तनपान से न केवल शिशु को लाभ होता है, बल्कि यह माँ के लिए भी ज़रूरी है। 

माँ के दूध में अनेक खूबियाँ हैं। इसमें शिशु की ज़रूरत के हिसाब से सभी पोषक तत्व मौजूद होते हैं। यह आसानी से पच जाता है। माँ का दूध शिशु को हर समय उपलब्ध रहता है। वो जब चाहता है, उसे दूध मिल जाता है। स्तनपान शिशु को संक्रमण से बचाता है। यह डायबिटीज व हाई ब्लडप्रेशर जैसी कई गंभीर बीमारियों की आशंका को भी कम करता है। माँ का दूध पीने वाले शिशु के मस्तिष्क का विकास सही ढंग से होता है। इससे बच्चे की दृष्टि एवं आईक्यू भी बढ़ता है। जिन बच्चों को बचपन में पर्याप्त रूप से माँ का दूध पीने को नहीं मिलता,उनमें बचपन में होने वाली डायबिटीज़ का खतरा अधिक होता है। ऐसे बच्चों की बुद्घि ठीक से विकसित नहीं हो पाती है। स्तनपान से शिशु में दमा व कान की बीमारी से बचाव होता है। कुछ शिशुओं को गाय या भैंस के दूध से एलर्जी हो सकती है, लेकिन माँ के दूध से किसी तरह की एलर्जी नहीं होती।

माँ के लिए भी है ज़रूरी 
स्तनपान न सिर्फ शिशु के लिए बल्कि माँ के लिए भी लाभकारी है। स्तनपान कराने से प्रसव पश्चात पीड़ा कम होती है। नई माताओं द्वारा स्तनपान कराने से उन्हें गर्भावस्था के बाद होने वाली परेशानियाँ कम होती हैं। इससे माताओं का तनाव भी कम होता है। माँ एनीमिया से भी सुरक्षित रहती है। स्तनपान एक प्राकृतिक गर्भनिरोधक के रूप में काम करता है। यह दूसरे गर्भधारण को रोकता है। स्तनपान कराने वाली माँ को स्तन कैंसर व गर्भाशय के कैंसर की संभावना कम होती है। 

परिवार के लिए लाभ 
स्तनपान कराना परिवार के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद होता है। माँ के दूध के लिए उन्हें किसी तरह के पैसे खर्च नहीं करने पड़ते। साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने से बच्चा बीमार कम पड़ता है, जिससे इलाज पर होने वाला भारी भरकम खर्च भी कम हो जाता है। स्तनपान से माँ और शिशु का रिश्ता मज़बूत होता है।

समाज को भी फायदा 
स्तनपान सिर्फ शिशु का पेट नहीं भरता बल्कि यह समाज को भी फायदा पहुँचाता है। स्तनपान इको-फ्रेंडली होता है। इसे तैयार करने में किसी तरह का प्रदूषण नहीं होता।

कितनी देर पिलाएँ दूध
बच्चा जब रोए तब उसे दूध जरूर पिलाएँ। इसे डिमांड फीडिंग कहा जाता है। दूध बच्चे की ज़रूरत के हिसाब से पिलाया जाना चाहिए। एक दिन में कम से कम ८ से १० बार दूध पिलाया जाना चाहिए। बच्चा जब तक खुद से दूध पीना न छोड़ दे तब तक उसे स्तनपान कराते रहें। कम वज़न के बच्चे देर तक दूध पीते हैं,जबकि स्वस्थ्य बच्चे जल्दी अपनी जरूरत का दूध पी लेते हैं। 

पोषक तत्वों से भरपूर 
माँ के दूध में एनर्जी,फेट,प्रोटीन,विटामिन-ए,विटामिन-बी व विटामिन-सी होता है। विटामिन-बी की मात्रा थोड़ी कम होती है, क्योंकि बच्चों को इसकी ज़रूरत कम होती है। मां के दूध में आयरन भरपूर मात्रा में होता है। ऊपरी दूध के मुकाबले शिशु का शरीर इसे ज्यादा अवशोषित कर पाता है। गाय का दूध जहां 10 प्रतिशत अवशोषित हो पाता है,वहीं मां का दूध 50 फीसदी अवशोषित होता है। मां के दूध में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले प्रोटीन होते हैं(सेहत,नई दुनिया,अगस्त 2012 द्वितीयांक)।

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शनिवार, 29 अक्टूबर 2011

स्तनपान के दिनों में खान-पान

माँ का प्रथम दूध बच्चे का टीकाकरण होता है। स्तनपान की प्रक्रिया कई हारमोन से नियंत्रित होती है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है प्रोलेक्टिन व ऑक्सीटोसिन जो दूध के उत्पादन व स्त्राव के लिए ज़िम्मेदार होता है। इन हारमोन्स के सुचारु रूप से काम करने के लिए ज़रूरी है कि माँ सही भोजन व पोषण ले। इसके अलावा माँ का खुश रहना व क्रियाशीलता बनाए रखना भी ज़रूरी है। यह सब सम्मिलित रूप से हारमोन को स्टिम्यूलेट करने में मदद करते हैं। माँ सभी भोज्य समूहों को आहार में शामिल करेगी तो बनने वाले दूध की मात्रा अधिक तथा गुणकारी होगी।  

एक धात्री महिला में प्रतिदिन ६००-८०० मिलीलीटर दूध बनता है। इस समय में उसे ५००-७०० अधिक कैलोरी की आवश्यकता होती है। अनाज तथा दालें, जिसमें कार्बोहाइड्रेट, ऊर्जा तथा फाइबर अधिक मात्रा में उपस्थित रहते हैं, ऊर्जा का सबसे अच्छा साधन हैं। अनाज तथा दालों को ४-५ बार लेना स्तनपान के दौरान आवश्यक है। जब बच्चा ऊपरी आहार लेने लगे तब अनाज की मात्रा को कम किया जा सकता है। विभिन्न फल व सब्ज़ियाँ दिन में ३-४ बार लेना चाहिए। इनसे मिलते हैं विटामिन व खनिज व सूक्ष्म पोषक तत्व, जो दूध के उत्पादन को बढ़ाते हैं। साथ ही शिशु में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास करते हैं व माँ के लिए दस्तावर का काम करते हैं। हरी पालक, मैथी आदि हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ व अनार, चुकंदर लौह तत्व से भरपूर होते हैं। स्तनपान के दौरान सबसे अधिक ज़रूरी भोज्य पदार्थ हैं 

दूध व दूध से बने पदार्थ जैसे ताज़ा दही-छाछ, पनीर, श्रीखंड आदि। यह दिन में ३-४ बार लेना चाहिए। दूध में उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन व पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम होता है, जिससे बच्चे की हड्डियाँ मज़बूत बनती हैं। उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन सूखे मेवे, अंडे एवं दूध से मिलता है। इसी के साथ अंकुरित दालें एवं खमीरीकृत भोज्य पदार्थ जैसे बे्रड, इडली-डोसा, जलेबी आदि में विटामिन-बी अधिक मात्रा में होता है। इस समय माँ को विटामिन-सी भी लेना चाहिए जो संतरे, मौसंबी, नींबू और आँवले आदि में मिलता है। यह लौह तत्व के अवशोषण के लिए आवश्यक है(डॉ. नंदिता ठाकुर,सेहत,नई दुनिया,अक्टूबर तृतीयांक 2011)। 
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शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

स्तनपानः भ्रांति और तथ्य

माँ का दूध अमृत के तूल्य है, क्योंकि उसमें सभी अमीनो एसिड उपलब्ध होते हैं, जो शिशु के मानसिक एवं शारीरिक विकास के लिए जरूरी हैं। माँ के दूध में सभी पोषक तत्व सरल रूप से उपस्थित होते हैं, जो शिशु के शरीर में पूर्ण रूप से अवशोषित हो जाते हैं। शिशु को जन्म से छः महीने तक सिर्फ माँ का दूध ही दें। बच्चे को दूध पिलाने वाली माता का आहार खूब पौष्टिक होना चाहिए। उसमें किसी किस्म की रोकटोक नहीं लगाना चाहिए। कई परिवारों में सद्यः प्रसूता को केला खाने से रोका जाता है। वजह यह बताई जाती है केला खाने से बच्चे को जुकाम हो जाता है। इस तरह की कई भ्रांतियाँ हैं, जिन्हें दूर कर नवजात शिशु को भरपेट स्तनपान कराया जा सकता है। यहीं से शिशु के स्वस्थ जीवन का आधार रखा जा सकता है।जन्म लेते ही शिशु स्तनपान प्रारंभ कर देता है। गर्भवती महिला को गर्भ के अंतिम महीनों से ही आहार में अधिक कैलोरी, प्रोटीन और वसा बढ़ा देना चाहिए। इससे माता के शरीर में दूध उचित मात्रा में बनता है। नवजात शिशु के समुचित विकास के लिए माता का दूध सर्वोत्तम आहार है। माँ के आहार में सभी प्रोटीन आवश्यक मात्रा में होना चाहिए। स्तनपान कराने वाली स्त्री की अतिरिक्त पोषक तत्वों की जरूरत को पूरा करने के लिए आहार में दूध, फल, अंकुरित अनाज, हरी सब्जियाँ, पनीर आदि सभी खाद्य पदार्थों को अपने आहार में शामिल करना चाहिए। विशेष रूप से पानी का सेवन अधिक मात्रा में करें, तभी दूध का स्राव पर्याप्त मात्रा में होगा।

भ्रांति : शिशु व माता को बंद कमरे में रखना।
तथ्य- प्रसव के बाद माता को खुले हवादार कमरे में रखें, ताकि स्वच्छ हवा का आदान-प्रदान हो सके।

भ्रांति : पानी एवं तरल पदार्थ कम मात्रा में लेना।
तथ्य- जितना अधिक तरल पदार्थ का उपयोग होगा, उतना अधिक दूध का स्त्राव होगा।

भ्रांति : बीमारी में स्तनपान न कराएँ।
तथ्य- एड्स को छोड़कर अन्य किसी भी बीमारी में बच्चे को दूध पिलाने में कोई भी नुकसान नहीं है।

भ्रांति : अधिक घी व तेल का उपयोग करें।
तथ्य- अत्यधिक घी व तेल लेने की बजाय मौसमी हरी ताजी पत्तेदार सब्जी, फल, ताजे फलों का ज्यूस, नारियल पानी, दाल पर अधिक ध्यान दें।

भ्रांति : प्रसव के बाद तीन दिन तक निकलने वाला पीला गाढ़ा दूध न दें।

तथ्य- नवजात शिशु को माता का पीला दूध कोलेस्ट्रम जरूर पिलाना चाहिए, ताकि बच्चे में संक्रामक रोगों से लड़ने की क्षमता पैदा हो सके।

भ्रांति : पावडर का दूध अच्छा होता है।
तथ्य- शिशु के लिए माता के दूध से बेहतर कुछ नहीं होता। माँ के दूध में एंटीबॉडीज प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। बोतल से दूध पिलाने पर संक्रमण होने का जोखिम अधिक होता है।

भ्रांति : स्तनपान कराने से फिगर खराब हो जाता है।
तथ्य- स्तनपान माता का फिगर बनाए रखने के साथ-साथ कई बीमारियों से बचाता है। इसमें स्तन कैंसर, बच्चेदानी का कैंसर, मोटापा जैसी बीमारियाँ शामिल हैं।

भ्रांति : प्रसव के बाद माँ को कई दिनों तक नहलाना नहीं चाहिए।
तथ्य- माँ को रोजाना नहलाएँ। संक्रमण से दूर करने वाले रसायनों को पानी में मिलाएँ। सर्दियों में प्रसव हुआ हो तो नीम की पत्तियाँ भी नहाने के पानी के साथ उबाली जा सकती हैं।

माता के दूध में पौष्टिक तत्वों की मात्रा
प्रोटीन 1.1
वसा 3.4
कार्बोज 7.5
केल्शियम 34
विटामिन ए 70
राइबोफ्लेविन 1.7(डॉ. संगीता मालू,सेहत,नई दुनिया,जुलाई पंचमांक 2011)

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बुधवार, 3 अगस्त 2011

माँ का दूध ही है सर्वोत्तम आहार

माँ के दूध की गुणवत्ता एक निर्विवाद सत्य है। प्राणीजगत को दिया गया यह सर्वोत्तम उपहार है। माता के दूध के अलावा दूसरे सभी आहार शिशु के स्वास्थ के लिहाज से दोयम दर्जे के माने गए हैं। स्तनपान को लेकर आधुनिक युग में भी कई भ्रांतियाँ हैं। कई परिवारों में इन्हीं भ्रांतियों की ज्यादती नवजात शिशु को भुगतना पड़ती है। सद्यः प्रसूता को गरिष्ठ खाद्य पदार्थ तो दिए जाते हैं लेकिन दही या चटनियों जैसी प्राथमिक "औषधियों" से वंचित रखा जाता है। तर्क यह है कि खट्टी चीजों से नवजात शिशु को नुकसान होगा।

दरअसल प्रजनन, प्रसव के बाद माता और नवजात शिशु की देखभाल की विस्तृत जानकारी देने की शुरुआत कन्याशालाओं से की जानी चाहिए। पाठ्यक्रम की पुस्तकों के अलावा भावी माताओं को अपने शरीर की सभी प्रक्रियाओं की जानकारी होनी चाहिए। शिशु के स्तनपान से लेकर उसकी साफ-सफाई तक की छोटी से छोटी जानकारियाँ लड़कियों को होना चाहिए। समाजविज्ञानियों का मानना है कि एक पढ़ी-लिखी माँ पूरे परिवार के स्वास्थ की रक्षा कर सकती है, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।

केवल ग्रामीण समाज में ही भ्रांतियाँ हों ऐसा नहीं है। शहर की नवआधुनिक माताएँ भी फिगर होने के झूठे डर से अपने शिशुओं को स्तनपान जैसे अनमोल उपहार से वंचित रखती हैं। ग्रामीण समाज की महिलाएँ अज्ञानतावश कुछ अर्से के लिए शिशु को स्तनपान से वंचित रखती हैं तो आधुनिक उच्चवर्ग की महिलाएँ दूसरी तरह की भ्रांति के चलते स्तनपान नहीं करातीं।

शहरी माताओं की समस्या गंभीर प्रकृति की हैं। करिअर को लेकर गंभीर रही लड़कियां पहले तो शादी ही देर से करती हैं,फिर शादी के बाद मां बनने से भी हिचकिचाती हैं। वे मातृत्व को टालने की हरसंभव कोशिश करती हैं । इसके लिए गर्भनिरोधक गोलियों से लेकर तमाम तरह के उपाय किए जाते हैं। प्रकृति ने श्रेष्ठ संतान प्राप्ति की एक उम्र तय की है। इस अवधि को टालने के नतीज़े कभी ठीक नहीं होते। स्तनपान शिशु का जन्मसिद्ध अधिकार है। उसे इस अधिकार से वंचित रखने की इजाज़त प्रकृति ने किसी को नहीं दी है(संपादकीय,सेहत,नई दुनिया,जुलाई पंचमांक,2011)।

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रविवार, 20 फ़रवरी 2011

स्तनपान कराने में सक्षम बनाएगी जड़ी-बूटी

अपने नौनिहालों को पर्याप्त मात्रा में स्तनपान नहीं करा सकने की समस्या से जूझ रही माताओं के लिए मंगोलयाड टोटो जनजाति की महिलाओं द्वारा अपना दूध बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एक जड़ी बूटी ने उम्मीद की एक नई किरण जगा दी है। एएसआई के वैज्ञानिक अमिताभ सरकार ने समीरा दासगुप्ता के साथ इस पौधे का पता लगाया। सरकार ने बताया कि इस जड़ी बूटी को स्थानीय लोग माइरूंसा के नाम से जानते हैं। टोटो महिलाएं सदियों से इसका इस्तेमाल कर रही हैं लेकिन बाहरी दुनिया को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। समीरा ने शोध के दौरान पाया कि लतमान के पौधे की पत्तियों को चार पांच दिन तक उबाल कर या तल कर खाने के बाद मां अपने बच्चे को अच्छी तरह से स्तनपान कराने में सक्षम हो जाती है।

गौरतलब है कि इस जनजाति की महिलाओं को बच्चों को जन्म देने के बाद आनुवांशिक वजह के चलते दूध की कमी की सामना करना पड़ता है। मंगोलयाड लोग पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के उप हिमालयी इलाके में रहते हैं। सरकार ने बताया कि स्तन में दूध की कमी के चलते नौनिहाल कुपोषण के शिकार हो जाते हैं। गांव की जनजातीय महिलाओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले औषधीय पौधों के सर्वेक्षण के दौरान यह खोज की गई।

जलपाईगुड़ी में मिली औषधि
भारतीय मानवशास्त्रीय सर्वेक्षण की एक टीम ने पश्चिम बंगाल में जलपाईगुड़ी जिले के टोटोपारा में लतमान (माईरूंसा) नाम की जड़ी बूटी की हाल ही में खोज की है। मंगोलयाड जनजाति की महिलाएं इसका इस्तेमाल अपना दूध बढ़ाने के लिए करती हैं(राजएक्सप्रेस,कोलकाता,20.2.11)।

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गुरुवार, 12 अगस्त 2010

माँ का दूध

दूध वह पौष्टिक पदार्थ है, जो मानव शरीर के लिए न सिर्फ जरूरी है, बल्कि उसे बीमारी से भी बचाए रखता है। रोजाना शुद्घ दूध पीकर शरीर को संतुलित रखा जा सकता है। दूध मानव शरीर की तेजस्विता, हड्डियों की शक्ति, दाँतों की सुरक्षा, रक्तचाप व वजन सामान्य बनाए रखता है। माँ के दूध का विकल्प अब तक दुनिया की किसी भी प्रयोगशाला में तैयार नहीं हो सका है।
बढ़ते बच्चों, गर्भवती महिलाओं, दूध पिलाने वाली माताओं के आहार में यदि दूध शामिल है तो उनका संतुलित विकास संभव हो जाता है। दूध प्रकृति का एक ऐसा उपहार है, जो एक पौष्टिक उत्पाद है। इसमें कैल्शियम व प्रोटीन भरपूर मात्रा में होता है। शाकाहारी आहार में दूध बेहद महत्वपूर्ण है। प्रोटीन का यह एक बेहतरीन स्रोत है। माँ का दूध बच्चे का जन्मसिद्ध अधिकार है। हर माँ को ५ से ६ महीने की आयु तक बच्चे को सिर्फ अपने दूध पर पालना चाहिए। उसके बाद २-३ साल की आयु तक या जब तक हो सके बच्चे को अपना दूध पिलाते रहना चाहिए। आधुनिक माताएँ अपने फिगर मेंटेन करने के चक्कर में बच्चों को स्तनपान नहीं करातीं। यह न सिर्फ बच्चे में कुपोषण को बढ़ाता है, बल्कि भविष्य में ऐसी माताओं के लिए स्तन कैंसर का खतरा भी बरकरार रहता है। बीमारियों से सुरक्षा माँ के दूधबढ़ते बच्चों, गर्भवती महिलाओं, दूध पिलाने वाली माताओं के आहार में यदि दूध शामिल है तो उनका संतुलित विकास संभव हो जाता है। दूध प्रकृति का एक ऐसा उपहार है, जो एक पौष्टिक उत्पाद है। इसमें कैल्शियम व प्रोटीन भरपूर मात्रा में होता है। शाकाहारी आहार में दूध बेहद महत्वपूर्ण है। प्रोटीन का यह एक बेहतरीन स्रोत है। बोतल से दूध न पिलाएँ कामकाजी माताएं और फिगर मेन्टेन करने के चक्कर में रहने वाली माताएँ अपने बच्चों को बोतल के दूध पर छोड़ देती हैं। बोतल का दूध बच्चे का सबसे बड़ा दुश्मन है। यदि मां किसी कारणवश बच्चे को दूध नहीं पिला सकती, तो उसको चम्मच व कटोरी या सीपी का इस्तेमाल करना चाहिए न कि बोतल थमा देना चाहिए। माताएँ अक्सर अपनी सुविधा के लिए भी बच्चों के मुंह में बोतल लगा देती हैं। ऐसे बच्चों का संतुलित विकास नहीं होता। इन बातों का रखें ख्याल *माँ को कभी अपने बच्चों को ऊपर का दूध पिलाना पड़ जाए तो बिना पानी मिलाए गाय या भैंस का दूध उसे दें, क्योंकि दूध में अधिकांश हिस्सा पानी का होता है। इसलिए उसमें बाहरी पानी नहीं मिलाना चाहिए। दूध में थोड़ी-बहुत शकर डाली जा सकती है। *कई माताओं को शिकायत होती है कि उसे पर्याप्त दूध नहीं होता। ऐसा माँ के अंदर हौसले की कमी, कम खुराक खाने और बच्चों को बोतल पर निर्भर करने की मानसिकता की वजह से होता है। आप अभी बोतल फेंक दें, हौसला रखें, अच्छी खुराक लें और बच्चे को प्यार से अपना दूध पिलाएँ। *बच्चों को दूध दो-ढाई घंटे के बाद ही पिलाना चाहिए। यदि बार-बार बच्चे को दूध पिलाने पर उसका न तो पेट सही ढंग से भरेगा और न ही उसे संतुष्टि ही होगी। इसकी वजह से वह ठीक से सो भी नहीं सकेगा। *छोटे बच्चे गैस निकालते रहते हैं। बच्चा जब दूध पीता है तो दूध के साथ गैस भी पेट में चली जाती है। कई माँ-बाप इसे बीमारी मानकर घबरा जाते हैं, लेकिन यह सामान्य बात है। डकार दिलवाकर भी गैस निकाली जा सकता है। *छोटे बच्चे बार-बार जरा-जरा-सी टट्टी करते रहते हैं। माँ-बाप इसे दस्त समझ लेते हैं, लेकिन यह दस्त नहीं है। इसे चुरक-चुरक करना कहते हैं। बच्चे को जब बीमारी के दस्त लगेंगे तो बच्चा बीमार दिखाई देगा। उसका वजन कम हो जाएगा, सुस्त हो जाएगा और बुखार आदि हो सकता है। *बच्चे अक्सर थोड़ा-थोड़ा दूध निकालते रहते हैं। इससे भी घबराने की जरूरत नहीं है। यदि बच्चे का वजन सामान्य है या बढ़ रहा है तो चिंता करने की कोई बात नहीं है। *बच्चों को ६ महीने से पहले दूध कभी नहीं छुड़ाना चाहिए। ठोस आहार ६ महीने के बाद ही शुरू करना चाहिए। शुヒआत पीने की चीजों से करें। जैसे दाल का पानी, चावल का पानी, मोसंबी का जूस, संतरे का रस आदि। जैसे-जैसे बच्चे की आयु बढ़ती है, खाने की चीजें बढ़ा दें। उसके बाद उसे चावल, सूजी की खीर, आलू, दही, रोटी मैश कर के दें, ताकि पचने में आसानी हो। ६-७ महीने का बच्चा ३-४ घंटे के बाद ही खाता है। बच्चों को जबरदस्ती न खिलाएँ। *नवजात बच्चे की माँ को भी पौष्टिक भोजन करना चाहिए। माँ के किसी भी खाने से बच्चे की पाचन शक्ति पर कोई असर नहीं होता है। हमारा शरीर कुदरत की देन है। माँ का दूध हमेशा साफ एवं शुद्घ होता है। माँ को खाने के बाद दाँतों पर ब्रश करना चाहिए। इससे उसके दाँत कमजोर होने का खतरा नहीं रहता है। (डॉ. राकेश महाजन,सेहत,नई दुनिया,जुलाई द्वितीय अंक,2010)

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मंगलवार, 3 अगस्त 2010

पश्चिम बंगाल में बनेगा मां के दूध का बैंक

ब्लड बैंक की तरह अब मां के दूध का भी संग्रहण किया जा सकेगा, ताकि जरूरतमंद बच्चों की मदद की जा सके। बंगाल के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल सेठ सुखलाल करनाली अस्पताल (एसएसकेएम) में जल्द ब्रेस्ट मिल्क बैंक खुलने वाला है। यह पूर्वी भारत का पहला और देश का दूसरा बैंक होगा। वर्तमान में महाराष्ट्र में एक ब्रेस्ट मिल्क बैंक चल रहा है। परियोजना में अहम भूमिका निभाने वाले एसएसकेएम अस्पताल के नियो-नैटोलॉजी डिपार्टमेंट के प्रमुख अरुण सिंह ने बताया कि मां के दूध का कोई विकल्प नहीं। यह नवजात शिशुओं के लिए पोषण का प्राथमिक व एकमात्र स्त्रोत है, जब तक कि वे अन्य तरह के भोजन को खाने व पचाने के लायक नहीं हो जाते। ब्रेस्ट मिल्क बैंक खुलने से उन शिशुओं के लिए दूध की व्यवस्था की जा सकेगी जिनकी माताएं प्रसव के बाद विभिन्न कारणों से उन्हें स्तनपान नहीं करा पातीं। यह समय पूर्व पैदा होने वाले और उन शिशुओं के लिए भी वरदान से कम नहीं होगा, जिनकी मां की प्रसव के दौरान मौत हो जाती है। डा. सिंह ने कहा कि बैंक अगले कुछ महीनों में अस्तित्व में आ जाएगा। इसके लिए स्तनपान कराने वाली माताओं की सहमति से उनके अतिरिक्त दूध का संग्रह किया जाएगा। अस्पताल प्रबंधन इस बाबत रक्तदान शिविर की तरह स्तन दूध दान शिविर का आयोजन करेगा(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,3.8.2010)।

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शुक्रवार, 26 मार्च 2010

स्तनपान के लिए दूध बढाने के उपाय

प्रायः,हर जच्चा के पास अपने बच्चे की आवश्यकता के अनुरूप दूध होता है। लेकिन हर बच्चे की आवश्यकता एक समान नहीं होती और न ही हर माता के पास बच्चे की जरूरत के मुताबिक दूध होता है। ऐसी ही माताओं के लिए एक आलेखः

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शुक्रवार, 12 मार्च 2010

स्तनपान बस दो साल तक


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मंगलवार, 19 जनवरी 2010

स्तनपान सर्वोत्तम

(हिंदुस्तान,पटना,19.1.10)
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शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

Breast-feeding:स्तनपान ही सर्वोत्तम

डाक्टर बच्चों को बोतल से दूध न पिलाने पर जोर देते हैं। इनका कहना है कि इससे जहां संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है वहीं स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इन चिकित्सकों ने मां के दूध को शिशु के लिए सर्वोत्तम आहार बताया। जिसे जन्म के तुरंत बाद से ही देना चाहिए। पहला दूध जो गाढ़ा और पीले रंग को होता है (कोलेस्ट्रम) उसे अवश्य पिलाना चाहिए क्योंकि यह बच्चों का पहला टीकाकरण होता है, जो उनमें संक्रमित बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। पटना की शिशु रोग विशेषज्ञ डा. नीलम का कहना है कि मां जब दूध पिलाने की स्थिति में न हो या डाक्टर उसे ब्रेस्ट फीडिंग के लिए मना करें तब बच्चे को संक्रमणरहित कप और चम्मच से दूध पिलाया जा सकता है। बच्चे का रखें ख्याल • बच्चे को छ: महीने तक सिर्फ मां का दूध देना चाहिए और कुछ नहीं। * कम से कम दो साल तक बच्चे को मां का दूध अवश्य दें। • छ: महीने के बाद से बच्चे को मां के दूध के साथ अनाज देना भी शुरू कर दें। इसकी शुरुआत आप उसे मां के दूध के साथ दिन में दो बार आनाज देने से करें। फिर धीरे-धीरे आप उसे मां के दूध के साथ दिन में तीन बार अनाज दें। • बच्चे को अनाज में आप खिचड़ी, दाल का पानी दे सकती है। बाटल फीडिंग के नुकसान चाहें आप कितना भी सफाई का ध्यान रख लें लेकिन डाक्टरों का मानना है कि बाटल से दूध पिलाना बच्चों के स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक नहीं। • बाटल धुलने के बाद भी उसकी पेंदी में कुछ कीटाणु रह ही जाते है जो बच्चे के हेल्थ पर बुरा असर डालते हैं। • बाटल से दूध पीने पर बच्चों को रिकरिंग डायरिया होने का खतरा रहता है। • इससे उनको कई प्रकार के वायरेल इंफेक्शन भी हो सकते हैं। बच्चे को उचित आहार न मिलने से वो कुपोषण का शिकार भी हो सकता है। जब आप बच्चे को ब्रेस्ट फीडिंग देना बंद करने वाली हों तो उसे बाटल की आदत डलवाने से बेहतर होगा की आप उसे कप से दूध पीने की आदत डलवाएं। (दैनिक जागरण,पटना में प्रकाशित पारुल पाण्डेय की रिपोर्ट)
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