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सोमवार, 28 मई 2012

जीवन-शैली में बदलाव से संभव है रक्तचाप नियंत्रण

उच्च रक्तचाप एक असामान्य शारीरिक स्थिति है। इस समस्या के लक्षण स्पष्ट नहीं होते हैं इसलिए इसे साइलेंट किलर भी कहा जाता है। उच्च रक्तचाप होने पर सिरदर्द, आँखों में अंधेरी छाना, चक्कर आना आदि लक्षण सामने आ सकते हैं लेकिन ये अग्रिम अवस्था में ही पता चलते हैं, शुरुआती अवस्था में नहीं। आमतौर पर लक्षण प्रकट हों तो भी स्पष्ट रूप से उच्च रक्तचाप की पुष्टि नहीं होती।  
सीने में दर्द महसूस होने तक इससे पीड़ित अधिकतर लोगों को यह मालूम ही नहीं होता कि उन्हें उच्च रक्तचाप की तकलीफ है। सीने में दर्द से चितिंत होकर चिकित्सक के पास पहुँचने पर उन्हें पता चलता है कि वे उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं और हृदयाघात के जोखिम पर भी हैं।  

उच्च रक्तचाप के कारण आर्ट्रीज़ के कमज़ोर होने का ख़तरा काफी बढ़ जाता है। फलस्वरुप हृदयाघात, हृदयरोग व गुर्दे के रोगों की आशंका बढ़ जाती है। रक्तचाप १४०/९० या इससे अधिक बना रहने पर उच्च रक्तचाप की पुष्टि की जाती है। उच्च रक्तचाप पर नियंत्रण कई प्रकार के सम्मिलित प्रयासों से संभव है। इसका प्रयास नियमित करना आवश्यक है।

श्रम महत्वपूर्ण 
लंबे और स्वस्थ जीवन के लिए नियमित शारीरिक श्रम बेहद महत्वपूर्ण है। मोटापा, कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ना, तनाव, मधुमेहहृदय रक्त को पंप करके धमनियों और नसों के माध्यम से पूरे शरीर में पहुँचाता है। शरीर में रक्त संचार होने के लिए रक्त के दबाव की ज़रूरत होती है। सामान्य स्थिति में यह १२०/८० होता है।  

सक्रिय बने रहें 

-शारीरिक श्रम का मतलब केवल जिम जाना नहीं है। सक्रिय रहने के लिए कोई भी गतिविधि चुन सकते हैं। व्यायाम हरेक के लिए ज़रूरी है चाहे आप हार्ट अटैक के जोखिम को कम करके आंकना चाहते हों या फिर दूसरे के हृदयाघात से बचने की कोशिश कर रहे हों। इसका महत्व जानते हुए भी कई लोग व्यायाम शब्द सुनते ह असहज हो जाते हैं। जिस तरह वे बैठे-बैठे रिमोट कंट्रोल से टीवी के चैनल बदलते रहते हैं,उसी प्रकार बैठे-बैठे बीमारियों से भी बचना चाहते हैं,जो संभव नहीं है। स्वस्थ शरीर के लिए शारीरिक श्रम बेहद ज़रूरी है। 

-व्यायाम के लिए जिम,स्वीमिंग,योग आदि विभिन्न विकल्पों में से कुछ चुन सकते हैं लेकिन कई लोग व्यायाम करने से कतराते हैं। व्यायाम तो सभी के लिए जरूरी है। आलसी लोगों के लिए भी कई विकल्प मौजूद हैं,जैसे-रोज़मर्रा के कार्यों को सक्रियता से करना। बस यह ध्यान रखें कि शरीर को चलाना महत्वपूर्ण है,फिर चाहे यह योग के द्वारा हो या कि घर की सीढ़ियां चढ़ते हुए। 

-दिन में 30-40 मिनट तेज़ी से पैदल चलना भी प्रभावशाली है। यह हृदय की सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है। स्वीमिंग,साइक्लिंग,जॉगिंग,सीढ़ियां चढ़ना,पहाड़ों पर ट्रेकिंग करना,योग,बागवानी आदि भी कर सकते हैं। व्यायाम के विकल्प यहीं खत्म नहीं होते। फुटबॉल,हॉकी,टेनिस,बैडमिंटन आदि खेल भी आपके हृदय और फेफड़ों(कार्डियोवैस्कुलर व्यायाम) के लिए उतने ही फायदेमंद हैं। 

-गलीचे को वैक्युम क्लीनर से साफ करना या फर्श पर पोंछा लगाने का काम बोरिंग हो सकता है लेकिन यही काम चुस्ती-फुर्ती से करेंगे तो यह व्यायाम का रूप ले लेगा। उबाऊ कामों को तेज़ धुन वाले संगीत के साथ कर सकते हैं,इससे बोरियत नहीं होगी और काम के साथ व्यायाम भी हो जाएगा। 

-बचपन के मज़ेदार खेलों में रस्सी कूदना भी शामिल होता है। यह हृदय की मांसपेशियों के लिए बढ़िया व्यायाम है। आप घर पर रस्सी कूद सकते हैं और इसे कहीं भी ले जा सकते हैं। अपनी रूचि के अनुसार व्यायाम चुनें,इनसे आप ऊबेंगे नहीं और नियमित रूप से पूरे उत्साह के साथ कर भी सकेंगे। 

व्यायाम के लाभ
-तनावमुक्ति

-कार्य में बेहतर प्रदर्शन कर सकेंगे।

-अच्छी नींद 

-स्वस्थ जीवन 

-वज़न नियंत्रित रहता है। रक्त में शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में सहायक होता है।

-खून के थक्के बनने व हृदयरोगों की आशंका कम होती है।  

बदलें जीवनशैली 
-धूम्रपान न करें व किसी भी तरह के तंबाकू का सेवन न करें।

-वज़न अधिक हो तो इसे नियंत्रित करें।  

-आहार में फल व सब्ज़ियाँ पर्याप्त मात्रा में शामिल करें। वसा नियंत्रित मात्रा में लें।

-सोडियम व कैफीन की मात्रा को नियंत्रित करें। (डॉ. हर्षित जैन,सेहत,नई दुनिया,मई तृतीयांक 2012)

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मंगलवार, 1 मई 2012

घातक है खून का थक्का

वेन में खून का थक्का बनने की प्रक्रिया को वीनस थ्रांबोसिस कहते हैं। हर साल लाखों लोग इससे प्रभावित होते हैं। इनमें से कई के लिए यह घातक सिद्घ होता है वहीं अन्य को इसके कारण कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई मरीज़ों को यह पता ही नहीं होता है कि वे वीनस थ्रांबोसिस के जोखिम पर हैं, ऐसे में ये समय रहते इलाज लेने से चूक जाते हैं।  

शरीर की किसी भी वेन में खून का थक्का जम सकता है लेकिन आमतौर पर थक्के पैरों की वेन्स में अधिक पाए जाते हैं। ये थक्के पिंडलियों या पैरों के निचले हिस्से में आम हैं। इसके अलावा घुटनों के पीछे या जांघों में भी हो सकते हैं।

कारण
वेन्स में रक्त का प्रवाह घटना : उदाहरण के लिए यदि बीमारी के कारण व्यक्ति को लंबे समय तक बिस्तर पर रहना पड़े या लंबी यात्रा में चेयर पर बैठे रहना पड़े।

रक्तवाहिनी का क्षतिग्रस्त होना : पैरों, हिप्स या पेल्विस सर्जरी के दौरान या बढ़ती उम्र के कारण होने वाले परिवर्तनों से रक्तवाहिनियों की दीवार क्षतिग्रस्त हो जाती है।

थक्का बनने की प्रवृत्ति : शरीर में खून जमने की प्रक्रिया में आनुवांशिक रूप से समस्या होना, कैंसर, गर्भावस्था या गर्भ निरोधक दवाओं के कारण हारमोन के स्तर में परिवर्तन आने के कारण भी यह हो सकता है।

ये हैं जोखिम पर
-वृद्धजन, बीमारी या सर्जरी के कारण लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहने पर। यात्रा के दौरान लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहने वाले यात्री।  

-हिप्स या घुटनों की सर्जरी कराने वाले मरीज़। टोटल हिप रिप्लेसमेंट कराने वाले करीब ५० प्रतिशत मरीज़ों को बचाव के लिए दवाएँ न दी जाएँ तो डीप वेन थ्रांबोसिस (डीवीटी) की आशंका रहती है।

-वे मरीज़, जिन्हें हृदयाघात हो चुका है। 

-कैंसर के मरीज़ों को विशेषकर सर्जरी के बाद आशंका रहती है। कीमोथैरेपी ले रहे मरीज़ों को भी थ्रॉम्बोसिस हो सकता है। 

-गर्भवती महिलाएं,गर्भनिरोधक गोलियां ले रही महिलाएं। -धूम्रपान करने वाले लोग(डॉ. इदरीस खान,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल तृतीयांक 2012)।

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गुरुवार, 8 मार्च 2012

विश्व गुर्दा दिवस विशेषः मधुमेह और रक्तचाप हैं गुर्दे के दुश्मन

मधुमेह और उच्च रक्तचाप दो ऐसे हत्यारे हैं जो पीठ के पीछे से वार करते हैं। अक्सर मरीज़ को इन बीमारियों के प्रारंभिक लक्षणों का पता नहीं चलता। गुर्दे इन दोनों बीमारियों के सबसे अधिक जोखिम पर होते हैं। गुर्दों की जाँच का मौका तभी आता है जब वे क्षतिग्रस्त हो चुके होते हैं। देश में अब तक बीमारी हो चुकने के बाद इलाज की जद्दोजहद पर ही ध्यान केंद्रित है। बीमारी की रोकथाम के लिए कभी पहल नहीं की गई। मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसे घातक हमलावरों की पहचान समय रहते होना सभी के हित में है। इन दोनों बीमारियों से खड़ी होने वाली समस्याओं के निराकरण में समाज और परिवार का मूल्यवान धन नष्ट होता है। 

रोगों से बचाव के लिए एक रणनीति की जरूरत होती है। स्वास्थ्य को लेकर देश में अभी हम इतना सुदृड़ ढांचा तैयार नहीं कर सके हैं कि मधुमेह या उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों की रोकथाम समय रहते कर सकें। चिकित्सा विज्ञान की पुस्तकों में दर्ज है कि चालीस साल की उम्र के बाद उच्च रक्तचाप और मधुमेह की नियमित जांच करना चाहिए, लेकिन ये मानक हमारे देश की आबादी पर लागू नहीं होते। पहले ही हमें मधुमेह की राजधानी का दर्जा हासिल है। किशोरावस्था से ही मधुमेह और उच्च रक्तचाप शरीर में घर कर लेते हैं। टीन एज में जहाँ किसी मनपसंद ब्रांच पाने का तनाव होता है वहीं युवावस्था में कैरियर का चुनाव तनावग्रस्त कर देता है। मनमुआफिक लक्ष्य हासिल नहीं कर पाने के कारण तनावग्रस्त युवा उच्च रक्तचाप और मधुमेह के जोखिम के नज़दीक पहुंच जाते हैं। 

दरअसल कॉलेजों में ही उच्च रक्तचाप और मधुमेह की स्क्रीनिंग की जानी चाहिए। इससे न सिर्फ इन बीमारियों को शुरूआती स्तर पर पकड़ने में मदद मिलेगी बल्कि गुर्दों को क्षतिग्रस्त होने से बहुत पहले बचाया जा सकेगा। आज दुनिया के धनाढ्य देश भी अपने नागरिकों को मुफ्त डायलिसिस की सुविधा नहीं मुहैया करा पाते। हमारे जैसे विकासशील देश पर गुर्दों के रोगों का बोझ असहनीय है(संपादकीय,सेहत,नई दुनिया,मार्च प्रथमांक,2012)।

मधुमेह से प्रभावित होती हैं किडनी 
विश्वभर में कैंसर और हृदय रोगों के बाद किडनी रोग मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है। भारत में ही हर साल किडनी फेल होने की वजह से २ लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है। यही नहीं हर साल गंभीर किडनी रोगियों की संख्या के साथ १ लाख नए रोगी जुड़ जाती है। इन सभी को इलाज की ज़रुरत होती है। किडनी रोगियों में से ९ लाख मरीज़ों को डायलिसिस की ज़रुरत होती है लेकिन इनमें से केवल २ प्रतिशत डायलिसिस करवा पाते हैं और ५ प्रतिशत में ही ट्रांसप्लांट हो पाता है। मध्यमवर्गीय मरीज़ों में डायलिसिस का प्रतिमाह का खर्च पूरे परिवार की मासिक आय जितना हो सकता है या फिर इससे अधिक भी हो सकता है। इसका मतलब ये हुआ कि लगभग ९० प्रतिशत मरीज़ इलाज का खर्च वहन नहीं कर पाते।

कारण पर ध्यान दें  
मधुमेह और उच्चरक्तचाप जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ १० में से ६ किडनी रोगियों में गंभीर किडनी रोगों का कारण बनती हैं। भारत को विश्वभर में मधुमेह की राजधानी कहा जाता है इसलिए यहाँ स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। यहाँ के युवा भी इस बीमारी के शिकार होते जा रहे हैं जिससे पूरी स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है। 

मधुमेह रोगियों में किडनी रोगों की आशंका बढ़ जाती है। मधुमेह अनियंत्रित होने पर रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ जाता है। लंबे समय तक इसके बढ़ा हुआ रहने के कारण किडनी में मौजूद बारीक-बारीक रक्तवाहिनियाँ क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। समय के साथ इससे किडनी की कार्य क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ने लगता है। क्षतिग्रस्त होने पर इन रक्तवाहिनियों में रिसाव होने लगता है। फलस्वरुप खून में रहने के बजाय थोड़ी-थोड़ी मात्रा में प्रोटीन पेशाब के ज़रिए शरीर से बाहर निकलने लगता है। इसे माइक्रो एलब्यूमिनयूरिआ कहते हैं।  

माइक्रो एलब्यूमिनयूरिआ किडनी रोग की शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण अवस्था होती है। यदि समय रहते इसका पता लगने पर तुरंत ही इलाज शुरु होने से बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। ध्यान न देने पर समय के साथ रोग बढ़ता ही जाएगा और पेशाब में प्रोटीन की मात्रा बढ़ती चली जाएगी। पेशाब में प्रोटीन की बहुत अधिक मात्रा को मेक्रो एलब्यूमिनयूरिआ कहते हैं। इसके बाद कभी भी किडनी फेलियर की अवस्था आ सकती है। गंभीर किडनी रोग हो जाने के बाद किडनी फिर से पहले की तरह स्वस्थ तो नहीं हो सकती लेकिन कुछ सावधानियाँ बरतने से बीमारी के बढ़ने की दर धीमी हो सकती है। ग्लुकोज़ की मात्रा को नियंत्रित करने के अलावा मधुमेह रोगियों को हर साल एस्टिमेटेड ग्लोमेरुलर फिल्टरेशन रेट (ईजीएफआर) टेस्ट करवाना चाहिए ताकि किडनी की कार्यक्षमता का अंदाज़ा लगाया जा सके। किडनी की कार्यक्षमता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जाता है कि यह प्रतिमिनिट कितना खून फिल्टर करती है। यह ६० मिलिमीटर प्रतिमिनिट से कम हो तो किडनी रोग होने की आशंका होती है। खाने-पीने में सतर्कता बरतने और सक्रिय बने रहने से किडनी रोगों का जोखिम घट जाता है। आहार में प्रोटीन, शक्कर और नमक की मात्रा नियंत्रित रखना चाहिए। स्वस्थ जीवनशैली अपनाने पर मधुमेह और उच्चरक्तचाप जैसे रोगों से बच सकेंगे।

इन बातों का भी रखें ध्यान 
-शक्कर की मात्रा सीमित करने के अलावा मधुमेह रोगी इन बातों का भी ध्यान रखें ताकि किडनी रोग का जोखिम घट सके

-फल, सब्ज़ी और साबुत अनाज, वसा-रहित डेयरी उत्पाद से भरपूर पोषक आहार लें। सैच्युरेटेड फैट, ट्रांस फैट और सोडियम व शक्कर की अधिकता वाले पदार्थों से परहेज़ करें।

-प्रोटीन की मात्रा कम होने से किडनियों का भार कम हो जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि प्रोटीन से पूरी तरह परहेज़ कर लिया जाए। थोड़ी-थोड़ी मात्रा में नियमित रुप से प्रोटीन लेना चाहिए।

-सप्ताह में कम से कम ५ दिनों में ३० से ६० मिनिटों तक शारीरिक श्रम करें। व्यायाम शुरु करने या सक्रियता बढ़ाने से पहले अपने चिकित्सक से सलाह ज़रुर लें।

-दवाओं का डोस अपने मन से निर्धारित न करें। चिकित्सक के निर्देशानुसार ही दवाएँ लें, ख़ासकर वे दवाएँ जो मधुमेह, उच्चरक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने के लिए दी गई हों।

-रक्तचाप नियंत्रित होना चाहिए।

-शराब, तंबाकू और धूम्रपान से दूर रहें। इसके आदि हों तो जल्द से जल्द छुटकारा पाने के प्रयास शुरु कर दें(डॉ. अश्विनी गोयल,सेहत,नई दुनिया,मार्च प्रथमांक 2012)।

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गुरुवार, 7 जुलाई 2011

थैलेसीमिया


(नई दुनिया से साभार)

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शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

आशंका होते ही कराएं ब्लड प्रेशर की जांच

(सेहत,नई दुनिया,जून चतुर्थांक 2011)

स्वास्थ्य-सुख ब्लॉग के स्वामी आदरणीय सुशील बाकलीवाल जी का निम्न रक्तचाप पर आलेख यहां और उच्च रक्तचाप पर यहां है।

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गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

निम्न रक्तचाप में लाभकारी है तालीयोग

ब्लड-प्रेशर की समस्या आज सबसे ज्यादा तेजी से बढऩे वाली समस्या है। कोई लो बीपी से परेशान है तो किसी को हाई बीपी ने अपने चंगुल में जकड़ रखा है। पूरी तरह से फिट व्यक्ति को ढूंढ पाना आज बेहद चुनौती का काम है। हर किसी को किसी न किसी बीमारी ने जकड़ रखा है।

अच्छी सेहत का मालिक होना करोडों की दौलत से ज्यादा मूल्यवान होता है। तभी तो इंसान बेहतर स्वास्थ्य पाने के लिये तमात तरह की कोशिशें करता है। आप इतना कुछ कर ही रहे हैं तो क्यों न आजमाएं इस बेहद कारगर तालीयोग को, जो पूरी तरह से सुरक्षित और बेहद आसान भी है।

गैस, कब्ज, अपच, मानसिक तनाव, एकाग्रता में कमी, चिड़चिड़ापन से पीडि़त हैं तो दायें हाथ की चार अंगुलियों को बाएं हाथ की हथेलियों पर जोर-से मारना चाहिए और इस अभ्यास को सुबह-शाम कम-से-कम 5 मिनट करना चाहिए। धीरे-धीरे हम इन रोगों से मुक्त हो जाएंगे।

निम्न रक्तचाप यानी लो बीपी के रोगियों को खड़े होकर दोनों हाथों को सामने लाकर ताली बजाते हुए नीचे से ऊपर की ओर गोलाकार घुमाएं और दिशा नीचे से ऊपर की ओर होनी चाहिए। यह निम्न रक्तचाप को सामान्य करने में बहुत ही लाभदायक तरीका है। ताली योग के द्वारा हृदय रोग, कमर दर्द, सरवाइकल जैसे रोग भी दूर होते हैं।

कैसे करें ताली योग 
दोनों हाथों की दसों अंगुलियों और हथेली को जोर-जोर से मारते हुए एक साथ एक ही जैसी आवाज में ताली योग का अभ्यास करें।

शुरू-शुरू में इसका अभ्यास कम-से-कम 2 मिनट अवश्य करना चाहिए और फिर इसको बढ़ाते हुए लगभग रोज 10 मिनट तक अभ्यास करना चाहिए(दैनिक भास्कर,उज्जैन,28.4.11)।

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मंगलवार, 25 जनवरी 2011

रक्तदान

किसी की जिंदगी को बचाने से बड़ा पुण्य भला क्या हो सकता है ! शायद इसीलिए लोग ब्लड डोनेट करके एक अलग तरह का संतोष महसूस करते हैं। कोई भी सेहतमंद शख्स ब्लड डोनेट कर सकता है क्योंकि इससे कोई नुकसान नहीं होता। एक्सपर्ट्स की मदद से इस बारे में पूरी जानकारी आपको दे रहे हैं नरेश तनेजा-

ब्लड की बेसिक बातें
- 1901 में ऑस्ट्रिया के डॉक्टर कार्ल लैंडस्टीनर ने तीन इंसानी ब्लड ग्रुपों की खोज की थी। 14 जून को हर साल उनके जन्मदिन पर वर्ल्ड ब्लड डोनर्स डे मनाया जाता है।

- भारत में नैशनल ब्लड डोनेशन डे 1 अक्टूबर को मनाया जाता है।

- ए, बी, ओ और एबी, ये चार ब्लड ग्रुप होते हैं। इन सभी में प्लस और माइनस होता है। ए1बी, ए ग्रुप के ब्लड का सब गुप है, जो पॉजिटिव और नेगेटिव दोनों में पाया जाता है।

- ' ओ' ग्रुप यूनिवर्सल डोनर है। इसके लोग सभी पॉजिटिव ग्रुप वालों को ब्लड दे सकते हैं।

- ' ओ' नेगेटिव वाले सभी ग्रुप के लोगों को दे सकते हैं।

- जरूरी नहीं कि कोई ग्रुप सेम ग्रुप को चढ़ ही जाएगा। डॉक्टर्स मैचिंग करने के बाद ही तय करते हैं कि वह ग्रुप चढ़ने लायक है या नहीं।

- कोई भी ग्रुप उपलब्ध नहीं हो, तो 'ओ' नेगेटिव बेस्ट है। इससे किसी तरह का नुकसान नहीं होता।

कौन दे सकता है, कौन नहीं दे सकता

दे सकते हैं अगर-
- आपकी उम्र 18 से 60 साल (महिला और पुरुष दोनों के लिए) के बीच है।
- वजन 45 किलो या उससे ज्यादा है।
- पल्स और बीपी दोनों ठीक हैं।
- हीमोग्लोबिन (एचबी) कम-से-कम 12.5 है।
- पहले भी ब्लड दिया है तो कम-से-कम तीन महीने बीत चुके हैं।

ये भी दे सकते हैं-
- अगर कोई शख्स किसी बीमारी में आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक या यूनानी दवाएं ले रहा है तो वह ब्लड दे सकता है, बशर्ते उसे कोई गंभीर बीमारी न हो।
- सिगरेट, बीड़ी, तंबाकू, गुटका, ड्रग्स और शराब पीने वाला ब्लड दे सकता है, बशर्ते उसने ब्लड देने से पहले इनमें से कुछ नहीं लिया हो। ड्रिंक किए हुए 24 घंटे हो चुके हों, तभी ब्लड देना सेफ होता है। इन चीजों का खराब असर ब्लड लेने वाले के ब्लड में नहीं जाएगा, बल्कि इससे ब्लड देने वाले के अंग ही खराब होंगे।
- धूल, धुएं, आग-भट्ठी के सामने और केमिकल्स में काम करने वाले ब्लड दे सकते हैं, बशर्ते उन्हें कोई अलर्जी न हो।

नहीं दे सकते-
- किसी भी वजह से जिनकी सेहत ठीक नहीं है।
- प्रेग्नेंट या दूध पिलाने वाली महिलाएं या जिन्हें किसी भी तरह की ब्लीडिंग हो रही हो। पीरियड्स के दौरान भी महिलाएं ब्लड नहीं दे सकतीं।
- जिन्हें वायरल इंफेक्शन है। दरअसल, ब्लड के साथ इंफेक्शन दूसरे शख्स में पहुंचने की आशंका होती है।
- जिन्हें लिवर, हार्ट, किडनी, ब्रेन या लंग्स की बीमारी है।
- जिन्हें अस्थमा, कैंसर या हिपेटाइटिस है या जिनकी बीपी की दवा चल रही है। बीपी कंट्रोल में हो, तो दे सकते हैं।
- थायरॉयड या हॉर्मोंस असंतुलन की बीमारी वाले।
- किसी को खुद ब्लड चढ़ा हो तो उसे एक साल बाद ही देना चाहिए क्योंकि इस दौरान बीमारी ट्रांसफर हो सकती है।
- जिन्हें जिनेटिक डिस्ऑर्डर या दिमागी बीमारी है। डिप्रेशन की दवा खाने वाले भी नहीं दे सकते।
- वे महिलाएं जिनके अबॉर्शन को छह महीने से कम वक्त हुआ है या ऑपरेशन से बच्चा हुए अभी एक साल पूरा नहीं हुआ है।
- जिन्हें कुत्ता काटने का इंजेक्शन लगा है और अभी एक साल पूरा नहीं हुआ है। अगर इंजेक्शन नहीं लगे, तो कभी नहीं दे सकते। - फ्रैक्चर, ऑपरेशन या गॉल ब्लैडर हटे हुए अगर छह महीने पूरे नहीं हुए हैं।
- मिर्गी या कुष्ठ रोग वाले।
- एक से ज्यादा सेक्स पार्टनर रखने वाले।
- जिन्होंने टैटू बनवाया हो। ये लोग टैटू बनवाने के छह महीने बाद दे सकते हैं।
- दांत की फिलिंग या इलाज कराने वाले। ऐसे लोग इलाज के तीन महीने बाद दे सकते हैं।
- मलेरिया और टाइफाइड वाले। मलेरिया वाले ठीक होने के तीन महीने बाद और टाइफाइड ठीक होने के एक साल बाद खून दे सकते हैं।
- टेटनस या प्लेग वाले ठीक होने के 15 दिन बाद दे सकते हैं।
- जिनका वजन एकदम पांच-दस किलो कम हो जाए। ऐसे लोगों को जांच के बाद ही ब्लड देना चाहिए।
- जिन्हें एड्स का कोई भी लक्षण है।
- जिनका हीमोग्लोबिन 18 या 19 से ऊपर चला जाए। (ऐसे लोग कभी नहीं दे सकते।)
- जो इंसुलिन ले रहे हैं। शुगर अगर दवाओं के जरिये कंट्रोल में है तो दे सकते हैं।
- जिन्हें सिरदर्द है या जिनका पेट खराब है।

ब्लड की जरूरत
इन स्थितियों में ब्लड चढ़ाने की जरूरत पड़ती है:
- एक्सिडेंट के मामले।
- डिलिवरी के मामले।
- किसी भी तरह की ब्लीडिंग में।
- सभी बड़े ऑपरेशनों में।
- अंग ट्रांसप्लांटेशन में।
- थैलीसीमिया, एप्लास्टिक एनीमिया, कैंसर के इलाज के वक्त, कीमोथैरपी के वक्त, डायलिसिस, हीमोफीलिया और संबंधित बीमारियों में।
- डेंगू, प्लेटलेट्स की कमी और प्लाज्मा में रेड सेल कम होने पर। इसके अलावा भी बहुत-सी बीमारियां हैं जिनमें ब्लड चढ़ाने की जरूरत पड़ती है।
- एनीमिया है या कमजोरी है, तो ब्लड न चढ़वाएं। ऐसे लोग अपना हीमोग्लोबिन बिना ब्लड चढ़वाए दूसरे तरीकों से भी बढ़ा सकते हैं। जैसे आयरन सप्लिमेंट, आयरन इंजेक्शन या आयरन वाले खानपान से। किसी को ब्लीडिंग है तो पहले ब्लीडिंग रोक दें।

डोनेशन करने वाले रखें ध्यान
देने से पहले
- जब भी खुद को फ्री और स्वस्थ महसूस करें, तनाव में न हों, ब्लड दे सकते हैं।
- सुबह नाश्ता करने के एक-डेढ़ घंटे के अंदर ब्लड दे सकते हैं, पर फौरन बाद नहीं।
- खाली पेट ब्लड नहीं देना है। सामान्य खाना खाने के बाद ही ब्लड दें।
- ईमानदारी से अपनी बीमारियों के बारे में पूरी जानकारी डॉक्टर को दें। यह ब्लड लेने व देने वाले दोनों की सुरक्षा के लिए जरूरी है। यह भी बताएं कि कौन-कौन सी दवाएं ले रहे हैं।
- मान्यता प्राप्त बैंक में ही ब्लड दें। इसकी पहचान उनके फॉर्म पर लिखे लाइसेंस नंबर से हो जाएगी। वे आपको अपना कार्ड देंगे जिस पर पूरी डिटेल लिखी होगी।
- नाको की वेबसाइट से भी मान्यता प्राप्त संस्थानों का पता लगाया जा सकता है।

देने के बाद
- डोनेशन के बाद पांच से दस मिनट आराम करना होता है।
- उस दिन नॉर्मल डाइट ही लें, फिर भी पानी, दूध, चाय-कॉफी, जूस आदि लिक्विड ज्यादा लेना अच्छा रहता है।
- ब्लड डोनेट करने के बाद ड्राइविंग समेत सभी रुटीन काम किए जा सकते हैं।
- ब्लड देने के बाद जिम नहीं जाना है और सीढि़यां भी नहीं चढ़नी हैं। एक दिन के बाद से ये काम भी कर सकते हैं।
- उस दिन स्मोकिंग और ड्रिंक न करें।
- ब्लड देने के तीन महीने बाद ही दोबारा ब्लड दिया जा सकता है। जिनके ब्लड से प्लाज्मा या प्लेटलेट्स लिए गए हैं, अगर उनमें सब कुछ नॉर्मल है, तो वे हफ्ते-दस दिन बाद भी ब्लड दे सकते हैं।

डरें नहीं, कुछ फैक्ट्स जान लें
- ब्लड बैग दो तरह के होते हैं। एक, साढ़े तीन सौ एमएल का और दूसरा साढ़े चार सौ एमएल का। जिनका वजन 60 किलो से कम है, उनसे साढ़े तीन सौ एमएल ब्लड ही लेते हैं। जिनका 60 किलो से ज्यादा है, उनसे साढ़े चार सौ एमएल लिया जाता है।

- डोनेशन के वक्त जितना खून लिया जाता है, वह 21 दिन में शरीर फिर से बना लेता है। ब्लड का वॉल्यूम बॉडी 24 से 72 घंटे में पूरा बना लेती है।

- अगर आप सामान्य ब्लड डोनेशन करते हैं तो आप तीन जिंदगियां बचाते हैं क्योंकि आपके ब्लड में प्लेटलेट्स, आरबीसी और प्लाज्मा होते हैं, जो तीन लोगों के काम आ सकते हैं।

- ब्लड देने से इंफेक्शन नहीं होता क्योंकि इसमें डिस्पोजेबल सिरिंज और सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है।

- अगर किसी का ब्लड एचआईवी पॉजिटिव निकल आए तो ब्लड बैंक द्वारा उसे फोन से जानकारी दी जाती है। फिर सरकारी विभाग को जानकारी दी जाती है, जो पॉजिटिव शख्स को बुलाकर उसकी काउंसलिंग करते हैं। ऐसे शख्स से लिए गए ब्लड को इस्तेमाल नहीं किया जाता। उसे नष्ट कर दिया जाता है।

अकसर पूछे जाने वाले कुछ सवाल
ब्लड डोनेट करने से क्या कमजोरी आती है?
कोई कमजोरी नहीं आती। हां, घबराहट की वजह से कुछ लोगों की पल्स तेज हो जाती है, पसीना आ सकता है, बीपी कम हो सकता है, उल्टी-सी महसूस हो सकती है। किसी-किसी को झटके भी आ सकते है, पर इन सबसे घबराने की जरूरत नहीं है। थोड़ी देर में अपने आप सब ठीक हो जाता। ब्लड देने के बाद कुछ खाने को देते हैं। उससे भी सब ठीक हो जाता है।

लगातार ब्लड देने वालों को एनीमिया जैसी बीमारी हो सकती है?
ऐसा नहीं होता। दरअसल, शरीर में ब्लड की उम्र तीन महीने ही होती है यानी तीन महीने बाद दोबारा रेड सेल्स बनते हैं। अगर ब्लड डोनेट नहीं करेंगे तो सेल तीन महीने बाद खत्म हो ही जाएंगे। बोन मैरो ब्लड बनाता है। इसे नहीं नहीं लिया जाता, सिर्फ रेड सेल लिए जाते हैं। ब्लड देने से कॉलेस्ट्रॉल और चर्बी जैसी चीजें निकल जाती हैं। सौ-सौ बार ब्लड देने वालों का हीमोग्लोबिन भी 14-15 बना रहता है। जो लोग रेगुलर ब्लड देते हैं, वे ज्यादा स्वस्थ रहते हैं। उनके दिल आदि अंग ज्यादा अच्छी तरह काम करते हैं। दिल से संबंधित बीमारी नहीं होती। ऐसे लोगों के चेहरे पर चमक बनी रहती है। पूरा चैकअप भी हो जाता है और समाज सेवा भी हो जाती है।

ब्लड देने के बाद चक्कर आ जाए, तो क्या करें?
अगर खाली पेट ब्लड दे रहे हैं तो कई बार चक्कर आ सकता है। कुछ लोगों को घबराहट, उलटी होना, पसीना आना या थोड़ी देर के लिए कमजोरी महसूस हो सकती है, पर इसमें घबराने की बात नहीं है। ऐसे में थोड़ी देर बैठ जाएं या लेट जाएं और पैरों को ऊपर कर दें जिससे खून का बहाव दिल की तरफ हो जाए। पल्स और बीपी ठीक है तो कपड़े ढीले करके लेट जाएं और आराम करें। माथे और गर्दन पर थोड़ा पानी लगा दें और कुछ पानी पिला दें। पहली बार ब्लड देने वालों के साथ ऐसा हो सकता है। यह स्थिति 5-7 मिनट में ठीक हो जाती है।

कितना समय लगता है ब्लड डोनेशन में?
अगर लाइन न लगी हो, तो फॉर्म भरने से लेकर डॉक्टरी जांच, ब्लड डोनेशन और रिफ्रेशमेंट लेने तक में आधा घंटा लग सकता है।

ब्लड बैंक
- ब्लड बैंक से ब्लड पैसे देकर नहीं लिया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने प्रफेशनल डोनर्स को 1998 में बैन कर दिया था। ब्लड के बदले ब्लड दिया जाता है।
- मजबूरी में बिना डोनर के भी स्वैच्छिक संस्थाएं ब्लड देती हैं। उनके पास अच्छा स्टॉक और ब्लड देने वाले लोगों का डेटा बैंक होता है। इसके लिए चार्ज लिया जाता है।
- अगर मरीज सरकारी अस्पताल में है और इमरजेंसी है तो ब्लड फ्री में ही जाता है, लेकिन सामान्य स्थिति में डोनर चाहिए। कुछ बैंक थैलीसीमिया वालों को फ्री में देते हैं। केस देखकर जरूरत के हिसाब से भी बिना डोनर या पैसे के मिल जाता है।
- दिल्ली में बाहर से आए या एक्सिडेंट और इमरजेंसी मामलों में भी बिना डोनर के ब्लड दे दिया जाता है।
- प्राइवेट अस्पतालों में दाखिल मरीजों को सर्विस चार्ज लेकर ही देते हैं।
- प्राइवेट अस्पताल में एडमिट होने वालों को आमतौर पर प्राइवेट ब्लड बैंक फ्री नहीं देते ।
- कुछ ग्रुप्स भी हैं जो ब्लड डोनेट करते हैं, जिनका पता इंटरनेट से लग सकता है।
- दिल्ली में 53 ब्लड बैंक हैं जिनमें 22 नाको समर्थित हैं।

डोनर्स
- डोनर दो तरह के होते हैं : रिप्लेसमेंट डोनर और वॉलंट्री डोनर।
- रिप्लेसमेंट डोनर के मामले में ब्लड देने के बदले में किसी और का ब्लड लिया जाता है। रिप्लेसमेंट डोनर का कंसेप्ट अब बंद हो रहा है क्योंकि इसमें भी घपले हो रहे हैं। अक्सर इन मामलों में पैसा लेकर खून बेचने वाले प्रफेशनल आकर ब्लड डोनेट कर देते हैं। वे अपना ब्लड बेचते हैं। ऐसा ब्लड लेने में जबर्दस्त रिस्क है।

- अपनी इच्छा से ब्लड देने वालों को वॉलंट्री डोनर कहा जाता है। ब्लड देने के बाद उन्हें पता नहीं कि उनका ब्लड किसे चढ़ाया जाएगा।

कहां करें ब्लड डोनेट
इन संस्थाओं में ब्लड डोनेट किया जा सकता है :

1. इंडियन रेडक्रॉस ब्लड बैंक
पता : रेडक्रॉस रोड, नई दिल्ली-110001
फोन : 2371 1551, 2371 6441/2/3 (एक्स 331, 332),
वेबसाइट : www.indianredcross.org
समय : सुबह 8 से रात 8 बजे तक
दिन : सातों दिन
ये लोग तमाम संस्थाओं में कैंप भी लगाते रहते हैं।

2. लॉयंस क्लब ब्लड बैंक
पता : एके 100, लायंस ब्लड बैंक, नियर ए. एल. ब्लॉक, शालीमार बाग, नई दिल्ली
फोन : 9717 897 500 व 9717 897 520
लैंडलाइन : 4225 8080 व 4225 8494
वेबसाइट : www.lionsbloodbank.org
ईमेल : lionsbloodbank@hotmail.com
समय : सुबह 9 से शाम 6 बजे तक
दिन : संडे समेत सातों दिन फोन करके आएं
ये लोग तमाम संस्थाओं में कैंप भी लगाते हैं। इनके लगभग सभी कर्मचारी रेगुलर ब्लड डोनर हैं।

3. रोटरी क्लब ब्लड बैंक
पता : 56, 57 तुगलकाबाद इंस्टिट्यूशनल एरिया, नई दिल्ली-110062
फोन : 2905 4066/7/8/9
वेबसाइट : www.rotarybloodbank.org
समय : सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक
दिन : सोमवार से शनिवार तक
ये लोग तमाम संस्थाओं में कैंप भी लगाते हैं।

4. स्माइल फॉर ऑल
पता : पीपी-8 पीतमपुरा, नजदीक गोपाल मंदिर, दिल्ली-88
ब्लड ऑन डिमांड उपलब्ध है, जिसके तहत भारत में कहीं भी कभी भी जरूरत पड़ने पर इमरजेंसी निशुल्क रक्तदाता उपलब्ध करवाया जाता है। संस्था के अध्यक्ष जीएस कपूर के मुताबिक, दिन-रात कभी भी इन नंबरों पर संपर्क किया जा सकता है : 9212 131 416 / 9266 666 666 / 9266 616 161 / 9266 636 363. यहां आप ब्लड डोनर के रूप में अपना नाम भी लिखवा सकते हैं। वेबसाइट है : www.smileforall.org

5. सत्य सांई ऑर्गनाइजेशन
श्री सत्य साई सेवा ऑर्गेनाइजेशन के दिल्ली इंचार्ज जतिंदर चीमा का कहना है कि ब्लड लेने वाले इस वेबसाइट पर जाकर अपनी जरूरत बताकर ब्लड ले सकते हैं। वेबसाइट है- www.saidelhi.org

6. सेल्फलैस सर्विस सोसायटी
युवाओं द्वारा बनाई गई यह संस्था वेबसाइट के माध्यम से काम करती है। संस्था के सेक्रेट्री अंशुल का कहना है कि संस्था से बड़ी संख्या में डोनर्स जुड़े हुए हैं। ब्लड डोनेट करने और ब्लड लेने के लिए पूरे भारत में इस वेबसाइट से संपर्क किया जा सकता है।
वेबसाइट- www.selflessservice.org
ईमेल-service.selfless@gmail.com
फोन-999999-6860
समय-किसी भी समय संपर्क किया जा सकता है।
दिन-सातों दिन

ये संस्थाएं ब्लड डोनेशन के लिए स्कूल और कॉलेजों में कैंप लगाती हैं, रेडियो व टीवी पर कार्यक्रम देती हैं और पोस्टर व अखबारों में विज्ञापनों के जरिये भी ब्लड इकट्ठा करती हैं। इन संस्थाओं के अलावा तमाम सरकारी अस्पतालों में जाकर भी ब्लड डोनेट किया जा सकता है।

एक्सर्पट्स पैनल
डॉ. वनश्री सिंह, डायरेक्टर, इंडियन रेडक्रॉस ब्लड बैंक
डॉ. सुनील देवानी, ब्लड ट्रांसफ्यूजन ऑफिसर, कालरा हॉस्पिटल
डॉ. पूनम श्रीवास्तव, मेडिकल डायरेक्टर, लॉयंस ब्लड बैंक
डॉ. अंजू वर्मा, चीफ मेडिकल ऑफिसर, रोटरी ब्लड बैंक
जी. एस. कपूर, अध्यक्ष, स्माइल फॉर ऑल
(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,23.1.11)

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मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

रक्तदान में पुरुषों से पीछे हैं महिलाएं

आज हर क्षेत्र में आगे रहने वाली महिलाएं रक्तदान करने में पुरुषों से पिछड़ रही हैं। वे चाह कर भी रक्तदान नहीं कर पा रही हैं। रक्तदान करने वालों में महिलाओं का आंकड़ा कुल रक्तदाताओं का औसतन 5 से 7 फीसदी है। ऐसा नहीं कि महिलाएं रक्तदान के प्रति जागरूक नहीं बल्कि अच्छी सेहत न होने के कारण ये अनफिट हो जाती हैं, जिससे रक्तदान नहीं कर सकतीं। शिविरों में कुछ महिलाएं ही रक्तदान के लिए फिट साबित होती हैं।

अनफिट होने की सबसे बड़ी वजह है महिलाओं में हीमोग्लोबिन 12 ग्राम से कम होना। इनका अंडरवेट होना दूसरी वजह है। एक और वजह यह भी कि जीरो फिगर व स्लिम लुक के ट्रेंड के चलन को देखते हुए लड़कियां व महिलाएं ‘डाइटिंग’ के फेर में पोषक आहार नहीं ले रही हैं। रक्तदान करने वाले में हीमोग्लोबिन की मात्रा 12.5 ग्राम से ज्यादा, वजन 45 किलोग्राम से ज्यादा व उम्र 18 से 60 साल के बीच होनी चाहिए। महिला गर्भवती या माहवारी के समय रक्तदान नहीं कर सकती।

इसलिए हैं आंकड़ों में फर्क
ब्लड बैंक इंचार्ज डा. विरेंद्र भारती बताते हैं कि गर्भवती व माहवारी के समय महिलाएं रक्तदान नहीं कर सकती। इस वजह से रक्तदान करने वाली महिलाओं की संख्या कम हो जाती है। ज्यादातर महिलाओं में हीमोग्लोबिन की मात्रा लगभग 9 से 10 ग्राम होती है। शहरों में फिगर कांशियसनेस के चलते ज्यादातर महिलाएं व लड़कियां डाइटिंग कर रही हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में पोषक आहार न लेने से वजन कम होता है। कुछ परिवार लड़कियों व महिलाओं को रक्तदान करने से रोकते हैं। लड़कियां वजन कम करने के लिए जरूरी न्यूट्रिएंट्स देने वाले खाद्य पदार्थ लेना भी बंद कर देती है, जिससे उनमें हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है। अम्बाला में पुरुषों के मुकाबले रक्तदान में महिलाओं की भागेदारी 5 से 7 प्रतिशत है।

अंडरवेट बनता है एक बड़ा कारण
148 बार रक्तदान कर सेंचूरियन ब्लड डोनर का खिताब पाने वाले राजेंद्र गर्ग बताते हैं कि कालेजों में ब्लड कैंपों में रजिस्ट्रेशन के लिए काफी लड़कियां आती हैं। मगर इनमें से आधे से ज्यादा लड़कियां अंडरवेट होने के कारण ब्लड डोनेट नहीं कर पाती(दैनिक भास्कर,अम्बाला,13.12.2010)।

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शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

बार-बार खून चढ़ाने से मिलेगी मुक्ति

थैलीसीमिया से पीड़ित बच्चों का इलाज अब पहले से अधिक आसान तरीके से हो सके गा। जेनेटिक विकृति के कारण इस तरह के बच्चों को हर महीने रक्त चढ़ाना पड़ता था। लेकिन डॉक्टरों के एकदल ने बीमारी के लिए कारक जीन की पहचान का दावा किया है जिसके बाद जीन थेरेपी से एक बार इलाज के बाद आजीवन के लिए रक्त नहीं चढ़ना पड़ेगा। जेनेटिक डिसआर्डर के लिए कारक जीन की पहचान विशेष बायोटेक्नॉलॉजी की मदद से की गई है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के हेमेटोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. वीपी चौधरी का कहना है कि बीटासेल्स इंजेक्शन को थैलीसीमिया में रक्त में पाई जाने वाली विकृति को दूर करने की क्षमता पाई गई है। डॉ. चौधरीने बताया कि जीन थेरपी का प्रयोग शुरू होने के बाद बीमारी की पहचान आने के बाद एक से दो बार की जीन थेरेपी से बच्चों की रक्त संबंधी विकृति को दूर किया जा सकेगा। इंजेक्शन के माध्यम से रक्त में पहुंचाया गया नया जीन विकृत जीन की जगह ले लेगा,जिसके बाद यदि दोबारा भी कोई विकृत जीन बनता है तो ट्रांसफ्यूज किया गया जीन उसकी जगह ले लेगा(हिंदुस्तान,दिल्ली,18.11.2010)।

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गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

उच्च रक्तचाप

आधुनिक जीवनशैली आहिस्ते से कब हमें कई गंभीर व घातक बीमारियों का शिकार बना देती है, पता ही नहीं चलता। ऐसी ही एक प्राणघातक बीमारी है ‘हाई ब्लड प्रेशर’, जिसे ‘साइलेंट किलर’ भी कहते हैं। जानकारी के अभाव में हम न तो समय पर इसकी जांच करा पाते हैं और न ही इलाज। परिणामस्वरूप हमें हार्ट अटैक, स्ट्रोक, किडनी फेल्योर, गुर्दे की बीमारी, दृष्टि संबंधी दोष और पैरों में रक्त प्रवाह रुकने जैसी समस्याएं आ घेरती हैं। समय पर जांचः नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स)के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर (डॉ़) कामेश्वर प्रसाद के अनुसार यूं तो हमारे देश में 25साल से अधिक उम्र के लोगों को साल में एक बार बीपी चेक करवाने की सलाह दी जाती है,लेकिन आज की जीवनशैली को ध्यान में रखते हुए बेहतर होगा कि 18 की उम्र से ही लोग इसकी जांच करवाना शुरू कर दें। इसके अलावा, यदि आपकी उम्र 25 से ज्यादा है तो साल में दो बार, 35 से ज्यादा है तो तीन बार, 45 से ज्यादा है तो चार बार और 55 से ज्यादा है तो पांच बार बीपी की जांच करवाएं। यदि आप 65साल से अधिक उम्र के हैं तो जब भी अस्पताल जाएं या डॉक्टर से मिलें, यह जांच अवश्य करा लें। तो हो जाएं सावधान, यदि जांच के बाद आपकी रीडिंग हो.. (कैटेगरी सिस्टोलिक प्रेशरडायस्टोलिक प्रेशर ऑप्टिमल 120 से कम 80 से कम नॉर्मल 130 से कम 85 से कम हाई नॉर्मल 130 से 139, 85 से 89 आप हाई बीपी के शिकार हैं यदि जांच के बाद आपकी रीडिंग है.. स्टेज वन 140 से 159, 90 से 99 (माइल्ड), स्टेज टू 160 से 179, 100 से 109 (मॉडरेट), स्टेज थ्री 180 या ज्यादा 110 या ज्यादा (सिवियर), आइसोलेटेड 140 या ज्यादा 90 या कम सिस्टॉलिक। रीडिंगः आप हाई बीपी के मरीज हैं या नहीं,यह जानने के लिए कम से कम तीन बार इसकी रीडिंग लेकर औसत निकाल लें। यदि औसत सामान्य न आए तो समझ लें कि आप हाई बीपी के शिकार हैं। यदि सिंगल चेकअप में ही रीडिंग 200/120 आए तो समझ लें कि आप हाई बीपी की गिरफ्त में आ चुके हैं। - अधिकांश मरीजों को इसका कारण पता नहीं चलता, इसलिए जांच के दौरान यदि हाई बीपी निकलता है तो इसका कारण पता करें। कई को इसकी वजह से किडनी की बीमारी होने की संभावना रहती है, इसलिए सही ढंग से जांच जरूरी है। यदि रीडिंग 120/80 से ज्यादा हो तो परहेज शुरू कर दें। साथ ही कुछ अन्य बातों का भी ध्यान रखें।
- खाने में नमक कम लें। - खाने में ज्यादा से ज्यादा हरी सब्जियां, फल आदि लें। एल्कोहल कम कर दें। - बीपी नॉर्मल हो जाए तब भी दवा बंद न करें। जीवनभर इसकी दवाएं लेते रहें। - नियमित रूप से व्यायाम, योग करें। तेज चलें, दौड़ें या फिजिकल एक्टिविटीज ज्यादा करें। रोज कम से कम 30मिनट या चार किलोमीटर अवश्य चलें। आपकी गति ऐसी हो कि दस मिनट में कम से कम एक किमी की दूरी तय कर लें। हफ्ते में पांच दिन ऐसा करें। - वजन पर नियंत्रण रखें। सैचुरेटेड फैट कम करें। यदि बीपी लो है तो इसका कारण जानने की कोशिश करें। दरअसल, लो बीपी कोई बीमारी नहीं है। इसके कारण का इलाज जरूरी है। बरतें सावधानीः - किसी भी वयस्क को साल में कम से कम एक बार बीपी की जांच अवश्य करवानी चाहिए। साल में एक बार ईसीजी अवश्य कराएं। - छाती में दर्द, देखने में दिक्कत या लकवा के लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। - जांच के दौरान हाई बीपी निकलता है तो डॉक्टर जितनी बार कहे, जांच कराएं। - घर पर भी बीपी चेक करने की मशीन रखें। अस्पताल में डॉक्टर के पास बीपी चेक करवाने पर ज्यादातर महिलाएं और बड़ी उम्र के लोग डर जाते हैं, जिससे रीडिंग बढ़ जाती है। ऐसा देखा गया है कि अस्पताल में जांच के बाद बीपी की जो रीडिंग आती है, वह सामान्य से पांच मि.मी. ज्यादा होती है। कद्दूः कद्दू,जो हमारे लिए केवल एक सब्जी है, वास्तव में एक उपयोगी फल भी है, जिसका कई तरीकों से इस्तेमाल किया जाता है। इससे कई मजेदार और स्वादिष्ट डिश बनाई जाती हैं। हमें इसके लिए अमेरिका का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसने कद्दू की क्रीम से बिस्कुट जैसी एक डिश तैयार की, जबकि इटली में उससे पुलाव बनाया जाता है। जापानी इसे फ्राई कर कुरकुरा बनाते हैं और फिर इसका स्वाद लेते हैं। पुर्तगाल में कद्दू का सूप तैयार किया जाता है। जहां तक अपने देश का सवाल है, हमारे यहां भी कद्दू को अलग-अलग तरीके से खाया जाता है। बंगाल में इससे कोरमोर चोखा और चोर्चरी बनाई जाती है जबकि दक्षिण में कोट्ट बनाया जाता है, सांभर में इसके शामिल होने से हम सभी परिचित हैं ही। जहां तक उत्तर भारत का सवाल है,मौसम होने पर कद्दू की सब्जी हमारे लंच और डिनर का स्वादिष्ट हिस्सा है । यहां हम आपको श्रीलंका में कद्दू से बनाई जाने वाली करी के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसका ईजाद यहां 1950 के दशक में किया गया था। यहां के सब्जी बेचने वाले एक दिन कद्दू को घर ले गए और इसे करी में डाल दिया। इससे एक ऐसी डिश बन गई, जो स्वादिष्ट भी थी और जल्दी पक जाती थी। यहां पाए जाने वाले लाल कद्दू और सूखी मछलियों में खूब ऊर्जा होती है और करी के साथ मिलकर इसका स्वाद और बढ़ जाता है(सुषमा कुमारी,हिंदुस्तान,19.10.2010)।
अलका सरवत जी ने अपने ब्लॉग मेरा समस्त में लिखा है कि दवा के रूप में चार सौ सालों से प्रयुक्त सर्पगंधा की जड़ों में ''रिसर्पिन '' नामक एल्केलाईड पाया जाता है जो उच्च रक्तचाप की अचूक दवा है। उन्होंने अश्वगंधा को भी उच्च रक्तचाप में बहुत लाभकारी बताया है।

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गुरुवार, 23 सितंबर 2010

उच्च रक्तचाप

मेट्रो शहर से ताल्लुक रखने वाले युवा दिल को नजरअंदाज कर रहे हैं। बात-बात पर यदि आपको गुस्सा आता है और दिनभर में दो घंटे भी तनाव के घेरे में रहते हैं तो सचेत हो जाएं। शुरुआत में एंजाइना के रूप में नजर आने वाला दिल का दर्द दिल की बीमारी बन सकता है।

कब हो जाएं सावधान अगर आप सोचते हैं कि बढ़ती उम्र के साथ अपना दिल भी आपका साथ दे तो इसके लिए दिनचर्या व खानपान में बदलाव करना होगा। दिल्ली डायबिटिक रिसर्च सेंटर के ताजा अध्ययन कहते हैं कि दिल की बीमारी के क्रम में युवाओं की हिस्सेदारी भी बढ़ रही है। पहले 55 से 60 की उम्र में दिखने वाले कार्डिक अरेस्ट अब 40 से 50 साल की उम्र में भी देखा जा रहा है। युवाओं में मूल रूप से सिगरेट व एल्कोहल सेवन की अधिकता उनके दिल के लिए घातक सिद्ध हो रही है, जिसका असर हृदय की धमनियों में संकुचन में देखा जाता है।

साइलेंट किलर है उच्च रक्तचाप दिन भर में 4 से 5 बार यदि आपको गुस्सा सामान्य से अधिक आता है तो इसका सीधा मतलब है आपका दिल बीमारी मुहाने पर खड़ा है। रक्तचाप को दिल की बीमारियों के साइलेंट किलर के रूप में जाना जाता है। चिकित्सक रक्तचाप का प्रमुख कारण अधिक नमक के सेवन को मानते हैं। दरअसल, शरीर में नमक यानी सोडियम पोटेशियम की अधिक मात्रा अनजाने में ही रक्त में पहुंच जाती है। पैकेट में बंद चिप्स, अचार व नमकीन वगैरह में इस तरह का सोडियम पोटेशियम पाया जाता है जो सीधे ब्लड में ग्लूकोज का स्तर बढ़ा देता है। यही कारण है कि चिकित्सक प्रिजरवेटिव फूड की जगह फ्रेश सब्जियां और फाइबर व होल ग्रेन अनाज खाने सलाह अधिक देते हैं।

कब हो जाएं सचेत - कंधों में हल्का दर्द हमेशा बने रहना। - पेट के दाहिनी हिस्से में दर्द व सीने में चुभन। - जबड़ों में हल्की सी टीस भी हृदय रोग का लक्षण है।

किसका रखें ध्यान - 20 से 80 साल के किसी भी व्यक्ति के रक्तचाप का उच्च स्तर (सिस्टोलिक)130 से अधिक निम्न रक्तचाप (डायस्टोलिक) 80 से कम नहीं होना चाहिए। - फास्टिंग में रक्त में शुगर की मात्र 100 एमजी व खाने के बाद (पीपी) में 140 से अधिक न हो। - एलडीएल (बैड कोलेस्ट्राल) की मात्र 100 मिलीग्राम से अधिक हो तो सचेत हो जाएं। - बीएमआई (बॉडी मास इंडेक्स) यदि 23 है तो आप स्वस्थ माने जा सकते हैं।

किससे करें परहेज - खाने में अधिक शुगर और अधिक नमक काब्रोहाइड्रेड का स्तर बढ़ाता है। - फ्रिज में रखे गए फलों की अपेक्षा फ्रेश फल खाएं, फ्रिजर फलों में शर्करा बढ़ जाती है। - रिफाइंड अनाज की जगह 100 प्रतिशत होल ग्रेन व फाइबर युक्त अनाज है सुरक्षित। - सिगरेट, एल्कोहल व तनाव माने गए हैं।(हिंदुस्तान,दिल्ली,21.9.2010)


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शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

लहसुन से ब्लड प्रेशर नियंत्रण

लंदन। लहसुन की गोली अब आपका ब्लड प्रेशर नियंत्रित रखेगी। सदियों से लहसुन को आयुर्वेद चिकित्सा का अभिन्न अंग माना जाता रहा है। अब वैज्ञानिकों ने लहुसन की एक गोली तैयार की है। उनका दावा है कि यह गोली ब्लड प्रेशर और दिल की अन्य बीमारियों के उपचार का बेहतर विकल्प साबित होगी। ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ एडीलेड के वैज्ञानिकों का दावा है कि यह गोली केवल 12 हफ्तों में मरीज के ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने के साथ हार्ट अटैक और स्ट्रोक के खतरे को कम कर देती है। वैज्ञानिकों ने हाई ब्लड प्रेशर से पीडि़त 50 मरीजों पर इस गोली का परीक्षण किया। यह मरीज इससे पहले ब्लड प्रेशर की अन्य दवाईयों का सेवन भी कर रहे थे। प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. केरिन रीड ने बताया,उन लोगों का ब्लड प्रेशर काफी बढ़ा हुआ था। मगर जब हमने उन्हें लहसुन की गोलियां देना शुरू किया तो उनके ब्लड प्रेशर में काफी गिरावट देखी गई। दिल की बीमारियों के साथ यह तनाव को भी नियंत्रित करती है। वैज्ञानिकों ने बताया कि लहसुन शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड और हाइड्रोजन सल्फाइड बनने की प्रक्रिया को तेज करता है। ये रसायन रक्त संचार को दुरुस्त रखते हैं, जिससे ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है। जर्मनी में इन गोलियों को दवाईयों के रूप में लाइसेंस मिल चुका है और डॉक्टर भी इन्हें मरीजों को खाने की सलाह दे रहे हैं(दैनिक जागरण,भोपाल,20.8.2010)।

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मंगलवार, 13 जुलाई 2010

ब्लडप्रेशरःकुछ सामान्य जिज्ञासाएं

पिता जी की उम्र 62 की है। एक साल पहले सीने में दर्द हुआ और यह सिलसिला एक दो महीने में होता रहता है। कभी-कभी तो दिन में कई बार सीने में चुभन होती है जिससे उन्हें काफी तकलीफ होती है। चिकित्सक की सलाह पर सभी जांचे करायीं लेकिन वो सामान्य निकलीं। सांस की बीमारी है और पल्स भी बढ़ी रहती है। - पंकज यादव, फैजाबाद
-पिता जी के विषय में जो आप परेशानी बता रहे हैं यह दिल की बीमारी ये ताल्लुक नहीं रखती है। उन्हें यह परेशानी एलर्जी के कारण हो सकती है। उन्हें सांस की बीमारी के लिए डाक्टर के पास ले जायें और नियमित दवा खिलाएं। कभी-कभी ऐसा होता है व्यक्ति में सांस की परेशानी होती है और दवाएं नहीं ली जाती हैं तो दिल की बीमारी की आशंका पैदा हो जाती है।
अक्सर सिर दर्द बना रहता है और अचानक दिल घबराने लगता है। नींद भी कम आती है। डाक्टर की सलाह पर नींद की दवा लेता हूं। क्या इससे दिल की बीमारी का कोई सम्बन्ध तो नहीं है? - रमेश चन्द्र श्रीवास्तव, लखीमपुर
-आप जो लक्षण बता रहे हैं वह दिल की बीमारी से सम्बन्धित नहीं हैं। यह लक्षण मानसिक सम्बन्धी परेशानी के कारण हो सकते हैं इसलिए आप किसी मनोचिकित्सक की सलाह लें। इसके अलावा खाली पेट नियमित टहलें और व्यायाम भी करें। अगर फिर भी लाभ न पहुंचे तो राम मनोहर लोहिया अस्पताल आकर दिखायें।
2005 में दिल का दौरा पड़ा था। डाक्टर की सलाह पर दवाएं नियमित चलीं लेकिन इस समय दवाएं नहीं खा रहा हूं जिस कारण सीने में दर्द बना रहता है।- उमेश चन्द्र सक्सेना, लखीमपुर
-दिल का दौरा पड़ने पर नियमित दवाएं खायी जाती हैं। इस बीमारी में दो प्रकार की दवा ली जाती हैं। पहली दिल के दौरे को नियंत्रित करने के लिए और दूसरी दोबारा दिल का दौरा न पड़ने के लिए इसलिए आप फिर से दवाएं नियमित खाते रहे। दवाएं हमेशा चलती रहेंगी।
मेरी उम्र 25 वर्ष है। ब्लड प्रेशर की शिकायत है जिसकी दवा चलती है। कभी-कभी पैदल चलने में तकलीफ होती है।- गंगेश गुप्ता, बहराइच
- इतनी कम उम्र में ब्लड प्रेशर की शिकायत होना अच्छी बात नहीं है और यह लक्षण गुर्दे की बीमारी के भी हो सकते हैं। इसके लिए आप रीनल आर्टरी स्नोसिस जांच करायें। कभी-कभी गुर्दे की नसों में सिकुड़न के कारण भी इस प्रकार की शिकायत हो जाती है जिसे इस जांच के बाद ठीक किया जा सकता है। इसके अलावा खाने में नमक कम लें।
मेरी उम्र 30 वर्ष है। बाएं कंधे से लेकर हाथ तक हमेशा दर्द बना रहता है। इसके कारण घबराहट भी होने लगती है और धड़कन अचानक तेज हो जाती है। कहीं ये दिल की बीमारी के लक्षण तो नहीं है? - हर्षवर्धन शुक्ला, गोण्डा
- आप जो परेशानी बता रहे हैं वह जोड़ों की अर्थराइटिस हो सकती है। अगर दिल की धड़कन तेज होती है तो हो सकता है दिल के वॉल्व में सिकुड़न आ गई हो या फिर लीकेज की समस्या हो। विशेषकर कम उम्र में यह परेशानी चिन्ता का विषय है। इसके लिए आप किसी मनोचिकित्सक की सलाह लें और नियमित दवा खायें। परेशानी की कोई बात नहीं। आपकी बीमारी जल्दी ठीक हो जाएगी।
मेरी उम्र 22 वर्ष की है। अचानक घबराहट होने लगती है। सांस भी फूलती है। इसके कारण काफी परेशानी होती है। कहीं ये दिल की बीमारी के लक्षण तो नहीं हैं?-विवेक अवस्थी, लखीमपुर
- इस उम्र में ऐसी परेशानी होना अच्छी बात नहीं है। घबराहट की समस्या आपको सांस फूलने के कारण हो सकती है। इसके लिए किसी मनोचिकित्सक की सलाह लें और नियमित दवा का सेवन करें। साथ ही काम को बोझ समझ कर न करें। व्यायाम करें और दिनचर्या बनायें।
मेरे छोटे भाई की उम्र 30 वर्ष है और वजन 72 किलो है। दो-तीन साल पहले से उसे ब्लड प्रेशर की समस्या हो गई है जो 100/150 तक बना रहता है। माता जी को भी यही समस्या है। उनका ब्लड प्रेशर 80/130 तक बना रहता है।- नीरज त्रिपाठी, बहराइच
- आपके भाई को इस उम्र में ब्लड प्रेशर की समस्या अत्यधिक परेशानी भरी है। इसके लिए खाने में नमक कम लें। नमक बिल्कुल कम न करें। धूम्रपान और अल्कोहल से सम्बन्धित कोई चीज न लें। वजन को नियंत्रित करें जिसके लिए व्यायाम अति आवश्यक है और सुबह खाली पेट अवश्य टहलें। एक-डेढ़ महीने तक नियमित ऐसा करें। इससे वजन के साथ ब्लड प्रेशर भी नियंत्रित हो जाएगा। अगर इसके बावजूद समस्या बनी रहती है तो डाक्टर की सलाह पर दवा का सेवन करें। माता जी का अधिक ब्लड प्रेशर नुकसानदेह है। ब्लड प्रेशर 80/130 के नीचे रहना चाहिए। डाक्टर की सलाह पर जो दवा खा रही है वह नियमित खाती रहें। लाभ न होने पर राम मनोहर लोहिया अस्पताल में आकर दिखायें।
अक्सर तनाव बना रहता है। इस कारण काम में मन नहीं लगता है। नींद भी कम आती है। - इश्तियाक अली, खैराबाद
- काम की भागदौड़ में व्यक्ति समझ नहीं पाता है कि उसे कौन सी शारीरिक परेशानी घेर रही है। तनाव रहना दिल की बीमारी का नहीं बल्कि मानसिक कारण है। इसके लिए किसी मनोचिकित्सक की सलाह लें और काम के दबाव को कम करें।
मेरी पति की उम्र 59 वर्ष है। उन्हें 17 साल से एन्जाइना है। कभी-कभी तकलीफ अधिक बढ़ जाती है। डाक्टर ने सिटी एन्जियों जांच लिखी है। क्या इस जांच से पूरी परेशानी की जानकारी हो जाएगी। - मधु सक्सेना, महानगर
- एन्जाइना की तकलीफ ज्यादा चलने मेहनत का काम करने से बढ़ने लगती है। इसके लिए एन्जियोंग्राफी की जांच सबसे कारगर होती है क्योंकि इस जांच में पूरी समस्या पता चल जाती है। डाक्टर के परामर्श पर जो दवा चल रही है उसे नियमित लेते रहें।
दो महीने से अचानक सिर चकराने लगता है, उल्टी महसूस होती है। दिल की धड़कन तेज चलने लगती है। इस कारण काफी परेशानी होती है। - इमरान अहमद, लहरपुर, सीतापुर
- हो सकता है ये दिल की बीमारी की शुरुआत हो। इसके लिए सभी जांच करायें। इसके बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। इसके अलावा धूम्रपान, तली-भुनी चीजें कम खायें और सुबह अवश्य टहलें।
मेरी उम्र 32 की है। सीने में अक्सर दर्द बना रहता है। पानी पीने के बाद काफी आराम मिलता है। - पंकज श्रीवास्तव, उतरौला
- आपको गैस की तकलीफ हो सकती है जिस कारण यह परेशानी आपको होती है। इसके लिए चिकित्सक के परामर्श पर इण्डोस्कोपी जांच करायें और नियमित दवा का सेवन करें। इसके अलावा तली चीजों का सेवन कम करें।
एक साल से सीने में अक्सर दर्द बना रहता है और भारी-भारी लगता है। तेज चलने पर दर्द काफी बढ़ जाता है। कहीं ये दिल की बीमारी के लक्षण तो नहीं हैं? - रामजी श्रीवास्तव, कृष्णानगर
- आप जिस प्रकार के लक्षण बता रहे हैं वह एन्जाइना के लक्षण हैं। मेहनत व चलते समय दिल को अधिक रक्त की आवश्यकता होती है। इसके लिए चिकित्सक के परामर्श पर जांचें कराएं और नियमित दवा खायें। इस बीमारी में कोलेस्ट्रॉल, ब्लड शुगर, ईसीजी, टीएमटी और आखिर में एन्जियोग्राफी की जांच होती है। दिल की बीमारी में व्यक्ति को अपनी दिनचर्या नियंत्रित करनी चाहिए। साथ ही मौसमी फल, साग-सब्जी का नियमित सेवन करना चाहिए।
एन्जाइना का दर्द के क्या लक्षण है? - उमेश मिश्रा, त्रिवेणी नगर
- रक्त का प्रवाह दिल की नसों के द्वारा होता है, जब इसमें कोलेस्ट्रॉल जमा हो जाता है तो रक्त प्रवाह में रुकावट पैदा होने लगती है। व्यक्ति जब अधिक मेहनत या जल्दी चलता है उस वक्त अधिक रक्त प्रवाह की आवश्यकता होती है। पर्याप्त मात्रा में प्रवाह न मिल पाने के कारण एन्जाइना का दर्द होता है। आराम करने पर इस दर्द से राहत मिलती है।
दिल का दौरा पड़ने पर क्या करना चाहिए? दीपक मिश्रा, सीतापुर
- दिल का दौरा पड़ने पर व्यक्ति को सबसे पहले जमीन पर लिटा देना चाहिए और उसके शर्ट के बटन खोल देना चाहिए। साथ ही खिड़कियां और दरवाजे खोल देना चाहिए, जिससे पर्याप्त हवा मिल सके। अगर घर में एस्पिरीन की गोली हो तो उसे तुरन्त देनी चाहिए। दिल का दौरा पड़ने पर व्यक्ति को चलने नहीं देना चाहिए, क्योंकि मेहनत करने से दिल पर अधिक जोर पड़ता है। दिल का दौरा पड़ने पर व्यक्ति को एक घंटे के अन्दर व अधिकतम तीन घंटे तक अस्पताल पहुंचा देना चाहिए(दैनिक जागरण,लखनऊ,13.7.2010)।

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शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

उच्च रक्तचाप में सावधानी

(हिंदुस्तान,पटना,8.1.10)
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