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बुधवार, 16 मार्च 2011

चिकित्सा और संवेदनहीनता

पिछले दिनों राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में प्रसवोपरांत संक्रमित ग्लूकोज चढ़ाने से हुई 16 महिलाओं की मौत ने एक बार फिर सरकारी तंत्र की पोल खोल दी है। दो सरकारी अस्पतालों के असंवदेनशील रवैये ने दर्जनों परिवारों की खुशियों को छीन लिया है। राज्य सरकार ने भी एक लाख का मुआवजा देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान ली है। सरकारी तंत्र की लापरवाही का यह पहला और शायद आाखिरी मामला नहीं है। सरकारी अस्पतालों में लापरवाही के ऐसे जानलेवा मामले सामने आते ही रहते हैं। कुछ महीनों पहले ही उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊमें ही जापानी इंसेफेलाइटिस का संक्रमित टीका लगाने से तीन बच्चों की मौत हो गई थी। इसी तरह मध्य प्रदेश में खसरे का काफी पुराना टीका लगाने से चार बच्चों की मौत हुई थी। इन मामलों में भी हमेशा की तरह लीपापोती हुई और अस्पताल प्रबंधन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। हमेशा की तरह जांच के नाम पर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। जोधपुर मामले की बात करें तो यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है किमां के बिना इन मासूमों का लालन-पोषण कैसे होगा। संक्रमित ग्लूकोज चढ़ाने से मरीजों को गंभीर हालत में उनके तीमारदारों ने निजी अस्पतालों में भर्ती कराया, जिसमें लाखों रुपये फूंके गए। माना कि मां की मौत से परिवार का आर्थिक सहारा नहीं छिना, लेकिन इस अपूरणीय क्षति के लिए एक लाख रुपये दिया जाना गरीबों के साथ मजाक नहीं तो और क्या है। इन्हीं भुक्तभोगी परिवारों में से एक आरिफ भी था। उम्मेद अस्पताल में भर्ती उसकी पत्नी की हालत एक शिशु को जन्म देने के बाद बिगड़ती चली गई। आनन-फानन में उसे निजी नर्सिग होम में भरती कराया गया। जहां उसे बीस बोतल से ज्यादा खून चढ़ाया गया। जांच और फीस में आरिफ ने लाखों रुपये फूंक दिए, लेकिन रुखसाना की जान नहीं बचाई जा सकी। पत्नी की मौत ने पेशे से मजदूर आरिफ को मानसिक रूप से तो तोड़ा ही, लाखों रुपये गंवाने से उसकी सारी जमा पूंजी भी स्वाहा हो गई।
अब सवाल यह उठता है कि अगर रुखसाना की हालत बिगड़ी तो उसका अच्छे अस्पताल में इलाज कराना सरकार की जिम्मेदारी नहीं थी। क्या इन पीडि़तों का कसूर सिर्फ इतना है कि वे गरीब परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। कम से कम दस लाख रुपये मुआवजा देने की बात गहलोत सरकार ने क्यों नहीं कबूल की। केंद्र सरकार ने भी इन पीडि़तों की सुध नहीं ली। इस मामले में राज्य सरकार ने सारा ठीकरा संक्रमित ग्लूकोज उपलब्ध कराने वाली कंपनी पर मढ़ने में देर नहीं लगाई, जबकि इन अस्पतालों के ऑपरेशन थिएटर में संक्रमण की बात भी सामने आई थी। एक बात और गौर करने वाली है कि ग्लूकोज संक्रमित था तो अस्पताल प्रबंधन को यह पता क्यों नहीं चल सका। अस्पताल में आई दवाओं और अन्य सामानों की गुणवत्ता की जांच करने की जिम्मेदारी आखिर उसी की तो है। इस मामले में वही लीपापोती होनी है, जो सरकारी तंत्र में किसी भी खामी के सामने आने पर होती है। अजीब विडंबना है कि जिन सरकारी डॉक्टरों पर लापरवाही का आरोप है, उन्हीं के सहयोगियों के हाथों में जांच का जिम्मा सौंप दिया गया है। आखिर हम भोली-भाली जनता को कब तक बरगलाते रहेंगे। इस मामले में मानवाधिकार आयोग और महिला कल्याण से जुड़े मंत्रालयों की चुप्पी भी हैरान करती है। किसी ने भी मरीजों को उपचार और पीडि़त परिवारों को मुआवजा दिलाने की कोशिश नहीं की।
अगर यही हादसा मुंबई या दिल्ली के किसी अस्पताल में पेश आया होता तो कितनी हायतौबा मचती, इसका आप अंदाजा लगा सकते हैं। नेतागण से लेकर नौकरशाह तक सबके सब न्याय के मसीहा बनने में देर नहीं लगाते। इंडिया और भारत के बीच यह फर्क कब मिटेगा। पीडि़त परिवार इस मामले के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और पर्याप्त मुआवजे के लिए लड़ने की हैसियत नहीं रखते हैं, लेकिन कम से कम राज्य सरकार तो इस मामले में अपनी संवेदनशीलता दिखाती। आखिर 17 मौतों के लिए जिम्मेदार संबंधित अस्पतालों के डॉक्टरों और प्रशासनिक अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई। आजादी के साठ साल बीत गए, लेकिन सरकारी अस्पतालों की स्थिति में बहुत ज्यादा सुधार नहीं है। यह शर्मनाक है कि जिला अस्पताल में सभी प्रकार की गंभीर बीमारियों का इलाज उपलब्ध नहीं है। कैंसर और हृदय रोगों की तो छोडि़ए, सामान्य बीमारियों के बेहतर इलाज के लिए भी मरीजों को सैकड़ों मील दूर जाना पड़ता है।
यह विडंबना ही है कि हमारी सरकारें हर जिले में अच्छी सुविधाओं वाला एक अस्पताल तक मुहैया नहीं करा पाई। जिला अस्पतालों में अत्याधुनिक मशीनें नहीं हैं। जहां एक्सरे, अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन जैसी सुविधाएं हैं भी तो वहां अक्सर मरीजों को यही जवाब मिलता है कि मशीन खराब है या अच्छी क्वालिटी की नहीं है। स्वास्थ्य क्षेत्र में भारी-भरकम बजट उन डॉक्टरों के वेतन पर खर्च हो रहा है, जो शहरों में बने अपने आलीशान मकानों में ही आराम फरमाते हैं, जबकि उन्हें अस्पताल में ही आवासीय परिसर मुहैया कराया गया है, जिससे वे 24 घंटे उपलब्ध हो सकें। भारी-भरकम वेतन पाने वाले सरकारी डॉक्टर बेखौफ तरीके से निजी अस्पतालों के लिए भी काम कर रहे हैं। सरकारी नौकरी के साथ-साथ निजी प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों पर लगाम कसने की सरकारी कवायद हर जगह टांय-टांय फिस्स हो जाती है। सरकारी डॉक्टरों की अकर्मण्यता मरीजों की जान पर भारी पड़ रही है। आये दिन होने वाली हड़तालों ने मरीजों का जीना मुहाल कर रखा है। गरीब मरीजों के लिए सरकारी अस्पताल ही एकमात्र सहारा हैं, लेकिन डॉक्टरों की असंवेदनशीलता से उन्हें उचित इलाज नहीं मिल पा रहा है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी तो है ही, जो मौजूद हैं वे भी दूर-दराज के इलाकों में जाने को तैयार नहीं है। सरकारी अस्पतालों में चल रही इस मनमानी पर लगाम लगाने की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है।
स्वास्थ्य मद पर होने वाले खर्च का एक बड़ा हिस्सा डॉक्टरों और स्टॉफ के वेतन पर खर्च होने के बावजूद गुणवत्ता पूर्ण इलाज नहीं मिल रहा है। कॉन्ट्रैक्ट पर डॉक्टरों और स्टॉफ की भर्ती भी एक बेहतर कदम है। इससे सरकारी डॉक्टरों की मनमानी तो रुकेगी ही, मरीजों को बेहतर इलाज भी मिलेगा। बदकिस्मती से सरकार अंधाधुंध संसाधन तो झोंक रही है, लेकिन लोगों को सुलभ और सस्ते इलाज की उपलब्धता की स्थिति दयनीय है। जरूरत है कि गरीबों को सस्ता, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध कराने के लिए सरकार को निजी क्षेत्र से हाथ मिलाना चाहिए। लापरवाह और असंवेदनशील कर्मचारियों की भारी-भरकम फौज खड़ी करने की बजाए गरीबों को राशन कार्ड की तरह हेल्थ कार्ड भी मुहैया कराया जा सकता है। सरकार ऐसे अस्पतालों को मदद देकर दोहरे फायदे में रहेगी। एक तो गरीबों को बेहतर इलाज मिलेगा, दूसरी ओर वेतन और अन्य संसाधनों पर भारी-भरकम रकम भी खर्च नहीं करनी पड़ेगी। साथ ही निजी अस्पतालों को भी जवाबदेह बनाया जा सकेगा। शिक्षा क्षेत्र में आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों के लिए निजी स्कूलों में 25 फीसदी सीटें आरक्षित करने का फैसला लेकर सरकार ने सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेदारी में निजी क्षेत्र को शामिल किया है। ऐसा ही प्रयोग स्वास्थ्य क्षेत्र में भी किया जा सकता है।
सरकार को यह बात समझनी होगी कि भारी मात्रा में संसाधन झोंककर वह अपने बलबूते सब कुछ नहीं कर सकती। गैर सरकारी संगठनों और निजी संस्थानों की मदद से जवाबदेही और गुणवत्ता दोनों ही सुनिश्चित की जा सकती है। प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल स्वास्थ्य क्षेत्र में भी अपनाना बेहतर होगा। यूआइडी कार्ड स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने का माध्यम बन सकता है। निजी क्षेत्रों पर सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेदारी डाली जानी चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर डॉक्टरों की कमी को पूरा करने के लिए एक दीर्घकालिक नीति बनानी चाहिए। अफसोस की बात है कि देश में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है। देश में आने वाले दस-पंद्रह सालों में कितने डॉक्टरों की जरूरत है और हर साल कितने लोग डॉक्टरी की पढ़ाई कर इस पेशे में आते हैं, इस बारे में एक राष्ट्रीय सर्वे कराए जाने की जरूरत है। गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए मरीजों को महानगरों की ओर भागना न पड़े, इस बारे में नीति निर्माण की आवश्यकता है। शहरों में भी स्थिति अच्छी नहीं है। विलासितापूर्ण जीवनशैली से भारत हृदयरोग, डायबिटीज जैसी बीमारियों का घर बन गया है। मगर केंद्र सरकार के पास इस बारे में कोई दूरदर्शी नीति नहीं है(अमरीश कुमार त्रिवेदी,दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,16.3.11)।

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शनिवार, 22 जनवरी 2011

पोलियो उन्मूलनःलक्ष्य और उपलब्धियां

पिछले करीब १५ वर्षों से पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम हमारे देश में चलाया जा रहा है। हर व्यक्ति के मन में यह जिज्ञासा है कि हम हमारे लक्ष्य से कितनी दूर हैं एवं छोटी माता के टीकाकरण से मुक्ति की तरह हम पोलियो की दवा हमारे बच्चों को पिलाना कब बंद करेंगे। यह आमजन के लिए अत्यंत चिंता का कारण हो सकता है कि पोलियो पर हमारे देश का ३.८५ करोड़ रुपए प्रतिदिन का खर्च जो प्रतिवर्ष १४०० करोड़ रुपए होता है, को बचा कर देश के अन्य स्वास्थ्य कार्यक्रमों में खर्च कर सकेंगे।

जब यह प्रश्न विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा गठित एक्सपर्ट एडवाइजरी गु्रप (आईईएजी) से पूछा गया तो उनका जवाब था, चाहे कुछ देरी से ही सही परंतु भारत में उच्च गुणवत्ता का निगरानी तंत्र एवं यहां के स्वास्थ्य कर्मियों एवं समाज सेवियों का पूर्ण समर्पण और सेवा भाव हमें अतिशीघ्र लक्ष्य तक पहुंचा देगा।

जिस तरह ब्राजील में पोलियो का उन्मूलन हुआ है उसी तरह का परिदृश्य विश्व स्वास्थ्य संगठन को हमारे देश में भी देखने को मिल रहा है। वर्तमान में विश्व के चार स्थानिक (एंडमिक) देशों में पी १ वायरस का प्रभाव अत्यंत कम देखने में आया है, जिसमें मुख्य रूप से नाइजीरिया व भारत हैं। वर्तमान में भारत में ४२, पाकिस्तान में १३८, अफगानिस्तान में २५ एवं नाइजीरिया में १८ पोलियो के प्रकरण हैं। हमारे लिए यह एक सुखद जानकारी है कि वर्ष २०१० में उत्तर प्रदेश एवं बिहार में पी१ वायरस का कोई भी प्रकरण नहीं पाया गया, बिहार में जो तीन पी१ वायरस के प्रकरण पाए गए हैं, वे नेपाल से आए हुए थे। पोलियो उन्मूलन की रणनीति के अनुसार सफलता पाने के जो चार आधार स्तंभ हैं।

नियमित टीकाकरण, संवेदनशील क्षेत्रों में वृहत्‌ स्तर पर टीकाकरण तथा राष्ट्रीय टीकाकरण दिवसों पर सभी बच्चों को पोलियो की दवा पिलाने में सफलता। १४ वर्र्ष तक के बच्चों में लकवा होने के प्रकरण की जानकारी सूचना जिला टीकाकरण अधिकार अथवा सर्वेलेंस मेडिकल आफिसर अथवा जिला टीकाकरण अधिकारी तक पहुंचाना एवं निराकरण करना कि लकवा पोलियो वायरस से हुआ है अथवा अन्य कारणों से हुआ है। वर्ष २००९ में संपूर्ण विश्व में १६०४ पोलियो के प्रकरण पाए गए थे जो २३ देशों में थे। वर्ष २०१० में १८४१ प्रकरण २० देशों में पाए गए थे। भारत में वर्ष २०१० में उत्तर प्रदेश में मात्र पी३ के १० प्रकरण है जो कि वर्र्ष २००९ में पी१ के ३३, पी३ के ५६८ एवं पी१+ पी३ के एक प्रकरण के साथ ६०२ थे।

वर्र्ष २०१० में भारी वर्षा के बावजूद पी१ का कोई प्रकरण नहीं पाया जाना एवं × ३ के १० प्रकरण पाया जाना हमारे लिए हर्ष का विषय है। इसी तरह बिहार में वर्ष २०१० में मात्र ९ पोलियो के प्रकरण पाए गए हैं, जिसमें पी१ के ३ (जो कि नेपाल के वायरस के कारण हैं) तथा पी३ के ६ प्रकरण पाए गए हैं जो कि, वर्ष २००९ के मुकाबले पी१ के ३८, पी३ के ७९, कुल ११७ के मुकाबले में अत्यंत कम हैं। वर्तमान में यदि हम विभिन्न प्रदेशों की स्थिति का आकलन करें तो उत्तर प्रदेश में १०, बिहार में ९, हरियाणा में १, महाराष्ट्र में ५, जम्मू-कश्मीर में १ एवं झारखंड में ८ प्रकरण पाए गए हैं। जो १७ राजस्व जिलों में हैं, जिसमें पी१ के १८ एवं पी३ के २४ प्रकरण हैं। इस सफलता के पीछे मुख्य रूप से बायवेलेंट दवा का इस्तेमाल है ।

रोटरी अंतर्राष्ट्रीय द्वारा वर्ष १९८५ में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) सी.डी.सी. (सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल) यूनिसेफ के साथ विश्व के सभी बच्चों के लिए यह वादा किया था, कि सन्‌ २००५ तक हम सब मिलकर पोलियो के वायरस से होने वाली विकलांगता को समाप्त कर देगें, इस किए गए वादे में देरी अवश्य हुई है परंतु हम अपने लक्ष्य के अत्यंत निकट हैं।

वर्ष १९८८ में जहां प्रतिवर्ष विश्व मे ३,५०,००० (प्रतिदिन लगभग एक हजार) पोलियो के प्रकरण पाए जाते थे जो घट कर २०१० में ८४१ तक पहुंच गए हैं, इसी तरह भारत में यह आंकड़ा लगभग ५०० प्रतिदिन का था जो कि अब घट कर प्रतिवर्ष मात्र ४२ रह गया है। रोटरी का इस कार्यक्रम में सहयोग अभूतपूर्व रहा है। भारत का यह सहयोग प्रति रोटरी सदस्य रुपए ६१६०० है।

यदि पोलियो विश्व से समूल खत्म हो जाता है जो हम पोलियो पर प्रतिवर्ष होने वाले १ अरब ५० करोड़ रुपए के खर्च को बचा सकेंगे जिसे अन्य स्वास्थ्य कार्यक्रमों में व्यय किया जा सकेगा। एक नवीन अध्ययन के अनुसार यह पाया गया है कि यदि हम विश्व से पोलियो उन्मूलन में पूर्ण रूप से सफल हो गए तो ८० लाख बच्चों पर खर्च होने वाले ४० से ५० अरब अमेरिकी डॉलर के व्यय को वर्ष २०१२ और उसके पश्चात्‌ बचा सकते हैं ।

उक्त रिसर्च १०४ देशों में की गई थी, उक्त रिसर्च में यह भी जानकारी दी गई है कि वर्ष १९८८ के मुकाबले पोलियो के ९९ प्रतिशत प्रकरण समाप्त हो चुके हैं, एवं ऐसी संभावना है कि वर्ष २०१२ तक संपूर्ण विश्व पोलियो से मुक्त हो जाएगा । मार्गरेट चान (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि रोटरी अभी तक ८.२ मिलियन डॉलर खर्च चुकी है, वह विश्व के १२ लाख रोटरी सदस्यों की अभूतपूर्व सकारात्मक सोच का परिणाम है। आगामी रोटरी वर्ष "जुलाई २०११" में जब भारतीय मूल के रोटरी अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष (भारत के तीसरे) कल्याण बनर्जी अपना पदभार ग्रहण करेंगे तब तक विश्व से पोलियो वायरस लगभग उन्मूलित हो चुका होगा।

पोलियो उन्मुलन कार्यक्रम की सफलता रोटरी अंतर्राष्ट्रीय जैसे समाजसेवी संगठनों के मनोबल को बढ़ाएगी। नेशनल टेक्निकल एडवाइजरी ग्रुप (एनटीएजी) द्वारा सन्‌ २००८ में भारत सरकार को रुबेला टीकाकरण एवं मिजल्स टीकाकरण हेतु आग्रह किया गया है, वह हमारे देश में भी लागू किया जा सकेगा। थाइलैंड एवं श्रीलंका जैसे देश इस संदर्भ में हमारे लिए प्रेरणास्रोत रहेंगे जहां पर इस कार्यक्रम को नियमित टीकाकरण कार्यक्रम में सम्मिलित कर लिया गया है(डॉ. नलिनी लंगर,नई दुनिया,22.1.11) ।

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गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

ठंड में फिटनेस

ठंड में ज्यादातर लोग घर से बाहर नहीं निकलना चाहते। मजबूरन बाहर निकलना पड़े तो खुद को पूरी तरह पैक करके जाते हैं। कोई भी सर्दी के को चुनौती देने की हिमाकत नहीं करता। इस मौसम में शारीरिक शिथिलता हर किसी पर हावी होती है। ज्यादातर लोग खुद को गर्म रखने के लिए हाई कैलोरी वाली चीजें खाते हैं। इनसे से शरीर में अतिरिक्त वसा बन जाती है, जो हानिकारक है। ठंड में इस एक्स्ट्रा कैलोरी बर्न करने की इस समस्या का हल यहां जानिए :

खुद को फिट रखने के लिए और एक्स्ट्रा कैलोरी बर्न करने के लिए आप घर बैठ कर ही कुछ आसान से तौर-तरीकों को अपनाकर एक्सरसाइज कर सकते हैं।

कॉर्डियोवेस्कुलर वर्कआउट: सर्दियों में शरीर में अतिरिक्त वसा का प्रभाव सबसे ज्यादा हृदय पर पड़ता है। इसका दिल की धड़कनों पर बुरा असर होता है। वजन बढ़ने की समस्या भी इस मौसम में होती है। इससे निपटने के लिए आप घर पर ही कॉड्रियोवेस्कुलर ट्रेनिंग से जुड़ी आसान एक्सरसाइज कर सकते हैं। इसमें आपको 20 मिनट या इससे थोड़ा ज्यादा समय तक ऐसे व्यायाम करने होंगे, जो आपके दिल की धड़कनों को सामान्य से तेज कर दें।

घर पर आजमाई जाने वाली कॉर्डियोवेस्कुलर ट्रेनिंग के तहत आप अपनी जगह पर ही खड़े होकर जॉगिंग कर सकते हैं, रस्सी कूद सकते हैं, लगातार 20 से 25 बार उछल सकते हैं, घर की सीढ़ियों में दो तीन बार तेजी से उपर नीचे कर सकते हैं। इनमें से हर एक को आजमा सकते हैं। हर तरह के व्यायाम को 5-5 मिनट के लिए किया जा सकता है। यह तरीके आपके बाहर निकलने की परेशानी को भी दूर कर देंगे, साथ आपके दिल को हमेशा जवां रखेंगे।

मांसपेशियों व जोड़ों से जुड़ा वर्कआउट: सर्दियों में मांसपेशियों का जकड़ जाना आम है। इसके अलावा इस मौसम में हड्डियों के जोड़ों में दर्द बना रहता है। इसके लिए घर पर ही कुछ खास तरह के व्यायाम करें। मांसपेशियों को व्यायाम के जरिए ही आराम दे सकते हैं। पुश-अप और पुल-अप मांसपेशियों को लचीला बनाए रखने का आसान तरीका है। घर पर ही व्यायाम के कुछ उपकरणों के जरिए भी मांसपेशियों की जकड़न दूर की जा सकती है। डंबल और रबर ट्यूब से भी वार्मअप किया जा सकता है। जोड़ों के दर्द को दूर करने के काम करते हुए भी कुछ मिनट का ब्रेक लें और बैठे बैठे ही हाथ और पैरों के जोड़ को घुमाते रहें(हिंदुस्तान,दिल्ली,26.12.2010)।

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बुधवार, 24 नवंबर 2010

यूपीः क्या गांवों में डाक्टर की तैनाती ही है इलाज़?

सैद्धांतिक रूप से यह सही है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने चिकित्सकों को प्रोन्नति के लिए अपनी नियुक्ति से चार वर्ष गांवों में बिताने की व्यवस्था की, लेकिन मौजूदा स्थितियों में इस व्यवस्था पर अमल मुश्किल ही है। ऐसा न करने वाले चिकित्सकों की प्रोन्नति तो तब रोकी जाएगी जब कोई चिकित्सक गांव में चार वर्ष सेवा देने से इनकार करेगा। राज्य सरकार इससे अवगत ही होगी कि एक बड़ी संख्या में चिकित्सक महज इसलिए सरकारी नौकरी छोड़ दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाएं न देनी पड़ें। इसके चलते ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों में एक बड़ी संख्या में चिकित्सकों के पद रिक्त हैं। राज्य सरकार यह कहकर कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर सकती कि उसने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवा नियमावली में संशोधन कर चिकित्सकों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करना अनिवार्य कर दिया। यदि इस व्यवस्था के कोई बेहतर परिणाम सामने नहीं आते हैं तो फिर इस निर्णय का कोई मूल्य नहीं। बेहतर होता कि राज्य सरकार उन कारणों पर गौर करती जिनके चलते एक बड़ी संख्या में चिकित्सक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवा की ओर रुख ही नहीं कर रहे हैं। यह आश्चर्यजनक है कि राज्य सरकार ने वस्तुस्थिति से अवगत होते हुए भी सैद्धांतिक रूप से सही नजर आने वाली नीति तो बना दी, लेकिन इस नीति से डाक्टरों के प्रोत्साहित होने की कोई व्यवस्था नजर नहीं आती। राज्य सरकार के नीति-नियंताओं को इसका अहसास होना चाहिए कि बिना किसी प्रोत्साहन के चिकित्सक ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाएं देने के लिए शायद ही तैयार हों। इस संदर्भ में केवल इस अपेक्षा के भरोसे रहने का कोई मतलब नहीं कि चिकित्सकों को अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करने के लिए आगे आना चाहिए। नि:संदेह, चिकित्सकों से ऐसी अपेक्षा की जाती है, लेकिन यह भी देखना चाहिए कि जो चिकित्सक ऐसा करने के लिए तैयार हैं उन्हें कैसी सुविधाएं मिल पा रही हैं? यह किसी से छिपा नहीं कि उत्तर प्रदेश में सरकारी स्वास्थ्य ढांचा लगातार संसाधन विहीन होता जा रहा है और अब तो स्थिति यह है कि अनेक जिलों में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र प्राथमिक एवं अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के मानकों को भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं(संपादकीय,दैनिक जागरण,लखनऊ,24.11.2010)।

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गुरुवार, 18 नवंबर 2010

इस सीजन में सतर्कता

ठंड के दिनों में सर्द तेज हवा और तेज धूप से त्वचा को बचना जरूरी होता है। अगर तेज सर्द हवा से हम त्वचा को बचाने में नाकाम रहते हैं तो इसकी पहली परत यानी एपिडर्मिस पर असर पड़ता। एपिडर्मिस में असर से कोशिकाएं टूटने लगती हैं तो त्वचा में झुर्रियां पड़ने लगती हैं। दूसरी ओर जाड़े में तेज धूप सनबर्न पैदा कर सकती है और त्वचा में एलर्जी हो सकती है। इसलिए.. - सर्द हवा के असर को कम करने के लिए अपनी त्वचा के मुताबिक कोल्ड क्रीम और माइश्चराइजर इस्तेमाल करें। - एंटी रिंकल क्रीम का इस्तेमाल करें और फेशियल करें। - चेहरे व शरीर पर विटमिन ई से युक्त क्रीम लगाएं। - एक्सफोलिएशन कराएं। कंडीशनिंग कराना न भूलें। - चेहरे को हलके हाथों से साफ करें। सर्दियों में त्वचा के मृत कोशों को हटाने के लिए तेज स्क्रब न करें। - अंडा एक अच्छा फेस मास्क है। इससे त्वचा में प्रोटीन जाता है और यह त्वचा में कसाव लाने में मदद करता है।
धूप से बचाव के तरीके - पंद्रह या इससे ज्यादा एसपीएफ वाली सनस्क्रीन क्रीम लगा कर निकलें। यह सूर्य की रोशनी से पैदा करने वाली पराबैंगनी किरणों को रोक सकती हैं। - होठों पर अच्छे किस्म का सनब्लॉक लगाएं। यह 20 या ज्यादा एसपीएफ का होना चाहिए। - धूप का चश्मा पहनें और लंबी आस्तीनों वाली कमीज।
सर्दी-जुकाम आम सर्दी को मेडिकल की भाषा में वायरल राइनाइटिस कहते हैं। सर्दी-जुकाम किसी भी मौसम में हो सकता है, लेकिन जाड़ों में इसका प्रकोप कुछ ज्यादा ही होता है। दरअसल, जुकाम या सर्दी ऊपरी सांस संक्रमण है। सर्दी-जुकाम के लिए 200 तरह के वायरसजिम्मेदार होते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा जिम्मेदार राइनोवायरस होते हैं। आम जुकाम एक सप्ताह में ठीक हो जाता है, लेकिन अगर यह ज्यादा खिंचता है तो कान, फेफड़ों या साइनस में बैक्टीरियाजनित संक्रमण हो सकता है। अगर आपको इसकी वजह से कान दर्द, साइनस, बदन में अकड़न, सांस लेने में तकलीफ या घरघराहट महसूस हो या तेज बुखार हो तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।
फूड-एलर्जी जाड़े में अंडे, दूध और मूंगफली आदि का इस्तेमाल बढ़ जाता है, लेकिन कुछ लोगों को इनसे एलर्जी हो सकती है। कुछ खास फलों से भी एलर्जी हो सकती है। एलर्जी से उल्टी आ सकती है। पेट दर्द, चेहरे और आंखों में सूजन डायरिया के लक्षण हो सकते हैं और खाना निगलने में तकलीफ जैसे लक्षण भी दिखते हैं। शरीर में खुजलाहट और मतली की समस्या भी हो सकती है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर के पास जाएं और एलर्जी टेस्ट कराएं। जिन चीजों से एलर्जी हो उनका इस्तेमाल तुरंत बंद करें। फूड एलर्जी से एनाफाइलेक्सिस हो सकता है जो जानलेवा भी सकता है। जाड़ों में निकलने वाली चटख धूप से स्कीन एलर्जी हो सकती है। धूप से त्वचा जल जाती है। जाड़ों में सूरज की धूप से शरीर के खुले अंगों मसलन गर्दन, पीठ, हथेलियों के पीछे और हाथ में दाने हो सकते हैं। धूप पड़ते ही उसमें खुजली, जलन होने लगती है। यह सौरकिरणों से एलर्जी होती है जिसे फोटोएलर्जिक लक्षण कहते हैं। कई बार यह एलर्जी सनस्क्रीन, कॉस्मेटिक या डियोड्रेंट जैसे अन्य प्रसाधन सामग्री में मौजूद रसायनों से सूरज की रोशनी की प्रतिक्रिया के दौरान पैदा हो सकती है। गर्भनिरोधक गोलियों, उच्च रक्तचाप की दवा, हृदयाघात रोकने वाली दवा या मानसिक बीमारियों के लिए दवा का इस्तेमाल कर रहे लोगों को इस एलर्जी होने की संभावना रहती है। इन दवाओं का इस्तेमाल करने वाले धूप में निकलने से पहले डॉक्टर से सलाह लें।
ऑस्टिओ आर्थराइटिस ऑस्टिओ आर्थराइटिस बुढ़ापे की गठिया है, जो जोड़ों की उम्र भर की टूट-फूट से उपजती है। कूल्हे, घुटने और रीढ़ में इसका खास असर होता है। हाथ की अंगुलियां भी इससे प्रभावित होती हैं। पुराने हड्डी रोग, चोट, संक्रमण, जन्मजात विकार और मोटापे से यह पैदा हो सकती है। इससे ग्रसित लोगों की तकलीफ जाड़े में काफी बढ़ जाती है। जोड़ों में दर्द, उनका कमजोर पड़ना, मांसपेशियां कमजोर होना और उनका अपने स्थान से खिसक जाना इस रोग के लक्षण हैं। जब ऑस्टियो आर्थराइटिस का दर्द या सूजन उभरे तो दवाएं राहत दे सकती हैं। जोड़ों में सेंक भी दर्द और सूजन को कम करता है। कुछ लोगों को बर्फ की सिंकाई से भी आराम मिलता है। जोड़ों की ताकत लौटाने और मांसपेशियों को मजबूत करने के लिए खास व्यायाम की भी जरूरत पड़ती है। फिजियोथेरेपी से भी इसे काफी हद तक काबू किया जाता है। ज्यादा खराब जोड़ों को सुधारने या बदलने के लिए ऑपरेशन होते हैं। गठिया ऑस्टियो ऑर्थराइटिस का सबसे आम रूप है।
ब्रोंकिअल अस्थमा ब्रोंकिअल अस्थमा को दमा भी कहते हैं। इसमें श्वास नली सिकुड़ जाती है। यह सिकुड़न अस्थायी होती है, पर जब तक यह सिकुड़न रहती है तब तक सांस लेना कठिन रहता है। ठंड के दिनों में इसका ज्यादा असर दिखता है। दरअसल, इन दिनों प्रदूषण के कारण हवा में नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाइक्साइड बढ़ जाती है। खर-पतवार, पेड़-पौधों को पराग कण, पालतू जीव-जंतुओं की झड़ी हुई खाल जैसी चीजें दमा के लगभग एक-तिहाई मामलों में इसके पैदा होने की वजह बन सकती हैं। केक-बिस्कुट और बेकरी की दूसरी चीजें, अचार, जैम, सॉस और कई डिब्बाबंद चीजों में डाले जाने वाले प्रिजरवेटिव भी इसे उकसा सकते हैं। कुछ दवाएं और खानपान में इस्तेमाल होने वाले रसायन भी इसका कारण बनते हैं। आजकल इनहेलर प्रयोग करने की सलाह दी जाती है। इसके कई लाभ हैं। इससे दवा तुरंत श्वास नलियों में पहुंचती है और कोई साइड इफैक्ट भी नहीं होता।
क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस क्रॉनिक ब्रोकाइंटिस सांस की नली की सूजन है। इससे फेफड़े में बलगम पैदा होती है। बार-बार खांसी आती है और सांस लेने या छोड़ने में तकलीफ होती है। दम फूलने लगता है और घरघराहट होने लगती है। यह बीमारी जाड़े के दिनों में खतरनाक हो जाती है। ज्यादातर मामलों में क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस पचास वर्ष की आयु के आसपास होती है। धूल, धुएं, सिगरेट, बीड़ी से इसके पीड़ितों को तकलीफ होती है। अगर ब्रोंकाइटिस की वजह से खांसी आती है तो ठंड के दिनों में कमरे को गर्म रखें। गरम तरल पदार्थ लें। भाप लें जिससे बलगम तरल होकर निकल जाए। ऑक्सीजन देकर डॉक्टर इसे काबू में लाते हैं। ब्रोंकोडाइलेटर जैसी दवाओं से इसका प्रभाव कम होता। श्वास संबंधी योग क्रियाओं से लाभ मिलता है।
(अनुजा भट्ट,हिंदुस्तान,दिल्ली,16.11.2010)

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शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

भारत में स्वास्थ्य की स्थिति पर विश्व बैंक की रिपोर्ट

सदियों से यह बात कही जा रही है कि स्वास्थ्य ही धन है। लेकिन स्वास्थ्य के मोर्चे पर भारत की स्थिति चिंताजनक है। इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि विश्व बैंक के २०१० के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के २३ फीसदी टी.बी., ८६ फीसदी डिपथिरिया, ५४ फीसदी कुष्ठरोग, ४२ फीसदी पोलियो, २२ फीसदी टिटनेस और ५५ फीसदी मलेरिया के रोगी भारत में ही रहते हैं। सवाल है कि भारत में रोगियों की संख्या इतनी अधिक क्यों है? इसके पीछे कई वजहें हैं जैसे कि प्रति व्यक्ति डॉक्टरों की उपलब्धता, अस्पताल में बिस्तरों की उपलब्धता, धन की कमी और व्यवस्था में व्याप्त खामियों के कारण स्वास्थ्य के मोर्चे पर हमारा प्रदर्शन बेहतर नहीं है। केवल विकसित देशों की तुलना में ही नहीं, विकासशील देशों के तुलना में भी हमारे देश में स्वास्थ्य संबंधित मूलभूत संरचना और संसाधनों की कमी है। भारत में प्रत्येक साल प्रति व्यक्ति केवल २९ डॉलर ही खर्च किया जाता है। इस २९ डाल्ॅार के खर्च में केंद्र और राज्य सरकार के द्वारा संयुक्त रूप से प्रत्येक साल प्रति व्यक्ति २ से ३ डॉलर ही खर्च किया जाता है। बाकी पैसे निजी तौर पर खर्च किए जाते हैं। लेकिन "ए सब ग्रुप ऑन हैल्थकेयर फाइनेंशिंग एंड इंश्यूरेंस" ने स्वीकृत किया है कि स्वास्थ्य सेवाओं पर सार्वजनिक खर्च कम से कम जीडीपी का २.५ फीसदी जरूर होना चाहिए। इसलिए संप्रग सरकार से आशा की जा रही थी कि वह स्वास्थ्य सेवाओं पर जीडीपी का ३ फीसदी खर्च करेगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। फिलवक्त भारत में सार्वजनिक तौर पर जीडीपी का ०.९ फीसदी पैसा ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किया जाता है। इसमें केंद्र सरकार के द्वारा ०.२९ फीसदी और राज्य सरकार के द्वारा ०.६१ फीसदी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किया जाता है। इसमें से ६३ फीसदी पैसा मजदूरी और वेतन देने में ही चला जाता है। इसके बाद कम ही पैसा दवा, उपकरण और मूलभूत संरचना के लिए बच पाता है। इसलिए नीतिकारों को इस और ध्यान देना चाहिए कि इस देश की ४१ करोड़ जनता की दैनिक आमदनी १.२५ डॉलर से भी कम है। इससे एक बात साफ तौर पर जाहिर होती है कि भारत का एक बहुत बड़ा तबका ऐसा है जिसकी जिंदगी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर करती है। इस ओर इसलिए भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है कि भारत की अर्थव्यवस्था विकास दर की परिधि में चक्कर काट रहा है। इस साल भारत का जीडीपी ७.४ फीसदी है और अगले साल आठ फीसदी से अधिक होगा, ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है। ऐसे में विकास के पथ पर उन लोगों को भी समाहित करने की जरूरत है जो हाशिए पर जिंदगी के अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वैसे भी भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां समाज के निचले तबके के कल्याण को प्राथमिकता मिलना चाहिए(कुमार विजय का यह आलेख नई दुनिया,5.11.2010 में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से जूझता भारत शीर्षक से प्रकाशित हुआ है)।

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मंगलवार, 2 नवंबर 2010

ताकि आप रहें हेल्दी

रोजाना लाइफ में अपनी हेल्थ को लेकर लापरवाह रहने वाले लोग कोई परेशानी आने पर एक दम से हेल्थ को लेकर बेहद परेशान हो जाते हैं। बेहतर होगा कि हम ऐसी कोई नौबत आने से पहले ही रोजाना लाइफ में कुछ ऐसे चेंज कर लें कि हमारी फिटनेस बरकरार रहे। भले ही आपको काम की आपाधापी में पूरी नींद लेने का वक्त नहीं मिल पा रहा हो, लेकिन ध्यान रहे कि अगर यह सब लंबे समय तक चलता रहा, तो आपके लिए काफी नुकसानदायक हो सकता है। आप न सिर्फ दिन के वक्त में उनींदे रहने लगेंगे, बल्कि किसी सिंपल टास्क पर भी फोकस नहीं कर पाएंगे। बेहतर होगा कि ऐसी किसी भी परेशानी से बचने के लिए आप रोजाना कम से कम सात घंटे की नींद जरूर लें। अच्छी नींद के लिए बेड रूम में टेलिविजन, कंप्यूटर और दूसरे गैजेट्स को इस्तेमाल ना करें। सोने से तुरंत पहले खाना ना खाएं, बल्कि सोने और खाने में कम से कम दो घंटे का गैप होना चाहिए। कोशिश करें कि रोजाना सोने और उठने का टाइम एक सा ही हो। अगर आपका बेड रूम आराम दायक होगा, तो आपकी नींद खुद ब खुद गहरी हो जाएगी। हो सकता है कि शुरुआत में गर्म पानी पीना आपको थोड़ा अजीब लगे, लेकिन आखिरकार ये आपके लिए काफी फायदेमंद रहेगा। यह न सिर्फ आपकी पूरी बॉडी को प्यूरीफाई कर देगा, बल्कि शरीर से गैरजरूरी तत्वों को निकाल भी देगा। गर्म पानी पीने से आपकी बॉडी का डाइजेसिव सिस्टम अच्छी तरह काम करेगा और आपकी स्किन पर भी चमक आ जाएगी। अगर पिछले दिनों आई कुछ रिसर्चों पर गौर करें, तो इंटरनेट पर समय बिताने वालों की संख्या काफी तेजी से बढ़ रही है। खासतौर पर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर तो लोग कुछ ज्यादा ही समय बिताने लगे हैं। अगर आप अपनी हेल्थ बेहतर रखना चाहते हैं, तो आपको खुद से पूछना होगा कि पिछले हफ्ते आपने इंटरनेट पर कितना वक्त बिताया और उसका क्या फायदा हुआ? बेहतर होगा कि अपनी हेल्थ की खातिर आप इंटरनेट पर वक्त बर्बाद करने की बजाय कोई और हॉबी पाल लें। आप चाहें, तो कुछ नया सीख सकते हैं या फिर लोगों से मिलने की हॉबी बना सकते हैं। जरूरी नहीं है कि खुद को फिट रखने के लिए आप रोजाना जिम जाकर भारी-भरकम वेट उठाएं। अपने आस-पड़ोस के किसी पार्क या सड़क पर रोजाना 30 मिनट की ब्रिस्क वॉक भी आपको फिट रख सकती है। इसके अलावा, आप घर पर भी एक दिन छोड़कर एक दिन एक्सरसाइज कर सकते हैं। साथ में योगा और मेडिटेशन करने से भी फायदा होगा। इस सब के अलावा, वॉकिंग, साइकिलिंग, स्विमिंग और डांसिंग से भी आपको अपनी बॉडी की शेप परफेक्ट बनाए रखने में मदद मिलेगी। अगर आपने आखिरकार इस बुरी आदत से छुटकारा पाने का मूड बना लिया है , तो आपके लिए बेहद अच्छा होगा। अगर आपके लिए अकेले स्मोकिंग छोड़ना मुश्किल हो रहा है , तो आप अपने फैमिली मेंबर्स , डॉक्टर , फ्रेंड्स और को - वर्कर्स की मदद ले सकते हैं। आपको यह बात अच्छी तरह समझनी होगी कि बेहतर हेल्थ से स्मोकिंग बेहद नुकसानदायक है। इसलिए आप जितनी जल्दी छोड़ देंगे आपके लिए उतना अच्छा रहेगा। अगर आप अपना वेट कम करने का प्लान बना रहे हैं , तो एकदम से खाना - पीना बंद करने की बजाय प्लानिंग करें। कोशिश करें कि हेल्दी खाना खाएं , जिससे आपका वजन ना बढ़े। मसलन छोटे - छोटे मील्स में हेल्थी डाइट ले सकते हैं। अगर आप इमोशनल ईटर हैं , तो टीवी देखते वक्त स्नैक्स कतई ना खाएं , वरना आपको पता ही नहीं लग पाएगा कि आपने कितने स्नैक्स खा लिए। कोशिश करें कि अपने खाने में ज्यादा वेजिटेबल और और फ्रूट्स शामिल करें। इस तरह ना सिर्फ आप फिट रहेंगे , बल्कि उलटी - सीधी चीजें खाने से भी बचेंगे। आपकी बॉडी के साथ - साथ दिमाग को भी एक्सरसाइज की जरूरत होती है। इसलिए कभी कभार गेम्स खेलकर या पजल सॉल्व करके अपने दिमाग की भी एक्सरसाइज करते रहा कीजिए। माइंड रिचार्ज करने के लिए जिग्सा पजल भी एक अच्छा मीडियम है। (नवभारत टाइम्स,31.10.2010)

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गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

सेहत के क्रेज़ में लोकप्रिय होती चीज़ें

आजकल बड़ों के साथ ही तुम यानी कि हमारे स्मार्ट और स्टाइलिश दोस्त भी सेहत और स्टाइल को लेकर बहुत ही कॉन्शस हो गए हैं। युवाओं की देखा-देखी बच्चों में भी सेहत बनाने और स्मार्ट दिखने का ट्रैंड काफी जोर पकड़ रहा है और इसमें उनके घरवाले भी पूरी हेल्प कर रहे हैं। बच्चों में आ रहे सेहत बनाने के इस नए ट्रैंड में कौन सी चीजें ज्यादा कारगर और फेमस हो रही हैं, पेश है विजय मिश्र की रिपोर्टः

बच्चों में हेल्थ को लेकर ज्यादा जागरूकता आयी है, इसमें कोई दो राय नहीं और इसमें बहुत बड़ा योगदान टीवी पर आने वाले बच्चों के कार्यक्रमों का भी रहा है। एक तरफ जहां बच्चों में अपनी नॉलेज को बढ़ाने के लिए इंटरनेट यूज करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है तो वहीं दूसरी तरफ ये बच्चे हेल्थ को लेकर भी उतने ही सजग हो रहे हैं। और इसके लिए ये अलग-अलग माध्यमों का सहारा ले रहे हैं, जिनमें खेल-कूद से लेकर योग तक सभी कुछ शामिल है। खेलों के चयन में भी इस बात का विशेष तौर पर ख्याल रखा जाता है कि कौन सा खेल खेलने से बढ़ते शरीर पर अच्छा या बुरा असर पड़ सकता है। मुख्य तौर पर हेल्थ को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए बच्चे आज भी खेल-कूद को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। इनमें खासतौर से बास्केटबॉल, लॉन्ग जंप, पुश अप, जिमनास्ट, डांसिंग, स्विमिंग ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं।

बास्केटबॉल

स्कूलों में बच्चों की लंबाई और स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए मुख्यतौर पर बास्केटबॉल को ही चुना जाता है। आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि बास्केटबॉल खेलना बच्चों की लंबाई के लिए फायदेमंद है। अमूमन यह देखने में आता है कि बच्चों को क्रिकेट और फुटबाल खेलने में ज्यादा आनंद आता है, लेकिन शुरुआती दौर में ये खेल खेलना शरीर के लिए फायदेमंद साबित नहीं होते हैं, क्योंकि इनमें पूरे शरीर के बजाय कुछ खास अंगों का ही ज्यादा उपयोग होता है। बास्केटबॉल के अलावा कुछ और भी ऐसे खेल हैं, जो बच्चों की रुचि के होने के साथ ही काफी लाभप्रद भी हैं, जैसे कि बैडमिंटन, टेबल टेनिस, साइकिलिंग इत्यादि।

डांसिंग

फिटनेस बनाने और शरीर में लचीलापन, फुर्ती लाने के लिए डांसिंग सबसे इंटरटेनिंग जरिया है। इसको करने में जहां बच्चों का भरपूर मनोरंजन होता है, वहीं शरीर के हर अंग की एक्सरसाइज भी हो जाती है। साउथ दिल्ली में रहने वाले पन्द्रह वर्षीय राहुल ने बताया कि मैं रोज स्कूल से आने के बाद शाम को डांसिंग क्लास करने के लिए जाता हूं। जहां मेरा इंटरटेनमेंट तो होता ही है, साथ ही खूब जमकर एक्सरसाइज भी हो जाती है। वहीं गुड़गांव के एक मशहूर डांस क्लब में रोजाना जाकर अभ्यास करने वाली चौदह वर्षीय दीपिका ने कहा कि शुरुआत में तो मुझे डांसिंग क्लास जाने में बहुत ही बोरियत होती थी, लेकिन दस-पंद्रह दिनों के बाद मुझे इसमें बहुत मजा आने लगा और मैंने इसके जरिए अपना दो किलो वजन भी कम कर लिया है।

स्विमिंग

आसान सी लगने वाली स्विमिंग वास्तव में हेल्थ के लिए बेहतरीन एक्सरसाइज है और इसको करने के लिए मेट्रो शहरों के बच्चे बहुत ही दिलचस्पी ले रहे हैं। इसके पीछे मुख्य वजह स्टेटस सिंबल को दिखाना भी है। स्विमिंग सीखने और करने के लिए किसी न किसी क्लब का मेंबर बनना पड़ता है या मोटी फीस देनी पड़ती है, जिसके कारण चाहकर भी इसको करने वालों की संख्या काफी कम है। लेकिन पिछले दो-तीन सालों में स्विमिंग करने वालों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है। स्विमिंग करने से सबसे बड़ा फायदा स्टेमिना बढ़ाने में होता है। इसके साथ ही स्विमिंग ब्रेथ रेट को भी बेहतर बनाता है।

इनडोर गेम

इनडोर गेम बच्चों की फिजिकल हेल्थ से ज्यादा मेंटल हेल्थ को मजबूत करने में ज्यादा कारगर हैं। ऐसे खेलों में फिजिकल लेबर काफी कम होता है। हेल्थ को चुस्त रखने के लिए इनडोर गेम का अपना अलग ही महत्त्व है। ये बच्चे के अंदर क्रिएटिविटी पैदा करने और उसके आई क्यू लेवल को बढ़ाने में सहायक हैं। मेट्रो शहरों में जहां घर बहुत बड़े नहीं होते हैं, वहां पर इनडोर गेम ही बच्चों के मनोरंजन का मुख्य जरिया हैं। इनडोर गेम्स में मुख्य रूप से मेमोरी गेम, क्ले गेम, स्टेट कैपिटल, शतरंज इत्यादि आते हैं।

आउटडोर गेम

शरीर को फुल एनर्जी से भरने के लिए आउटडोर गेम ही बच्चों की नजर में पहले पायदान पर हैं। हां, ये अलग बात है कि आउटडोर गेम खेलने के लिए आपके साथ दोस्तों की एक टीम तो होनी ही चाहिए, क्योंकि आउटडोर गेम खेलने का आनंद तभी आता है जब आपके दोस्तों की टोली आपके साथ मौजूद हो। इसके साथ ही इस तरीके के खेलों से बच्चों के अंदर स्वस्थ माहौल में कॉम्पिटीशन करने की भावना भी आती है। आउटडोर गेम्स के जरिए बच्चे के अंदर समाज में उठने-बैठने से लेकर अपने आपको साबित करने की भी क्षमता डेवलप होती है। आउटडोर गेम्स में प्रमुख हैं फुटबॉल, क्रिकेट, बास्केटबॉल, बालीवॉल, टेनिस, हॉकी, जिमनास्टिक इत्यादि।

योग है सदा के लिए

सबसे लेटेस्ट और लोकप्रिय ट्रैंड है योग। एक सर्वे के मुताबिक, योग करने वाले बच्चों की याददाश्त और बच्चों से कहीं ज्यादा बेहतर होती है। इसके अलावा नियमित तौर पर बीस मिनट का योग करने वाले बच्चों का कॉन्फिडेंस लेवल भी आम बच्चों से अच्छा पाया गया।

फायदेमंद बातें कॉन्फिडेंस बढ़ाने में सहायक शरीर स्वस्थ और आकर्षक बना रहता है अनावश्यक कैलोरी को नियंत्रित करता है बढ़ती प्रतिस्पर्धा में काम करने की क्षमता में होती है वृद्धि शारीरिक और मानसिक ताकत होती है मजबूत

क्या सावधानी बरतें

नए खेल को खेलने से पहले उसकी ट्रेनर से पूरी जानकारी लें अकेले स्विमिंग करने न जाएं आउटडोर गेम खेलते वक्त अपनी क्षमताओं को धीरे-धीरे बढ़ाएं विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें डॉक्टर की सलाह के बिना सप्लीमेंट न लें जरूरत से ज्यादा वेटलिफ्टिंग न करें एक्सरसाइज करते वक्त डंबल अपनी क्षमता के मुताबिक ही उठाएं

एक्सपर्ट की राय

बच्चों की हेल्थ के लिए फ्लेक्सीबिलिटी, स्ट्रेंथ, स्टेमिना और इनडोरेंस एक्सरसाइज प्रमुख हैं। इसके लिए पारंपरिक खेलों की बजाय स्विमिंग, डांसिंग और बास्केटबॉल जैसे खेल ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं।

डॉ. आर.पी. सिंह हेड ऑफ डिपार्टमेंट दिल्ली इंस्टिटय़ूट ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन एंड रिहेबिलिटेशन साइंसेज, पंजाबी बाग

प्रयास

बदलते दौर में हम यही कोशिश करते हैं कि सभी स्कूलों में ज्यादा से ज्यादा खेलों का आयोजन हो सके। सरकार का पूरा ध्यान इस बात पर रहता है कि बच्चों को जितना ज्यादा हो सके, सुविधाएं मुहैया करवाई जा सकें।

प्रदीप कुमार पांडेय चेयरमैन विद्यालय कल्याण समिति, दिल्ली सरकार

(हिंदुस्तान,27.10.2010)


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