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शनिवार, 7 मई 2011

हेपेटाइटिस की हर्बल दवा

स्वास्थ्य एवं सौन्दर्य प्रसाधन के हर्बल उत्पाद बनाने वाली कंपनी हिमालया ड्रग ने लिव 52 एसबी पेश की है। इस दवा का प्रयोग हेपेटाइटिस बी संक्र मण के इलाज में किया जाता है। कंपनी ने एक बयान में बताया कि लिव 52 एचबी हेपेटाइटिस बी की असरकारक दवा है और इसे 14 साल के शोध के बाद विकसित किया गया है। यह बहुत किफायती है और इसका एक "˜पूरा कोर्स" 4,680 रुपए का पड़ता है। इसके एक कैप्सूल का दाम 6.5 रुपए के करीब है(राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली संस्करण,7.5.11 में मुंबई से रिपोर्ट)।

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शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

फरीदाबादःबढ़ रहे हैं हैपेटाइटिस के मामले

हेपेटाइटिस को ज्यादातर लोग गंभीरता से नहीं लेते लेकिन यह एक लाइलाज बीमारी है। फरीदाबाद शहर के लोगों को भी अब यह बीमारी अपने आगोश में ले चुकी है। स्वास्थ्य विभाग के इस साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो अब तक हेपेटाइटिस के कुल 26 मामले सामने आए हैं।

दूषित पानी हो सकता है कारण
हेपेटाइटिस बीमारी का कारण दूषित पानी भी हो सकता है। इस इस बात से जिला अस्पताल के सीनियर डॉ . वीरेंद्र यादव भी इत्तफाक रखते हैं। डॉ . यादव का कहना है कि इस बीमारी में मुख्य रूप से लीवर में सूजन आ जाती है। गंदे पानी से हेपेटाइटिस - ए का वायरस सबसे तेजी से फैलता है। यह एक लाइलाज बीमारी है। वैसे तो कई मामलों में हेपेटाइटिस - ए का वायरस अपने आप खत्म हो जाता है लेकिन कई बार ऐसे मामले भी सामने आ जाते हैं जब यह बीमारी बढ़कर हेपेटाइटिस - बी का रूप ले लेती है और सबसे ज्यादा खतरनाक साबित होती है। हेपेटाइटिस - बी का वायरस कई बार जानलेवा साबित हो सकता है।

रक्तदान सीवरों के सैंपल से खुलासा
शहर में ज्यादातर लोगों में इस बीमारी के बारे में जागरूकता का अभाव है। अब तक जो ये 26 मामले सामने आए हैं ये सभी रक्तदान में आने वाले ब्लड की टेस्टिंग के बाद सामने आए हैं। इसके लिए सबसे जरूरी यह है कि लोगों में जागरूकता हो। हालांकि जिला अस्पताल में सिर्फ ब्लड डोनेशन कैंपों में आने वाले ब्लड में से ही इसकी जांच की जाती है। अलग से अगर कोई हेपेटाइटिस की जांच करवाना चाहे तो इसकी सुविधाअस्पताल में उपलब्ध नहीं है।

समय पर पता चले तो हो सकता है इलाज
बल्लभगढ़ स्थित एम्स के सीनियर मेडिकल ऑफिसर डॉ . संजय रॉय ने बताया कि अगर हेपेटाइटिस के शुरुआती लक्षणों की पहचान कर ली जाए तो दवाइयों के जरिये इस बीमारी से निजात पाई जा सकती है। कई मामलों में यह बात स्पष्ट भी हो चुकी है , लेकिन यह जरूरी है कि सही समय पर इस बीमारी के बारे में पता चल जाए। उनका कहना है कि एड्स की तरह इस बीमारी की जांच भी करा लेनी चाहिए(नवभारत टाइम्स,फरीदाबाद,वर्षांत-2010)।

नोटःइस ब्लॉग पर कुछ ही दिन पूर्व हैपेटाइटिस पर एक विस्तृत आलेख प्रकाशित किया गया था जिसे यहां देखा जा सकता है।

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बुधवार, 15 दिसंबर 2010

हैपेटाइटिस

हेपटाइटिस बड़ी समस्या बनकर सामने आ रहा है। वजह यह कि लोग इसके बारे में ज्यादा नहीं जानते, इसलिए जांच आदि से दूर रहते हैं। साथ ही, बहुत-से मामलों में इसके लक्षण लंबे वक्त के बाद नजर आते हैं। जब तक पता चलता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। बीमारी की जानकारी मिलने के बाद भी बहुत-से लोग इसे लाइलाज मानकर इलाज नहीं कराते, जबकि वक्त पर जांच और इलाज हो तो मरीज पूरी तरह से ठीक हो सकता है। साथ ही, वैक्सीन यानी टीका लगवा लेने से भी न सिर्फ खतरा कम होता है, बल्कि महंगे इलाज से भी बचा जा सकता है। एक्सपर्ट्स से बात करके पूरी जानकारी दे रही हैं प्रियंका सिंह :

क्या होता है हेपटाइटिस
हेपटाइटिस का मतलब है लिवर (जिगर) की सूजन। यह ग्रीक शब्द है, जिसमें हेपेटिक का मतलब होता है लिवर और आइटिस का मतलब सूजन। लिवर हमारे शरीर का अहम हिस्सा है, जो शरीर से जहरीले पदार्थ निकालता है, खाना पचाने में मदद करता है, एनर्जी स्टोर करता है, ब्लीडिंग रोकता है और इन्फेक्शन से लड़ने में मदद करता है।

लिवर की खासियत यह है कि किसी तरह का नुकसान होने पर खुद ही उसकी भरपाई कर लेता है, लेकिन लंबे वक्त तक सूजन या इन्फेक्शन रहे तो लिवर को स्थायी तौर पर नुकसान पहुंच सकता है। हेपटाइटिस ऐसी ही बीमारी है। यह वायरस से होता है। हेपटाइटिस का वायरस कई बार शरीर में आने के बरसों बाद तक मरीज को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता, जबकि कुछ मामलों में यह शरीर को नुकसान पहुंचाने लगता है। यह एक्टिव और इनएक्टिव, दोनों तरीकों से शरीर में रहकर उसे नुकसान पहुंचा सकता है।

कैसे-कैसे वायरस
हेपटाइटिस वायरस यों तो पांच तरह का होता है - ए, बी, सी, डी और ई लेकिन डी कॉमन नहीं होता और बहुत ही गिने-चुने मामलों में नजर आता है। इसे डेल्टा वायरस कहा जाता है। यह बी के साथ ही अटैक करता है, वह भी गिने-चुने मामलों में। लेकिन अगर यह एक बार होता है तो मुश्किलें बढ़ा देता है। मरीज को पेट में पानी आने या कैंसर की आशंका बढ़ जाती है। तब मरीज का इलाज लंबा चलता है और ट्रीटमेंट मुश्किल हो जाता है। यह कई बार घातक भी साबित होता है। वैसे, हेपटाइटिस ए, बी, सी और ई को ही मेन वायरस माना जाता है। मोटे तौर पर लक्षणों और नुकसान के आधार पर हेपटाइटिस ए और ई व बी और सी को एक साथ रखा जा सकता है।

हेपटाइटिस ए और ई
इन दोनों का वायरस पानी और खाने के जरिए शरीर में आता है। वायरस का इन्फेक्शन होने के 15 से 45 दिन में लक्षण सामने आते हैं। अच्छी बात यह है कि ज्यादातर सभी मामलों में ए और ई वायरस खुद-ब-खुद चला जाता है। हेपटाइटिस ए की वैक्सीन है, लेकिन खास जरूरत नहीं समझी जाती, क्योंकि यह जानलेवा नहीं है।

वजह: खराब खाना खाने या पानी पीने से
लक्षण: उलटी, बुखार और पीलिया। ये लक्षण करीब चार हफ्ते तक चलते हैं। इसके बाद मरीज की हालत में सुधार होने लगता है।

इलाज: इसमें अलग से कोई खास इलाज नहीं होता। बुखार या दूसरे लक्षणों की दवा दी जाती है और मरीज को पूरा आराम करना होता है। साथ में विटामिन बी कॉम्प्लेक्स और विटामिन सी की टैब्लेट या कैप्सूल दिए जाते हैं और पौष्टिक खाने की सलाह दी जाती है। करीब 4-6 हफ्ते में मरीज नॉर्मल हो जाता है। ये दोनों वायरस लंबे समय तक जीवित नहीं रहते। इक्का-दुक्का मामलों में लिवर फेल्योर हो सकता है। लिवर फेल्योर होने से करीब हफ्ते, 10 दिन पहले से मरीज की मानसिक स्थिति खराब होने लगती है। उसकी याददाश्त कम होने लगती है और वह बेहोश हो सकता है। उस हालत में लिवर ट्रांसप्लांट ही इकलौता इलाज बचता है। इसमें 10 लाख रुपये से 25 लाख रुपये तक का खर्च आता है। साथ ही, सही लिवर डोनर की भी जरूरत होती है।

हेपटाइटिस बी और सी
बी और सी वायरस का इन्फेक्शन होने के करीब डेढ़ से दो महीने बाद लक्षण नजर आते हैं। जिन मामलों में एक महीने से चार महीने में लक्षण नजर आ जाते हैं, उन्हें एक्यूट कहा जाता है। इन्फेक्शन को छह महीने से ज्यादा हो जाए तो वह क्रॉनिक कहलाता है। ऐसा होने पर मरीज के पूरी तरह ठीक होने के आसार कम हो जाते हैं। हालांकि क्रॉनिक के मामले कम ही होते हैं। जिनको बचपन में यह इन्फेक्शन होता है, ज्यादातर उन्हीं में बड़े होने पर क्रॉनिक हेपटाइटिस होता है।

एक्टिव या इनएक्टिव, दोनों ही फॉर्म में हेपटाइटिस बी या सी वायरस लिवर पर बुरा डाल सकता है। एक्टिव होने पर बुरा असर जल्दी दिखने लगता है। बी 70 फीसदी मामलों में और सी करीब-करीब सभी मामलों में क्रॉनिक बनता है क्योंकि इसका पता काफी देर से चलता है इसीलिए इसे साइलेंट किलर भी कहा जाता है। इन्फेक्शन के छह महीनों में इसके कोई लक्षण सामने नहीं आते और 20 फीसदी लोगों के शरीर से वायरस खुद बाहर निकल जाता है, लेकिन 80 फीसदी मामलों में वायरस लिवर के अंदर मौजूद रह जाता है। इनमें से 20 फीसदी में एक दशक के अंदर लिवर सिरोसिस (लिवर का सिकुड़ जाना) हो जाता है और तब जाकर बीमारी का पता चलता है, जबकि 25 पर्सेंट में समस्या की शुरुआत जॉन्डिस से होती है।

वजह: अल्कोहल, स्टेरॉयड, प्रदूषित सूई, प्रदूषित खून, सेक्सुअल ट्रांसमिशन के अलावा बच्चे को मां से हो सकता है। यलो फीवर, विल्संस डिसीज और डेंगू भी कई बार हेपटाइटिस की वजह बनता है। इसके अलावा, टीबी, कैंसर, दिल की कुछ दवाओं और एंटी-बायोटिक दवाओं मसलन, आईजोनाइजिड Isoniazid (टीबी), पैरासिटामोल Paracetamol (बुखार), पाइराजिनामाइड Pyrazinamide (एंटीबायोटिक खासकर टीबी में ), एमिनोड्रेरोन Amiodarone (दिल की बीमारी ), क्लोरप्रमाइजिन Chlorpromazine (दिमागी बीमारियां खासकर सिजोफ्रेनिया) इबो-प्रोफीन Ibuprofen (पेनकिलर), ऑगमेंटिन augmentin (एंटीबायोटिक) आदि लिवर को नुकसान पहुंचा सकती हैं और हेपटाइटिस की वजह बन सकती हैं।

नोट : यहां हम दवाओं के जेनरिक नाम दे रहे हैं। आप जिस भी ब्रैंड की दवा ले रहे हैं, उसके रैपर पर जेनरिक नाम भी लिखा होता है।

ध्यान रहे कि मरीज की छींक या खांसी, उसके साथ खाने या पानी पीने, हाथ मिलाने या गले लगने, बच्चे को पीड़ित मां का दूध पिलाने आदि से नहीं फैलता है।

लक्षण : भूख न लगना, वजन कम होना, पीलिया, बुखार, कमजोरी, उलटी, पेट में पानी भर जाना, खून की उलटियां होना, रंग काला होने लगना, पेशाब का रंग गहरा होना आदि। स्मोकिंग करनेवाले लोगों को स्मोकिंग से विरक्ति हो सकती है। शुरुआत में कोई लक्षण नजर नहीं आता। अगर लगातार पीलिया रहे, खून की उलटियां हों, रंग काला पड़ने लगे, वजन बहुत कम हो जाए, पाखाने में खून आए तो समझना चाहिए कि लिवर पर असर आ गया है।

नुकसान : हेपटाइटिस बी और सी में लिवर फाइब्रोसिस (लिवर का सख्त होना) और लिवर सिरोसिस (लिवर का सिकुड़ जाना) होने की आशंका बहुत ज्यादा होती है। फाइब्रोसिस बहुत बढ़ जाए तो सिरोसिस हो जाता है। ऐसा होने पर लिवर अपना काम सही से नहीं कर पाता। सिरोसिस के बहुत-से मामले इलाज न होने पर कैंसर में बदल जाते हैं, बल्कि कैंसर के करीब 90 फीसदी मरीज सिरोसिस वाले ही होते हैं। मोटे तौर पर हेपटाइटिस बी के करीब 20 फीसदी और सी के करीब 4 फीसदी मरीजों में कैंसर की आशंका होती है। कई बार इलाज के बाद भी कैंसर के चांस बने रहते हैं, खासकर हेपटाइटिस बी में क्योंकि ज्यादातर मामलों में इसका वायरस शरीर में बना रहता है। ऐसा वायरस के न्यूक्लियस से जुड़ने पर होता है। ऐसे में कभी-कभी मरीज को पूरी जिंदगी दवा खानी पड़ सकती है। डॉक्टर जांच के बाद ही बता सकते हैं कि इलाज कितना लंबा चलेगा।
नोट : अल्कोहल बहुत-से मामलों में हेपटाइटिस की वजह बनती है। अगर हेपटाइटिस न हो तो भी अल्कोहल की वजह से सिरोसिस हो सकता है। हेपटाइटिस बी या सी का मरीज शराब पीता है तो लिवर को और नुकसान पहुंचता है। ऐसे में शराब से दूरी हेपटाइटिस की आशंका कम कर देती है। कम-से-कम यह ऐसी वजह है, जिसे आप रोक सकते हैं।

टेस्ट और इलाज
हेपटाइटिस बी या सी का आसानी से पता नहीं लगता। इसके लिए कुछ टेस्ट कराए जाते हैं : ब्लड टेस्ट, ताकि वायरस की मौजूदगी पता लगाए जा सके।

लिवर फंक्शन टेस्ट (एलएफटी) : सरकारी अस्पतालों में फ्री, बाकी जगह 350 से 600 रुपये में

पेट का अल्ट्रासाउंड : सरकारी अस्पतालों में फ्री, बाकी जगह 450 से 800 रुपये में

वायरस टेस्ट (वायरल सिरॉलजी) : 1000 से 1500 रुपये में

पीटी (आईएनआर) टेस्ट : 200 रुपये

डीएनए (हेपटाइटिस बी पॉजिटिव आने पर) : 6000 से 6500 रुपये

आरएनए (हेपटाइटिस सी पॉजिटिव आने पर) : 6000 से 6500 रुपये

वायरस जिनोटाइप टेस्ट : 11 से 18 हजार रुपये

नोट : यहां दिए गए टेस्टों की कीमत अनुमानित है। अलग-अलग हॉस्पिटल में रेट अलग-अलग हो सकते हैं। हेपटाइटिस बी और सी का इलाज काफी लंबा और महंगा होता है। प्राइवेट अस्पतालों में करीब 3-4 लाख रुपये तक का खर्च आ सकता है।

इलाज के दौरान दिए जाने वाले इंटरफेरॉन इंजेक्शन से मरीज को सिरदर्द, बुखार, चिड़चिड़ापन, भूख न लगना, उलटी आदि हो सकती है। इलाज के दौरान कुछ मरीज बेहद कमजोरी भी महसूस करने लगते हैं, जो धीरे-धीरे ठीक हो जाती है।

प्रेग्नेंसी और हेपटाइटिस
मां को अगर हेपटाइटिस है तो बच्चे के भी इससे पीड़ित होने की आशंका बढ़ जाती है। प्रेग्नेंसी के दौरान सही इलाज न हो तो महिला को ब्लीडिंग हो सकती है और बच्चे व महिला, दोनों की जान जा सकती है। अगर मां को पहले से मालूम है कि उसे हेपटाइटिस है तो उसे डॉक्टर को जरूर बताना चाहिए। डॉक्टर दवा देंगे, जिससे बच्चे में वायरस जाने के चांस कम हो जाते हैं। जिन महिलाओं को हेपटाइटिस बी का टीका लगा है, उन्हें भी प्रेग्नेंसी के दौरान जांच करानी चाहिए क्योंकि कई बार टीका फेल भी हो जाता है। जन्म के बाद भी बच्चे को टीका लगाकर बीमारी से बचाया जा सकता है।

कैसे बचें हेपटाइटिस से
हेपटाइटिस ए और ई से बचाव के लिए जरूरी है कि हम साफ खाना खाएं और साफ पानी पिएं।
हेपटाइटिस बी और सी से बचाव के लिए निम्न बातों का ध्यान रखें :
ऐसे हॉस्पिटल या ब्लड बैंक से ही खून लें, जहां ढंग से चेक करने के बाद ही खून लिया जाता हो।
टैटू से बचें। इन्फेक्टेड सूई हेपटाइटिस की वजह बन सकती है।
दांत का इलाज अच्छे हॉस्पिटल से कराएं, जहां इक्वेपमेंट्स की साफ-सफाई का ध्यान रखा जाए।
अल्कोहल से बचें। हेपटाइटिस होने के बाद तो बिल्कुल न पिएं। अगर शराब पीते हैं तो पैरासिटामोल (क्रोसीन आदि) की ज्यादा डोज लेने से बचें।

हेपटाइटिस बी के टीके लगते हैं और काफी असरदार होते हैं। एक्सपर्ट्स इन्हें 95 फीसदी कामयाब मानते हैं। इसमें तीन डोज लेनी होती हैं। पहला इंजेक्शन लगने के बाद दूसरा अगले महीने और तीसरा छठे महीने लगना जरूरी है। एक हफ्ते से ज्यादा की देरी होने पर पहली खुराक का असर खत्म हो जाता है और तब तीनों टीकों फिर से लगवाने होते हैं। तीन टीकों का कोर्स होता है, जिसकी कीमत सरकारी अस्पतालों में 200 रुपये और प्राइवेट अस्पतालों में 1000 रुपये तक हो सकती है।

हेपटाइटिस सी और ई के टीके नहीं हैं। हेपटाइटिस ई के टीके पर अभी रिसर्च चल रही हैं। हेपटाइटिस ए के लिए टीका लगाया जाता है लेकिन यह डब्ल्यूएचओ की वैक्सीनेशन की लिस्ट में नहीं है क्योंकि यह ज्यादा नुकसानदेह नहीं होता। कम ही मामलों में टीका लगाया जाता है।

खाने में खास चीजें
किसी भी हेपटाइटिस में खाने का कोई परहेज नहीं होता। बस, सिरोसिस होने पर नमक कम खाना बेहतर होता है। साथ ही बहुत तला-भुना खाना नहीं खाना चाहिए। इससे लिवर पर दबाव पड़ता है। प्रोटीन से भरपूर खाना जैसे पनीर, दूध, सोयाबीन, मछली आदि खाना बेहतर है। साथ ही, ऐसा खाना खाएं, जो आसानी से पच सके। खिचड़ी, दलिया, चावल, रोटी, मक्का, सूप, फल और सब्जियां खाएं। गैस बनानेवाली चीजें जैसे राजमा, छोले आदि कम खाएं। दही ले सकते हैं, लेकिन लिमिट में। छाछ बेहतर है।

होम्योपैथी
हेपटाइटिस होने पर होम्योपैथी में सेलिडोनियम ( Chelidonium ), लाइकोपोडियम ( Lycopodium ), करिका पपाया ( Carrica Papaya ) या कालमेघ ( Kalmegh ) मदर टिंचर या 6 c या 3 x दी जाती हैं। इनमें से एक वक्त में कोई एक दवा लेनी होती है। आमतौर पर भूख बढ़ाने के लिए ये दवाएं दी जाती हैं। दिन में तीन बार चार-चार गोलियां खानी होती हैं। बाकी और भी दवाएं हैं, जो बीमारी देखकर दी जाती हैं, लेकिन ये दवाएं बीमारी के शुरुआती स्टेज पर भी कारगर हैं। फाइब्रोसिस या सिरोसिस होने पर इनसे इलाज नहीं हो सकता।

नोट : कोई भी दवा डॉक्टर की सलाह के बिना न खाएं।

आयुर्वेद
अगर हेपटाइटिस शुरुआती स्टेज में है तो आयुर्वेदिक दवाओं से इलाज किया जा सकता है। बीमारी बढ़ने पर बेशक मॉडर्न मेडिसिन का सहारा लेना ही बेहतर है लेकिन आयुर्वेदिक एक्सपर्ट्स का कहना है कि मॉडर्न मेडिसिन के साथ अगर आयुर्वेदिक इलाज भी किया जाए तो मरीज को बेहतर जिंदगी मिल सकती है। मसलन उसकी भूख बढ़ेगी, वजन कम नहीं होगा आदि।

अगर मरीज को पीलिया है तो उसे आरोग्यवधिर्नी वटी दे सकते हैं। 500 मिग्रा की गोली दिन में तीन बार गुनगुने पानी से दी जाती है। पुनर्नवारिष्ट 25 मिली दिन में दो बार खाना खाने के बाद इतने ही पानी में मिलाकर देनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर या बीमारी बढ़ने पर दिन में दो बार रोहितकारिष्ट (25 मिली) या दारव्यादि क्वाथ दिया जाता है। दारव्यादि क्वाथ तैयार करने के लिए 160 मिली पानी में 10 ग्राम दारव्यादि मिलाएं और थोड़ी देर उबाल कर छान लें।

एलोवेरा (घृतकुमारी) का गूदा निकालकर थोड़ी काली मिर्च मिलाकर सुबह-शाम एक चम्मच लें। दिन में दो बार 25 मिली कुमारीआसव इतने ही पानी में मिलाकर ले सकते हैं।

भृंगराज के पौधे का 10 मिली रस निकालकर रोजाना ले सकते हैं।
कटुकि या कुटकी चूर्ण रोजाना 1 से 3 ग्राम तक ले सकते हैं। यह काफी कड़वा होता है।
भूम्यामल्कि या भूईं आंवला की कुछ पत्तियों को पीसकर जूस निकाल कर ले सकते हैं।
दिन में दो-तीन बार तीन ग्राम हरड़ का पाउडर ले सकते हैं। इसके अलावा कालमेघ, पीपली आदि भी फायदेमंद हैं।
खाने में हल्दी, काली मिर्च, लौंग का भरपूर इस्तेमाल करें। लाल मिर्च बंद कर दें।
ऐसा खाना खाएं, जो आसानी से पच जाए। इससे लिवर पर जोर कम पड़ेगा।
खाने में बहुत तेल या मिर्च मसाला न खाएं।
गर्म तासीर वाला खाना न खाएं।
बहुत गर्म पानी से न नहाएं।

नोट: आयुर्वेदिक एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही दवा लें। वह आपको बताएगा कि बीमारी के अनुसार आपको कौन-सी दवा सूट करेगी।

योग
सीधे बैठ जाएं और पालथी मार लें। हाथों को पैरों पर रख लें और बहुत धीरे-धीरे सांस बाहर निकालें ताकि पेट अंदर की तरफ जाए। फिर सांस भरें और पेट को आराम दें। यह अभ्यास कपालभाति की तरह होता है लेकिन ध्यान रखें कि यह कपालभाति नहीं है इसलिए इसे बहुत धीरे-धीरे करें। 15-20 बार करें। फिर आराम करें और फिर से अभ्यास करें। ऐसे दो सेट बैठकर करने के बाद दो सेट लेटकर करें। लेटकर पैरों को मोड़ लें और यह अभ्यास करें। यह लिवर को मजबूत बनाता है।

एक पैर से उत्तानपादासन कर सकते हैं। कमर के बल लेट जाएं और एक पैर को मोड़कर दूसरे पैर को सीधा फैलाकर ऊपर उठाएं। फिर पैर बदलकर करें। यह खून के दौर को पेट की तरफ बढ़ाएगा और लीवर को फिर से ताकत देगा।

धीरे-धीरे कटिचक्रासन करें। दोनों पैरों को मोड़कर एक साथ लेफ्ट साइड में ले जाएं और गर्दन को राइट साइड में ले जाएं। दोनों तरफ से दो-दो बार करें।

वज्रासन करें। घुटने मोड़कर बैठें। यह पाचन तंत्र को ताकत देगा।

अनुलोम-विलोम प्राणायाम करें।

डीप ब्रीदिंग करें।

नोट : अगर बीमारी बढ़ गई है तो पेट पर दबाव डालने या थकानेवाले अभ्यास बिल्कुल न करें। तब सिर्फ प्राणायाम करें।

ध्यान दें
पीलिया होने पर आमतौर पर लोग गन्ने का रस पीने और मूली खाने की सलाह देते हैं। कुछ लोग हल्दी खाने तो कुछ छोड़ने की सलाह देते हैं। ये सब गलतफहमियां हैं। तमाम मेडिकल एक्सपर्ट इनसे दूर रहने की सलाह देते हैं क्योंकि खुला और गंदा गन्ने का रस पीने से बीमारी के बढ़ने की आशंका होती है।

पीलिया या जॉन्डिस खुद में कोई बीमारी नहीं है। यह लिवर की बीमारी का लक्षण है। किसी भी तरह के हेपटाइटिस में पीलिया हो सकता है। इसी तरह लिवर का बढ़ना भी हेपटाइटिस या लिवर की दूसरी बीमारियों का लक्षण हो सकता है।

इलाज के दौरान कोई भी दवा लेने से पहले डॉक्टर से जरूर पूछें। कुछ दवाएं लिवर पर निर्भर करती हैं और अगर लिवर ठीक से काम नहीं कर रहा है तो इन दवाओं से मेटाबॉलिजम में भी कुछ गड़बड़ हो सकती है।

शराब पीना बिल्कुल बंद कर दें। इलाज के बाद अगर डॉक्टर इजाजत दे तो ही शराब पिएं और वह भी लिमिट में।

न्यूट्रिशन से भरपूर खाना खाएं, खासकर प्रोटीन से भरपूर। धीरज रखें, शरीर में ताकत लौटने में वक्त लग सकता है।

तेज और भारी एक्सरसाइज न करें, जब तक कि डॉक्टर सलाह न दें।

ऐसा कोई भी काम न करें, जिससे यह दूसरों तक फैले मसलन सेक्सुअल इंटरकोर्स, खुद के लगाई गई निडल का इस्तेमाल दूसरों को करने देना आदि।

फैक्ट्स
एचआईवी इन्फेक्शन से भी तेजी से फैलता है हेपटाइटिस। जहां एचआईवी के लिए इन्फेक्टेड 0.1 मिली खून जरूरी होता है, वहीं हेपटाइटिस सी 0.01 मिली और हेपटाइटिस बी सिर्फ 0.00001 मिली खून से हो जाता है। यानी अगर इतना-सा भी इन्फेक्टेड खून शरीर में पहुंच जाए तो हेपटाइटिस हो सकता है।

जिन बच्चों में हेपटाइटिस बी वायरस का इन्फेक्शन हो जाता है, उनके पूरी जिंदगी इस बीमारी से पीड़ित रहने की आशंका होती है।

हेपटाइटिस बी से होनेवाला लिवर कैंसर पुरुषों में कैंसर से होनेवाली मौतों में तीसरी बड़ी वजह बनता है।

80 फीसदी लिवर कैंसर हेपटाइटिस बी की वजह से होते हैं।

हेपटाइटिस बी के हर 100वें मरीज की हो जाती है लिवर कैंसर से मौत।

हेपटाइटिस से होनेवाली मौतों में से करीब 50 फीसदी की वजह शराब होती है।

25 पर्सेंट मरीजों में समस्या की शुरुआत पीलिया से होती है।

एक्सपर्ट्स पैनल
डॉ. एस. के. सरीन, डायरेक्टर, इंस्टिट्यूट ऑफ लिवर ऐंड बाइलरी साइंसेज
डॉ. एम. पी. शर्मा, एचओडी, गेस्ट्रोएंट्रॉलजी, रॉकलैंड हॉस्पिटल
डॉ. विवेक राज, डायरेक्टर, गेस्ट्रोएंट्रॉलजी ऐंड हेपेटॉलजी डिपार्टमेंट, मैक्स हेल्थकेयर
डॉ. हितेंद्र गर्ग, असिस्टेंट प्रफेसर, हेपेटॉलजी, एल्ब्स
डॉ. प्रदीप दुआ, रिसर्च ऑफिसर, सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंसेज
डॉ. शिखा शर्मा, न्यूट्री-डाइट एक्सपर्ट
डॉ. आलोक कुमार, डिप्टी एडवाइजर, होम्योपैथी, आयुष विभाग
सुरक्षित गोस्वामी, योग गुरु(नवभारत टाइम्स,12 दिसम्बर,2010)

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बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

बच्चों को मुफ्त लगेगा हैपेटाइटिस-बी का टीका

हेपेटाइटिस-बी के संक्रमण से देश में हर साल एक लाख लोग मारे जाते हैं लेकिन इसके टीके की ऊंची कीमत की वजह से अधिकांश नवजात इस सुरक्षा कवच से वंचित ही रह जाते हैं। अब केंद्र सरकार देश भर के सभी बच्चों को यह टीके मुफ्त उपलब्ध करवाने जा रही है। टीकाकरण पर केंद्र सरकार के राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह (एनटीएजीआई) ने इसे राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करने की सिफारिश की है। इसके तहत अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र पर पैदा हुए सभी बच्चों को इसकी 4 खुराकें उपलब्ध करवाई जाएंगी। केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव सुजाता के. राव की अध्यक्षता में राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह ने पाया है कि अब समय आ गया है कि बिना देरी किए इसे राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल कर लिया जाए। दैनिक जागरण के पास मौजूद इस समूह की सिफारिशों में कहा गया है, इस बीमारी के दायरे और इसके सुरक्षित टीके की उपलब्धता को देखते हुए हेपेटाइटिस-बी टीकाकरण को देश भर में लागू कर दिया जाना चाहिए। इस समय देश के सिर्फ 33 चुनिंदा जिलों में बच्चों को ये टीके लगाए जा रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी बताते हैं कि अब बच्चों में इसका संक्रमण रोकने के लिए जल्द ही इसे लागू किया जाएगा। इसके तहत अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्रों में होने वाले प्रसव के तुरंत बाद नवजात को इसकी पहली खुराक दी जाएगी। इसके बाद जन्म के छठे, दसवें और चौदहवें सप्ताह में इसकी एक-एक खुराक और दी जाएगी। तकनीकी सलाहकार समूह ने इस कार्यक्रम को जल्द लागू करने के लिए तुरंत क्षेत्रवार योजना बनाने और प्रशिक्षण शुरू करने को कहा है। यह फैसला करने वाली तकनीकी सलाहकार समिति की बैठक में स्वास्थ्य सचिव सुजाता के. राव, स्वास्थ्य शोध सचिव विश्व मोहन कटोच और जैव तकनीक विभाग के सचिव एमके भान के अलावा स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के लगभग दो दर्जन विशेषज्ञ मौजूद थे। इसने कहा है कि भारतीय चिकित्सा शोध परिषद (आईसीएमआर) हेपेटाइटिस-बी की संक्रमण दर पर टीकाकरण कार्यक्रम के प्रभाव का अध्ययन भी चलाएगा। समूह के विशेषज्ञों के मुताबिक हेपेटाइटिस-बी के टीके को न सिर्फ बेहद प्रभावी बल्कि अत्यधिक सुरक्षित भी पाया गया है। हिंदुस्तान में अब सस्ती दर पर ये टीके उपलब्ध हैं। लगभग सभी देशों ने अपने राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में इसे शामिल कर लिया है। ऐसे पर्याप्त अध्ययन मौजूद हैं जो बताते हैं कि हेपेटाइटिस-बी के संक्रमण से बढ़ने वाले बीमारियों के बोझ को टीके की मदद से काफी कम किया जा सकता है। ये टीके इस समय बाजार में 10 एमएल के वायल में 5 से 7 सौ रुपये की कीमत पर उपलब्ध हैं। हालांकि यही कंपनियां डॉक्टरों को ये टीके लगभग आधी कीमत पर उपलब्ध करवाती हैं। फैसले पर उठ रहे सवाल इन टीके की भारी कीमत की वजह से राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के तहत इसे शामिल किए जाने के फैसले पर सवाल भी उठाए जा रहे हैं। लोक स्वास्थ्य विशेषज्ञ अनंत फड़के और अशोक काले के मुताबिक इस समय मुफ्त दिए जाने वाले सभी छह टीकों की कीमत प्रति शिशु लगभग 30 रुपये आती है जबकि हेपेटाइटिस बी का टीका अगर सौ रुपये का भी हुआ तो सालाना सरकार को लगभग 250 करोड़ रुपए खर्च करने होंगे। अगर आगे इसे 14 साल की उम्र तक के बच्चों को लगाया जाता है तो सालाना खर्च 1273 करोड़ रुपए पहुंच जाएगा जबकि सरकार मलेरिया जैसी गंभीर बीमारी पर सालाना दो से सवा दो सौ करोड़ रुपये ही खर्च कर रही है(मुकेश केजरीवाल,दैनिक जागरण,दिल्ली,13.10.2010)।

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रविवार, 22 अगस्त 2010

विश्व भर में एक मानक पर होगा हेपेटाइटिस का इलाज

हेपेटइटिस-सी वायरस संक्रमण से निपटने का तरीका पूरे विश्व के लिए वर्ल्ड गैस्ट्रोइंट्रोलाजी एसोसिएशन ने तय कर दिया है। संगठन ने कहा है कि वायरस संक्रमण से प्रभावित व्यक्ति में कितना प्रभाव पड़ा यह जानने के लिए हेपेटाइटिस-सी वायरस आरएनए (राइबोन्यूक्लिक एसिड) लेवल परीक्षण करने के बाद इलाज शुरू करना चाहिए। वायरस के किस प्रकार के जीनोम से व्यक्ति संक्रमित है,इसका भी परीक्षण करना चाहिए। जीनोम के आधार पर ही इलाज की दिशा तय की जानी चाहिए। संगठन के मुताबिक, हेपेटाइटिस-सी वायरस के 6 रूप हैं। इन्हें जीनोम के रूप में जाना जाता है। सबसे अधिक खतरनारक जीनोम-वन प्रकार का वायरस होता है। हेपेटाइटिस-सी वायरस से ग्रसित 70 प्रतिशत भारतीयों में जीनोम-2 व 3 प्रकार का वायरस होता है। इस जीनोम वाले वायरस से ग्रसित मरीज जल्दी ठीक हो जाते हैं। संगठन ने कहा है कि इस बीमारी से संक्रमित मरीजों को इलाज के इंटरफेरान एवं रिवावैरीन दवा देनी चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि जिन मरीजो में जिन मरीजों में आरएनए वायरल लोड जितना अधिक होगा उसमें दवा से उतना ही कम रिस्पांस मिलेगा,हालांकि लीवर सिरोरिस व लीवर फाइब्रोसिस का वायरल लोड से कोई मतलब नहीं है। दवा मरीज में कितना फायदा कर रह है यह जानने के लिए समय-समय पर वायरल लोड परीक्षण कराते रहन चाहिए। भारत में हर साल दस हजार लोग इस वायरस से संक्रमित होते हैं(कुमार संजय,हिंदुस्तान,लखनऊ,22.8.2010)।

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बुधवार, 28 जुलाई 2010

काढ़ा खत्म करेगा हेपेटाइटिस का खतरा

हेपेटाइटिस-बी एक ऐसा संक्रमण है जिसे चिकित्सक एचआईवी से कम खतरनाक नहीं मानते। एलोपैथ में हेपेटाइटिस-बी को मारने वाली कारगर दवा अब तक नहीं है। इस बीमारी की काट अब एक काढ़े में ढूढ़ लिया गया है। फलत्रिकाऽमृता वासा तिक्ता भूनिम्ब-निम्बज: नाम का काढ़ा हेपेटाइटिस के समूचे साम्राज्य की काट साबित हुआ है। यानी सिर्फ हेपेटाइटिस-बी ही नहीं बल्कि ए, सी, डी, ई सभी संक्रमणों में कारगर साबित हुआ है। लिवर के समस्त रोगों में असरकारी काढ़े के इस नए प्रभाव का दावा करते हैं चिकित्सा विज्ञान संस्थान (बीएचयू) स्थित आयुर्वेद संकाय में द्रव्यगुण विभाग के डॉ.अनिल कुमार सिंह। पिछले छह महीनों में उन्होंने दर्जनों मरीजों पर इस काढ़े का प्रयोग किया है जिसके उपरांत मरीजों में आश्चर्यजनक रूप से हेपेटाइटिस का वायरस गायब हो गया है। काढ़े के लिए औषध डॉ.अनिल कुमार सिंह के मुताबिक काढ़े में जिन औषध को शामिल किया गया है, उनमें आमलकी (आंवला), विभीतिकी (बहेड़ा), हरीतिकी (हरड़), अमृता (गुरुच), वासा (अणुषा), तिक्ता (चिरैता), भूनिम्ब (कालमेघ) व निम्ब (नीम) शामिल हैं। बनाएं कैसे सभी औषध एक समान मात्रा में लेकर उसको चार गुना अधिक मात्रा पानी में उबालते हैं। मसलन संपूर्ण औषध की मात्रा अगर 50 ग्राम है तो उसे 200 मिली पानी में उबाल लेते हैं, जब एक भाग यानी 50 मिली रह जाए तो इसे छानकर सुबह खाली पेट पीते हैं। असर एक माह में डा. सिंह के मुताबिक एक माह तक लगातार इस काढ़े के सेवन से नतीजा सामने आ जाता है। उनहोंने कहा कि काढ़े का असर तो पता चल गया है। लेकिन हेपेटाइटिस के वायरस पर यह कैसे कार्य करता है, जानने के लिए वह शोध की तैयारी कर रहे हैं(धनंजय वर्मा,दैनिक जागरण,वाराणसी,28.7.2010)।

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बुधवार, 19 मई 2010

आज विश्व हैपेटाइटिस दिवस है





रॉकलैंड अस्पताल के गैस्ट्रोएंटोलॉजी डिपार्टमेंट के डॉ. एम.सी.शर्मा कहते हैं कि दुनिया भर में एड्स को सबसे खतरनाक बीमारी बताया जाता है, लेकिन हेपेटाइटिस से मरने वालों की संख्या एड्स से दस गुना है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जब हेपेटाइटिस के टीके बाजार में उपलब्ध हों, फिर भी अकेले भारत में हर साल दो लाख से ज्यादा लोगों की मौत हेपेटाइटिस के कारण हो रही है। पूरी दुनिया में हर साल 15 लाख लोग हेपेटाइटिस बी या सी से मरते हैं।

हेपेटाइटिस बीमारी ज्यादातर वायरस के कारण होती है, पर कभी-कभी बैक्टीरिया के संक्रमण अथवा दवाइयों के दुष्प्रभावों के कारण भी हो सकती है। वायरस से होने वाली हेपेटाइटिस गंभीर रूप भी धारण कर सकती है, इसलिए इसमें विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है।

हेपेटाइटिस ए
पानी चेक किया क्या 


शहर हो या गांव दूषित पानी की समस्या कहां नहीं है। पीने का पानी साफ मिले, इसके लिए कुछ राज्यों में कई स्थानों पर लोगों को कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ता है। शहरों में लोग आरओ सिस्टम लगाने लगे हैं। यह सब इसलिए करना पड़ता है क्योंकि एक तो पानी के बिना काम नहीं चलता और दूसरे यदि पानी गंदा या दूषित होगा तो कई प्रकार की बीमारियां आ घेरेंगी। सरकार भी पीने के साफ पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बहुत पैसा खर्च कर रही है।
इसके बावजूद, हर वर्ष भारत में जलजनित बीमारी पीलिया की चपेट में आने वाले लोगों की संख्या बहुत ज्यादा हैं। यह बीमारी दूषित खाने व जल के सेवन से होती है। जब नाली का गंदा पानी या किसी अन्य तरह से प्रदूषित जल सप्लाई के पाइप में मिल जाता है तो बहुत से लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं।
वैसे तो यह बीमारी तीन-चार हफ्तों के परहेज से ठीक हो जाती है किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब गर्भवती महिलाओं को पीलिया हो जाता है। तब यह भयानक रूप ले लेता है। ऐसे में माँ और बच्चा दोनों की जान को खतरा होता है।
दरअसल, लिवर में कुछ ऐसे पदार्थ होते हैं जिनमें बहते खून को रोकने की क्षमता होती है। जब लिवर क्षतिग्रस्त हो जाता है तो इन पदार्थो की कमी हो जाती है। ऐसे में अगर शरीर के किसी भाग से रक्त बहने लगे तो वह जानलेवा हो सकता है। हेपेटाइटिस बी और सी के उलट हेपेटाइटिस ए संक्रमण क्रॉनिक लिवर डिजीज पैदा नहीं करता और कम घातक होता है, लेकिन यह दुर्बलता के लक्षण पैदा कर सकता है।
लक्षण रोग को शुरुआत में रोगी को ऐसा महसूस होता है- बुखार, झुरझुरी, भूख न लगना, खाने को देख जी मिचलाना, उल्टी, बदन दर्द, सिगरेट पीने वालों को तंबाकू से अरुचि। इन शुरुआती लक्षणों के बाद अगर इलाज न हुआ तो रोगी को पीलिया हो सकता है। इसमें बदन में खुजली, पेट में गड़बड़ी, मल का रंग सफेद होना, आंखों में पीलापन, पेशाब का रंग पीला हो जाता है।
जब रोग और बढ़ जाता है तो पैरों में सूजन बढ़ जाती है तथा जोड़ों में भी दर्द हो जाता है। यदि रोग का निदान इस अवस्था में भी न हो पाए तो हेपेटाइटिस प्राणघातक रूप धारण कर सकता है। जिस किसी व्यक्ति को हेपेटाइटिस होता है और जिगर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है, तो रोगी बेहोशी या कोमा में चला जाता है तथा उसकी मृत्यु भी हो सकती है।
जरूरी नहीं कि हर संक्रमित व्यक्ति में ये सभी लक्षण हों। बच्चों की तुलना में वयस्कों में इसके लक्षण अक्सर जल्दी दिखते नहीं और रोग की गंभीरता और मृत्यु का खतरा अधिक उम्र के लोगों में बढ़ जाता है।
निवारण साफ सफाई का विशेष खयाल रखें और हेपेटाइटिस ए का टीका जरूर लगवाएं। एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में दो अरब लोग हेपेटाइटिस बी वायरस से संक्रमित हैं और 35 करोड़ से अधिक लोगों को क्रॉनिक (लंबे समय तक) लिवर संक्रमण होता है।

हेपेटाइटिस बी
ज्यादा पी तो लिवर बोल जाएगा


एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में दो अरब लोग हेपेटाइटिस बी वायरस से संक्रमित हैं और 35 करोड़ से अधिक लोगों में क्रॉनिक (लंबे समय तक) लिवर संक्रमण होता है, जिसकी मुख्य वजह शराब है।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अल्कोहल एब्यूस एंड एल्कोहलिज्म द्वारा किए गए अनुसंधान के अनुसार 15 साल से कम उम्र में शराब का सेवन शुरू करने वाले नौजवानों में 21 साल की उम्र में शराब पीना शुरू करने वाले किशोरों की तुलना में शराब के आदि होने की संभावना चार गुना अधिक होती है। पीने की यही आदत उन्हें कुछ ही महीनों में हेपेटाइटिस बी का शिकार भी बनाती है।
शराब के लगातार और लम्बे समय से सेवन के कारण हेपेटाइटिस जैसी गंभीर बीमारियां पनप सकती हैं। और हां, नियमित रूप से पीने पर हेपेटाइटिस के मामलों में वृद्घि होती है यह आपको विशेषकर हेपेटाइटिस ए और बी के प्रति अतिसंवदेनशील बना सकता है। जिन व्यक्तियों को पहले से ही हेपेटाइटिस ए और बी है और उनके साथ शारीरिक संपर्क होने से दूषित संक्रमित जीवाणु वाले चिकित्सा उपकरण जैसे सुइयों से संक्रमित खून चढ़ाने से, टैटू बनवाने से यह बीमारी हो सकती है।
हेपेटाइटिस की दो अवस्थाएं होती हैं, पहला, प्रारंभिक (एक्यूट) और दूसरा पुरानी (क्रॉनिक)। हेपेटाइटिस की प्रारंभिक अवस्था रोग शुरू होने की तीन महीनों तक रहती है। किंतु छह माह तक जब इसका इलाज नहीं होता तो यह क्रॉनिक हेपेटाइटिस में बदल जाती है।
प्रारंभिक अवस्था में यदि हेपेटाइटिस के साथ पीलिया भी हो जाए तथा इसका उपचार ठीक से न किया जाए तो यह क्रॉनिक बी या सी का रूप ले लेती है। यदि फिर भी उचित इलाज न हो सका तो यह लिवर सिरोसिस में परिवर्तित हो जाती है जिसके फलस्वरूप पूरा लिवर क्षतिग्रस्त हो जाता है। इसके अलावा लिवर का कैंसर भी हो सकता है।
इलाज शुरू करने से पहले यह जरूर जान लेना चाहिए कि रोगी को दोनों में से कौन सा हेपेटाइटिस है क्योंकि दोनों का इलाज अलग है। इन दोनों की ही तरह हेपेटाइटिस का इलाज यदि शुरुआत में ही करा लिया जाए तो पूरी तरह से ठीक होने की संभावना अधिक रहती है, पर ज्यादा देर होने पर यकृत क्षतिग्रस्त हो जाता है और फिर इलाज के बहुत अच्छे परिणाम नहीं मिलते। इनमें 20 से 25 प्रतिशत रोगी दवाओं के साथ परहेज से ठीक हो जाते हैं, लेकिन 80 प्रतिशत में यह बीमारी क्रॉनिक हो जाती है।
लक्षण त्वचा और आँखों का पीलापन (पीलिया), गहरे रंग का मूत्र, अत्यधिक थकान, उल्टी और पेट दर्द। लोगों को इन लक्षणों से निजात पाने में कुछ महीनों से लेकर एक साल तक का समय लग सकता है। हेपेटाइटिस बी क्रॉनिक लिवर संक्रमण भी पैदा कर सकता है जो बाद में लिवर सिरोसिस या लिवर कैंसर में परिवर्तित हो सकता है।
एहतियात - घाव को खुला न छोड़ें। यदि त्वचा कट फट जाए तो उस हिस्से को डिटॉल से साफ करें। - शराब पीना बंद कर दें। - किसी के साथ अपने टूथब्रश, रेजर, सुई, सिरिंज, नेल फाइल, कैंची या अन्य ऐसी वस्तुएं जो आपके खून के संपर्क में आती हो, शेयर न करें। - ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के मार्च के अंक में कहा गया है कि यहां तक कि एक्यूपंक्चर संक्रमित सुई के माध्यम से हेपेटाइटिस बी और सी दोनों को फैला सकता है। अत: किसी भी चीज को शेयर करने के प्रति सावधान रहें।
निवारण मौजूदा नियमित टीकाकरण के एक हिस्से के तहत तीन या चार अलग-अलग खुराक में हेपेटाइटिस बी का टीका दिया जा सकता है। नवजात बच्चों, छह माह और एक वर्ष की आयु के समय में यह टीका दिया जाता है। ये कम से कम 25 साल उम्र तक सुरक्षा प्रदान करते हैं।

हेपेटाइटिस सी 
खामोश मौत दे सकता है टैटू 

हेपेटाइटिस सी को खामोश मौत की संज्ञा दी गई है। शुरू-शुरू में इसका कोई प्रभाव नहीं दिखता और जब दिखता है तो मौत एकदम से सामने खड़ी होती है। यह खून के संक्रमण से फैलता है। हाथ पर टैटू गुदवाने, संक्रमित खून चढ़वाने, दूसरे का रेजर उपयोग करने आदि की वजह से हेपेटाइटिस सी होने की संभावना रहती है। हेपेटाइटिस सी अंतिम चरण में सिरोसिस और लिवर कैंसर के लिए जिम्मेवार होता है।
हेपेटाइटिस के अन्य रूपों की तरह हेपेटाइटिस सी, लिवर में सूजन पैदा करता है। हेपेटाइटिस सी वायरस मुख्य रूप से रक्त के माध्यम से स्थानांतरित होता है और हेपेटाइटिस ए या बी की तुलना में अधिक स्थायी होता है। युवाओं में टैटू लगवाने (गोदना) की प्रवृत्ति बढ़ रही है, लेकिन गैर विषाणुरहित और दोबारा इस्तेमाल किये गये उपकरण निश्चित तौर पर हेपेटाइटिस बी और सी के साथ-साथ एचआईवी के संचरण के स्रोत हैं।
चिकित्सक भी सौंदर्य चिकित्सा को लेकर चिंतित हैं जहां कई पदार्थो से मृत कोशिकाओं को हटाया जाता है। यहां तक कि जहां मृत त्वचा कोशिकाएं गिरी होती हैं, उसकी सतह पर कई दिनों तक हेपेटाइटिस सी का वायरस पनपता रहता है। अगर स्पा या सैलून स्ट्रिंजेंट स्टरलाइजेशन तकनीकों का इस्तेमाल नहीं करते हैं तो ग्राहक वायरस के संपर्क में आ सकते हैं।

हेपेटाइटिस सी वायरस के फैलने के अन्य तरीके -
दवा इंजेक्ट करने वाले उपकरणों (सुई, हीटिंग चम्मच आदि) को शेयर करने से। यह उप-सहाराई अफ्रीका के बाहर एचसीवी के संचरण का प्राथमिक स्रोत है। - किसी संक्रमित व्यक्ति के साथ असुरक्षित सेक्स से। - कभी-कभार प्रसव के दौरान संक्रमित माता से उसके बच्चे में हो सकता है। यह खतरा तब और भी बढ़ सकता है जब माता एचआईवी से भी संक्रमित हो। - संक्रमित रक्त से। - नाक से कोकीन का इस्तेमाल करने वाले उपकरणों को शेयर करने से।
लक्षण
कई लोगों में हेपेटाइटिस सी से संक्रमित होने पर भी कोई लक्षण नहीं दिखाई देते। अमूमन इसके लक्षण 15 से 150 दिन में विकसित हो सकते हैं। कुछ लोगों में कोई भी लक्षण नहीं दिखाई देता और ऐसे संक्रमित लोग ही वायरस को फैलाने में अहम भूमिका निभाते हैं। संक्रमित व्यक्ति एक वाहक का काम करता है। हालांकि इसके कुछ लक्षणों में भूख में कमी, पीलिया, उल्टी, अनिद्रा और अवसाद शामिल हो सकते हैं।

हेपेटाइटिस डी बी, सी को न रुके तो डी आएगा 


यह वायरस तभी होता है जब मरीज को बी या सी का संक्रमण हो चुका हो। हेपेटाइटिस डी वायरस बी पर सवार रह सकते हैं। इसलिए जो लोग हेपेटाइटिस से संक्रमित हो चुके हों, वे हेपेटाइटिस डी से भी संक्रमित हो सकते हैं।
बुरी खबर यह है कि जब कोई व्यक्ति डी से संक्रमित होता है तो सिर्फ बी से संक्रमित व्यक्ति की तुलना में उसके लिवर के नुकसान का खतरा अधिक होता है। सन् 1977 में पहचान की गई थी कि हेपेटाइटिस डी आम तौर पर संक्रमित इंट्रावीनस इंजेक्शन उपकरणों के द्वारा फैलता है। हेपेटाइटिस बी के खिलाफ प्रतिरक्षित होने पर यह कुछ हद तक हेपेटाइटिस डी से सुरक्षा कर सकता है।
वैसे तो सभी प्रकार के हेपेटाइटिस के लक्षण एक ही तरीके के होते हैं, इस कारण उपचार आरंभ करने से पहले परीक्षणों द्वारा यह पता लगा लेना चाहिए कि किस प्रकार के वायरस के संक्रमण हैं तभी इसका इलाज शुरू करना चाहिए। इस बीमारी में जितनी जरूरी दवाएं होती हैं, उतना ही जरूरी परहेज भी है। हेपेटाइटिस एक की प्रारंभिक अवस्था परहेज से ही ठीक हो जाती है।

लक्षण : थकान, उल्टी, हल्का बुखार, दस्त, गहरे रंग का मूत्र ।
टीका : एचबी का टीका लेने से कुछ हद तक सुरक्षा मिलती है।

हेपेटाइटिस ई 
हेपेटाइटिस ई एक जलजनित रोग है और इसके व्यापक प्रकोप का कारण दूषित पानी या भोजन की आपूर्ति है। प्रदूषित पानी इस महामारी को बढ़ा देता है और स्थानीय क्षेत्रों में छिटपुट मामलों के स्रोत कच्चे या अधपके शेलफिश को खाना होता है। इससे वायरस के फैलने की संभावना अधिक होती है। हालाकि अन्य देशों की तुलना में भारत के लोगों में हेपेटाइटिस ई न के बराबर होता है। बंदर, सूअर, गाय, भेड़, बकरी और चूहे इस संक्रमण के प्रति संवेदनशील हैं।
(मीनाक्षी,हिंदुस्तान,दिल्ली,18 मई,2010)

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मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

सोमवार, 25 जनवरी 2010

हैपेटाइटिस जांच फ्री

(हिंदुस्तान,पटना,25.1.10)
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