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मंगलवार, 22 मई 2012

साइनोसाइटिस है गर्मी में बार-बार जुकाम का कारण

कुछ लोगों को गर्मी में जुकाम की समस्या का बार-बार सामना करना पड़ता है। कई बार वे घरेलू उपचार से काम चलाने की कोशिश करते हैं तो कई बार आधा-अधूरा एलोपैथिक इलाज कराकर छोड़ देते हैं। लेकिन कुछ हफ्ते के बाद पता चलता है कि यह साइनोसाइटिस है और आपको सजर्न के पास जाना पड़ सकता है।

पिछली दो रातों से स्नेहा बहुत परेशान है। रात भर उसके गले में दर्द होता रहा और अब नाक बंद होने की वजह से सांस भी नहीं ले पा रही थी। मुंह से सांस लेने से बार-बार मुंह सूखता था और कमजोरी भी हो गई थी। वह इसे मामूली जुकाम समझकर घरेलू उपचार कर रही थी, लेकिन कुछ समय बाद डॉक्टर के पास जाने के बाद पता चला कि उस साइनोसाइटिस है। 

क्या आपने साइनोसाइटिस का नाम सुना है? नाक बंद होना, गले में खिचखिच या सांस लेने में मुश्किल होना तो मामूली जुकाम या एलर्जी के लक्षण भी हो सकते हैं, लेकिन ये लक्षण 12 हफ्तों से ज्यादा समय तक आपका पीछा कर रहे हैं तो ये क्रॉनिक साइनोसाइटिस हो सकता है। ऐसे में आपको कान,नाक और गले के सजर्न के पास जाना चाहिए। यह समस्या हमारे यहां तेजी से फैल रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में करीब 13 करोड़ चालीस लाख लोग क्रॉनिक साइनोसाइटिस के शिकार हैं। 

क्या है साइनोसाइटिस 
जुकाम आमतौर पर वायरस से पैदा होने वाला संक्रमण है जो हमारे श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है। रही बात एलर्जी की तो वह हमारे शरीर में किसी पदार्थ से पैदा होने वाली प्रतिक्रिया को कहते हैं। एलर्जी से जुकाम और साइनोसाइटिस हो सकता है लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर बार ऐसा हो ही। असल में, साइनोसाइटिस साइनस की अंदरुनी सतह में सूजन को कहते हैं जो बैक्टीरिया या वायरस के संक्रमण से पैदा हो जाती है।

साइनोसाइटिस दो तरह के होते हैं-एक्यूट और क्रॉनिक। साइनोसाइटिस से पहले जुकाम और प्रदूषण की वजह से गले में खिचखिच पैदा होती है। इसी के साथ नाक बंद होना, नाक बहना और बुखार जैसी शिकायतें होने लगती हैं। अगर ये लक्षण कई दिनों तक बने रहे तो ये एक्यूट साइनोसाइटिस हो सकता है। और अगर साइनोसाइटिस बार-बार होने लगे या तीन महीने से ज्यादा समय तक बना रहे तो ये क्रॉनिक साइनोसाइटिस हो सकता है। 

लक्षण को गंभीरता से लें 
कई बार हम इन लक्षणों को मामूली जुकाम या खांसी समझकर घरेलू उपचार के भरोसे बैठे रहते हैं। हो सकता है कि कुछ दिनों के लिए हमें इन उपचारों से आराम मिल भी जाए, लेकिन अगर यह साइनोसाइटिस हुआ तो बाद में हमारी तकलीफ बढ़ सकती है। साइनस असल में खोपड़ी में खोखली जगह को कहते हैं जो खोपड़ी में हलकापन लाती है। साइनस से नाक के अंदर नमी बनी रहती है और सांस लेने पर सांस को सूखने नहीं देती।

रोग के लक्षण 
-नाक या गले के पिछले हिस्से से गाढ़े पीले या हरे रंग का स्त्राव 

-नाक का बंद होना 

-आंख, नाक या गला में सूजन आना 

-सूंघने और स्वाद महसूस करने की क्षमता का कम होना 

-चेहरे या सिर में दर्द होना 

-आंख, नाक, गला और माथे के आसपास की त्वचा का नाजुक लगना 

-सांस लेने में कठिनाई होना 

-सांस से बदबू आना 

-चिड़चिड़ापन, थकान या जीव मचलाना 

-क्रॉनिक साइनोसाइटिस का इलाज 

-कान, नाक और गला विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए। 

-नाक की एंडोस्कोपी और सीटी स्कैन 

-मुंह के रास्ते लिए जाने वाले स्टीरॉयड 

-म्यूकस को पतला करने वाली दवाएं 

-नाक में डाले जाने वाले स्टीरॉयड 

-नेजल और साइनस कल्चर 

इलाज से डरें नहीं 
एक अध्ययन से यह बात सामने आई है कि ज्यादातर मरीज इसका इलाज कराने से डरते हैं। कई बार दर्द की आशंका के चलते तो कई बार जानकारी न होने की वजह से ऐसा करते हैं। यह धारणा भी उन्हें इलाज कराने से रोकती है कि सजर्री की वजह से सिर्फ अस्थायी समाधान होगा(करूणा कृति,हिंदुस्तान,दिल्ली,16.5.12)।

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गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

यह मौसम है एलर्जी का

सर्दियों का मौसम स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा माना जाता है लेकिन तापमान गिरने के साथ ही पर्यावरण में वायरस की संख्या भी बढ़ने लगती है। ऐसे में एलर्जी से परेशान लोगों की समस्या वायरल संक्रमण से बढ़ सकती है। खासतौर पर सर्दियों में नाक से जुड़ी एलर्जियों में प्रदूषण मुख्य कारणों में से है। धुंध, धुँआ, शारीरिक श्रम की कमी भी कारणों में शामिल है। 

सर्दियों में सबसे सामान्य एलर्जी नाक से होती है, जिसे नेज़ल ब्रॉनकियल एलर्जी कहते हैं। इसके सामान्य लक्षणों के रूप में नाक बहना, छींक आना, आँखों में पानी, नाक में खारिश, बलगम जमा होना, थकावट आदि लक्षण देखने को मिलते हैं। पहले से साँस की तकलीफ से पीड़ित लोगों में मौसम के बदलाव के साथ छाती में जकड़न और साँस लेने में परेशानी की समस्या बढ़ जाती है। बच्चों व वयस्कों की साँस की नली (रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट) के ऊपरी व निचले भाग में भी संक्रमण के मामले कहीं ज़्यादा बढ़ जाते हैं। विंटर एलर्जी में खासतौर पर यदि समस्या की वजह धूल व मिट्टी है तो उपचार के लिए एंटीहिस्टामिनिक दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। जिनमें यह समस्या लंबे समय से बनी होती है, उनके लिए एंटीएलर्जिक दवाओं या स्टेरॉयड और स्प्रे का उपयोग किया जाता है। अस्थमा के मरीज़ों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार इन्हेलर इस्तेमाल करना चाहिए। 

कान में संक्रमण 
मौसम का असर कान पर भी पड़ता है। सर्दी की शुरुआत में ही कान के संक्रमण के मामले बढ़ जाते हैं लेकिन शुरुआत में अक्सर इसका पता नहीं चलता।

लक्षण 
-बुखार होना।
-कान में तेज़ दर्द होना।
-कान में खुजली होना और कान का बहना। 

ज़रूरी नहीं कि मरीज़ों में सभी लक्षण दिखाई दें। हो सकता है कि किसी मरीज़ में केवल दो लक्षण ही हों। कान के अधिकतर संक्रमण वायरस के कारण होते हैं। यह आवश्यक नहीं कि उपचार के लिए एंटीबॉयोटिक दवाएँ ही दी जाएँ लेकिन दर्द से राहत पाने के लिए डीकन्जेस्टेंट दवाएँ दी जा सकती हैं। कानों को ठंडी हवाओं से बचाने की कोशिश करना चाहिए। बाहर निकलते समय कान को ढँकने के लिए मफलर लपेट लें या ऊनी हैट पहनें। 

बचाव के टिप्स
-घर में अधिक नमी न होने दें, इससे वायरस बढ़ने की आशंका बढ़ जाती है।
-धूम्रपान से बचें। धूम्रपान कर रहे व्यक्ति के समीप बैठना भी एलर्जी से प्रभावित होने वाले व्यक्ति में साँस की तकलीफ और खाँसी को बढ़ा देता है।
-अचानक गर्म-सर्द से बचें यानी तुरंत गर्म वातावरण से निकल कर ठंडे में बाहर न जाएँ। 
 -साइनोसाइटिस के मरीज़ों को एलर्जी से मुक्ति पाने का आसान सा तरीक़ा है खूब पानी पीना और आराम करना। 
 -फूल-पौधों को कमरे के अंदर न रखकर बालकनी में रखें। 

फ्लूः 
फ्लू भी श्वास नली से संबंधित रोग है। इसके वाहक कुछ खास किस्म के वायरस अपनी संख्या को तेज़ी से बढ़ाते हुए सांस नली में वायरस का संक्रमण पैदा कर समस्या खड़ी कर देते हैं। आमतौर पर लोग इसे मौसमी जुकाम और ठंड के लक्षणों से जोड़कर नज़रंदाज़ कर देते हैं। 

लक्षणः 
-बुखार आना और नाक बहना 
-गले में खराश रहना 
-खांसी आना 
-थकान रहना और शरीर में दर्द महसूस होना 

इलाज़ 
फ्लू को दूर करने के लिए पैरासिटामोल और विटामिन-सी की गोलियां दी जाती है। बलगम और सीने में जकड़न आदि समस्याओं को दूर करने के लिए कुछ दवाओं के साथ ही भाप लेने की सलाह दी जाती है। लक्षणों के गंभीर होने पर डाक्टर से सलाह ज़रूर लें। फ्लू के वैक्सीन लगवाने से इस बीमारी केलक्षण गंभीर नहीं हो पाते। साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। कुछ भी खाने से पहले एंटी-बैक्टीरियल साबुन से हाथ धोएं। यह संक्रमण खांसी और छींक से फैल सकता है,,इसलिए बीमार को रूमाल का इस्तेमाल करना चाहिए(डॉ. धीरेन्द्र सिंह कुशवाह,सेहत,नई दुनिया,फरवरी द्वितीयांक 2012)।

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मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

जाती सर्दी के परहेज

हम यह तो जानते ही हैं कि बदलते मौसम में अपना ख्याल रखना चाहिए, फिर भी कई बार हम लापरवाही कर बैठते हैं और बीमार पड़ जाते हैं। अब तो सर्दियों के जाने का समय आ गया, जब और अधिक खयाल रखने की जरूरती पड़ती है। रेखा चौधरी बता रही हैं कि क्या-क्या खयाल रखें ताकि जाती सर्दियां परेशान न करें। 

सर्दियों में ठंड की चपेट में सबसे पहले 7 साल की उम्र तक के बच्चे ही आते हैं। इनमें खांसी, जुकाम और निमोनिया जैसी बीमारियां जल्द हो जाती हैं। इसलिए बच्चों के स्वास्थ्य का ध्यान अति आवश्यक है। 

सर्दियों के मौसम में बच्चों को खांसी, जुकाम के साथ-साथ ब्रांकायटिस यानी हल्का निमोनिया या अधिक सर्दी में फेफड़ों में कफ एकत्र होने से रोग उत्पन्न होने लगते हैं। इस अवस्था में बच्चों को सांस लेने व खांसने में परेशानी होती है और कई बार ये परेशानी इतनी बढ़ जाती है कि बच्चे सो भी नहीं पाते। कफ, खांसी या कफ के कारण हुई सीने में जकड़न के लिए डॉक्टर नेब्युलाइजर देने की सलाह देते हैं जिसे लेने से बच्चे के सीने में हो रही जकड़न व एकत्र हुए कफ के कारण हुई परेशानी में आराम मिलता है। डॉक्टर इस बात की भी सलाह देते हैं कि नेब्युलाइजर के अत्यधिक प्रयोग से बचना चाहिए। 

ठंड के मौसम में सर्द-गर्म होना स्वाभाविक है, लेकिन ध्यान दिया जाए तो सर्द-गर्म से होने वाले रोगों से बचा जा सकता है। सर्द-गर्म के कारण होने वाले रोगों में सिर में दर्द, गले में इंफेक्शन आदि रोग आते हैं। सर्द-गर्म का मतलब है ठंडे स्थान से गर्म स्थान पर या जल्द ही गर्म स्थान से ठंडी जगह पर आना। कई लोग रूम हीटर का या बदन सेकने के लिए आग का प्रयोग करते हैं, किंतु वे रूम हीटर से गर्म हुए कमरे से निकलकर अचानक ठंड में आ जाते हैं या बदन सेकने के तुरंत बाद ठंडे पानी में काम करने लगते हैं। ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे उन्हें सर्द-गर्म से होने वाली बीमारियां अपनी गिरफ्त में ले लेती हैं। 

सर्दियों के मौसम में महिलाओं में एलआरटीआई (लोवर रेसपायरेटरी ट्रेक्ट इंफेक्शन) और यूआरटीआई (अपर रेसपायरेटरी ट्रेक्ट इंफेक्शन) जैसी बीमारियों की आशंका बढ़ जाती है। इसमें महिलाओं के लंग्स में सूजन, इंफेक्शन, निमोनिया जैसी शिकायतें सामने आती हैं। यदि समय पर डॉक्टरी सलाह नहीं ली जाए, तो महिलाओं को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। 

ठंड से बचने के लिए 
इस मौसम में हम गर्म कपड़ों का तो इस्तेमाल करते ही हैं, कई बार रूम हीटर का भी प्रयोग करते हैं, जिससे बचना चाहिए। हीटर का इस्तेमाल तब करें, जब आप सोने जा रहे हों या आपको जब बाहर नहीं जाना हो। याद रखें कि हमेशा सोने से पहले रूम हीटर बंद कर दें। 

हल्की खांसी या जुकाम में अदरक का प्रयोग करें। इसका इस्तेमाल आप चाय के साथ भी कर सकते हैं, अदरक का रस और शहद समान मात्र में मिलाकर ले सकते हैं या फिर सब्जियों या दालों में भी इसका प्रयोग किया जा सकता है। जितना हो सके दही, रायते व ठंडी तासीर वाली चीजों से परहेज करें। फ्रिज में रखे भोजन की बजाय ताजे भोजन का प्रयोग करें। यदि उड़द की दाल या गोभी का प्रयोग करें, तो उसमें एक चुटकी सोंठ व दो लौंग अवश्य डालें। 

भोजन में अदरक के साथ यदि लहसुन का भी प्रयोग करें तो सोने पे सुहागा, क्योंकि अदरक और लहसुन सर्दियों में ठंड से निजात दिलाते हैं वहीं बाय-बादी से भी छुटकारा दिलाते हैं और पाचन क्रिया को भी दुरुस्त रखते हैं। 

डॉ. अजीत वरदान सिंह का कहना है कि ठंड के मौसम में अस्थमा, दमा जैसी बीमारियों में तकलीफ काफी बढ़ जाती है। इस कारण रोगियों को अपना विशेष ध्यान रखना चाहिए। यदि जरा-सी भी तकलीफ हो, तो तुरंत डॉक्टर से सम्पर्क करना चाहिए। 

आसपास कोई छींक रहा है तो उनसे बचें, क्योंकि इससे आप संक्रमण के शिकार हो सकते हैं। आमतौर पर जितना पानी हम गर्मियों के मौसम में पीते हैं, इस मौसम में उसका आधा भी पानी नहीं पीते। इसका बड़ा नुकसान हो सकता है(हिंदुस्तान,दिल्ली,1.2.12)।

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बुधवार, 7 दिसंबर 2011

वायरल इन्फेक्शनःकारण,बचाव और समाधान

मौसम का बदलाव अपने साथ बीमारियां लाता है। दरअसल, मौसम तो तय वक्त पर बदलने लगता है लेकिन हम इन बदलावों के लिए तैयार नहीं होते। मौसम के बदलाव का यही असर सर्दी, जुकाम और वायरल बुखार के रूप में नजर आता है। अब मौसम फिर बदल रहा है और सर्दी दस्तक दे रही है। इन दिनों कई लोग वायरल बुखार की चपेट में हैं। आइए,जानते हैं वायरल इन्फेक्शन के लक्षण, कारण और इलाज के बारे में : 

खतरनाक चार महीने 
सितंबर से दिसंबर तक का ड्राई मौसम बीमारियों के लिए जिम्मेदार होता है। इस दौरान नाक, कान, गले की एलर्जी, सांस लेते समय छाती में परेशानी, आंखों पर स्ट्रेन, आवाज बैठना, जुकाम व खांसी जैसी बीमारी ज्यादा होती हैं। ये बीमारियां इन दिनों होने वाली आतिशबाजी, धान फसल की कटाई, शुष्क मौसम, सड़कों पर उड़ती धूल आदि से होती हैं। 

वायरल इन्फेक्शन 
-कॉमन कोल्ड या जुकाम। इसमें नाक बंद हो जाती है, छींकें आती हैं, खांसी हो जाती है, गला खराब रहता है और बुखार भी हो जाता है। इसके फैलने का कारण वातावरण में मौजूद वायरस है जो एक-दूसरे में सांस के जरिये, छींकने से या खांसने पर ड्रॉप्लेट्स द्वारा फैलता है। इसे रेस्पिरिटरी इन्फेक्शन का वायरस कहते हैं, जो जाड़े में ज्यादा फैलता है। 
 -हैजा भी वायरस से फैलता है। यह किसी भी मौसम में हो सकता है। 
 -डेंगू, मलेरिया, फ्लू, चिकनगुनिया, पीलिया, डायरिया और हेपेटाइटिस भी वायरस से फैलते हैं, जो साल में कभी भी हो सकते हैं। 
 -बच्चों में डायरिया फैलने की मुख्य वजह वायरल इन्फेक्शन ही है। इसे वायरल डायरिया कहते हैं। 
 -सामान्य दर्द और बुखार से लेकर एंकेफ्लाइटिस और मेनिनजाइटिस तक वायरल इन्फेक्शन से हो सकता है।  

अपर रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन 
हम जब छींकते हैं या खांसते हैं तो हवा में सैकड़ों ड्रॉप्लेट्स फैल जाते हैं। हम जब सांस लेते हैं तो यही वायरस हमारे शरीर में प्रवेश कर जाता है। एक से चार दिन के भीतर पूरे शरीर में यह फैल जाता है। इसे हम कॉमन कोल्ड या अपर रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन कहते हैं। 

लोअर रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन कॉमन 
कोल्ड या वायरल तो दो-तीन दिन में खुद ठीक हो जाता है, लेकिन अगर यह लंबे समय तक रहे तो तेज खांसी, बुखार, नाक से गाढ़ा बलगम, छाती में बलगम जमा होने लगता है। इससे सांस लेने में तकलीफ, बुखार, निमोनिया आदि दिक्कतें बढ़ने लगती हैं। इसे लोअर रेस्पिरेटरी इन्फेक्शन कहा जाता है। 

साइनोसाइटिस होने से मरीज की नाक, सिर, माथा जकड़ने लगता है और पूरा चेहरा दर्द करता है और उसे भारीपन महसूस होता है। कई बार नाक से गाढ़ा सा बलगम और साथ में खून आने लगता है। यह वायरल से बैक्टीरियल इन्फेक्शन कहलाता है। वायरल पहली स्टेज है और बैक्टीरियल इन्फेक्शन सेकंडरी, जिसमें मरीज को एंटीबैक्टीरियल दवाएं देना जरूरी हो जाता है। 

वायरस फैलने की वजह 
-पलूशन। सर्दियों में सुबह-शाम वातावरण में पलूशन की एक परत छाई रहती है। इसी हवा में हम सांस लेते हैं जिसमें हजारों तरह के वायरस होते हैं। 
-भीड़भाड़ वाली जगह पर इकट्ठा होने से भी वायरस फैलता है। आजकल मेलों, मॉल, सिनेमा हॉल में छुट्टी बिताने का चलन है। ऐसी जगहों पर एयरकंडिशनर लगे होते हैं। बाहर की ताजा हवा तो मिलती ही नहीं। जब लोग छींकते हैं, खांसते हैं तो वही ड्रॉप्लेट्स पूरी हवा में फैल जाते हैं और लोग वायरस की चपेट में आ जाते हैं। 

वायरल और फ्लू में फर्क 
वायरल का ही दस गुना बड़ा रूप फ्लू होता है। वायरल में आमतौर पर मरीज बिस्तर नहीं पकड़ता, जबकि फ्लू में अच्छा-खासा बुखार आ जाता है। नाक बहना, गले में इन्फेक्शन होना, तेज छींकें, खांसी और शरीर में दर्द सब एक साथ होता है। फ्लू तीन से पांच दिन में ही एक इंसान को बेहाल कर देता है। फ्लू में एंटीवायरल दवा दी जाती है। इसका पांच दिन का कोर्स होता है। 

यह है वायरल इन्फेक्शन का इलाज 

एलोपैथी 
अगर किसी को सिर्फ जुकाम हुआ है तो आमतौर पर उसे किसी खास इलाज की जरूरत नहीं होती। जुकाम के बारे में एक बड़ी मशहूर कहावत है - इफ यू ट्रीट द कोल्ड, इट टेक्स वन वीक टाइम, इफ यू डोंट ट्रीट, इट टेक्स सेवन डेज टाइम। कहने का मतलब यह है कि अगर आप दवा लेंगे तो भी इसे ठीक होने में उतना ही टाइम लगेगा और नहीं लेंगे, तो भी। ठीकहोने का समय आप कम नहीं कर सकते। 

दरअसल, हर बीमारी की कुछ फितरत होती है और वह ठीक होने में थोड़ा समय लेती ही है। उसके बाद वह खुद शरीर छोड़कर भागने लगती है। फिर भी अगर करना ही पड़े तो जुकाम में लक्षणों के आधार पर ट्रीटमेंट दिया जाता है। मरीज को तेज छींकें आ रही हैं तो उसे ऐसी दवा दी जाती है जिससे उसकी छींकें रुक जाएं। अगर मरीज की नाक बंद है तो नाक खोलने की दवा दी जाती है और अगर बुखार है तो पैरासीटामोल मसलन कालपोल और क्रोसिन जैसी दवाएं डॉक्टर लिखते हैं। 

जुकाम में एंटीवायरल ड्रग्स नहीं दी जातीं और एंटीबायोटिक्स का तो इसके इलाज में कोई रोल ही नहीं है। कई बार शुरू में वायरल इन्फेक्शन होता है और बाद में बैक्टीरियल इन्फेक्शन हो जाता है। इसे सेकंडरी बैक्टीरियल इंफेक्शन कहा जाता है। इसमें एंटीबायोटिक्स दवाएं दी जाती हैं। 

अगर किसी मरीज को साथ में बैक्टीरियल इंफेक्शन भी है तो एंटीबायोटिक दी जाएंगी, लेकिन इन्हें कम-से-कम पांच दिन दिया जाता है। कुछ वायरस के लिए एंटीवायरल ड्रग्स भी आ चुके हैं, लेकिन ज्यादातर वायरस के लिए एंटीवायरल ड्रग्स काम नहीं करते। हरपीज, चिकनपॉक्स और हेपेटाइटिस जैसी कुछ बीमारियों के लिए एंटीवायरल ड्रग्स उपलब्ध हैं। 

होम्योपैथी 
 वायरल इन्फेक्शन में इन होम्योपैथिक दवाओं को दिया जाता है: -तेज छीकें आने और नाक से पानी बहने पर रसटॉक्स ( Rhus Tox ), आर्सेनिक अलबम ( Arsenic Album ), एलीयिम सीपा ( Allium Cepa ) -गले में इन्फेक्शन है तो ब्रायोनिया ( Bryonia ), रस टॉक्स ( Rhus Tox ), जेल्सीमियम ( Gelsemium ) -बदन दर्द और सिर दर्द है तो फेरम फॉस ( Ferrum Phos ) -लोअर रेस्पिरेटरी समस्या है तो ब्रायोनिया ( Bryonia ), कोस्टिकम ( Costicum ) के साथ बायोकेमिक मेडिसिन 
ऊपर लिखी गई सभी दवाएं डॉक्टर मरीज की स्थिति और लक्षणों को जांचने-परखने के बाद ही लिखते हैं। बड़ों, बच्चों और महिलाओं के लिए इन दवाओं की अलग-अलग डोज और अलग-अलग पावर होती हैं। इसलिए इन दवाओं को डॉक्टर की सलाह से ही लेना चाहिए। 

आयुर्वेद 
-वायरल के इलाज में आयुर्वेद मौसम के मुताबिक खानपान पर जोर देता है। 
- तुलसी की पत्तियों में कीटाणु मारने की क्षमता होती है। लिहाजा बदलते मौसम में सुबह खाली पेट दो-चार तुलसी की पत्तियां चबाएं। 
 - अदरक गले की खराश जल्दी ठीक करता है। इसे नमक के साथ ऐसे ही चूस सकते हैं। 
 - गिलोय, तुलसी की 8-9 पत्तियां, काली मिर्च के 4-5 दाने, दाल-चीनी 4-5, इतनी ही लौंग, वासा (अड़ूसा) की थोड़ी सी पत्तियां और अदरक या सौंठ मिलाकर काढ़ा बना लें। इसे तब तक उबालें, जब तक पानी आधा न रह जाए। छानकर नमक या चीनी मिलाकर गुनगुना पी लें। इसे दिन में दो-तीन बार पीने से आराम मिलता है। काढ़ा पीकर फौरन घर के बाहर न निकलें। 
 - वायरल बुखार में रात को सोते वक्त एक कप दूध में चुटकी भर हल्दी डालकर पिएं। गले में ज्यादा तकलीफ है तो संजीवनी वटी या मृत्युंजय रस की दो टैब्लेट भी इसके साथ लेने से आराम मिलता है। 
 - गले में इन्फेक्शन है तो सितोपलादि चूर्ण फायदेमंद है। इसे तीन ग्राम शहद में मिलाकर दिन में दो बार चाटें। खांसी में आराम मिलेगा। डायबीटीज के मरीज शहद की जगह अदरक या तुलसी का रस मिलाकर लें। वैसे गर्म पानी से भी इस चूर्ण को लेने से आराम मिल जाएगा। 
 - त्रिभुवन कीर्ति रस, मृत्युंजय रस या नारदीय लक्ष्मीविलास रस में से किसी एक की की दो-दो टैब्लेट, दिन में तीन बार गुनगुने पानी से लेने से गले को आराम मिलता है। 
 - टॉन्सिल्स व गले में दर्द है तो कांछनार गुग्गुलू वटी की दो-दो टैब्लेट सुबह-शाम गुनगुने पानी से लें। 

बच्चों में वायरल इन्फेक्शन 
आम भाषा में बोले जाने वाले कॉमन कोल्ड या जुकाम की शुरुआत बच्चों में नाक बहने, छींक, आंखों से पानी आने और हल्की खांसी से होती है। इसे वायरल भी कहते हैं। बड़े लोग तो अपनी बीमारी के बारे में बता सकते हैं लेकिन दूध पीता बच्चा बोल नहीं पाता। ऐसे बच्चे सांस लेते वक्त आवाजें करते हैं। ऐसा लगता है कि उनकी नाक में ब्लॉकेज है। बच्चा बेवजह रोने लगता है। उसे हल्का बुखार भी हो सकता है। दूसरी ओर ऐसे बच्चे जो बोल सकते हैं, उनमें भी वायरल के वही लक्षण होते हैं। नाक बंद होना, छींकें आना, गले में खराश और आंखों से पानी आना। जब नाक का रास्ता बंद होता है तो वही पानी आंखों के रास्ते बहने लगता है। कुछ बच्चों की नाक बंद होती है तो कुछ को बहुत छींक आती हैं। कुछ बच्चों को हल्का बुखार भी महसूस होता है। आप थर्मामीटर लेकर नापें तो बुखार पता भी नहीं चलता। इसे अंदरूनी बुखार या हरारत भी कहते हैं। सभी बच्चों में जुकाम के लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं। 

 क्या करें कि वायरल हो ही ना 
-वायरस दो तरह का होता है- एंडनिक और पेंडनिक। एंडनिक वायरस की वजह से होने वाला फ्लू किसी एक जगह पर दिखाई पड़ता है, जबकि पेंडनिक सब जगह देखा जा सकता है। जैसे स्वाइन फ्लू शुरू में मैक्सिको में हुआ, लेकिन महीने भर बाद भारत पहुंच गया। पेंडनिक वायरस दुनिया भर में एक महीने के भीतर ही फैल सकता है। यह वायरस अपनी शक्ल-सूरत बदल लेता है और एक नए वायरस की तरह दिखना शुरू हो जाता है। यह उन सब लोगों पर अटैक करता है, जो इससे पीड़ित व्यक्ति के संपर्क में आते हैं। इससे बचाव के लिए डब्ल्यूएचओ साल में दो बार सितंबर और मार्च में एंटी-फ्लू वैक्सीन रिलीज करता है। सितंबर में उत्तरी क्षेत्र (जहां हम रहते हैं) और मार्च में दक्षिणी क्षेत्र (ऑस्ट्रेलिया) में यह वैक्सीन रिलीज होता है। 

यह वैक्सीन 600 से 900 रुपये के बीच उपलब्ध है, जिसे छह महीने के बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को दिया जा सकता है। छह महीने से कम उम्र के बच्चों को यह साल में दो बार दिया जाता है, जबकि इससे ऊपर के लोगों को साल में केवल एक बार। ये वैक्सीन वैक्सीग्रिप, फ्लूरिक्स, इनफ्लूबैक जैसे नामों से उपलब्ध हैं। 
-कोशिश यह होनी चाहिए कि सर्दी न लगे। पूरे कपड़े पहनकर बाहर जाएं। 
- कोई खांस रहा हो तो रुमाल हाथ में रखें। खुद भी अगर खांस रहे हैं या छींक रहे हैं तो रुमाल ले लें। 
- कभी खाली पेट घर से बाहर न निकलें। खाली पेट शरीर को कमजोर करता है। 
- खाना मौसम के हिसाब से लें। अगर बाहर खाएं, तो सफाई का पूरा ध्यान रखें। 
- इस मौसम में फ्रिज का पानी पीने से बचें। आइसक्रीम या ज्यादा ठंडी चीज से परहेज करें। 

और हो ही जाए तो... 
- नमक डालकर गुनगुने पानी के गरारे करें। 
- ज्यादा से ज्यादा पानी और विटामिन सी वाली चीजें लें, लेकिन ज्यादा खट्टे फलों से बचना चाहिए। - वायरल के दौरान सामान्य, पौष्टिक खाना यानी संतुलित आहार लें। 
- अगर बुखार है और भूख नहीं लगती, तो हेवी खाना न लें क्योंकि वह बुखार के कारण पचेगा नहीं। 
- जहां तक संभव हो सके, गरम व तरल पदार्थ जैसे सूप, दलिया, खिचड़ी और रसेदार सब्जियां भरपूर मात्रा में लें। 
-तुलसी, अदरक, शहद और च्यवनप्राश का इस्तेमाल करते रहें। 

क्या है टेस्ट 
सिर्फ जुकाम होने पर कोई भी टेस्ट नहीं कराया जाता। डेंगू, मलेरिया, मेनिनजाइटिस, हेपेटाइटिस या एंकेफ्लाइटिस जैसी बीमारियों को कंफर्म करने के लिए ब्लड टेस्ट कराया जाता है। डेंगू होने की आशंका लगती है तो डॉक्टर प्लेटलेट्स काउंट टेस्ट की सलाह देते हैं। 

(एक्पसपर्ट पैनल प्रो. एस. वी. मधु एचओडी, मेडिसिन, जीटीबी अस्पताल डॉ. निलेश आहूजा असिस्टेंट डायरेक्टर, भारतीय चिकित्सा पद्धति एवं होम्योपैथी निदेशालय डॉ. वाई. डी. शर्मा, डेप्युटी डायरेक्टर, भारतीय चिकित्सा पद्धति एवं होम्योपैथी निदेशालय डॉ. मोमिता चक्रवर्ती, एमओ इंचार्ज, होम्योपैथी मेडिसिन, जीटीबी अस्पताल डॉ. प्रसन्ना भट्ट, सीनियर, कंसलटेंट (पीडिएट्रिक्स), मैक्स बालाजी )

 ... गर लेनी पड़ जाएं एंटीबायोटिक्स 
बुखार और जुकाम जैसे छोटी-मोटी बीमारी में भी कई बार डॉक्टर एंटीबायोटिक्स लिख देते हैं। इनसे बीमारी तो जल्दी अच्छी हो जाती है, लेकिन दूसरे कई नुकसान शरीर को झेलने पड़ते हैं। इस नुकसान से बचाने में प्रोबायोटिक्स का बड़ा रोल है। क्या हैं प्राबायोटिक्स और कैसे होता है इनका असर, बता रही है नीतू सिंह : 

गुड और बैड बैक्टीरिया का फंडा 
-हमारे शरीर में गुड और बैड दोनों बैक्टीरिया होते हैं। बैड बैक्टीरिया की वजह से जब बीमारी होती है तो डॉक्टर एंटीबायोटिक्स देते हैं, जिनसे बैक्टीरिया खत्म हो जाते हैं। लेकिन कई गुड बैक्टीरिया भी खत्म हो जाते हैं। -गुड बैक्टीरिया का काम हमारे हाजमे को दुरुस्त रखना होता है लेकिन इनके खत्म होने से बैलेंस बिगड़ जाता है। एंटीबायोटिक्स के साथ प्रोबायोटिक्स खाने से गुड बैक्टीरिया हमारी बॉडी में कायम रहते हैं।

कैसे करता है काम एंटीबायोटिक 
आजकल गले में हल्का इन्फेक्शन होने पर भी लोग तुरंत डॉक्टर के पास जाते हैं और जल्दी फिट होना चाहते हैं, क्योंकि वे बीमारी में वक्त बर्बाद नहीं करना चाहते। दूसरी ओर डॉक्टर भी अपने मरीज की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए फौरन एंटीबायोटिक्स लिख देते हैं, जिससे ठीक होने में लगने वाला समय आधा हो जाए। जब एंटीबायोटिक्स शरीर में प्रवेश करते हैं तो वे सारे जिंदा माइक्रोऑर्गेज्म (सूक्ष्मजीवी) को मारना शुरू कर देते हैं। दवा गुड बैक्टीरिया (मलाशय में जीवित फायदेमंद बैक्टीरिया) और बैड (संक्रमण के लिए जिम्मेदार) बैक्टीरिया का फर्क नहीं कर सकती और वह दोनों तरह के बैक्टीरिया पर हमला करती है। ऐसे में बुरे बैक्टीरिया के खत्म होने से इन्फेक्शन पर नियंत्रण हो जाता है, लेकिन साथ ही अच्छे बैक्टीरिया के खत्म होने से डायरिया जैसी दिक्कतें भी हो जाती हैं। 

हो सकती है अलग-अलग दिक्कतें 
जरूरी नहीं है कि एंटीबायोटिक्स लेने वाले हर मरीज को डायरिया हो। कई लोगों को गैस की समस्या हो जाती है। कुछ मरीजों को बार-बार टॉयलेट जाना पड़ता है तो कइयों को सिर्फ ऐसा महसूस होता है कि पेट अपसेट है। थोड़े समय के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एंटीबायोटिक्स से ज्यादा दिक्कत नहीं आती। इनका इस्तेमाल बंद करते ही मरीज सामान्य हो जाता है, मगर जो लोग लंबे समय तक एंटीबायोटिक्स यूज करते हैं, उनमें कई बार विटामिन और दूसरे पौष्टिक तत्वों की कमी हो जाती है। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है और हॉर्मोंस से जुड़ी समस्याएं हो जाती हैं। 

क्या हैं प्रोबायोटिक्स 
प्रोबायटिक्स में आंतों के लिए फायदेमंद बैक्टीरिया होते हैं। एंटीबायोटिक्स लेने से कई बार मरीज के शरीर के अच्छे बैक्टीरिया भी मर जाते हैं। प्रोबायोटिक्स एंटीबायोटिक्स से खत्म हो चुके इन बैक्टीरिया की आबादी बढ़ाने में मदद करते हैं। ऐसे मामलों में प्रोबायोटिक्स को आंतों के लिए फायदेमंद कई तरह के विटामिन कैप्सूल से बेहतर माना जाता है। देखा गया है कि एंटीबायोटिक्स के साथ प्रोबायोटिक्स लेने वाले मरीज दूसरे मरीजों की तुलना में जल्दी स्वस्थ हुए हैं। 

प्रोबायोटिक्स के नेचरल स्त्रोत 
प्रोबायोटिक्स वाले पेय पदार्थ, जैसे याकूट और कुछ कैप्सूल पिछले चार-पांच सालों के भीतर लॉन्च हुए हैं। वैसे अपने यहां पुराने समय से पेट की समस्या से बचाव के लिए प्रोबायोटिक्स के प्राकृतिक स्त्रोतों का इस्तेमाल होता आया है। इनमें कुछ आम स्त्रोत इस प्रकार हैं-

दही 
पेट अपसेट होने के कई मामलों में आम भारतीय घरों में दही चावल खाने का चलन काफी पुराना है। खमीर बनने की वजह से दूध दही में तब्दील होता है और इस पूरी प्रक्रिया में उसमें तमाम गुड बैक्टीरिया पनप जाते हैं जो कि पेट के लिए फायदेमंद होते हैं। 

किमची 
इसे बनाने के लिए गोभी को काली मिर्च, मूली, गाजर और फिश सॉस के साथ मिलाकर खमीर बनने के लिए रख देते हैं और इसके बाद इस्तेमाल करते हैं। 

अचार 
आम, नींबू, आंवला, अदरक, लहसुन, हरी मिर्च जैसी चीजों के इस्तेमाल से धूप में रखकर बनाया गया अचार प्रोबायोटिक्स का अच्छा स्त्रोत है। 

सोयाबीन और जौ 
सोयाबीन और जौ में खमीर बनाकर इस्तेमाल करने से प्रचुर मात्रा में प्रोबायोटिक्स मिल सकता है। 

डार्क चॉकलेट ज्यादातर डेयरी प्रॉडक्ट्स की तुलना में डार्क चॉकलेट में चार गुना ज्यादा प्रोबायोटिक्स होते हैं। 

कैप्सूल फॉर्म में मार्केट में मिलने वाले कुछ प्रोबायटिक्स सप्लिमेंट : BIFILAC, ViBact, Binifit, Becelac PB, Vizyl, Gutpro, Ecoflora, Econova 

एनालिसिस की जरूरत 
डॉक्टरों का कहना है कि प्रोबायोटिक्स का कोई नुकसान नहीं देखा जाता। ऐसे में हम मरीजों को एंटीबायोटिक्स के साथ इसे लेने की सलाह देते हैं, मगर इस संबंध में अब तक कोई एनालिसिस नहीं हुआ है। ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि यह हर मरीज को डायरिया से बचा सकते हैं। रिसर्च में यह साबित हुआ है कि इससे सेहत पर अच्छा असर पड़ता है। कुछ लोग यह दलील भी देते हैं कि एंटीबायोटिक शरीर में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया को मार सकती है तो प्रोबायोटिक्स के बैक्टीरिया पर भी असर दिखा सकती है। ऐसे में मरीज को कितना भी प्रोबायोटिक्स दिया जाए, जब तक एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल बंद नहीं होगा, कोई फायदा नहीं। इस बारे में एनालिसिस की जरूरत है। 
(एक्सपर्ट्स पैनलः डॉ. इंदर मोहन चुग, कंसल्टेंट पल्मनरॉलजी, मैक्स हॉस्पिटल डॉ. शिवानी, गौड़ गायनिकॉलजिस्ट,आईसिस हॉस्पिटल, कैलाश कॉलोनी डॉ. के. के. सेठी, कार्डियोलॉजिस्ट, दिल्ली हार्ट एंड लंग इंस्टिट्यूट डॉ. संजय चौधरी ऑप्थेल्मिक सर्जन, आई-7 हॉस्पिटल्स डॉ. मोनिका, जैन गैस्ट्रो-इंटेरोलॉजिस्ट, फोर्टिस, हॉस्पिटल(रूनीत शर्मा,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,4.12.11)

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गुरुवार, 16 सितंबर 2010

जुकाम

गरमी के बाद बरसात होने पर जहां अचानक तापमान गिरता है, वहीं बरसात में भीग जाने की वजह से भी कई बार जुकाम और छींकों के साथ भी कई तरह की शारीरिक परेशानियां और बीमारियां हमें घेर लेती हैं। कुछ सावधानियां अपना कर ऐसे सर्दी-जुकाम से आसानी से बचा जा सकता है।

जुकाम क्यों होता है सामान्य जुकाम नाक और श्वास तंत्र में होने वाला संक्रमण है। राइनो, एडेनो और कोराना जैसे वायरस नाक के बहने या बंद नाक का कारण बन सकते हैं। कई बार आपको शारीरिक पीड़ा और सूखी खांसी की शिकायत भी हो सकती है। ये लक्षण प्राय: 4 से 9 दिन तक रहते हैं। इसमें सामान्यत: लोग दवा नहीं लेते, जबकि यह रवैया बीमारी को और भी बढ़ा सकता है। हालांकि सर्दियों में जुकाम ज्यादा होता है क्योंकि बदलते मौसम में हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ जाती है।

इसी तरह अचानक कम तापमान में आने से भी जुकाम पकड़ सकता है जैसा आमतौर पर गर्मियों के बाद की बरसात में होता है। इसीलिए अक्सर डॉक्टर एयर कंडीशनर से धूप में या धूप से एसी में प्रवेश के बारे में हिदायतें देते हैं, क्योंकि शारीरिक तापमान अचानक गिर जाने से हमारा शरीर होने वाले संक्रमणों से लड़ने के लिए अकसर तुरंत तैयार नहीं हो पाता।

इसके अलावा, जुकाम और इन्फ्लूएन्जा (फ्लू) के अंतर को भी समझना जरूरी है। अक्सर जुकाम को फ्लू समझने की भूल की जाती है। फ्लू इन्फ्लूएन्जा के वायरस से होता है, जबकि जुकाम अन्य कारणों से। दोनों बीमारियां एक दूसरे से मिलती जरूर हैं। फ्लू के दौरान तेज बुखार से सिरदर्द, अंग दर्द, सूखी खांसी और बेहद कमजोरी भी महसूस होती है।

जुकाम को कैसे रोका जा सकता है? इस बारे में कुछ सावधानियां बरत कर अपना बचाव किया जा सकता है :- - अचानक ठंडे से गरम और गरम से ठंडे वातावरण में न जाएं। - पसीने के दौरान/खेलने के तुरंत बाद ठंडा पानी न पीएं। - गरम भोजन के साथ ठंडी चीजें न खाएं। मौसम के मुताबिक कपड़े पहनें। - धूल भरे वातावरण से बचें या नाक पर कपड़ा रखें। अपनी स्वच्छता का ख्याल रखें। - अपने हाथ बराबर धोते रहें क्योंकि ज्यादातर कोल्ड और फ़्लू वायरस अशुद्ध हाथों से ही फैलते हैं। - सार्वजनिक वस्तुओं जैसे - बैंक में पैन, पेपर आदि के इस्तेमाल से बचें। - घर से निकलते समय अपने साथ रुमाल/नैपकिन लेकर निकलें। - दिन का कुछ समय ताजी हवा या धूप में अवश्य बिताएं। - भीड़ भरी जगहों और धूल से बचें। - पर्याप्त मात्र में पोषक भोजन करें, जिसमें फल व हरी पत्तेदार सब्जियां पर्याप्त मात्र में हों। - रोग प्रतिरोधक विटामिन व खनिज तत्व प्रचुर मात्र में होते हैं। - प्रचुर मात्र में तरल पदार्थ लें/रेशेदार फल, सब्जियों का प्रयोग करें। - संक्रमित लोगों से दूरी बनाकर रखें।

ज्यादा प्रतिरोधक लेकर लड़ सकते हैं जुकाम से ? एंटी एलर्जिक दवाइयां व पैरासिटामोल जैसी दर्द निवारक दवाएं सहायक हो सकती हैं, बेहतर यही होगा कि इनके इस्तेमाल से पहले डॉक्टर की सलाह ले ली जाए। अगर जुकाम की वजह से आपकी नींद और दिनचर्या में कोई दिक्कत नहीं है तो दवा लेने की जरूरत नहीं होती। आमतौर पर जुकाम के लिए सबसे प्रभावशाली उपाय दवा के बगैर भी हो सकते हैं। जैसे, नाक में डालने वाले ड्रॉप/स्प्रे/इन्हेलर/भाप/प्राणायाम, बहुत से तरल पदार्थो को खानपान में प्रयोग करना/विटामिन सी युक्त फल/खाद्य लेना।

इन दिनों आहार क्या लें - तापमान में गिरावट के साथ ही विशेषज्ञ विटामिन सी को खाने में प्रमुखता की सलाह देते हैं, जिसके लिए आंवला व नीबू के साथ ही विटामिन सी की दवाओं को भी शामिल किया जा सकता है। - बारिश के साथ मौसम में आद्रता के बने रहने से शरीर में पानी की कमी हो सकती है, इसके लिए फलों के ताजे जूस को भोजन में शामिल किया जाना जरूरी है। - साधारण भोजन के अलावा मानसून में 200 से 300 कैलोरी इंटेक किया जा सकता है, हालांकि इसके साथ ही शारीरिक श्रम को अनुपात बनाए रखना भी जरूरी है। -हरी सब्जियों के अलावा, न्यूट्रिशियन व पाइथोन्यूट्रिट को शामिल किया जा सकता है। डॉ. रितिका समदर, डायटिशियन, मैक्स अस्पताल

(हिंदुस्तान,दिल्ली,14.9.2010)


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सोमवार, 22 मार्च 2010

जुकाम-बुखार और जोड़ों के दर्द में अदरक का उपयोग

शरीर सात धातुओं से बना हुआ है। सातों धातुओं का निर्माण और इनमें संतुलन से ही शरीर स्वस्थ बना रहता है। सातवें धातु शुक्र अर्थात ओज के निर्माण और शरीर के स्वस्थ बने रहने में अदरक का बहुत बड़ा योगदान होता है। अदरक इसे अंग्रेजी में जिंजर, संस्कृत में आद्रक, हिंदी में अदरख, मराठी में आदा के नाम से जाना जाता है। गीले स्वरूप में इसे अदरक तो सूखने पर इसे सौंठ (शुष्ठी) कहते हैं। यह भारत में बंगाल, बिहार, चेन्नई, कोचीन, पंजाब और उत्तर प्रदेश में अधिक उत्पन्न होती है।

 अदरक का कोई बीज नहीं होता, इसके कंद के ही छोटे-छोटे टुकड़े जमीन में गाड़ दिए जाते हैं। साधारण सी नजर आने वाली मटमैली गांठों वाली अदरक वाकई गुणों की खान है। फायदे अचूक हैं। इसका सेवन जुकाम-बुखार से लेकर जोड़ों के दर्द तक में तुरंत फायदा देता है। भूख लगती है। यह अपच निवारक है।
अदरक का सामान्य प्रयोग  भोजन के पूर्व इसके टुकड़ों पर सेंधा नमक डाल कर खाने से जीभ और गला साफ होता है और भोजन के प्रति अरूचि मिटती है।
अदरक की चाय  पांच ग्राम अदरक कूटकर पाव भर पानी में पकाएं। आधा पाव पानी रहने पर चाय की पत्ती, दूध और चीनी मिलाकर पीएं। यह कफ, खांसी, जुकाम, सिरदर्द, कमर दर्द, पसली और छाती की पीड़ा दूर करती है और पसीना लाकर रोम छिद्रों को खोलती है। पीने में यह स्वादिष्टहोती है।
अदरक का शर्बत  एक पाव मिश्री को आधा किलो पानी में डालकर चाशनी बना लें। फिर पाव भर अदरक के रस में पकाएं। एक तार की चाशनी रह जाने पर उसमें दो माशा असली केसर डालकर बोतल में भर लें। इसे छोटे बच्चों को भी पिलाया जा सकता है। सुबह सेवन करने पर यह भूख जागृत करता है और सर्दी-जुकाम, खांसी और श्वास के रोगियों के लिए फायदेमंद है। बच्चों में अपच, दस्त आदि में लाभदायक है।
जुकाम में  तीन ग्राम अदरक, पचास ग्राम काली मिर्च, छह ग्राम मिश्री को कूटकर एक कप पानी में ओटा लें व चौथाई कप रहने पर चाय की तरह गरम पीएं। वर, वायरल फीवर, डेंगू व ऋ तु परिवर्तन पर होने वाले बुखार, गले में खराश में अदरक का रस दो चम्मच और एक चम्मच शहद, सौंठ, काली मिर्च पीसकर मिलाएं और हल्का गरम कर चटाएं। शरीर दर्द, कफ, खांसी व इन्फ्लुएंजा में शीघ्र लाभ होगा।
जोड़ों के दर्द में  एक सेर अदरक का तेल व रस और आधा सेर तिल के तेल को स्टील के भगोने में मंद आंच पर पकाएं। पानी के पूरे जल जाने पर तेल शेष रह जाएगा। इसे ठंडा होने दें और बोतल में भरकर रख लें। जोड़ो के दर्द में मालिश करते समय इसमें 10 ग्राम हींग और दस ग्राम नमक भी मिलाएं, दर्द में शीघ्र ही फायदा होगा।

(दैनिक देशबन्धु,23 जनवरी,2010 से साभार)

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