कैंसर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कैंसर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 28 अगस्त 2012

कई रोगों का इलाज़ हो रहा है फोटोथैरेपी से

फोटोथैरेपी त्वचा संबंधी परेशानियों में लाभकारी हो सकती हैं। अब विशेषज्ञ रोशनी का उपयोग विभिन्न रोगों के इलाज के लिए कर रहे हैं। इन दिनों स्ट्रोक, मुँह की दुर्गंध और कैंसर जैसे रोगों के इलाज के लिए भी रोशनी को उपयोग में लिया जा रहा है। शुरूआत में त्वचा रोग विशेषज्ञ लाइट थैरेपी का उपयोग सोराइसिस के इलाज के लिए करते थे। इसके बाद सर्दी के मौसम में होने वाले सीज़नल डिप्रेशन के उपचार के लिए भी इसका उपयोग किया गया। अब विभिन्न तकलीफों में राहत के लिए लाइटथैरेपी का इस्तेमाल किया जा रहा है।

कमर दर्द 
कमर दर्द से निजाद दिलाने के लिए चिकित्सक नीली रोशनी का उपयोग कर रहे हैं। सफेद रोशनी के बिखरने पर इसके सात अलग-अलग रंगों को देखा जा सकता है। नीली रोशनी बहुत शक्तिशाली होती है, यह ऊतकों को नुकसान पहुँचााए बिना शरीर पर प्रभाव डालती है। इसीलिए इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के उपचार के लिए किया जा रहा है। युनिवर्सिटी हॉस्पिटल ऑफ हेडिल्बर्ग के चिकित्सकों ने नीली रोशनी उत्सर्जित करने वाला पैच विकसित किया है। इस पैच को दर्द की मदद से चिकित्सक दर्द का उपचार कर रहे हैं। 

यह पद्धति शुरूआती अध्ययनों पर आधारित है जिनमें यह सामने आया था कि रोशनी से शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड का उत्पादन बढ़ता है। नाइट्रिक ऑक्साइड माँसपेशियों के तनाव को दूर करता है। इससे रक्त धमनियाँ चौड़ी हो जाती है जिससे रक्त संचार बेहतर होता है। हेडिल्बर्ग में पैच पर अध्ययन जारी है, नई ट्रायल में १४ दिनों में पैच का उपयोग ५ बार किया जाएगा। मरीज़ों को इसे हर बार आधे घंटे के लिए लगाया जाएगा। अमेरिका में रोशनी के ज़रिए ओस्टियोआर्थ्राइटिस के कारण घुटने में होने वाले दर्द का इलाज खोजा जा रहा है। एक अन्य शोध से सामने आया कि कंधे का दर्द दूर करने के लिए फोटोथैरेपी असरदार है, वो भी बिना किसी दुष्प्रभाव के।  

पेट के छाले 
पेट के छालों के इलाज के लिए एक ऐसा उपकरण मददगार हो सकता है जिसके ज़रिए पेट के अंदर तक नीली रोशनी पहुँचाई जा सके। इस रोशनी के प्रभाव से अल्सर के लिए ज़िम्मेदार बैक्टीरिया नष्ट होने लगते हैं। यह तकनीक पेट के कैंसर के इलाज में भी फायदेमंद हो सकती है। अध्ययन बताते हैं कि प्रभावित हिस्से पर एक घंटे से भी कम समय के लिए यदि नीली रोशनी डाली जाए तो यह हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने के लिए पर्याप्त होती है। ख़ास बात यह है कि इससे बैक्टीरिया तो नष्ट हो जाता है लेकिन शरीर के स्वस्थ ऊतकों पर कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है। यह नया उपकरण हाल ही में विकसित किया गया है और इसपर शोध-अध्ययन व ट्रायल जारी हैं। अमेरिका में हुए शोध बताते हैं कि इस इलाज के बाद बैक्टीरिया की संख्या में ९१ प्रतिशत तक की कमी देखी गई है।

मिर्गी 
मिर्गी के उपचार के लिए फोटोथैरेपी को विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। जिन मरीज़ों को मिर्गी-रोधी दवाओं से ख़ास फायदा नहीं होता है, उनके लिए फोटोथैरेपी फायदेमंद साबित हो सकती है। युनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में हुई एक ट्रायल में मिर्गी के मऱीजों को तीन महीने तक रोज़ ३० मिनिट के लिए लाइट-बॉक्स से एक्सपोज़ किया गया। इस लाइट बॉक्स से तेज़ सफेद रौशनी निकलती है। मिर्गी का यह उपचार पहले हुए शोध-अध्ययनों पर आधारित है जिससे यह पता चलता है कि जिन दिनों में बादल छाए रहते हैं, तब मरीज़ों को मिर्गी के दौरे अधिक पड़ते हैं। जिन दिनों में तेज़ धूप निकलती है, तब मरीज़ों को कम दौरे पड़ते हैं। कुछ वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि तेज़ रोशनी के प्रभाव से विटामिन-डी और मेलाटोनिन आदि का स्तर बढ़ जाता है जिससे दिम़ाग में दौरों को नियंत्रित करने वाले रसायन स्त्रावित होने लगते हैं।

घाव  
मधुमेह रोगियों के पैरों में बने गंभीर घाव, अधिक दबाव पड़ने पर बनने वाले घाव व अन्य प्रकार के गंभीर घावों के इलाज के लिए लाइट थैरेपी असरकारी है। स्टॉकहोम में हुए इस शोध अध्ययन के अनुसार लाल रोशनी और इंफ्रारेड रोशनी के कॉम्बिनेशन से घाव तेज़ी से भरते हैं। इससे प्रेशर अल्सर ५४ प्रति तेज़ी से ठीक हो गए थे। प्रेशर अल्सर का ९० प्रतिशत हिस्सा केवल ५ हफ्तों में ही भर गया था। जिन मरीज़ों को लाइट थैरेपी नहीं दी गई थी, उनमें घाव भरने के लिए ९ हफ्तों का समय लगा था। 

मुँह की दुर्गंध  
जेरूसलम की हीब्रू युनिवर्सिटी के डेंटल स्कूल के अध्ययनकर्ताओं ने एक शोध में पाया कि नीली रोशनी से मुँह की दुर्गंध को कम किया जा सकता है। दंत चिकित्सक अक्सर दाँतो को सफेद बनाने के लिए इन पर दो मिनिट तक नीली रोशनी डालते हैं। नीली रोशनी न सिर्फ दाँतों को सफेद बनाती है बल्कि थूक में मौजूद दुर्गंधकारी बैक्टीरिया भी इससे ख़त्म होते हैं। इसीलिए अब इसे मुँह की दुर्गंध के इलाज के रूप में देखा जा रहा है। अध्ययनकर्ताओं ने थूक के ५० नमूनों पर शोध कर पाया कि इनपर नीली रोशनी डालने पर दुर्गंध काफी कम हो जाती है। उन्होंने पाया कि रोशनी डालने के बाद थूक के नमूनों में दुर्गंधकारी बैक्टीरिया की संख्या काफी कम हो गई थी। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने शोध अध्ययन में पायाका कि नीली रोशनी से मसूड़ों में बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया को ख़त्म किया जा सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह रोशनी मुंह में होने वाले पेरियोडोन्टिस नामक संक्रमण से बचाव और उपचार के लिए भी असरकारी हो सकती है। इस संक्रमण से दांत और हड्डियां क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। 

शोध प्रमुख डॉ. निकोस सूकोज के अनुसार,रोशनी डालने पर मुंह में मौजूद कई नुकसानकारी बैक्टीरिया कुछ सेकेंड्स में ही ख़त्म हो जाते हैं। रोशनी से बैक्टीरिया का सुरक्षा-कवच नष्ट हो जाता है जिससे ये नष्ट होने लगते हैं। 

कैंसर का इलाज़ 
लाइट के उपयोग से कैंसर के इलाज के लिए एक विशेष प्रकार के ट्रीटमेंट का उपयोग किया जा रहा है, इसे फोटो-डायनामिक थैरेपी कहा जाता है। इसका सबसे अधिक उपयोग त्वचा कैंसर के इलाज के लिए किया जाता है। इस ट्रीटमेंट में रौशनी के साथ ही एक विशेष प्रकार के ड्रग का इस्तेमाल किया जाता है। यह ड्रग कैंसर की असामान्य कोशिकाओं को रोशनी के प्रति संवेदशील बनाता है। कैंसर के मरीज़ों को दिए जाने वाले इस ड्रग की विशेषता यह है कि इसे केवल कैंसर की कोशिकाएँ ही अवशोषित करती हैं। 

इसके बाद मरीज़ के प्रभावित हिस्से पर नीली रोशनी डाली जाती है। रोशनी के प्रभाव में कैंसर कोशिकाओं द्वारा अवशोषित यह ड्रग एक विशेष प्रकार की ऑक्सीजन उत्सर्जित करने लगता है, जिससे कैंसर की कोशिकाएँ मरने लगती हैं। यह ट्रीटमेंट ट्यूमर को सिकोड़ने और नष्ट करने के लिए प्रभावी है। शरीर के भीतरी हिस्सों में मौजूद कैंसर के लिए ऑप्टिक फाइबर द्वारा रोशनी को शरीर के अंदरूनी हिस्सों में भेजा जा सकता है(सेहत,नई दुनिया,अगस्त,2012 द्वितीयांक)।

आगे चलें...

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

खानपान की आदत है कोलोरेक्टल कैंसर की जड़

वैसे तो कैंसर के कई प्रकार हैं लेकिन इनके बीच विश्व भर में कोलोरेक्टल कैंसर पुरुषों में तीसरा आम कैंसर (कुल का 10 प्रतिशत यानी 6,63,000 मामले) और महिलाओं में दूसरा आम कैंसर (कुल का 9.4 प्रतिशत यानी 5,71,000 मामले) है। दुनियाभर में कोलोरेक्टल कैंसर के मामलों की दर दोनों लिंगों में 10 गुना तक भिन्न होती है। कोलोरेक्टल कैंसर (सीआरसी) के मामलों की दर अलग-अलग है। दक्षिणी एशियाई देशों में इसके मामले कम है तो विकसित एशियाई देशों में ज्यादा। कोलोरेक्टल कैंसर ज्यादातर आर्थिक रूप से संपन्न देशों जैसे कि जापान, कोरिया और सिंगापुर में तेजी से बढ़ रहे हैं। हालांकि विभर के मुकाबले में भारत में सीआरसी के मामले बहुत कम रजिस्टर हुए हैं लेकिन पिछले कुछ बरसों में पश्चिमी लाइफस्टाइल को अपनाने के कारण भारत में भी इस कैंसर के मामले बढ़ते जा रहे हैं। नई दिल्ली स्थित सर गंगाराम अस्पताल के कीमोथेरेपिस्ट डॉ. श्याम अग्रवाल के मुताबिक, ‘विकसित देशों में कोलोरेक्टल कैंसर के मामलों की दर काफी ज्यादा है, इसकी वजह उनके खानपान की शैली है। रेड मीट, कम फाइबर का आहार और फास्ट फूड के ज्यादा इस्तेमाल से इस कैंसर के मामले ज्यादा दिख रहे हैं। 

उनका मानना है कि भारत में पिछले दो दशकों से सीआरसी के मामले ज्यादा देखने को मिल रहे हैं क्यों कि भारतीय बहुत ज्यादा पश्चिमी देशों के लाइफस्टाइल और खाने की आदतों को अपना रहे हैं। देशभर में मौजूद विभिन्न जनसंख्या ग्रुप और अस्पतालों से एकत्र आंकड़े काफी रोचक और विरोधाभासी हैं। देश के सभी भागों में कैंसर के मामलों में रेक्टम (बड़ी आंत का भाग जो गुदा को जो ड़ता है) के केस कोलन कैंसर से ज्यादा है। कोलोरेक्टल कैंसर महिलाओं में भी तेजी से फैल रहा है। वि स्तर पर सबसे आम कैंसर की सूची में 15 बरसों के भीतर मामलों की बढ़ोतरी के चलते 49 प्रतिशत बढ़कर यह 1990 में दूसरे स्थान पर आ गया है जबकि 1975 में यह चौथे स्थान पर था। रेक्टल कैंसर के मामले भारत के ग्रामीण इलाकों में ज्यादा देखने को मिल रहे हैं हालांकि देशभर में कोलोरेक्टल कैंसर के मामले सीमित हैं। इसके विपरीत, पेट के कैंसर और पित्ताशय में कैंसर के मामलों के दर में उत्तर-दक्षिण भारत में काफी अंतर है। तकरीबन 6 प्रतिशत सीआरसी आनुवांशिक कारणों से होता है तो तकरीबन दो तिहाई मामलों में लाइफ स्टाइल और खाने की आदतें शामिल हैं। परिवार का परिवेश और लाइफस्टाइल भी आनुवांशिक तौर पर कोलोरेक्टल कैंसर होने में भूमिका निभाते हैं। हालांकि सीआरसी के निर्माण में जीन के परिवेश की भूमिका पर अध्ययन करने की जरूरत है। डॉ. अग्रवाल के अनुसार, ‘तथ्यों से यह सामने आया है कि यूके और यूएसए के भारतीय अप्रवासियों में सीआरसी के मामले ज्यादा देखने को मिल रहे हैं जो चिंता का विषय है। दरअसल, लाइफस्टाइल और खानपान की आदतें सीआरसी होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इसका मतलब यह है कि भारत में कम आय से मध्यम आय की अर्थव्यवस्था में सीआरसी के मामले बढ़ेंगे।‘‘



विभिन्न अध्ययनों द्वारा रेड मीट की खपत और कोलोरेक्टल कैंसर के बीच का संबंध जानने की कोशिश की जा रही है। इसके साथ-साथ विशेषज्ञ यह भी खोज रहे हैं कि डाइट में सब्जियों और फलों का सेवन कोलोरेक्टल कैंसर को रोकने में प्रभावी है। कोलोरेक्टल कैंसर बड़ी आंत के भीतर होने वाला घातक ट्यूमर है। कोलन पॉलिप और कैंसर की शुरुआत में किसी भी तरह के लक्षण नजर नहीं आते। इसलिए नियमित तौर पर स्क्रीनिंग कराना महत्वपूर्ण है। कोलोरेक्टल कैंसर का इलाज उसके आकार, जगह और फैलने पर निर्भर करता है। इसके साथ-साथ मरीज की सेहत और उम्र का भी ध्यान रखा जाता है। वैसे सर्जरी ही कोलोरेक्टल कैंसर का आम इलाज है। हमारे जैसे देश में, जहां आबादी बहुत ज्यादा है, वहां रेक्टल कैंसर के मामले हालांकि कम हैं, बावजूद इसके इलाज में देरी या फिर एक जगह से दूसरी जगह रेफर करने से बीमारी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। इसके अलावा, देश में इलाज की पद्धतियों में भी भारी कमी है। वैसे तो सर्जरी ही इसका इलाज है, इसके साथ-साथ एडवांस स्टेज में रेडियोथेरेपी और कीमियोथेरेपी भी अहम भूमिका निभाते हैं। आधुनिक और विकसित तौर-तरीकों से बीमारी के इलाज में बेहतरीन सुधार हुये हैं(आधी दुनिया,राष्ट्रीय सहारा)।

आगे चलें...

गुरुवार, 31 मई 2012

गुटका और सिगरेट हैं ओरल कैंसर की जड़

क्या आप तंबाकू, सिगरेट, पान मसाला, पान, गुटखा आदि के बगैर रह नहीं सकते? क्या इस कारण आपके मुंह में तकलीफ रहने लगी है? सावधान हो जाइए, विशेषज्ञ कहते हैं कि यह ओरल यानी मुंह का कैंसर हो सकता है। धर्मशिला हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के सर्जिकल ओनकोलॉजिस्ट डॉ. अंशुमन कुमार और डॉ. मुदित अग्रवाल बता रहे हैं कि ओरल कैंसर क्या है, यह कैसे होता है और इससे कैसे बच सकते हैं। 

ओरल कैंसर यानी मुख का कैंसर, कैंसर के कारणों में आठवां प्रमुख कारण है। इसमें मुंह तो प्रभावित होता ही है, होंठ और जुबान पर भी इसका असर पड़ता है। वैसे यह गाल, मुंह के तालु, मसूड़ों और मुंह के ऊपरी हिस्से में होता है। इसके लक्षण आमतौर पर पकड़ में नहीं आते। 

प्रारम्भिक जांच 
ओरल कैंसर की जांच के दौरान सबसे पहले रोगी के स्वास्थ्य की पूर्व परेशानियों का पता लगाया जाता है। इसके बाद रोगी की धूम्रपान की आदतों का अध्ययन किया जाता है कि वह तंबाकू का आदी है या शराब का अधिक प्रयोग करता है या सिगरेट पीता है। विशेषज्ञ होठों, ओरल कैविटी, फारनेक्स (मुंह के पीछे, चेहरा और गर्दन) में शारीरिक परीक्षण द्वारा किसी भी तरह की सूजन, असामान्य या धब्बे वाले टिश्यू और घाव की जांच कर यह निर्णय लेते हैं कि कि कैंसर का कारण क्या है और वह किस स्थिति में है। 

कई बार में होती है जांच 
कोई भी जख्म या अल्सर मिलता है तो बायोप्सी की जाती है, जिसके बाद एनडोस्कोपिक परीक्षण और इमेजिंग इन्वेस्टिगेशन्स (कम्प्यूटिड टोमोग्राफी यानी सीटी), मैगनेटिक रिसोनेन्स इमेजिंग (एमआरआई) और अल्ट्रासोनोग्राफी द्वारा बीमारी की स्टेज जांची जाती है। 

उपचार का तरीका 
इसका उपचार हर मरीज के लिए अलग होता है। यह मुख्य रूप से पांच बातों पर निर्भर करता है। रोगी की उम्र, सामान्य स्वास्थ्य और उसका पिछला मेडिकल इतिहास, कैंसर का प्रकार, आकार व स्थान, कौन सा उपचार संभव है, पहले से मौजूद छुपी हुई बीमारियों का असर क्या होगा और क्या-क्या सुरक्षा जरूरी है।

शुरुआती अवस्था में ही ओरल कैंसर की पहचान हो जाए तो उपचार आसान हो जाता है। पीड़ित व्यक्ति के उपचार के लिए सर्जरी, कीमोथेरेपी और या रेडियोथेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है। सर्जरी की सहायता से टय़ूमर टिश्यू को पूरी तरह मिटाने और साथ वाले टिश्यू को सुधारने का काम किया जाता है ताकि कैंसर की समस्या फिर से पैदा न हो। 

अब तो पहचानें दुश्मन को 
अधिकतर ओरल कैंसर का कारण तंबाकू का प्रयोग है, इसलिए रोगियों को सख्त चेतावनी दी जाती है कि धूम्रपान छोड़ दें। रोगी धूम्रपान छोड़ देता है तो सिर, गर्दन और फेफड़ों के कैंसर के पनपने की आशंका से मुक्ति पाई जा सकती है जिसकी आमतौर पर आशंका रहती है। 

उपचार 
कन्जरवेटिव रिसेक्शन्स 
कन्जरवेटिव रिसेक्शन्स ओरल कैविटी के कैंसर के शुरुआती लक्षणों में होती है। इसका मुख्य काम होता है अंग को बचा कर रोगी को बेहतर जीवन प्रदान करना। इसमें एक छोटा सा ऑपरेशन किया जाता है। प्रारम्भिक स्थिति के लिए यही उपचार पर्याप्त होता है। 

कम्पोजिट रिसेक्शन्स 
एडवांस टय़ूमर ऑफ ओरल कैविटी के लिए यह सर्जरी की जाती है जो थोड़ी बड़ी होती है। तंबाकू चबाने वालों में यह समस्या सामान्य बात होती है। इसमें जबड़े का कुछ हिस्सा या पूरे जबड़े के साथ लगी गाल की अंदरूनी लाइनिंग के साथ में या इसके बिना गाल की त्वचा ही निकाल दी जाती है। 

मैक्सिलेक्टमी 
गाल की हड्डी (मैक्सिला) के कैंसर में रेडिकल मैक्सिलेक्टमी की जाती है। इसमें गाल की हड्डी के खराब हिस्से को निकाला जाता है। 

मेन्डिब्ल आर्क एंड फ्लोर ऑफ माउथ रिसेक्शन्स 
यह चुनौतीपूर्ण सर्जरी जबड़े के लोको-रिजनल टय़ूमर्स के लिए होती है। इसमें टय़ूमर को जबड़े सहित सावधानी पूर्वक हटाने के लिए ऑपरेशन किया जाता है और रोगी की टांग की हड्डी की सहायता से जबड़े का पुनर्निर्माण किया जाता है। 

कीमोथेरेपी 
सबसे जानी-पहचानी क्रिया है कीमोथेरपी। यह सुनियोजित किस्म का उपचार है जो सारे शरीर के सेल्स पर असर डालने वाला है। इसमें असामान्य विकास को रोकने और कैंसर पीड़ित सेल्स को अलग हटाने या उन्हें मारने के लिए दवा का प्रयोग किया जाता है। इस उपचार के बाद कैंसर सेल्स को फिर से बनने का कोई मौका भी नहीं मिलता। कई बार कीमोथेरपी के साथ सर्जरी और रेडिएशन थेरेपी का भी इस्तेमाल किया जाता है। 

रेडिएशन थेरेपी 
इसमें कैंसर पीड़ित सेल्स को समाप्त करने के लिए हाई एनर्जी रे या पार्टिकल्स प्रयोग किया जाता है। इसका मकसद कैंसर पीड़ित टिश्युओं को समाप्त करना और स्वस्थ टिश्युओं को बचाना होता है(हिंदुस्तान,दिल्ली,30.5.12)। 


नोटःइसी विषय पर आज इस और इस ब्लॉग पर दो महत्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुए हैं।

आगे चलें...

शनिवार, 12 मई 2012

मोटे बच्चों में लिवर कैंसर का जोखिम अधिक

डेनमार्क में १९३० से १९८९ के बीच १ लाख ६५ हज़ार पुरुष एवं १ लाख ६० हज़ार महिला स्वयंसेवकों पर एक शोध अध्ययन किया गया। स्कूल जाने की उम्र से ही इनके वज़न और बॉडी मास इंडेक्स पर निगाह रखी गई। इनमें से २५२ को वयस्क होने पर लिवर का कैंसर (हेपॅटोसेल्युलर कार्सीनोमा) हुआ। अध्ययन में सामने आया कि वयस्क होने तक जैसे-जैसे इनके बॉडी मास इंडेक्स में प्रति युनिट वृद्धि होती गई वैसे-वैसे इनके लिवर कैंसर का जोखिम भी बढ़ता गया। 

लिवर कैंसर का जोखिम हर लिंग और उम्र के स्वयंसेवकों में पाया गया। ईएएसएल साइंटिफिक कमेटी के सदस्य डॉ. फ्रेंक लमेर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि बचपन में हुए मोटापे के कारण न सिर्फ टाइप-२ डायबिटीज और दिल की बीमारियों का जोखिम है बल्कि फैटी लिवर डिसीज भी होती है जो बाद में लिवर कैंसर में भी तब्दील हो जाती है। इसलिए बच्चों का स्वस्थ बॉडी मास इंडेक्स बनाए रखने के महत्व को कभी भी नज़रदाज़ नहीं किया जा सकता। बचपन के मोटापे और वयस्कावस्था में विकसित हो रहे लिवर कैंसर के अंर्तसंबंधों पर ऊंगली रखने वाले इन शोध अध्ययनों के नतीजे चेताने वाले हैं। 

लिवर कैंसर के दूसरे कारणों में नियमित शराबखोरी, हिपेटाइटिस-बी और सी का संक्रमण तथा अन्य तरह की लिवर की बीमारियाँ शामिल हैं। शोध अध्ययन से जब इन कारणों से होने लिवर कैंसर के रोगियों को अलग रखा गया तब भी नतीजों में कोई बदलाव नहीं पाया गया। इससे यह संकेत मिलते हैं कि बच्चों में मोटापा हेपॅटोसेल्युलर कार्सीनोमा विकसित होने का एक प्रमुख कारण है। केवल १०-२० प्रतिशत मरीज़ों के लिवर कैंसर को सर्जरी की मदद से सफलता पूर्वक निकाला जा सकता है, शेष की ३ से ६ महीनों में मृत्यु हो जाती है। इसलिए लिवर कैंसर की रोकथाम में ही भलाई है। 

एक नए शोध अध्ययन का दावा है कि जो लोग नॉन अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिसीज़ (एनएलएफडी) से पीड़ित हैं और एक दिन में एक या दो पैग से अधिक शराब नहीं पीते उन्हें इसी बीमारी से पीड़ित दूसरे लोगों की बनिस्बत लिवर कैंसर का जोखिम आधा रहता है। नॉन अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिसीज अमेरिका में होने वाली बहुत ही आम बीमारी है। यह एक तिहाई अमेरिका वासियों को होती है। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो शराब तो नहीं पीते लेकिन मोटापे और खान-पान की बिगड़ी हुई आदतों के कारण इस बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। इस बीमारी में लिवर पर असामान्य मात्रा में वसा जमा हो जाती है। 

यह बीमारी होने का कोई ठोस कारण अभी तक मालूम नहीं हो सका है लेकिन मोटापे और मधुमेह को जोखिम की सूची में सबसे ऊपर रखा जाता है। अधिकांश मरीज़ों में लिवर पर वसा जमा होने पर कोई लक्षण प्रकट नहीं होते लेकिन बीमारी गंभीर होने पर लिवर से संबंधित बीमारियों से मृत्यु होने का जोखिम बना रहता है। नॉन एल्कोहोलिक फैटी लिवर डिसीज के कारण दिल की बीमारियाँ होने का जोखिम दो गुना अधिक होता है। 

सैन डियागो स्कूल ऑफ मेडिसिन के वरिष्ठ शोधकर्ता जैफ्री श्वीमर मानते हैं कि ५० साल का नॉन अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिसीज से ग्रस्त मरीज दिल की बीमारी के अधिक जोखिम पर होता है। आंकड़े सुझाते हैं कि लिवर की किसी बीमारी का जोखिम न हो तो कम मात्रा में शराब पीने से दिल की बीमारी का खतरा कम करने में मदद मिल सकती है लेकिन लिवर की कोई भी समस्या हो तो शराब सेवन का प्रश्न ही नहीं उठता(सेहत,नई दुनिया,मई द्वितीयांक 2012)।

आगे चलें...

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

पेल्विक पेनःकहीं कैंसर तो नहीं?

महिलाओं में काफी कॉमन हो चुकी पेल्विक पेन की प्रॉब्लम को हल्के में कतई न लें। गौरतलब है कि पेल्विक पेन कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का लक्षण भी हो सकता है। जानते हैं , इस बारे में : 

आजकल महिलाओं में पेल्विक पेन की प्रॉब्लम काफी कॉमन हो गई है। इस सिचुएशन को हल्के में लेने की बजाय तुरंत सीरियस हो जाना चाहिए , क्योंकि यह प्रीमेंसट्रुअल सिंड्रोम और सीरियस कंडिशन में सर्वाइकल कैंसर तक की निशानी हो सकती है। दरअसल , पेल्विक पेन की असल वजह का पता लगाना काफी मुश्किल होता है और इसी वजह से यह सीरियस प्रॉब्लम में भी कंवर्ट हो सकता है। 

पेल्विक पेन यानी ऐसा दर्द , जो नाभि के नीचे पेट के किसी भी हिस्से में हो सकता है। यह रुक - रुककर या लगातार भी हो सकता है। अक्सर देखने में आता है कि महिलाएं इस तरह के दर्द को सीरियसली नहीं लेतीं। लेकिन अगर आपको इसके साथ बहुत ज्यादा वैजाइनल ब्लीडिंग , लोअर बैक पेन और वैजाइनल डिस्चार्ज हो रहा है , तो आपको सावधान हो जाना चाहिए। दरअसल , इनकी मदद से आपको पेल्विक पेन की असल वजह का पता लग सकता है। 

अपोलो हॉस्पिटल में कैंसर सर्जन डॉ . राजिंदर कौर सग्गू कहती हैं , ' अपने डॉक्टर को पेल्विक पेन की असल वजह पता लगाने में मदद करने के लिए आपको इस चीज का रेकॉर्ड रखना चाहिए कि आपको यह दर्द कब उठता है , उस वक्त आप क्या कर रही होती हैं और क्या करने से ठीक यह ठीक हो जाता है। खुद को किसी भी तरह के कैंसर से बचाने के लिए आपको विभिन्न प्रकार के कैंसर और उनके लक्षणों की जानकारी होनी चाहिए। ' 

डॉक्टर सग्गू की मानें , तो इन लक्षणों पर नजर रखकर आप अपने डॉक्टर से इनके बारे में डिस्कस कर सकती हैं। इस तरह आपको अपनी बीमारी को शुरुआती स्टेज में पकड़ने में मदद मिलेग और आप डॉक्टर को आसानी से बता पाएंगी कि आपको क्या प्रॉब्लम है। साथ ही , आप अपनी बॉडी में होने वाले चेंज को लेकर भी सावधान रहेंगी। 

गौरतलब है कि पेल्विक पेन गायनेकॉलजिकल कैंसर का लक्षण तो हो ही सकता है। इसके अलावा , यह और भी कई बीमारियों का इंडिकेशन हो सकता है। हो सकता है कि आपको कैंसर की बजाय यूरिनरी इंफेक्शन , किडनी स्टोन , फाइब्राइड ट्यूमर्स या दूसरी किसी बीमारी की वजह से पेल्विक पेन हो रहा हो। 

दरअसल , गायनेकॉलजिकल कैंसर की शुरुआती स्टेज में किसी तरह के लक्षण नजर नहीं आते। लेकिन अगर आपको पेल्विक पेन , पेनफुल इंटरकोर्स , पीरियड के दौरान ब्लीडिंग , इंटरकोर्स के बाद ब्लीडिंग , मेनोपॉज के बाद ब्लीडिंग , हैवी डिस्चार्ज या वैजाइनल डिस्चार्ज जैसी प्रॉब्लम हैं , तो आपको तुरंत अपने डॉक्टर से कॉन्टैक्ट करना चाहिए। ध्यान रखें , शुरुआती चेकअप और ट्रीटमेंट से बड़ी परेशानी से बच सकती हैं(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,1.4.12)।

आगे चलें...

रविवार, 25 मार्च 2012

कैंसरःइलाज़ के बाद

अस्पताल में भर्ती मरीज़ से उसकी ख्वाहिश पूछी जाए तो वो जल्दी से ठीक होकर घर जाने की बात ही कहेगा। किसी भी मरीज़ और उसके परिजनों के लिए हॉस्पिटल से छुट्टी मिलना खुशी की बात होती है, लेकिन कैंसर जैसी बीमारी का उपचार पूरा होने पर हॉस्पिटल से छुट्टी मिलने के बाद भी मरीज़ को पूरी राहत नहीं मिल पाती। 

कैंसर का उपचार पूरा होने के बाद मरीज़ का सामना इन तीनों में से किसी एक स्थिति से होता है :

कम्पलीट रेमिशन 
कैंसर का कोई भी लक्षण दिखाई न देना। इसका मतलब है कि मरीज़ कैंसरमुक्त (कम्पलीट रेमिशन) हो चुका है। पाँच साल तक कैंसर का कोई भी लक्षण सामने न आने पर व्यक्ति को बिलकुल ठीक मान लिया जाता है।

पारशियल रेमिशन 
इलाज से कैंसर कम तो हो गया, लेकिन पूरी तरह ग़ायब नहीं हुआ। इस स्थिति को पार्शियल रेमिशन कहा जाता है जिसमें कैंसर पूरी तरह ख़त्म नहीं होताह ै। कुछ मरीज़ खासकर स्तन व प्रोस्टेट कैंसर के मरीज़ इस स्थिति के बाद भी कई सालों तक जी सकते हैं। लंबा जीवन जीने के बाद इनकी मृत्यु अक्सर कैंसर के अलावा किसी और कारम से होती है। 

जब बेअसर हो इलाज़ 
कई मरीज़ों के कैंसर पर इलाज़ का कोई असर ही नहीं होता है। 

इलाज पूरा होने के बाद चिकित्सक से अपनी स्थिति के बारे में पूरी जानकारी लें। अपने चिकित्सक से ये सवाल पूछ सकते हैं-

-आप में कैंसर के वापस आने या फैलने की कितनी आशंका है। क्या इसके अलावा किसी और प्रकार के कैंसर की आशंका भी है?

-आपको फॉलोअप के लिए कितनी बार आना होगा या कौन-कौन सी जाँचें करानी होंगी?

-स्वास्थ्य से जुड़ी किसी परेशानी के लिए किससे संपर्क करना होगा? 

- किन लक्षणों के प्रति सतर्क रहना होगा?

-उपचार के कारण लंबे समय में किस प्रकार के दुष्प्रभाव हो सकते हैं? यदि हाँ तो ये कब प्रकट होंगे?

जब लौट जाए कैंसर 
कैंसर के दोबारा फैलने की ख़बर से मरीज़ को गहरा सदमा लग सकता है। यह जानना पहली बार कैंसर का पता लगने से भी ज़्यादा मुश्किल हो सकता है। हो सकता है कि मरीज़ यह जानकर टूट जाए और उसमें फिर से इलाज लेने की हिम्मत भी न हो। इसके विपरीत कुछ मरीज़ों का मानना होता है कि वे दूसरी बार ज़्यादा सशक्त महसूस करते हैं।

ठीक होने के बाद 
उपचार के पूरी तरफ सफल होने के बाद भी मरीज़ पहले से काफी अलग महसूस करते हैं। वे शारीरिक, भावनात्मक या दोनों ही रूप से फर्क महसूस करते हैं। कैंसर और उसके उपचार के कारण शरीर में कई परिवर्तन होते हैं, मरीज़ पहले के मुकाबले कमज़ोर महसूस करता है। कैंसर के इलाज के दुष्प्रभाव भी होते हैं, जिन्हें समझने और एडजस्ट होने में समय लग सकता है। भावनात्मक रूप से मरीज़ घबराहट महसूस करता है, उसे इस बात का डर सताता रहता है कि कहीं कैंसर दोबारा न लौट जाए। बीमारी के कारण मरीज़ का कामकाज भी प्रभावित होता है और बीमारी में हुए खर्च के कारण आर्थिक स्थिति भी चिंता का विषय हो सकता है। ऐसे में मरीज़ को दूसरों की मदद लेना चाहिए। स्थिति बहुत चिंताजनक हो तो काउंसलर की मदद भी ली जा सकती है। इलाज़ के लिए यदि इम्यूनोसप्रेसेंट दवाएं दी गई हों तो संक्रमण से बचने के लिए विशेष प्रयास करने की जरूरत होती है। ऐसे में मरीज़ की संक्रमम से लड़ने की क्षमता कमज़ोर होती है। 

इन बातों का ध्यान रखें
-दिन में ३ बार माउथवॉश का इस्तेमाल करें।

-खाने से पहले हाथों को अच्छी तरह से धोएँ मरीज़ का खाना बनाने में भी सफाई का पूरा ध्यान रखना चाहिए। खाना स्वच्छता से पकाना चाहिए और बर्तन भी साफ होने चाहिए। 

- टॉयलेट का इस्तेमाल करने के बाद और अन्य लोगों व पालतु जानवरों से संपर्क के बाद जल्दी से हाथ धोएँ। 

-मरीज़ को मिलने से पहले परिजनों को हाथ ज़रूर धोना चाहिए। मरीज़ के कमरे की सफाई प्रतिदिन होनी चाहिए। प्रतिदिन नहाएं। 

-मरीज़ को ताज़ा बना हुआ भोजना खिलाना चाहिए। खाना अच्छी तरह पका हुआ होना चाहिए। 

-फलों को अच्छी तरह धोकर और छिलका निकालकर ही मरीज़ को दें। 

-मलाई या अधकचरी चीजें खाने से बचें। कच्ची सलाद भी नहीं खाना चाहिए(डॉ. अनिल सिंघवी,सेहत,नई दुनिया,मार्च द्वितीयांक 2012)।

आगे चलें...

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

मुख एवं गर्दन कैंसर की विकिरण चिकित्सा

तम्बाकू से होने वाले प्रमुख कैंसर में मुख और गर्दन का कैंसर है। तम्बाकू चबाने या बीड़ी-सिगरेट पीने, दोनों स्थितियों में मुख एवं गर्दन के कैंसर की संभावना बढ़ जाती है। मुख एवं गर्दन कैंसर का इलाज मुख्यतः सर्जरी और रेडियोथेरेपी द्वारा होता है। कीमोथेरेपी भी इन दोनों पद्वतियों के साथ सहायक रूप में दी जाती है।

आज भी विकिरण के बारे में कई अवधारणाएँ व शंकाए हैं जिसके कारण कई ज़रूरतमंद मरीज़ सही इलाज से वंचित रह जाते हैं। रेडियोथेरेपी (विकिरण चिकित्सा) को अभी भी लोग सिकाई या बिजली बोलते है जिसमें किसी मशीन द्वारा सिकाई की जाती है परंतु केवल भ्राँति है। रेडियोथेरेपी में उच्च ऊर्जा की एक्स-रे से कैंसर वाले हिस्से का इलाज किया जाता है जिसमें लिनियर एक्सेलरेटर जैसी अत्याधुनिक मशीन का इस्तेमाल किया जाता है। यह सुविधा विकसित संस्थानों उपलब्ध होती है। विकिरण चिकित्सा का सही प्रयोग प्रशिक्षित चिकित्सकों द्वारा किया जाता है अतः लोगों को इससे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। 

रेडियोथेरेपी दो प्रकार की होती है, बाहरी और आंतरिक विकिरण चिकित्सा। बाहरी विकिरण चिकित्सा लगभग ६ से ७ हफ्ते तक चलती है। इसके लिए मरीज़ को सप्ताह में पाँच दिनों तक रोज़ एक निश्चित समय पर इलाज के लिए आना होता है। बाहरी विकिरण चिकित्सा में भी कई प्रकार उपलब्ध हैं जैसे साधारण, तीन आयामी रेडियोथेरेपी और इंटेंसिटी मोड्यूलेटेड रेडियोथेरेपी (आईएमटीआर)। यह सब लिनियर एक्सेलरेटर मशीन पर संभव है जो रेडियोथेरेपी की सबसे आधुनिक मशीन है। इसमें प्रशिक्षित चिकित्सक द्वारा इलाज से पहले प्लानिंग की जाती है। इस पद्यति में कैंसर वाले भाग को अधिकतम विकिरण मिलता है और सामान्य अंगों को संपूर्ण रूप से बचाया जाता है। इसके दुष्प्रभाव कम से कम होते हैं। 

ब्रेकीथेरेपी के दौरान ट्यूमर कोशिकाओं में पतली प्लास्टिक की नलियाँ डालते हैं जिनसे रेडियोथेरेपी स्रोत ट्यूमर के हिस्से में जाकर रेडियेशन देता है। कैंसर की विकिरण चिकित्सा शुरु होने से पहले मरीज़ व परिजनों को कुछ महत्वपूर्ण बातों की जानकारी दी जानी चाहिए - 

-मरीज़ व परिजन को पूरी प्रक्रिया के बारे में अवगत कराना बहुत ज़रूरी है।

-सब से पहले हर मरीज़ के लिए मास्क बनाते हैं ताकि मरीज़ इलाज की प्रक्रिया के दौरान बिलकुल भी हिल न सके।

-इस मास्क के साथ सीटी स्कैन होता है और इस स्कैन की तस्वीरों पर ही पूरी प्लानिंग की प्रक्रिया निर्भर करती है। इसे प्लानिंग सीटी स्कैन भी कहते हैं।

-रेडियोथेरेपी प्रारंभ होने से पहले दंत चिकित्सक द्वारा दाँतों, मसूड़ों का परीक्षण और सफाई होना आवश्यक है।

-नई तकनीक से इलाज के दौरान रेडियोथैरेपी मशीन पर भी सप्ताह में दो से तीन बार इमेजिंग द्वारा इलाज़ की गुणवत्ता को परखा जाता है। 

-इलाज़ के दौरान रेडिएशन से होने वाले दुष्प्रभाव जैसे-मुंह में छाले होना,मुख लाल होना,स्वाद में परिवर्तन,दर्द,थकान,चमड़ी काली पड़ना,वज़न कम होना,लार न बनना,स्वाद में परिवर्तन-ये सभी दुष्परिणाम अस्थायी होते हैं। उचित देखभाल और डाक्टरी सलाह से मरीज़ बिल्कुल ठीक हो जाते हैं। 

-मरीज़ का भोजन और वज़न चार्ट बनाना ज़रूरी है। अगर किसी कारणवश,जैसे-ज्यादा छाले होने के कारण मरीज़ यदि मुंह से नहीं खा पाए तो नाक के ज़रिए नली डाली जाती है या एंडोस्कोपी द्वारा पेट में छेद करके नली डाल सकते हैं। इन दोनों तरीक़ों से घर में बना स्वच्छ प्रोटीनयुक्त आहार दे सकते हैं। 

-मुख एवं गर्दन की रेडियोथैरेपी के दौरान 8 से 10 ग्लास पानी पीना चाहिए। मुख की सफाई रखना ज़रूरी है। दिन में 8-10 बार कुल्ला करना चाहिए। 

-जिस भाग में रेडियोथैरेपी हो रही हो,उस भाग की चमड़ी पर कोई पदार्थ न लगाएं(डॉ. आरती कौल पटेल,सेहत,नई दुनिया,फरवरी द्वितीयांक 2012)

आगे चलें...

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

सिर और गर्दन का कैंसर

कैंसर के सौ से भी अधिक प्रकार हैं। हरेक प्रकार दूसरे से अलग होता है, सभी के कारण, लक्षण और उपचार भी अलग-अलग होते हैं। कुछ प्रकार के कैंसर आम हैं जैसे स्तन, सर्वाइकल और फेंफड़ों का कैंसर। 

विश्व भर में हर आठ में से एक व्यक्ति की मृत्यु कैंसर के कारण होती है। कैंसर से मरने वालों की संख्या एड्स, टीबी और मलेरिया से मरने वाले कुल मरीज़ों से अधिक है। दुनियाभर में हृदय रोगों के बाद कैंसर ही मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है। तंबाकू चबाना, सिगरेट, सैच्युरेटेड फैट से भरपूर आहार लेना, शराबखोरी, शारीरिक श्रम का अभाव, जैसी अस्वास्थकर आदतें लोगों को कैंसर की ओर धकेल रही हैं। 

हर समय बने रहने वाला दर्द, छाला, ज़ुबान में सुन्नपन, जबड़े में सूजन जैसे मामूली लगने वाले लक्षणों के साथ सिर और गले के कैंसर की शुरुआत होती है। इन्हें लोग आसानी से नज़रअंदाज़ कर देते हैं। अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है कि इस तरह की छोटी-मोटी तकलीफें कैंसर की शुरुआत भी हो सकती हैं। शुरुआत भले ही मामूली तकलीफों से हो लेकिन यह कैंसर बहुत गंभीर होता है। विश्वभर में यह छठा सबसे आम प्रकार का कैंसर है। केवल भारत में हर साल इसके २ लाख से भी अधिक नए मरीज़ सामने आते हैं यानी विश्व के एक तिहाई पीड़ित हमारे देश में ही हैं। विभिन्न रुपों में मिलन वाले तंबाकू का प्रचुर मात्रा में सेवन इसका मुख्य कारण है। ओरल, "सिर और गले" के कैंसर एक संयुक्त टर्म है जो सिर और गले के हिस्सों में होने वाले कैंसर के लिए उपयोग में ली जाती है। होंठ, मुख और लार गं्रथी, साइनस और आहार नलिका आदि का कैंसर इसमें शामिल है।

लक्षण
-ठीक न होने वाली गांठ या दर्द, छाला।
-गले में खराश जो इलाज के बावजूद ठीक न हो। आवाज़ का कर्कश होना। 
 - खाना निगलने में तकलीफ होना। 

ये लक्षण मामूली हैं, इन्हें आसानी से नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है क्योंकि ये कुछ ही समय में ठीक हो जाते हैं। कुछ समय में ठीक न हो या इलाज के बाद भी कोई सुधार न हो तो स्थिति चिंताजनक हो सकती है। ऐसे में चिकित्सक या दंत चिकित्सक से परामर्श लेना ज़रुरी हो जाता है।  

इन स्थितियों पर भी ध्यान दें

मुख : मसूड़ों, जीभ या मुँह के अंदर सफेद या लाल चकत्ता, जबड़ों में सूजन, मुँह में असामान्य रक्तस्त्राव या दर्द होना।

नाक : साइनस की तकलीफ का लंबे समय तक बने रहना, साइनस का गंभीर संक्रमण जिसपर एंटीबायोटिक उपचार का कोई असर न हो, नाक से खून बहना, बार बार सिर में दर्द होना, आँखों में सूजन या कोई और तकलीफ, ऊपर के दाँतों में दर्द।

थूक ग्रंथि : ठोड़ी के निचले हिस्से या जबड़े के आस-पास सूजन, चेहरे की मांसपेशियों में सुन्नपन, चेहरे, ठोड़ी और गले में लगातार होने वाला दर्द। -सांस लेने या बोलने में तकलीफ होना, बार-बार सिरदर्द होना, कानों में दर्द होना, सीटियाँ बजना, बहरापन। -खाना निगलते समय गले में या आस-पास दर्द, कानों में दर्द होना -गले में या गर्दन में लगातार होने वाला दर्द। 

कैंसर एक भयानक रोग है लेकिन इससे जो डर जुड़ा है उसके पीछे सच्चाई से ज़्यादा ग़लतफहमियाँ हैं। एक अध्ययन के अनुसार भारत में कैंसर को नियंत्रित करने के लिए जागरुकता की कमी मुख्य रुप से ज़िम्मेदार है। कैंसर के करीब ७० प्रतिशत मामलों में मरीज़ की अनुचित जीवनशैली और सामाजिक व्यवहार मुख्य रुप से ज़िम्मेदार होता है। सिर और गर्दन के कैंसर से अधिकतर पुरुष प्रभावित है। शोधकर्ताओं ने पाया कि पुरुषों को होने वाले कैंसर का शुरुआती अवस्था में पता लग जाए तो इन्हें फैलने से रोका जा सकता है। लक्षणों का अस्पष्ट होना, स्क्रीनिंग टेस्ट के प्रति भय या अन्य समस्याओं में उलझे होने के कारण कई लोग कैंसर के लिए स्क्रीनिंग टेस्ट नहीं करवाते। लाखों लोग कैंसर से पीड़ित हैं या पहले कभी रह चुके हैं। कैंसर के खतरे को जीवनशैली में परिवर्तन करके कम किया जा सकता है। तंबाकू-सिगरेट से दूरी, उचित शारीरिक श्रम और बेहतर आहार लेने से कैंसर की आशंका को कम किया जा सकता है। यह परिवर्तन करना मुश्किल हो सकता है लेकिन स्वस्थ जीवन के लिए इतना तो किया जा सकता है(डॉ. सुधीर बहादुर,सेहत,नई दुनिया,फरवरी प्रथमांक 2012)।

आगे चलें...

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

कैंसर हारेगा तो सिर्फ जागरूकता के हथियार से

कैंसर को पछाड़ने की कवायद इसे शुरुआत में ही पकड़ने से होती है। किसी भी बीमारी का प्रकोप पूरी तरह शरीर को तबाह कर दे और इलाज बाद में शुरु हो तब आशाजनक परिणाम नहीं मिलते। किसी भी बीमारी की पहचान जितनी जल्दी होगी, इलाज भी उतना ही कारगर होगा। कैंसर को जल्दी पकड़ने के दो आयाम है। पहला है जागरूकता, दूसरा है समय पर जाँच। चिकित्सा विज्ञान में डायग्नोसिस यानी बीमारी की पहचान को बहुत महत्व दिया गया है। मरीज़ कैंसर के शुरुआती लक्षणों के साथ जनरल प्रैक्टिशनर के पास पहुंचते हैं, वहीं इन्हें पहचानकर परीक्षणों के लिए रैफर किया जा सकता है। कैंसर की चेतावनी के लक्षणों की जानकारी नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ के साथ आमजन को भी होना चाहिए। शरीर में उभर रही असामान्य गठानों अथवा न भरने वाले घावों पर नज़र रखने की जरूरत है। स्तनकैंसर, गर्भग्रीवा का कैंसर, मुंह अथवा गले के कैंसर के लक्षणों को पहले से पढ़ा जा सकता है। चालीस पार पुरुष-महिलाओं को सालाना कैंसर की जाँचों से गुजरना चाहिए। पुरुषों में प्रोस्टेट का कैंसर तथा महिलाओं में स्तन कैंसर के मामले आमतौर पर उम्र के चौथे दशक के बाद ही सामने आते हैं। सालाना परीक्षणों के दौरान ही कई बार अपने आपको स्वस्थ समझने वालों में कैंसर पकड़ में आ जाता है। इसलिए जागरूकत रहते हुए सालाना परीक्षणों को पूरी तवज्जो देना उचित होता है। 

कैंसर को पछाड़ने वाले अधिकांश मरीजों की बीमारी पहली स्टेज में ही पकड़ी गई थी। रजोनिवृत्ति की ओर पहुंच रही महिलाओं को हर साल मैमोग्राफी और पैप स्मियर करना ठीक होता है। जहां तक पूरी आबादी के स्क्रीनिंग का सवाल है, इसके लिए काफी धन चाहिए। स्तनकैंसर और गर्भग्रीवा कैंसर इस जानलेवा बीमारी के दो ऐसे प्रकार है जिन्हें बहुत ही कम लागत पर पकड़ा जा सकता है। उदाहरण के लिए मैमोग्राफी को आंशिक अनुदान प्रदान किया जा सकता है। इसी तरह किसी महिला को आगे चलकर गर्भग्रीवा का कैंसर होगा या नहीं इसका पता एसिटिक एसिड टेस्ट से लग सकता है। मैमोग्राफी का विकल्प है स्वयं स्तन परीक्षण। स्वयं स्तन परीक्षण की जानकारी एएनएम अथवा नर्सों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं तक भी पहुंचाई जा सकती है। (संपादकीय,सेहत,नई दुनिया,फरवरी प्रथमांक 2013)।

विश्व कैंसर दिवस एक विश्वव्यापी पहल है, जिसके द्वारा कैंसर, इसकी रोकथाम, पहचान एवं इलाज के बारे में जागरूकता फैलाई जाती है। २०१२ की थीम है- 'एकजुट प्रयास से जीत संभव है।' 

भारत की आबादी १.२ अरब से अधिक है और यहाँ लाखों लोग विभिन्ना बीमारियों से पीड़ित हैं, जिनमें कैंसर के कारण हर साल लगभग ५.५ लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है। भारत ही नहीं दुनियाभर में कैंसर मृत्यु के बड़े कारणों में से है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि यदि इस ओर आवश्यक कदम नहीं उठाए गए तो २००५ से २०१५ के बीच कैंसर से मरने वालों की संख्या साढ़े आठ करोड़ तक पहुँच सकती है। इसीलिए जागरूकता फैलाने के लिए हर साल ४ फरवरी को विश्व कैंसर दिवस मनाया जाता है। कैंसर के खिलाफ एकजुट प्रयास किए जाएँ तो जीत संभव है। यदि प्रत्येक व्यक्ति, संगठन, सरकार अपनी-अपनी भूमिका निभाए तो २०२५ तक कैंसर और दूसरी असंक्रामक बीमारियों से होने वाली मौतों में २५ प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। एक अनुमान के अनुसार भारत में २५ लाख से ज़्यादा लोग कैंसर से पीड़ित हैं और हर साल ८ लाख नए मामले सामने आते हैं। जाँच और इलाज के लिए आने वाले ७० प्रतिशत मरीज़ों में कैंसर काफी विकसित हो चुका होता है, जिससे मरीज़ के बचने की संभावना बहुत कम हो जाती है। इसी कारण कैंसर पीड़ितों की मृत्यु दर बढ़ जाती है।  

कौन है जोख़िम पर? 
पुरुषों और स्त्रियों को होने वाले सबसे आम प्रकार के कैंसर पर हुए अध्ययन में देखा गया है कि इसके अधिकांश मामले पर्यावरण एवं जीवनचर्या से जुड़े होते हैं। तम्बाकू और शराब का सेवन,संक्रमण,खानपान की आदतें सबसे बड़े कारण हैं। किसी भी प्रकार के तम्बाकू का सेवन पुरुषों में होने वाले कैंसर के लिए 50 प्रतिशत तक ज़िम्मेदार होता है। कैंसर के 20-30 प्रतिशत मामलों में आहार-व्यवहार एवं यौन आचार की भूमिका होती है। अध्ययन बताते हैं कि जीवनशैली में उचित बदलाव लाने से कैंसर के मामलों में कमी आ सकती है। 

भारत में कैंसर निवारण 
भारत उन देशों में शामिल है जहां कैंसर के प्रभाव का आकलन और इस रोग से मुकाबले के लिए देशव्यापी अभियान आरंभ किया गया है। 1984 में राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम तय किए गए,जिसके चार लक्ष्य थेः 
1. तम्बाकूजनित कैंसर की प्राथमिक रोकथाम 
2. कैंसर का जल्द से जल्द पता लगाना 
3. इलाज़ की सुविधाओं में बढ़ोतरी 
4. पूरे देश में समान दर्द-निवारक और प्रशामक सेवा का जाल बिछाना। 

कैंसर के लक्षणः 
परिवर्तनः 
शौच-पेशाब की नियमित आदतों में बदलाव। किसी गांठ,मस्से या मुंह के छाले के आकार,रंग,रूप या मोटाई में स्पष्ट परिवर्तन। 

असमानता 
असामान्य रक्तस्राव या अन्य द्रवों का स्राव। 

कड़ापन 
स्तन,अंडकोश या किसी अन्य अंग में कड़ापन या गांठ महसूस होना। 

पाचन संबंधी गड़बड़ी 
अपच या निकलने में कठिनाई होना,समस्या बनी रहना। -जल्दी न छूटने वाली खांसी,ठीक न होने वाला घाव या छाला। घबराहट बनी रहना। 

रोकथाम
तम्बाकू से परहेज़ : 
तम्बाकू पुरुषों में कैंसर का एक बड़ा कारण है। अप्रत्यक्ष धूम्रपान समेत किसी भी रूप में तम्बाकू का प्रयोग न करें।

अलग-अलग प्रकार के स्वास्थ्यवर्द्धक आहार लें : 
शाकाहारी आहार लेना ज़रूरी है, फलों एवं सब्जियों का भरपूर सेवन करें, वसा और शराब कम से कम लें।

शारीरिक श्रम : 
नियमित रूप से व्यायाम करें, किसी भी गतिविधि के ज़रिए सक्रिय रहें और अपना वज़न नियंत्रित रखें। 

अधिक धूप से बचें : 
धूप से त्वचा के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। सूर्य की पराबैंगनी किरणों से बचना ज़रूरी है, दिन में १० से ४ बजे के बीच। इस अवधि में बाहर निकलने के पहले सनस्क्रीन लोशन लगाएँ। इसका एसपीएफ कम से कम १५ होना चाहिए। धूप तेज़ होने पर अधिक एसपीएफ वाला लोशन चुनें।

टीकाकरण : 
हेपेटाइटिस-बी से बचाव के लिए नियमित रूप से टीके लगावाने चाहिए, क्योंकि इससे लिवर का कैंसर हो सकता है।

निरापद आचरण : 
ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) जनित यौन-संक्रमित रोग, हेपेटाइटिस-बी और एचआईवी से विभिन्ना प्रकार के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। असुरक्षित यौन संबंधों और इंजेक्शन के लिए पहले से इस्तेमाल की हुई सुई का दोबारा इस्तेमाल होने से इस तरह के संक्रमण फैलने की आशंका होती है। यदि नशे के आदी हों और तमाम कोशिशों के बाद भी छुटकारा नहीं मिल रहा हो तो जल्द से जल्द चिकित्सकीय मार्गदर्शन लें।

जाँच करवाएँ : 
नियमित जाँच और स्वयं-परीक्षण किए जाएँ तो कुछ प्रकार के कैंसर का निदान करना आसान हो जाता है(डॉ. टी.पी. साहू,सेहद,नई दुनिया,फरवरी प्रथमांक 2012)।

आगे चलें...

विश्व कैंसर दिवस विशेषःलाइलाज़ नहीं है कैंसर

कैंसर के कारणों और इलाज के बारे में बात करना मुश्किल काम है क्योंकि शरीर में तमाम तरह का कैंसर हो सकता है। हर तरह के कैंसर के कारण, लक्षण और इलाज अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन एक बात बिल्कुल तय है और वह यह कि कैंसर लाइलाज नहीं है। आने वाली 4 फरवरी यानी शनिवार को वर्ल्ड कैंसर डे है। इस मौके पर एक्सर्पट्स से बात करके कैंसर के सामान्य लक्षणों, कारणों और इलाज की पूरी जानकारी दे रहे हैं प्रभात गौड़: 

कैंसर ऐसी जटिल बीमारी है जिसे एक वाक्य में परिभाषित करना बेहद मुश्किल है। शरीर के भीतर होने वाले 100 से भी ज्यादा कैंसरस बीमारियों के लिए मोटे तौर पर कैंसर ही बोल दिया जाता है। देखा जाए तो कैंसर शरीर के लगभग हर अंग को प्रभावित कर सकता है। यहां तक कि आंख और दिल जैसे अंगों में भी कैंसर हो सकता है। पुरुषों में सबसे ज्यादा कॉमन कैंसर है: मुंह और गले (हेड ऐंड नेक कैंसर) का कैंसर, जो लगभग 60 फीसदी मामलों में होता है। दूसरा सबसे कॉमन कैंसर है फेफड़ों का कैंसर। इसके अलावा, पेट के कैंसर भी खूब होते हैं। महिलाओं की बात करें तो उनमें सबसे ज्यादा कॉमन सर्वाइकल कैंसर होता है, लेकिन बड़े शहरों के आंकड़ों को ज्यादा तवज्जो दें तो अब ब्रेस्ट कैंसर सर्वाइकल कैंसर से भी ज्यादा हो रहा है। 

कैसे होता है कैंसर 
मानव शरीर में जो भी अंग हैं, वे कोशिकाओं से बने होते हैं। जैसे-जैसे शरीर को जरूरत होती है, ये कोशिकाएं आपस में विभाजित होती रहती हैं और बढ़ती रहती हैं, लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि शरीर को इन कोशिकाओं के बढ़ने की कोई जरूरत नहीं होती, फिर भी इनका बढ़ना जारी रहता है। बिना जरूरत के लगातर होने वाली इस बढ़ोतरी का नतीजा यह होता है कि उस खास अंग में गांठ या ट्यूमर बन जाता है। ये गांठ या ट्यूमर दो तरह के हो सकते हैं- बिनाइन और मैलिग्नेंट। 

हर ट्यूमर कैंसर नहीं 
बिनाइन ट्यूमर गैर-कैंसरस होते हैं, जबकि मैलिग्नेंट ट्यूमर को कैंसरस माना जाता है। बिनाइन ट्यूमर से जीवन को कोई खतरा नहीं होता और ये शरीर के दूसरे हिस्सों में भी नहीं फैलते। ये जिस अंग में होते हैं, वहीं रहते हैं और वहीं से इन्हें सर्जरी के जरिए हटा दिया जाता है। वर्ल्ड कप जीतने वाली भारतीय क्रिकेट टीम के सुपरस्टार युवराज सिंह इन दिनों अमेरिका में ट्यूमर का इलाज करा रहे हैं। उनके फेफड़े में ट्यूमर है, लेकिन यह ट्यूमर कैंसरस नहीं है। दूसरी तरफ मैलिग्नेंट ट्यूमर बदमाश होते हैं। जिस अंग में ये हैं, उसके आसपास के अंगों पर भी ये हमला करना शुरू कर देते हैं और उन्हें भी अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं। इनकी ताकत इतनी ज्यादा होती है कि ये ट्यूमर से अलग हो जाते हैं और ब्लड में घुस जाते हैं, जिसका नतीजा यह होता है कि कैंसर शरीर के दूसरे अंगों में भी फैलना शुरू हो जाता है। फैलने की इस प्रक्रिया को मेटास्टैटिस कहा जाता है।

यह वह स्थिति है, जिसमें कैंसर एक अंग से शुरू होकर दूसरे अंगों तक पहुंच जाता है, लेकिन इसे नाम उसी अंग के अनुसार दिया जाता है, जहां से शुरू हुआ। मसलन, अगर सर्वाइकल कैंसर फैलकर लंग्स तक पहुंच जाए तो इसे कहा सर्वाइकल कैंसर ही जाएगा, लंग्स का कैंसर नहीं। 

लक्षण 
कैंसर के लक्षण इस बात पर निर्भर होते हैं कि वह किस तरह का कैंसर है। जैसे-जैसे यह अडवांस स्टेज की तरफ बढ़ता जाता है, इसके लक्षण वजन में कमी, बुखार और थकान के तौर पर सामने आने लगते हैं, लेकिन याद रखें ऐसा होने का मतलब कैंसर होना ही नहीं है। हो सकता है, ये किसी बेहद सामान्य बीमारी के लक्षण हों। 

ये भी हो सकते हैं शुरुआती लक्षण 
-तीन हफ्ते से ज्यादा खांसी। 
-कहीं से भी असामान्य ब्लड का आना। मसलन, इंटरकोर्स के समय किसी को ब्लड आता हो या महिलाओं को पीरियड के अलावा बीच-बीच में ब्लड आता हो। 
-मुंह के अंदर कोई भी छाला हो, जो भर न रहा हो। 
-मुंह खोलने, चबाने, निगलने या खाना हजम करने में परेशानी। 
-शरीर के किसी भी हिस्से में गांठ महसूस हो। 
-लंबे वक्त से एसिडिटी हो और ठीक न होती हो, तो शक करें। हर एसिडिटी कैंसर नहीं होती, लेकिन यह कैंसर का एक शुरुआती लक्षण जरूर हो सकती है। 
-हीमोग्लोबिन यानी एचबी बेहद कम हो जाना। 
-तिल या मस्से में बदलाव आना या किसी जख्म का न भरना। 
-कमर, पेट या पीठ में लगातार दर्द रहना। -दर्द इसका एक लक्षण है लेकिन दर्द तब होता है जब कैंसर बेहद अडवांस स्टेज में पहुंच चुका होता है। 

कैंसर की वजहें 
-ठीक-ठीक यह बता पाना मुश्किल है कि कैंसर किस वजह से होता है, लेकिन फिर भी कार्सिनोजंस जैसी कुछ चीजें कैंसर होने का खतरा बढ़ा देती हैं। मसलन जो लोग स्मोकिंग करते हैं या किसी भी तरह से तंबाकू का सेवन करते हैं, उन्हें मुंह, गले और फेफड़े का कैंसर होने की आशंका बहुत ज्यादा होती है। 
-बीड़ी इस मामले में सिगरेट के मुकाबले कहीं ज्यादा नुकसानदायक है। 
-प्रदूषण, प्रीजर्व्ड और जंक फूड ज्यादा लेना भी कैंसर होने की वजहें हैं। 
-एचपीवी (सर्वाइकल कैंसर का कारण), हेपटाइटिस सी और ईबीवी (हर्पीज फैमिली का वायरस) जैसे कुछ वायरस भी कैंसर की वजह हो सकते हैं। कैंसर को मुख्यत: लाइफस्टाइल डिजीज माना जाता है। 

लाइलाज नहीं है कैंसर 
कैंसर के बारे में अक्सर कहा जाता है कि एक बार कैंसर हो जाने का मतलब मौत है। इसका कोई इलाज नहीं होता, लेकिन यह सच नहीं है। कैंसर का पता शुरुआती स्टेज में लग जाए तो इसे ठीक किया जा सकता है। शुरुआत में पता चलने पर 90 फीसदी कैंसर के मरीज पूरी तरह ठीक हो जाते हैं। 

दो तरह की देरी 
कैंसर के मामलों में आमतौर पर दो तरह की देरी देखी गई हैं, जिनसे यह बढ़ जाता है। पहली है मरीज की देरी और दूसरी है डॉक्टर की देरी। कई बार तो मरीज को शुरुआती लक्षण पता नहीं चलते, लेकिन कई बार शक होने के बावजूद वह इस डर से डॉक्टर के पास नहीं जाता कि कहीं डॉक्टर उसे कैंसर न बता दे। इसी चक्कर में देरी होती है। दूसरी देरी होती है डॉक्टर की तरफ से की जाने वाली देरी। मसलन किसी मरीज को तीन हफ्ते तक खांसी रही और वह डॉक्टर के पास चला गया, लेकिन सामान्य डॉक्टर पहचान ही नहीं पाया कि यह कैंसर भी हो सकता है और अगले दो महीने तक टीबी का इलाज करता रहा। दो महीने बाद आराम न आने पर वह मरीज को बताता है कि यह टीबी नहीं, कैंसर हो सकता है। किसी कैंसर विशेषज्ञ से मिलो। जब तक मरीज कैंसर विशेषज्ञ के पास जाता है, कैंसर बढ़ चुका होता है। सलाह यही है कि अगर कोई भी शुरुआती लक्षण नजर आएं, तो डर से बैठे न रहें और फौरन काबिल कैंसर विशेषज्ञ की राय लें। 

सर्वाइकल कैंसर का टीका 
टीका अभी सिर्फ सर्वाइकल कैंसर के लिए ही है, जिसे लगवाने से सवाईकल कैंसर से बचा जा सकता है। 9-45 साल की उम्र में इसे लगवा सकती हैं। छह महीने में इसके तीन इंजेक्शन लगते हैं और एक इंजेक्शन का खर्च करीब दो हजार रुपये आता है। कैंसर विशेषज्ञ के अलावा इसे गाइनकॉलजिस्ट से भी लगवा सकती हैं। 

बचाव के तरीके 
कैंसर की कुछ स्थितियां ऐसी होती हैं, जिनसे कुछ बातों का ध्यान रखकर हम बच सकते हैं। जनेटिक्स जैसी कुछ वजहें ऐसी हैं जिन्हें लेकर हमारे हाथ में कुछ खास नहीं होता। 

1 . तंबाकू से बचें 
 कैंसर होने की सबसे बड़ी वजह तंबाकू है। लगभग 40 फीसदी कैंसर के मामले तंबाकू की वजह से होते हैं। अगर आप बीड़ी-सिगरेट नहीं पीते, लेकिन मजबूरी में उसके धुएं में सांस लेनी पड़ती है तो भी आपको खतरा है। गुटखा (पान मसाला) चाहे तंबाकू वाला हो या बिना तंबाकू वाला, दोनों नुकसान करता है। हां, तंबाकू वाला गुटखा ज्यादा नुकसानदायक है। तंबाकू या पान मसाला चबाने वालों को मुंह का कैंसर ज्यादा होता है। 

2 . शराब कम 
रोज दो से ज्यादा पेग लेना मुंह, खाने की नली, गले, लिवर और ब्रेस्ट कैंसर को खुला न्योता है। ड्रिंक में ऐल्कॉहॉल की ज्यादा मात्रा और साथ में तंबाकू का सेवन कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ा देता है। सबसे कम ऐल्कॉहॉल बियर में, उससे ज्यादा वाइन में, उससे भी ज्यादा ऐल्कॉहॉल विस्की व रम में होती है। 

3 . फैट और नॉन वेज भी कम 
 तला हुआ खाना या ऊपर से घी-मक्खन लेने से बचना चाहिए। ज्यादा चर्बी खाने वाले लोगों में ब्रेस्ट, प्रोस्टेट, कोलोन और मलाशय (रेक्टम) के कैंसर ज्यादा होते हैं। मीट हजम करने में ज्यादा एंजाइम और ज्यादा वक्त लगता है। ज्यादा देर तक बिना पचे भोजन से पेट में एसिड व दूसरे जहरीले रसायन बनते हैं जिनसे कैंसर बढ़ता है। 

4 . बार-बार एक्स-रे नहीं 
एक्स-रे, सीटी स्कैन आदि की रेडियोएक्टिव किरणें हमारे शरीर में पहुंचकर सेल्स की रासायनिक गतिविधियां बढ़ा देती हैं जिससे स्किन कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए अगर आप अलग-अलग डॉक्टरों से इलाज कराते हैं और हर डॉक्टर अलग एक्सरे कराने के लिए कहे, तो डॉक्टर को जरूर बताएं कि आप पहले कितनी बार एक्स-रे करा चुके हैं। 

ये हैं इलाज के तरीके 
कैंसर विशेषज्ञों का साफ कहना है कि कैंसर के इलाज के लिए अलोपथी के अलावा कोई भी दूसरी पद्धति मसलन आयुर्वेद और होम्योपथी कारगर नहीं हैं। अलोपथी में ही इसका कामयाब इलाज है, क्योंकि अभी तक कोई ऐसी स्टडी नहीं आई है जिससे साबित हो कि दूसरी पद्धतियों ने कैंसर के मरीज को ठीक किया है। ऐसे में दूसरी पद्धतियों के चक्कर में फंसकर पैसा और वक्त की बर्बादी करने से बचना चाहिए। अलोपथी ही इसके लिए स्थापित पद्धति है। अलोपथी में कैंसर के इलाज के लिए मोटे तौर पर तीन तरह के तरीके अपनाए जाते हैं। कौन से तरीके से इलाज होगा, यह तीन बातों पर निर्भर करता है: बीमारी की स्टेज, कैंसर किस जगह पर है और मरीज की सामान्य अवस्था कैसी है। इसके आधार पर ही डॉक्टर इलाज का तरीका तय करते हैं। 

1 . सर्जरी 
 कब होती है: कैंसर की चार स्टेज होती हैं- 1, 2, 3 और 4। इनमें से 1 और 2 स्टेज को शुरुआती अवस्था (अर्ली स्टेज) कहा जाता है। स्टेज 3 को इंटरमीडिएट और 4 को अडवांस स्टेज कहा जाता है। अगर कैंसर अर्ली स्टेज में है, तो डॉक्टर सर्जरी कराने की सलाह देते हैं। इसमें सर्जरी ही बेस्ट ऑप्शन है। अगर किसी मरीज को सर्जरी कराने की सलाह दी जा रही है तो उसे खुश होना चाहिए कि उसका कैंसर अभी शुरुआती स्टेज में ही है, जिसे सर्जरी से ठीक किया जा सकता है। सर्जरी में रिस्क के चांस सिर्फ 0.001 फीसदी हैं। 

कैसे करते हैं: 
इसमें ट्यूमर का एक्स्ट्रा मार्जिन लेकर उसे निकाल दिया जाता है। दरअसल, कैंसरस ट्यूमर की जड़ें किसी पेड़ की जड़ों की तरह फैली होती हैं। जितना वह नजर आ रहा है, हो सकता है उसके आसपास के क्षेत्र में भी उसकी सेल हों। इसलिए इस ट्यूमर को निकालते वक्त यह ध्यान रखा जाता है कि किसी भी हालत में कोई कैंसरस सेल शरीर में रह न जाए और इसी के लिए ट्यूमर का एक्स्ट्रा मार्जिन लेकर उसे निकाला जाता है, जिसमें नॉर्मल टिश्यू भी ले लिए जाते हैं। अब उस अंग का पूरा निकालने की जरूरत नहीं है जिसमें कैंसर हुआ है। यानी ब्रेस्ट कैंसर में पूरा ब्रेस्ट हटाने की जरूरत नहीं होती। सिर्फ कैंसरस हिस्से को निकालते हैं। कई बार ट्यूमर निकालने के बाद भी काम करना पड़ता है। 

मसलन मुंह के कैंसर में वह जगह खाली हो जाती है जिससे मुंह में असंगतता आ जाती है। इसे दूर करने के लिए कैंसर की सर्जरी के बाद प्लास्टिक सर्जरी की जाती है। हेड ऐंड नेक वाले कैंसर की सर्जरी में मरीज को 4 दिन अस्पताल में रुकना पड़ता है, जबकि कैंसर अगर पेट का है तो सर्जरी के बाद 7 दिन अस्पताल में रुकना पड़ सकता है। पूरी तरह से रिकवर होने में दो से तीन हफ्ते का वक्त लग जाता है। 

फायदे: सर्जरी के बहुत अच्छे रिजल्ट मिले हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके साइड इफेक्ट बहुत कम होते हैं। 

नुकसान: यह तकनीक सिर्फ शुरुआती अवस्था में ही कारगर है। साइड इफेक्ट कम हैं, लेकिन हैं। मसलन सर्जरी के बाद के दाग पड़ जाना, मुंह का कैंसर है तो मुंह में थोड़ी असंगतता आ जाना आदि। 

खर्च: मुंह और गले के कैंसर की सर्जरी में करीब 1 लाख रुपये का कुल खर्च आ जाता है। यह खर्च जनरल वॉर्ड का है और कम-से-कम है। अस्पताल में ली जा रही सुविधाओं को देखते हुए खर्च बढ़ सकता है। इसी तरह अगर पेट का कैंसर है तो कम-से-कम दो लाख रुपये का खर्च आ सकता है। 

2 . कीमोथेरपी 
कब करते हैं: कैंसर स्टेज 1 और 2 पार कर चुका है और तीसरी या चौथी स्टेज में है तो कैंसर के इलाज में काम आने वाली तीन तकनीकों (सर्जरी, कीमो और रेडिएशन थेरपी) में से किन्हीं दो के कॉम्बिनेशन को उस पर इस्तेमाल किया जाता है। कौन से दो तरीके कब इस्तेमाल होंगे, यह मरीज की हालत देखकर डॉक्टर तय करते हैं। 

कैसे होती है: 
कीमोथेरपी में कुछ दवाएं दी जाती हैं। ये दवाएं दो तरह से दिए जाते हैं : आईवी द्वारा और ओरल। कीमो तीन हफ्ते के अंतराल पर दी जाती है। इसे एक साइकल कहते हैं। ऐसे कितने साइकल दिए जाएंगे, यह बात मरीज की हालत पर निर्भर करती है। फिर भी आमतौर पर छह से आठ साइकल लगते हैं। एक सिटिंग में आने के बाद मरीज को दो तरीके से दवा दी जाती है : डे केयर और भर्ती करके। डे केयर में मरीज को चार से छह घंटे अस्पताल में रुकना होता है। मरीज आता है और दवा लेकर उसी दिन चला जाता है। भर्ती वाले तरीके में डेढ़ दिन तक मरीज को अस्पताल में रखा जाता है। उसके बाद उसे घर भेजे देते हैं। 

नुकसान: कीमोथेरपी में कैंसर सेल तो मरते ही हैं, नॉर्मल सेल को भी इससे नुकसान होता है। ये दवा एक गोली की तरह होती हैं, जिसे सिर्फ यह पता होता है कि मुझे जान लेनी है, किसकी जान लेनी है, यह भेद गोली नहीं कर पाती। इसी तरह कीमोथेरपी में प्रयोग की जाने वाली दवाएं यह पता नहीं कर पातीं कि किस सेल को मारना है और किसे नहीं। वैसे, यह भी सच है कि अगर 1000 कैंसर सेल मरेंगे, तो नॉर्मल सेल एक ही मरेगा। कीमोथेरपी के साइड इफेक्ट काफी होते हैं। मसलन बालों का झड़ जाना, उलटी होना आदि। वैसे कीमो देते वक्त ही डॉक्टर इसके साइड इफेक्ट्स को भी कंट्रोल करते रहते हैं। 

खर्च: कीमोथेरपी में मोटे तौर पर 6 से 25 हजार रुपये प्रति साइकल का खर्च आ जाता है। 

टारगेटेड थेरपी: 
यह नई थेरपी है। यह कैंसर सेल स्पैसिफिक ड्रग्स हैं, जो नॉर्मल सेल को नहीं मारते, सिर्फ कैंसर सेल पर ही हमला करते हैं। हर कैंसर सेल पर एक सिग्नल होता है। ड्रग्स इसे पकड़ता है और हमला करता है। यह तकनीक बहुत महंगी है। अगर आईवी तरीके से दी जाए तो एक साइकल का खर्च 40 हजार से 1 लाख रुपये तक आ सकता है। टैब्लेट (ओरल) वाले तरीके से खर्च इससे कुछ कम आता है। 

3 . रेडियोथेरपी 
किसके लिए: कैंसर की स्टेज 3 और 4 के मरीजों के लिए ही है। एक और तरीके के कॉम्बिनेशन में इसे यूज किया जाता है। 

कैसे होती है: 
इसमें मशीन की मदद से कंट्रोल्ड रेडिएशन ट्यूमर पर डाले जाते हैं और इनसे कैंसर सेल को किल किया जाता है। यह ओपीडी प्रोसिजर है। यानी अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं होती। एक दिन में 15 मिनट में काम हो जाता है। हफ्ते में पांच दिन तक रेडियोथेरपी की जाती है और फिर दो दिन का गैप दे दिया जाता है। इसके बाद फिर हफ्ते में पांच दिन और फिर दो दिन का गैप। इस तरह कुल मिलाकर यह प्रोसेस डेढ़ महीने तक चलता है। 

नुकसान: इस तकनीक के भी साइड इफेक्ट हो सकते हैं जो निर्भर करते हैं इस बात पर कि किस जगह के कैंसर का इलाज किया जा रहा है। साइड इफेक्ट में शामिल हैं त्वचा पर आने वाला कालापन, मुंह का सूखना, डायरिया आदि। 

पुरुषों को भी हो सकता है ब्रेस्ट कैंसर 
आम धारणा है कि ब्रेस्ट कैंसर सिर्फ महिलाओं को ही होता है, पुरुषों को नहीं। यह एक बड़ी गलतफहमी है। ब्रेस्ट कैंसर पुरुषों को भी हो सकता है, जिसे मेल ब्रेस्ट कैंसर कहते हैं। इसके मामले बेहद कम होते हैं और इसीलिए इसका खतरा कम हो गया, यह सोचना गलत है। यह महज 1 फीसदी मामलों में होता है, लेकिन नंबरों में देखें तो एक अच्छी खासी तादाद ऐसे पुरुषों की हो सकती है जिन्हें बेस्ट कैंसर हो। 

अगर किसी पुरुष को निपल के एरिया में कोई गांठ, सूजन, घाव या किसी भी तरह का डिस्चार्ज महसूस हो तो इस बात की आशंका हो सकती है कि उसे ब्रेस्ट कैंसर हो। अगर ऐसा कोई भी लक्षण महसूस हो तो फौरन डॉक्टर से जांच कराएं। यहां यह जानना भी दिलचस्प है कि पुरुषों का ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं के ब्रेस्ट कैंसर के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से फैलता है। इसकी वजह है दोनों के ब्रेस्ट की बनावट का फर्क। महिलाओं के ब्रेस्ट मांसल होने की वजह से उनके रिब मसल्स थोड़े दूर होते हैं, जबकि पुरुषों में मांसलता न होने की वजह से रिब मसल्स और ब्रेस्ट में बहुत कम अंतर होता है। ऐसे में पुरुषों में अगर ब्रेस्ट कैंसर हो जाए तो वह अंदर तक तेजी से जाता है और ज्यादा फैलता है, जबकि महिलाओं में उसे अंदर तक पहुंचने में थोड़ा वक्त लगता है। जहां तक इलाज और खर्च की बात है तो मेल ब्रेस्ट कैंसर के इलाज के तरीके और खर्च वही हैं, जो दूसरी तरह के कैंसर के लिए हैं। 

टॉप 5 मिथ्स 
1. हेयर डाई, डियो और सेलफोन कैंसर का रिस्क बढ़ाते हैं। 
इन चीजों के कैंसर से संबंधों को लेकर काफी भ्रम हैं, लेकिन एक स्टडी से यह साबित हो चुका है कि हेयर डाई, सेलफोन या डियो में से किसी का भी यूज कैंसर के रिस्क को नहीं बढ़ाता। इनके यूज से किसी भी तरह के कैंसर होने की आशंका नहीं होती। 

2. अगर मां-बाप को कैंसर है तो बच्चों को भी होगा। 
कई तरह के कैंसर जनेटिक होते हैं, पर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि अगर किसी के मां-बाप को कैंसर हुआ है तो बच्चे को होगा ही। ब्रेस्ट और ओवेरियन जैसे कुछ कैंसर हैं जो माता-पिता से बच्चों में आ सकते हैं। बच्चे को पैरंट्स से कैंसर के जीन मिल गए हैं तो आशंका बढ़ जाती है, लेकिन बच्चों को कैंसर होगा, यह निश्चित नहीं है। 

3. कैंसर की वजह से सिर के बाल झड़ जाते हैं। 
कैंसर सिर के बाल झड़ने की वजह नहीं है। हेयर लॉस दरअसल, कीमोथेरपी और रेडिएशन थेरपी जैसे कैंसर के इलाजों का साइड इफेक्ट होता है। वैसे यह भी सच है कि कीमोथेरपी और रेडिएशन जैसी थेरपी कराने वाले हर मरीज के ही बाल झड़ जाएं, यह भी कोई जरूरी नहीं होता है। आजकल ऐसे अडवांस तरीके हैं, जिनसे कई मरीजों के बाल नहीं भी झड़ते। 

4. कैंसर में लोहा (सर्जिकल ब्लेड) लगने से यह बढ़ जाता है। 
यह एक बहुत बड़ा मिथ है कि कैंसर की जगह अगर लोहा लग गया तो वह और तेजी से फैल जाएगा। ऐसा देखा गया है कि कई बार इसी चक्कर में लोग सर्जरी और बायोप्सी कराने से डरते हैं। सच यह है कि अभी तक ऐसी कोई भी स्टडी नहीं हुई है जिससे यह साबित होता हो कि लोहा लगने से कैंसर की बीमारी और फैल सकती है। 

5. कुछ खास तरीके का कैंसर छूत की बीमारी होता है। 
कैंसर छूत की बीमारी है, यह भी एक मिथ है। कैंसर छूत से नहीं फैलता। हां, दो ऐसे वायरस जरूर हैं जिनसे कैंसर की बीमारी हो सकती है। ये वायरस हैं एचपीवी और हेपटाइटिस सी। एचपीवी से महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर और हेपटाइटिस सी से लिवर का कैंसर हो सकता है। ये दोनों वायरस असुरक्षित सेक्स संबंधों से फैल सकते हैं। 

यह है कैंसर विजेताओं की कहानी 
आत्मविश्वास से दी कैंसर को मात 
महज 30 साल की उम्र में ब्रेस्ट कैंसर होने के बारे में कौन सोच सकता है? 13 साल पहले जब मुझे इसका पता चला, तब तक कैंसर स्टेज थ्री-बी की विकसित अवस्था में पहुंच चुका था, लेकिन यह किसी वाइटल अंग तक नहीं पहुंच पाया था। एम्स में मेरा इलाज हुआ। इंटरनेट, किताबें, पत्र-पत्रिकाएं मेरे सहयोगी औजार थे, इस बीमारी के खिलाफ। इनसे मिली जानकारी ने मुझे आत्मविश्वास और हौसला दिया। 11 महीने लंबा इलाज हुआ। उसके बाद तीन, फिर छह और फिर 12 महीनों पर फॉलोअप, चेकअप आदि। पांच साल पूरे होने पर डॉक्टरों ने भी बधाई दी। आत्मकथात्मक किताब भी छपकर आ गई, लेकिन कहानी अभी बाकी थी। यह मुझे सात साल बाद पता चला। फिर से सर्जरी, रेडियोथेरपी, कीमोथेरपी। सात साल और बीत चुके हैं और उम्मीद करती हूं कि यह कहानी अब सचमुच खत्म हो चुकी है। इन 13 साल के उतार-चढाव से गुजरते हुए जीने के कुछ गुर सीख लिए हैं मैंने। किसी संगठन से नहीं जुड़ी हूं लेकिन कैंसर के मरीजों को जानकारी और हिम्मत देने का काम जारी है। कैंसर दूर रहे या आए भी तो जल्द दूर चला जाए, इसके लिए खुद को जानना, शरीर के बदलावों पर नजर रखना, सेहतमंद खान-पान और जीवनचर्या बहुत जरूरी है और सबसे जरूरी है - जीने की उम्मीद बनाए रखना। -आर. अनुराधा 

कमजोरी को बनाया ताकत 
आज मैं 70 साल की हूं। 30 साल पहले मुझे शुरुआती स्टेज पर ब्रेस्ट कैंसर हो गया था। सर्जरी और कीमोथेरेपी से इलाज हुआ। उस वक्त इलाज तक पहुंच पाना और पूरा करवा पाना आज की तरह आसान नहीं था। तब इसे लाइलाज बीमारी समझा जाता था। ऐसे में हिम्मत और डॉक्टरों के भावनात्मक संबल के सहारे मैंने इलाज कराया। मन में आता था कि चुपचाप जीवन खत्म कर लूं, फिर भी जाने किस अंदरूनी प्रेरणा की वजह से वह मुश्किल वक्त पार हो गया। कैंसर के खिलाफ लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती। इसमें डॉक्टर-नर्स, परिवार, दोस्त सभी शामिल होते हैं। पैरामेडिकल प्रफेशन में होने के कारण मुझे इस बीमारी की जानकारी थी। टाटा मेमोरियल अस्पताल की वर्कशॉप में मैंने प्रोस्थेटिक (नकली) ब्रेस्ट, विशेष ब्रा आदि बनाने की जानकारी पाई। अब मैं महिलाओं को ब्रेस्ट कैंसर सर्जरी के बाद जरूरी चीजें मुहैया कराने का काम कर रही हूं। -सुप्रेम बंसल

एक्सर्पट्स पैनल 
डॉ. अंशुमन कुमार, कंसल्टेंट कैंसर सर्जन, धर्मशिला हॉस्पिटल ऐंड रिसर्च सेंटर,डॉ. राजेश जैन, सीनियर कंसल्टेंट (सर्जिकल ऑन्कोलजी), एक्शन कैंसर हॉस्पिटल,डॉ. दिनेश सिंह, सीनियर कंसल्टेंट(रेडिएशन ऑन्कोलजी), पुष्पांजली क्रॉसले हॉस्पिटल(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,29.1.12)।

 शाम चार बजे पढ़िएः

जागरूकता ही है समाधान

आगे चलें...

सोमवार, 16 जनवरी 2012

काल्पोस्कोपी है गर्मग्रीवा कैंसर का कारगर इलाज़

गर्भग्रीवा का कैंसर हर साल सैक़ड़ों महिलाओं की जान ले लेता है। दुनिया भर में गर्भाशय ग्रीवा के कुल मामलों में से ६० प्रतिशत केसेस भारत में पाए जाते हैं। १ लाख से भी अधिक महिलाएँ हर साल गर्भग्रीवा के कैंसर से पी़िड़त हो रही हैं। जागरूकता के अभाव में गर्भग्रीवा कैंसर के मामलों में इजाफा हो रहा है। यदि इसे जल्दी पक़ड़ लिया जाए तो हमेशा के लिए इससे छुटकारा भी मिल सकता है। 

काल्पोस्कोपी एक ऐसा हथियार है, जो इस बीमारी पर काबू पाने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इस उपकरण से गर्भग्रीवा के मुख के हिस्से को ४० गुना ब़ड़ा करके देखा जा सकता है। इससे कैंसर के रोगाणुओं को फैलने से पहले पहचानने में आसानी हो जाती है। यह जाँच कुल १५ मिनटों में संपन्ना की जा सकती है। इसके अलावा रिपोर्ट भी तत्काल हासिल की जा सकती है। मरीज को न तो कोई परेशानी होती है और न दर्द होता है। पेपस्मियर टेस्ट भी इसी तरह का एक दूसरा टेस्ट है, जो गर्भग्रीवा के कैंसर को शुरुआती अवस्था में पक़ड़ सकता है। शरीर के इस हिस्से का द्रव लेकर बनाई गई स्लाइड, बायोप्सी अथवा कॉल्पोस्कोपी से इस बीमारी की पुख्ता जाँच संभव है। ३५ साल की उम्र के बाद हर महिला का साल में एक बार यह टेस्ट किया जाना चाहिए। इसके अलावा जिनकी शादी बहुत कम उम्र में हो जाती है और ५ से अधिक बच्चे पैदा हो चुके हों, उन महिलाओं को भी यह जाँच कराते रहना चाहिए। साथ ही जिनका सफेद पानी निकलता हो, संभोग के बाद खून आता हो, मासिक बंद होने के बाद भी खून आता हो, पीरियड के दिनों के गुजर जाने के बाद भी खून आता हो, ऐसी महिलाओं को जाँच अवश्य कराना चाहिए। यदि कॉल्पोस्कोपी अथवा पेपस्मियर से गर्भग्रीवा के कैंसर की पुष्टि हो जाती है तो एक छोटा ऑपरेशन भी किया जा सकता है। इससे पूरा गर्भाशय निकालने की जरूरत नहीं होती। 

महिलाओं के स्वास्थ्य की स्थिति बेहद खराब होने का एक बहुत ब़ड़ा कारण यह है कि उनकी किसी भी जरूरत को नजरअंदाज किया जाता है। रोग की अनदेखी करने से वह इतना ब़ढ़ जाता है कि कई बार महिलाओं की जान तक पर बन आती है।गर्भग्रीवा का कैंसर हर साल सैक़ड़ों महिलाओं की जान ले लेता है। दुनिया भर में गर्भाशय ग्रीवा के कुल मामलों में से ६० प्रतिशत केसेस भारत में पाए जाते हैं। १ लाख से भी अधिक महिलाएँ हर साल गर्भग्रीवा के कैंसर से पी़ड़ित हो रही हैं। जागरूकता के अभाव में गर्भग्रीवा कैंसर के मामलों में इजाफा हो रहा है। यदि इसे जल्दी पक़ड़ लिया जाए तो हमेशा के लिए इससे छुटकारा भी मिल सकता है।

क्या हैं फायदे
इस जाँच के लिए भर्ती होने की जरूरत नहीं है। तत्काल नतीजा मिल जाता है। 


ओपीडी में ही स्त्री रोग विशेषज्ञ मरीज का परीक्षण कर सकती हैं। इसी के साथ जरूरत समझने पर विशेषज्ञ बायोप्सी की सलाह भी दे सकते हैं। 


जरूरत प़ड़ने पर कैंसर से पहले की स्थिति को भी तत्काल क्रायोथेरेपि से ठीक किया जा सकता है। 


बिना देर किए हुए भविष्य के इलाज की योजना भी तैयार की जा सकती है। 


इन सब फायदों के मद्देऩज़र यह प्रोसीजर मरी़ज़ के लिए वरदान साबित होता है(डॉ. शिल्पा भंडारी,सेहत,नई दुनिया,जनवरी 2012 प्रथमांक)।

आगे चलें...

बुधवार, 11 जनवरी 2012

कीमोथैरेपी है कैंसर की सुरक्षा-रेखा

कैंसर जैसी जिद्दी बीमारी का इलाज पूरी तरह सुनिश्चित करने के क्रम में कीमोथेरेपी दूसरे स्थान पर आती है। पहले मरीज की सर्जरी की जाती है तथा बाद में इसे भी आजमाया जाता है। कीमोथेरेपी को 'इन्सल्ट टू लाइफ' भी कहा जाता है क्योंकि इसमें मरीज़ के शरीर की कैंसर कोशिकाओं को मारने के लिए दवाएँ दी जाती हैं। इन दवाओं से जहाँ कैंसर कोशिकाएँ मरती हैं वहीं स्वस्थ कोशिकाएँ भी मर जाती हैं। इस दवा के साइड इफेक्ट्स भी खूब हैं। अपनी तमाम बुराइयों के बावजूद कीमोथेरेपी को कैंसर के खिलाफ सुरक्षा पंक्ति में महत्वपूर्ण दर्जा हासिल है। 

कीमोथेरेपी को सर्जरी और रेडियोथेरेपी के साथ या इनके बिना भी दिया जा सकता है। कैंसर विशेषज्ञ सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मरीज के हित में इसे देने का निर्णय लेता है। कीमोथेरेपी या तो कैंसर कोशिकाओं को मार देती है या फिर उन्हें बहुगुणित होने से रोक देती है। ठीक उसी तरह जैसे भिन्ना तरह के बैक्टेरिया भिन्ना तरह की एंटीबायोटिक्स के प्रति संवेदनशील होते हैं, विभिन्ना किस्म की कैंसर कोशिकाओं भी अलग-अलग तरह की औषधियों से मारी जाती हैं।

कैसे काम करती हैं 
 कीमोथेरेपी की औषधि रक्त प्रवाह के जरिए कैंसर कोशिकाओं तक पहुँचती हैं। यहाँ तक पहुँचकर औषधि उन्हें खत्म कर देती है। सामान्य कोशिकाएँ जब अपना मूल स्वभाव छोड़कर पागलों की तरह बहुगुणित होने लगती हैं तो उन्हें कैंसर कोशिकाएँ कहा जाता है। कैंसर की सभी कोशिकाएँ हर समय बहुगुणित नहीं होतीं। वे चुपचाप पड़ी भी रहती हैं और कीमोथेरेपी की औषधियाँ इन्हें मार भी नहीं पातीं। कीमोथेरेपी के डोज जैसे-जैसे मरीज के शरीर में पहुँचने लगते हैं, चुपचाप पड़ी हुई कैंसर कोशिकाएँ बहुगुणित होना शुरू कर देती हैं। इसीलिए कीमोथेरेपी के कई डोज दिए जाते हैं जिन्हें कीमो सायकल भी कहा जाता है। कितने डोज का सायकल होगा और कितने तरह की दवाएँ इस्तेमाल की जाएँगी इसका निर्णय विशेषज्ञ बीमारी की अवस्था यानी स्टेज देखकर तय करता है। 

प्लेटलेट... 
 रक्त का एक और घटक प्लेटलेट रक्त का थक्का बनाने में सहायक होता है। कीमो के दौरान प्लेटलेट की संख्या कम हो जाती है तब मरीज़ को अधिक सावधान रहने की जरूरत है। इस अवधि में लगी जरा सी चोट या खरोंच भी दुखदाई हो सकती है। यदि नाक या मसूड़ों से खून बह रहा हो तो उसे बंद करना मुश्किल हो जाता है।कीमोथेरेपी को सर्जरी और रेडियोथेरेपी के साथ या इनके बिना भी दिया जा सकता है। कैंसर विशेषज्ञ सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मरीज के हित में इसे देने का निर्णय लेता है। कीमोथेरेपी या तो कैंसर कोशिकाओं को मार देती है या फिर उन्हें बहुगुणित होने से रोक देती है। ठीक उसी तरह जैसे भिन्ना तरह के बैक्टेरिया भिन्ना तरह की एंटीबायोटिक्स के प्रति संवेदनशील होते हैं, विभिन्ना किस्म की कैंसर कोशिकाओं भी अलग-अलग तरह की औषधियों से मारी जाती हैं। 

कीमोथेरेपी के साइड इफेक्ट्स 
कीमोथेरेपी के साइड इफेक्ट्स अलग-अलग लोगों पर भिन्न-भिन्न किस्म के हो सकते हैं। असर भी औषधियों की भिन्नाता के कारण अलग हो सकता है। अधिकांश साइड इफेक्ट्स अस्थाई होते हैं, और धीरे-धीरे ग़ायब हो जाते हैं। कीमोथेरेपी के साइड इफेक्टस और मरीज़ के कैंसर के बीच कोई अंतर्संबंध नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें कि यदि आपको कीमोथेरेपी के साइड इफेक्टस नहीं हो रहे हैं तो कीमो की दवाएं काम ही नहीं कर रही हैं। कीमोथैरेपी के साइड इफेक्ट्स और उससे उबरने के उपायों को जनाने के साथ-साथ इलाज़ के दौरान रखने वाली सावधानियों की जानकारी भी चिकित्सक से पूछ लेनी चाहिए। सामान्य कोशिकाएं जहां बहुगुणित होतोी हैं,वहीं कीमोथैरेपी की औषधियां भी असर करती हैं। मसलन,बोनमारो,मुंह,पाचनतंत्र(पेट और मल-मार्ग),शरीर के बाल,त्वचा और प्रजनन अंगों पर इसका सबसे अधिक असर होता है।

कीमोथेरेपी के दौरान थकान 
 कीमोथेरेपी के दौरान कई मरीजों को दिन भर बिस्तर पर पड़े रहकर आराम करने के बावजूद थकान महसूस होती है। कीमो के दौरान हल्की कसरतें करते हुए ताजी हवा में सांस लेना महत्वपूर्ण होता है। सोने से पहले कुनकुने पानी से नहाने से राहत मिलती है। यदि अलस्सुबह नींद खुल जाए तो चिढ़ने की जरूरत नहीं है। उठने के बाद कोई गर्म पेय पी सकते हैं और तनाव शैथिल्य के लिए वाद्य संगीत सुन सकते हैं। 

प्रजनन पर असर 
कीमो की सभी औषधियों से प्रजनन पर असर नहीं पड़ता लेकिन कुछ ऐसी हैं जिनसे ऐसा हो सकता है। कीमो का प्रजनन पर स्थाई या अस्थाई असर हो सकता है। यह डोज की सायकल और औषधि पर भी निर्भर होता है।

लाल रक्तकण 
 लाल रक्तकण पूरे शरीर में ऑक्सीजन पहुँचाने का काम करते हैं। कीमो का असर लाल रक्तकणों पर भी पड़ता है। इसकी वजह से रक्तअल्पता की शिकायत हो जाती है जिससे बहुत जल्दी साँस फूलने की शिकायत हो जाती है। इसके अलावा बेहद थकान भी महसूस होती है।

मुँह पर असर 
 कीमोथेरेपी की औषधि से मुँह सूख जाता है और छाले तक हो जाते हैं। इसके लिए मरीज को माउथ फ्रेशनर दिए जाते हैं।

पाचन पर असर 
 कीमो के कारण कुछ मरीजों को उल्टी और दस्त लगने लगते हैं लेकिन कीमो की सभी दवाओं का ऐसा असर नहीं होता। कीमोथेरेपी की कई तरह की औषधियों से कुछ मरीजों को कब्ज हो जाता है।

बाल पर असर 
 सभी कीमो की औषधियों से बाल नहीं झड़ते। कुछ औषधियों से बाल झड़ते हैं लेकिन पुनः उग आते हैं। कभी कभी सिर के बालों के साथ शरीर के अन्य हिस्सों से भी बाल झड़ जाते हैं। कीमो के कारण त्वचा रुखी हो जाती है। इसमें खुजली चलती है और धूप असहनीय हो जाती है(डॉ. राकेश तारण,सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर चतुर्थांक 2011)।

आगे चलें...

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

कैंसर को हराएगी जीवन-शक्ति

नए शोधों के ज़रिए कैंसर की नई दवाएँ सामने आ रही हैं। नई औषधियों की सफलता मरीज़ की मानसिकता पर भी निर्भर है। मन के हारे हार है और मन के जीते जीत। कैंसर का मरीज़ बीमारी की गंभीरता और उसकी मारक क्षमता को दिल पर ले लेता है। वह भूल जाता है कि इस बीमारी पर विजय पाने का हथियार खुद उसी के पास है। मरीज़ को अपनी जीवनीशक्ति पर भरोसा करना चाहिए। उसे कैंसर की प्रामाणिक चिकित्सा अपनाने के साथ ही अपने आप से भी एक वादा करना चाहिए कि वह कभी भी नकारात्मक विचार को पास फटकने नहीं देगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि देश में २०१५ तक स्तन कैंसर के ढाई लाख से अधिक मरीज़ होंगे। स्तन कैंसर ने शाकाहारियों और माँसाहारियों के साथ शहरी और ग्रामीण आबादी के बीच भेद-भाव नहीं करते हुए समान रूप से सबको शिकार बनाया है। इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के एक अध्ययन के मुताबिक स्तन कैंसर ने अब गर्भग्रीवा के कैंसर को पीछे छोड़ दिया है। शहरी आबादी की एक लाख महिलाओं में से ३३ स्तन कैंसरग्रस्त पाई गईं हैं। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि शाकाहारी महिलाएँ रजोनिवृत्ति के बाद स्तन कैंसर के जोखिम पर होती हैं। इसके लिए कीटनाशकों और रासायनिक खाद को दोषी माना जा रहा है। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अंश कृषि उत्पादों के ज़रिए हम तक पहुँच जाते हैं। हम सबके यानी स्त्री-पुरुष दोनों के शरीर में ये न चाहते हुए भी मौजूद रहते हैं। रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में हारमोन बनना बंद हो जाते हैं। तब शरीर में जमा कीटनाशकों और रासायनिक खाद के अंश सक्रिय होने लगते हैं। यही बाद में स्तन कैंसर का कारण बनते हैं। 

रासायनिक खाद और कीटनाशकों को वैज्ञानिकों ने हारमोन डिसरप्टिंग केमिकल माना है। प्रकृति ने स्तन के ऊतकों को इस्ट्रोजेन ग्रहण करने और प्रतिक्रिया करने के लिए डिज़ाइन किए हैं। इसलिए रजोनिवृत्ति के बाद जो महिलाएँ हारमोन रिप्लेसमेंट थैरेपी पर जाती हैं उनके मामले में स्तन कैंसर होने की प्रक्रिया और तेज़ हो जाती है। आहार के जरिए शरीर में पहुँच चुके रासायनिक खाद के अंश पुरुषों को भी परेशान करते हैं। अंडकोष एवं पौरुष ग्रंथि के कैंसर के बढ़ रहे मामलों को इससे जोड़ कर देखा जा रहा है। 

आम आबादी आज भी रासायनिक खाद के दम पर उगाई जा रही फसल पर निर्भर है। महंगा होने के कारण जैविक आहार सभी के लिए सुलभ भी नहीं है। अच्छे इलाज के साथ आत्मशक्ति और प्रबल जीजिविषा के भरोसे ही इस जानलेवा रोग पर विजय पाई जा सकेगी(संपादकीय,सेहत,नई दुनिया,दिसम्बर 2011 चतुर्थांक)।

आगे चलें...

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल की नई मशीन से कैंसर की शुरू में ही होगी पहचान और वह भी मुफ़्त में

कैंसर रोगियों को बड़ी राहत मिलने वाली है। सफदरजंग अस्पताल में जल्द ही गामा कैमरा मशीन की सुविधा मिलेगी, वह भी बिल्कुल मुफ्त। यह सुविधा अभी एम्स में है, जिसके लिए मरीजों को मोटी राशि खर्च करनी पड़ती है। अनुमान है कि इसके लिए 50 हजार रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं। गामा कैमरा मशीन की सहायता से शुरू में ही ब्रेन ट्यूमर के लक्षणों की पहचान संभव है, जिसके बाद डॉक्टर उसके इलाज के बारे में निर्णय ले सकेंगे। इससे मर्ज के शुरुआती चरण में ही पहचान करना संभव होगा। सुविधा मुफ्त होने से कैंसर की पहचान कराने की प्रक्रिया में आने वाले खर्च से भी राहत मिलेगी। गौरतलब है कि सफदरजंग अस्पताल को देश में सबसे ज्यादा बिस्तरों वाला अस्पताल माना जाता है। 

कैंसर की जांच के लिए मौजूदा तकनीक जैसे एक्स-रे या आइसोटोप स्कैन में जांच रिपोर्ट भी पूरी तरह सही न आने की शिकायत आती रही है। इससे इलाज में दिक्कत होती है। माना जा रहा है कि इस मशीन की सहायता से ज्यादा एक्युरेट रिपोर्ट मिल सकेगी। मशीन की लागत करीब 12 करोड़ रुपए होगी, जिसे जर्मनी से यहां मंगाया जाएगा। यह मशीन अस्पताल के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग में लगाई जाएगी। शुरू में मशीन की रोगियों पर परीक्षण के पहले डॉक्टरों को विशेषज्ञों द्वारा ट्रेनिंग भी दी जाएगी। मार्च तक अस्पताल में यह सुविधा शुरू हो जाएगी। अस्पताल के एमएस डॉ. एनके मोहंती ने बताया कि यह मशीन कैंसर सेल्स की सही पहचान कर सकेगी, जिससे पेशेंट को बेहतर सुविधाएं मिल सकेगी। 

जांच के लिए मशीन को पेशेंट के शरीर के विभिन्न हिस्से में मौजूद धमनियों के आस पास पॉइंट के सहारे रेडियोएक्टिव तारों से जोड़ा जाता है। इसके सहारे कैंसर का पता लगाया जाता है। इंडियन कैंसर सोसायटी के आंकड़े बताते हैं कि देश भर में कैंसर के हर साल 30 लाख मामले सामने आते हैं। ब्रेन ट्यूमर तो किसी भी उम्र में हो सकता है। यह बीमारी 40 से 70 साल के लोगों में ज्यादा देखी जाती है। पिछले दिनों 12 साल तक के बच्चों में ब्रेन ट्यूमर के कई केस देखे गए(सुशील कुमार त्रिपाठी,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,28.12.11)।

आगे चलें...

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

झारखंड में खुला देश का तीसरा जेनेटिक्स विभाग,कैंसर की दवा भी मिलेगी अस्पतालों में

रांची स्थित रिम्स में झारखंड व बिहार का इकलौता जेनेटिक डिपार्टमेंट खुल गया है। यह विभाग 12 दिसंबर से काम करने लगेगा। रिम्स के अनुसार अब गर्भ में ही आनुवांशिक रोग से ग्रस्त शिशु की पहचान हो सकेगी जिससे उनका इलाज हो सकेगा। इस संबंध में निदेशक ने सोमवार को अधिसूचना जारी की। 

डिपार्टमेंट के संचालन के लिए विशेषज्ञों की टीम गठित की गई है। इसके डिप्टी डायरेक्टर शिशुरोग विभाग के डॉ. अमर कुमार वर्मा और क्लीनिकल पैथोलॉजी विभाग के डॉ. चंद्रहास बनाए गए हैं। टीम में डॉ. विनीता लाल, डॉ. विद्यासागर, डॉ. पात्रो और डॉ. आशीष कुमार शामिल हैं। डिपार्टमेंट में हर शुक्रवार को दोपहर तीन बजे से शाम पांच बजे तक ओपीडी चलेगा। 

देश का तीसरा डिपार्टमेंट बना 
रिम्स देश का तीसरा ऐसा मेडिकल कॉलेज बन गया है यहां जेनेटिक्स डिपार्टमेंट है। अभी एम्स नई दिल्ली और एसजीपीजीआई, लखनऊ में ही यह विभाग काम कर रहा है। जहां डीएम (मेडिकल जेनेटिक्स), पीएचडी, बायोटेक्नोलॉजी में एमडी-एमएस की पढ़ाई होती है। 

बीमारियों का प्रसार थमेगा 
डिपार्टमेंट के खुलने से राज्य में आनुवांशिक रोगों का प्रसार थमेगा। क्योंकि बच्चों के जन्म से पूर्व ही जांच हो सकेगी और उनका उचित इलाज किया जा सकेगा। डॉ. तुलसी महतो, निदेशक, रिम्स जेनेटिक डिजीज का ओपीडी चालू था, लेकिन अब यह सिस्टम व्यवस्थित हो चुका है। डिपार्टमेंट के खुल जाने से जेनेटिक डिजीज के मरीजों के इलाज में आसानी होगी। डॉ. एके वर्मा, उप निदेशक, जेनेटिक विभाग, रिम्स राज्य सरकार ने आवश्यक दवाओं की सूची (लिस्ट ऑफ ऐसेंशियल मेडिसिन) तैयार कर ली है। सूची में कुल 348 किस्म की दवाएं हैं। इनमें अधिकांश जीवन रक्षक दवाएं हैं। ये दवाएं सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध रहेंगी। जल्द ही दवाओं की खरीद के लिए कंपनियों से रेट कांट्रैक्ट (दर निर्धारण) किया जाएगा। इसके बाद दवाएं जिलों में सिविल सर्जनों को भेज दी जाएंगी। सिविल सर्जन आवश्यकता अनुसार कंपनियों से सीधे दवा की खरीद कर सकेंगे। 

सूची में कैंसर के इलाज की भी दवा 
आवश्यक दवाओं की सूची में कैंसर, डायरिया, मलेरिया समेत अन्य बीमारियों की जीवन रक्षक दवाएं हैं। राज्य भर में कुल 348 किस्म की इन दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित कराने का प्रयास किया जा रहा है। तत्काल राज्य के सभी सिविल सर्जनों की सूची ई-मेल से भेज दी गई है। सिविल सर्जनों को निर्देश दिया गया है कि सूची में शामिल दवा ही खरीदें। 
आवश्यक दवाओं की सूची तैयार कर राज्य के सभी सिविल सर्जनों को ई मेल कर दिया गया है, ताकि वे दवा खरीद सकें। जल्द ही राज्य स्तर पर दर निर्धारण किया जाएगा। आवश्यक दवाओं की सूची में कमोबेश सभी बीमारियों को जीवन रक्षक दवाएं शामिल हैं। गरीब मरीजों को अब अधिकांश जीवन रक्षक दवाएं अस्पताल से मिल सकेंगी। डॉ. प्रवीण चंद्रा, निदेशक प्रमुख, स्वास्थ्य सेवाएं(पुष्पगीत और पवन कुमार,दैनिक भास्कर,रांची,6.12.11)

आगे चलें...

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

शरीर की गांठ की जांच है ज़रूरी

शरीर के किसी भी हिस्से में हुई गठान की जाँच करना जरूरी होता है। कई मामलों में पूरी गठान निकालकर उसकी जाँच करना संभव नहीं होता। इसके लिए एक पोली सुई की नोक से गठान का नमूना निकाल लिया जाता है। इसे एफएनएसी जाँच कहा जाता है।

शरीर के किसी भी हिस्से में उठने वाली कोई भी गठान या रसौली एक असामान्य लक्षण है जिसे गंभीरता से लेना आवश्यक है। ये गठानें पस या टीबी से लेकर कैंसर तक किसी भी बीमारी की सूचक हो सकती हैं। गठान अथवा ठीक नहीं होने वाला छाला व असामान्य आंतरिक या बाह्य रक्तस्राव कैंसर के लक्षण हो सकते हैं। ज़रूरी नहीं कि शरीर में उठने वाली हर गठान कैंसर ही हो। अधिकांशतः कैंसर रहित गठानें किसी उपचार योग्य साधारण बीमारी की वजह से ही होती हैं लेकिन फिर भी इस बारे में सावधानी बरतनी चाहिए। इस प्रकार की किसी भी गठान की जाँच अत्यंत आवश्यक है ताकि समय रहते निदान और इलाज शुरू हो सके। 

चूँकि लगभग सारी गठानें शुरू से वेदना हीन होती हैं इसलिए अधिकांश व्यक्ति नासमझी या ऑपरेशन के डर से डॉक्टर के पास नहीं जाते। साधारण गठानें भले ही कैंसर की न हों लेकिन इनका भी इलाज आवश्यक होता है। उपचार के अभाव में ये असाध्य रूप ले लेती हैं, परिणाम स्वरूप उनका उपचार लंबा और जटिल हो जाता है। कैंसर की गठानों का तो शुरुआती अवस्था में इलाज होना और भी ज़रूरी होता है। कैंसर का शुरुआती दौर में ही इलाज हो जाए तो मरीज के पूरी तरह ठीक होने की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। 

शरीर के किसी भी भाग या अवयव जैसे स्तन, थायरॉइड, लिम्फ ग्रंथियाँ, लार ग्रंथियाँ, कोमल उतकों, लिवर, किडनी, फेफडे, प्रोस्टेट, ओवरी, अण्डकोष जैसे किसी भी अंग में गठानें विकसित हो सकती हैं। रसौलियों का सही और विश्वसनीय निदान उपलब्ध न होने की स्थिति में कोई भी चिकित्सक उपचार की सही रूपरेखा नहीं बना सकता है। विशेषकर कैंसर के उपचार के लिए उसका सही रूप और रोग की तीव्रता जानना बेहद ज़रुरी होता है। एक्स रे, सोनोग्राफी,सीटी स्कैन,एमआरआई आदि से अनि रसौलियों के सही स्थान,गहराई,आकार,ठोस अथवा खोखले होने के बारे में जाना जा सकता है,लेकिन ऊतक अथवा कोशिका स्तर पर हुए परिवर्तनों के बारे में इनसे कोई जानकारी नहीं मिलती है। किसी रोग अथवा रसौली के प्रकार का अंतिम निदान ऊतक या कोशिका के स्तर पर हुए परिवर्तनों को देखकर ही संभव है क्योंकि प्राथमिक जांच में गठान का कारण कैंसर लग सकता है लेकिन अंदर से ये किसी और निरापद बीमारी की हो सकती है,यानी स्थिति स्पष्ट नहीं होती है। 

पुष्टि करने के लिए उस ऊतक की जांच माइक्रोस्कोप द्वारा करनी होती है। शरीर के प्रत्येक अंग या अवयव की संरचना विशेष प्रकार की कोशिकाओं-ऊतकों से होती है। ये ऊतक अपने सहयोगी ऊतकों के साथ एक विशेष संतुलन बनाकर रखते हैं। बीमारी के अनुरूप इस संरचना में कुछ विशिष्ट परिवर्तन होने लगते हैं। 

बारीक सुई से निकाले टुकड़े की जाँच 
बहुत पतली सुई की सहायता से किसी भी गठान का थोड़ा सा भाग खींच लिया जाता है। इस नमूने को स्लाइड्स्‌ पर फैला कर स्केन किया जाता है। माइक्रोस्कोप में नमूना देखकर चन्द मिनटों में ही नतीजे पर पहुँचा जा सकता है। इस विधि से ०.५ सेंटीमीटर व्यास से बड़ी रसौलियों की जाँच संभव है, कभी-कभी उससे छोटी गठानों की भी हो सकती है। नमूना लेने में ज्यादा समय नहीं लगता और आपात स्थिति में कुछ मिनटों में ही रिपोर्ट दी जा सकती है। नमूना लेने की सारी प्रक्रिया बिना किसी विशेष वेदना या असुविधा के कुछ ही पलों में पूरी हो जाती है। इसमें किसी चीरे, टाँके आदि की आवश्यकता नही। 

चूँकि नमूना लेने के लिए एक बहुत ही पतली सुई का इस्तेमाल किया जाता है इसलिए दर्द नही के बराबर होता है। थॉयराइड या शरीर के अंदरूनी हिस्सों में स्थित गठानों की बायोप्सी लेना बहुत दुष्कर होता है। ऐसे में फाइन निडल एस्पिरेशन सायटालॉजी एक वरदान साबित होती है। यहाँ तक की मस्तिष्क में होने वाले ट्यूमर का भी सही निदान इस विधि से संभव है। स्त्रियों और बच्चों के लिए तो यह तकनीक वरदान साबित हुई है। क्योंकि कई बार ऑपरेशन के लिए लगाया गया चीरा सौंदर्य की दृष्टि से बहुत भद्दा निशान छोड़ जाता है। केट स्केन, एमआरआई और सोनोग्राफी की सहायता से तो यह काम और भी आसान हो गया है। वे गठानें जो शरीर की सतह पर महसूस नहीं होती हैं या अंदरूनी भागों में स्थित होती हैं, उनका नमूना भी इस तरीके से आसानी से लिया जा सकता है। 

इस तरह की जाँच में नमूना चिकित्सक अथवा पैथालॉजिस्ट कोई भी ले सकता है। पैथालॉजिस्ट ही नमूना निकाले तो बेहतर होगा क्योंकि उसे रोग की तीव्रता के साथ अन्य जाँचों के परिणामों के बारे में समुचित जानकारी रहती है। नमूना कहाँ से निकालना है, निकाला हुआ नमूना काफी है या नहीं इसका निर्णय और उस नमूने का समुचित उपयोग, पैथालॉजिस्ट ही ज्यादा अच्छे से कर सकता है।  

चीरा लगाकर निकाले टुकड़े की जाँच... 
 किसी भी गठान की जाँच की परंपरागत विधि है बायोप्सी या हिस्टोलॉजी जाँच। इस विधि में सुन्ना या बेहोश करके, चीरा लगाकर पूरी गठान या उसका एक टुकडा निकाल लेते हैं। फिर विभिन्ना तकनीकों द्वारा इसका अध्ययन किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में लगभग ४८ घंटों का समय लगता है। यद्यपि ऊतकों और कोशिकाओं में हुए परिवर्तनों को जानने की यह सर्वमान्य तकनीक है, फिर भी यह काफी लंबी और जटिल है। इसमें समय भी काफी लगता है, चीरा और टाँके लगाए जाते हैं, दर्द, रक्तस्राव, संक्रमण की संभावना होती है। आर्थिक दृष्टि से भी यह प्रक्रिया खर्चीली होती है। कुछ गठानें ऐसी भी होती हैं जिनमें उपचार की दृष्टि से शल्यक्रिया आवश्यक नहीं होती। ऐसी स्थितियों में यह विधि मरीज के लिए अत्यंत कारगर उपाय है(डाक्टर प्रकाश राजे,सेहत,नई दुनिया,नवम्बर तृतीयांक 2011)।

आगे चलें...