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शुक्रवार, 10 मई 2013

आंतों का दुश्मन है इरिटेबल बाउल सिंड्रोम

इरिटेबल बाउल सिंड्रोम यानी आईबीएस आंतों की एक ऐसी बीमारी है जो मरीज़ की दिनचर्या में बाधा डालने लगती है। यह आंतों को डैमेज तो नहीं करती,मगर इसके लक्षण यह ज़रूर बताते हैं कि पेट के अंदर कुछ गड़बड़ चल रही है जिसे जल्द ही ठीक करने की ज़रूरत है। 

आईबीएस यानी आंतों में होने वाली अकड़न जिससे पेट में दर्द बना रहता है। इसे स्पैस्टिक कोलन, इरिटेबल कोलन, म्यूकस कोइलटिस जैसे नामों से भी जाना जाता है। इससे न केवल व्यक्ति को शारीरिक तकलीफ महसूस होती है, बल्कि उसकी पूरी जीवनशैली प्रभावित हो जाती है। यह आंतों को खराब तो नहीं करता लेकिन उसके संकेत देने लगता है। पुरुषों की तुलना में महिलाएं इस बीमारी से अधिक प्रभावित होती हैं। वैसे यह आंत या पेट के कैंसर के खतरे को नहीं बढ़ाता है लेकिन जीवन को अस्त-व्यस्त कर देता है। 

क्या हैं लक्षण 
-पेट में मरोड़ उठना 

-पेट में दर्द और सूजन 

-लगातार कब्जियत का बना रहना 

-बार-बार डायरिया जैसे लक्षण 

इसके कारण 
आईबीएस के सही कारणों का अब तक पता नहीं चला है। डॉक्टर्स मानते हैं कि संवेदनशील कोलन या कमजोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता के कारण यह समस्या पैदा हो सकती है। कई बार पेट में बैक्टीरियल इंफेक्शन के कारण भी आईबीएस हो सकता है। इसके कुछ खास कारण भी हैं जो अलग-अलग रोगियों में भिन्न हो सकते हैं- 
-कोलन का कमजोर मूवमेंट, जिससे मरोड़ के साथ काफी दर्द होता है। 

-कोलन में सेरोटोनिन की अनियंत्रित मात्रा, जिससे आंतों का मूवमेंट प्रभावित होता हैं।
 
-माइल्ड सेलिएक डिसीज के आंतों को डैमेज करने के कारण आईबीएस के लक्षण उभरने लगते हैं। 

संभव है इलाज 
आईबीएस का ऐसा कोई निश्चित इलाज नहीं है, लेकिन इसके लक्षणों से राहत जरूर मिलती है। इसके लिए कोई दवा आरंभ करने से पहले जीवनशैली में बदलाव की जरूरत होती है। इससे राहत पाने के लिए कुछ खास चीजों का ध्यान रखना भी जरूरी होता है। -रोजाना व्यायाम करें। -तनाव से बचें। -कैफीनयुक्त चीजें कम से कम लें। -खाना कम मात्रा में कई बार लें। -तले-भुने और स्पाइसी खाने से दूर रहें। -प्रोबायोटिक प्रोडक्ट्‌स लें जैसे दही आदि। 

कैसे होती है पहचान 
मरीज के लक्षणों के आधार पर आईबीएस का पता लगाना आसान होता है। कुछ खास प्रकार की डाइट का सुझाव दिया जाता है या फिर खाने में से कुछ चीजें कम कर दी जाती हैं, जिससे यह पता लगाया जा सके कि कहीं ये लक्षण किसी फूड एलर्जी के कारण तो नहीं है। स्टूल सैंपल के आधार पर इंफेक्शन का पता लगाया जाता है और ब्लड टेस्ट किया जा सकता है, जिससे यह पता लगाया जाता है कि रोगी एनिमिया से तो पीड़ित नहीं है। इसके आधार पर सेलिएक डिसीज यानी ग्लूटेन इनटोलरेंस का पता भी लगाया जाता है। इसकी जांच के लिए कोलनस्कॉपी की जाती है। इस टेस्ट के जरिए डॉक्टर कोलन की जांच करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर टिशू सैंपल लिए जाते हैं। इससे इस बात का पता लगाना आसान हो जाता है कि कहीं ये सारे लक्षण किसी और बीमारी के कारण तो नहीं है, जैसे कोलाइटिस या कोई अन्य क्रॉनिक डिसीज। मरीज की उम्र ५० वर्ष से अधिक है तो भी इस जांच की आवश्यकता पड़ती है।

इसके साथ जीवन 
आईबीएस के साथ जीना आसान तो नहीं होता क्योंकि इससे हमारी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होती है। लेकिन कुछ बातों को अमल में लाने से इसके साथ जीना भी आसान हो जाता है। वैसे दवाओं और सही तरीके से परहेज करने पर यह ठीक भी हो सकता है। टहलने और योग या ध्यान करने से काफी राहत मिलती है। पूरी नींद लेना इससे राहत के लिए काफी जरूरी है। एक्यूपंचर आदि भी लिया जा सकता है। 

विशेषज्ञ कहते हैं 
आमतौर पर आईबीएस तीन प्रकार का होता है, जिसमें रोगी को कब्जियत, डायरिया और दर्द की शिकायत रहती है। अब एक चौथे प्रकार के आईबीएस के लक्षण भी दिख रहे हैं, जिसमें इन तीनों के मिति लक्षण होते हैं। तलाभुने खाने, दूध और उससे बनी सामग्री से परहेज करें। तनाव से बचें(डॉ देवेंद्र सिंह, गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट, बिलासपुर का यह आलेख नई दुनिया के सेहत परिशिष्ट,मई प्रथमांक,2013 में प्रकाशित है)।

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गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

बैक-पेनःअनदेखी होगी घातक

बदलती जीवन शैली और भागमभाग भरी जिंदगी के कारण आज हर दसवां व्यक्ति बैक पेन से परेशान है। कभी बुढ़ापे में होने वाला यह पीठ या कमर दर्द आज युवाओं और अधेड़ों से लेकर बच्चों में भी दिखाई पड़ने लगा है। यदि कमर दर्द के लक्षणों की लंबी समय तक अनदेखी की जाए तो यह गंभीर बीमारी का रूप भी ले सकता है क्योंकि रीढ़ की हड्‌डी और कमर दोनों मिलकर ही शरीर को आधारभूत संरचना प्रदान करते हैं और दैनिक कार्य करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हमारे शरीर का पूरा भार कमर पर होता है। यह भार जब असंतुलित ढंग से मसल्स, कार्टिलेज, बोन्स या स्पाइनल कार्ड पर पड़ता है तो दर्द की शुरुआत होती है।

क्या हैं कारण 
बैक पेन के कई कारण हो सकते हैं। वजन का बढ़ना कुछ सबसे सामान्य कारणों में से एक है। इसके अलावा ऑर्थराइटिस व प्रोलेप्स डिस्क (स्लिप डिस्क), उठने-बैठने और सोने का गलत ढंग, कमर की मांसपेशियों में अत्यधिक खिंचाव और स्पॉन्डीलाइटिस कुछ अन्य कारण हैं, जो बैक पेन का कारण बनते हैं। एक ही स्थिति में लगातार खड़े रहना भी पीठ में दर्द पैदा करता है। स्त्रियों में अनियमित मासिक धर्म की वजह से भी बैक पेन होता है या फिर गर्भवती होने के दौरान ऐसा होना आम है। नौकरी या पढ़ाई से जुड़ा मानसिक तनाव या अवसाद भी बैक पेन के लिए जिम्मेदार है। 

लक्षणों पर करें गौर
-किसी नर्व के दब जाने से पैरों में अकड़न।
-जलन, सुन्नपन, झुनझुनी होना।
-कमर के पिछले हिस्से में सामान्य दर्द की शुरुआत।
-दर्द का फैलाव पैर की अंगुलियों तक होना। 
-ज्यादा से ज्यादा आराम करने पर ही आराम महसूस होना। 

ये होते हैं ज़्यादा प्रभावित 
बैकपेन लोगों को विभिन्न कारणों से और अलग-अलग तरह से प्रभावित करता है। ऐसे लोग जिनका वजन लगातार बढ़ रहा हो, वे इसके लिए अधिक संवेदनशील होते हैं। कंप्यूटर पर लगातार काम करने वाले लोग, गलत ढंग से कसरत करना दर्द की शुरूआत करता या उसे बढ़ाता है। जिन्हें लगातार एसिडिटी की शिकायत हो या गरिष्ठ भोजन करने वाले भी इसके लिए वल्नरेबल होते हैं। ज्यादा कोमल गद्दों पर सोना भी दर्द दे सकता है। 

रोकथाम के उपाय
-वजन पर नियंत्रण रखना जरूरी क्योंकि वजन बढ़ने के साथ कमर दर्द की शिकायत भी बढ़ती है।
-एक्सपर्ट की देखरेख में नियमित व्यायाम करें और संतुलित आहार लें।
-खड़े रहते समय दोनों पैरों पर समान वजन डालें, पीठ और पांव सीधे रखें।
-लंबे समय तक बैठते वक्त यदि संभव हो तो फुट स्टूल का इस्तेमाल करें।
-फ्लैट फुटवेयर का इस्तेमाल करें। 
- लंबे समय तक बैठे-बैठे काम करना हो तो बीच-बीच में ब्रेक लें।

उपचार 
दो या दो से अधिक दिनों तक बैक पेन बना रहे तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। दर्दनिवारक दवाइयां राहत तो पहुंचा सकती हैं लेकिन दर्द को जड़ से खत्म नहीं करतीं और इसके साइड-इफैक्ट्‌स भी हैं। फिजियोथैरेपी में दर्द कम करने के लिए गर्म पानी या बर्फ से विशेष सिंकाई की जाती है। इसके तहत अत्याधुनिक मशीनों जैसे लेजर अल्ट्रावॉयलेट आदि भी कमर दर्द में बहुत राहत पहुंचाती है। ट्रैक्शन (कैल्कुलेट खिंचाव) के द्वारा वर्टिब्राओं के बीच के गैप को सामान्य रखने की कोशिश की जाती है। कसरत के जरिए बीमार की रीढ़ की हड्डियों से लगी मांसपेशियों को मजबूती दी जाती है।

क्या करें 
कमर दर्द का सबसे बड़ा कारण पोश्चर का सही नहीं होना है इसलिए इसमें सुधार जरूरी है। जैसे, शरीर के वजन को पंजे के मुकाबले एड़ियों पर ज्यादा डालें। एकदम मुडें या झुकें नहीं। ड्राइविंग करते वक्त कार की सीट को सही तरीके से एडजस्ट करें। दोपहियां वाहन चलाते समय लंबर बेल्ट का इस्तेमाल करें। सोते समय जांघों और घुटनों को थोड़ा सा मोड़ लें। बिस्तर छोड़ते समय एकाएक न उठकर पहले करवट लें और फिर उठें।

क्या न करें 
-औंधे मुंह न सोएं।
-न अचानक उठें, न एकदम से बैठें।
-बॉश बेसिन का उपयोग झुककर न करें।
-भारी सामान को धकलने की कोशिश न करें।
-दो हफ्तों से ज्यादा बेड रेस्ट न करें। अधिक बेड रेस्ट करने से दूसरी बीमारियां पैदा हो सकती हैं(रायपुर के फिजियोथैरेपिस्ट डॉ. गीतेश अमरोहित का यह आलेख नई दुनिया के सेहत परिशिष्ट,मार्च द्वितीयांक,2013 में प्रकाशित है)।

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गुरुवार, 13 सितंबर 2012

थकान और दर्द से निज़ात के आसान उपाय

काम करने से कलाई, हाथ, गर्दन में दर्द होने लगता है, पैर भी बैठे-बैठे अकड़ जाते हैं। आंख में दर्द, जलन होने लगती है। इन सब तकलीफों से बचाव के लिए कुछ व्यायाम करके आप आसानी से आराम कर सकती हैं। बुनाई की शौकीन महिलाओं को अक्सर उंगलियों और कलाई में दर्द की शिकायत रहती है। इस समस्या को ध्यान में रखते हुए कुछ सरल व्यायाम करें जो थकान को दूर करके पुन: तरोताजा महसूस कर सकती हैं 

- यदि आप जल्दी थकान, कंधे या कमर दर्द महसूस करती हैं तो अपने पैरों के नीचे एक पटरा रखें और आराम से बैठें। यह विधि आपके कमर व कंधे के दर्द को मिनटों में दूर करेगी। 

-कलाइयों के व्यायाम हेतु, पियानो या हारमोनियम बजाने की मुद्रा में अपनी प्रत्येक उंगली को टेबल पर रखकर उंगली को आगे-पीछे इधर-उधर घुमाकर नृत्य कराएं, बहुत आराम मिलेगा। 

-अपने दोनों हाथ कंधों के ऊपर तक ले जाएं फिर उन्हें ऐसे घुमाएं। मानों आप होल्डर बल्ब ढीला करके निकाल रही हों। इससे आपके कंधों को बहुत आराम मिलेगा। 

-दोनों हाथों से नमस्कार की मुद्रा बनाएं। हाथों को एक साथ दाएं-बाएं ऊपर-नीचे घु माएं। यह क्रिया हाथों के लिए उत्तम है। हाथों को उसी स्थिति में रखकर अपनी उंगलियों को अलग-अलग और बार-बार फैलाएं- सिकोडें। काफी आराम मिलेगा। 

-हाथों को उसी स्थिति में रखें व बारी-बारी से एक-एक उंगली को फैलाएं व सिकोड़ें, यह क्रिया भी थकी उंगलियों को काफी आराम पहुंचाएगी। 

-यदि आपको बहुत देर तक काम करना हो (कोई काम जल्दी पूरा करना हो) तो गर्दन के पास ऊपर एक हल्का बल्ब जलाकर रखें। इसकी हल्की गरमाहट गर्दन के तनाव को दूर करती रहेगी व रक्त प्रवाह भी संतुलित रहेगा। 

-दोनों हाथों को कोहनी के पास आगे की ओर करें। दोनों हाथों के पंजों को एकदू सरे में फंसाकर विपरीत दिशा में खींचें। दर्द काफी कम हो जाएगा। 

-हर आधे घंटे बाद दोनों हाथों व कंधों को सामने की ओर ढीला लटकाएं। ऐसा केवल दो मिनट के लिए करें। आपको ताजगी महसूस होगी। 

-अपने सिर को सीधा लटकने दें। गर्दन को गोलाई में दाएं-बाएं घुमाएं। 3 बार एक दिशा में और 3 बार दूसरी दिशा में घुमाएं। कुछ सेकेंड बाद गर्दन को दाएं व बाएं कंधे से छूने का प्रयत्न करें। गर्दन ढीली करके आगे-पीछे ले जाएं। फिर देखिए, आप किस तरह से ताजगी का अनुभव करेंगी। 

-आंखों के लिए 5 मिनट सीधी लेट जायें। आंखों पर ठंडे पानी से भींगे रूई के फाहे रखें। करवट लेकर पेट के बल लेट जाएं। ठंडी रूई का फाहा गर्दन पर रखें। आपकी सारी थकान दूर हो जाएगी। आप पुन: बुनाई के लिए तैयार हैं। 

ये कुछ ऐसी क्रियाएं हैं जिन्हें कोई भी महिला कर सकती है। जरूरी नहीं कि काम करने वाली महिलाएं ही ये व्यायाम करें। घरेलू कामकाज के दौरान थकान में भी ये टिप्स आपको फायदा पहुंचाएंगे। (उषा राय,आधी दुनिया,राष्ट्रीय सहारा,3 सितम्बर,2012)।

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रविवार, 2 सितंबर 2012

कमरःआह से आहा तक!

हमारी शारीरिक मुद्राओं के अनुसार ही शरीर पर दबाव पड़ता है और यदि यह दबाव गलत तरीके से पड़ रहा है तो कमर दर्द का कारण बन सकता है। यही नहीं इससे जोड़ों के लचीलेपन पर भी असर पड़ सकता है। कोई भी व्यक्ति प्रैक्टिस से सही मुद्राएँ सीख सकता है। बचपन से यह आदत डाली जाए तो और भी अच्छा। 

हम अपनी रूटीन लाइफ में कई काम ऐसे कर जाते हैं जो लंबे समय बाद हमें फिज़िकली तकलीफ देते हैं। शुरू में तो हमें इनके कोई साइड इफेक्ट्स नहीं दिखते लेकिन बाद में कमर दर्द जैसी कई परेशानियों के रूप में ये सामने आते हैं। इन प्रॉबलम्स से महिलाएँ सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। यदि वे अपनी डेली लाइफ में किए जा रहे कामों का सही तरीका जान लें, तो काफी हद तक समस्या हल हो सकती है। असल में हमारी शारीरिक मुद्राओं के अनुसार ही शरीर पर दबाव पड़ता है और यदि यह दबाव गलत तरीके से पड़ रहा है तो कमर दर्द का कारण बन सकता है। यही नहीं इससे जोड़ों के लचीलेपन पर भी असर पड़ सकता है। कोई भी व्यक्ति प्रैक्टिस से सही मुद्राएँ सीख सकता है। बचपन से यह आदत डाली जाए तो और भी अच्छा। असल में एक जैसा काम करते-करते कोई भी शारीरिक मुद्रा शरीर में स्थायी हो जाती है। उसे बदलने के लिए आपको मानसिक रुझान बदलना पड़ेगा। सही शारीरिक मुद्राओं का पालन करने से कमर दर्द से काफी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। आइए जानें कैसे- 

खड़े होने की मुद्रा 
खड़े होने की मुद्रा ऐसी होना चाहिए ताकि कमर पर कम दबाव पड़े और रीढ़ की हड्डी अपने प्रकृतिक रूप में मुड़े। कुछ लोग इस तरह खड़े होते हैं कि उनकी रीढ़ की हड्डी तनी हुई रहती है और सीना बाहर निकला रहता है। इससे कमर, कंधे, के बीच के भाग तथा पेड़ू की माँसपेशियों पर दबाव पड़ता है। यदि आपको लंबे समय तक खड़े रहना है तो एक पैर को किसी स्टूल पर रखकर आराम की मुद्रा प्राप्त की जा सकती है। इससे रीढ़ की हड्डी के नीचे के हिस्से को आराम मिलता है। 

बैठने की मुद्रा 
जितना दबाव कमर पर खड़े होने से पड़ता है इससे अधिक बैठने से पड़ता है। बैठने की कुर्सी का डिजाइन ऐसा होना चाहिए जिसके निचले हिस्से में हल्का सा घुमाव हो। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि कुर्सी का वह हिस्सा जहाँ हम बैठते हैं वह थोड़ा सा अवतल हो तो देर तक बैठना सुविधाजनक होता है। यदि मेज पर रखे कम्प्यूटर पर कार्य करना है तो कुर्सी की पीठ ऐसी होनी चाहिए जिस पर कमर लगाने के लिए सहारा मिले। मेज और कुर्सी की ऊँचाई कार्य करने के दृष्टिकोण से उपयुक्त होनी चाहिए। 

लेटना या आराम करना 
लेटने या विश्राम करने से निःसंदेह ही कमर को आराम मिलता है। लेटकर विश्राम करने से रीढ़ की हड्डी पर कम भार पड़ता है। लेटने की मुद्रा ऐसी होनी चाहिए जिससे शरीर को आराम मिले। कुछ लोगों को सीधा लेटने या करवट से लेटने में आराम मिलता है तो उसी तरह से सोना चाहिए। 

बिस्तर और तकिए का चुनाव 
कमर दर्द से छुटकारा पाने के लिए आपका बिस्तर हार्ड बोर्ड का बना होना चाहिए और गद्दा ऐसा होना चाहिए जो शरीर के आकार के अनुसार दब जाए। कमर दर्द या गर्दन दर्द से पीड़ित रहने वाले व्यक्तियों के लिए तकिया ऐसा होना चाहिए जो तीन भागों में बना हो। इस तकिए के बीच का भाग झुका हुआ होता है और किनारे के दो भाग उठे हुए होते हैं। इस तकिए पर सिर किनारों की तुलना में कुछ नीचे रहता है।

रसोई का कामकाज 
रसोई के स्लैब की ऊंचाई कोहनी से नीचे होनी चाहिए। रसोई का सामान ऐसी जगह रखना चाहिए जिसे उठाने में अधिक झुकना,मुड़ना या पंजे के बल खला होना न पड़े। रसोई में कम ऊंचाई वाले स्टूल का प्रयोग किया जा सकता है। ऐसा करने से कमर पर अधिक दबाव नहीं पड़ता। 

स्नान करते समय 
ज़मीन पर बैठकर स्नान करने से कमर दर्द की शिकायत हो सकती है। नहाने के लिए बाथरूम में स्टूल ज़रूर होना चाहिए जिस पर बैठकर नहाया जा सके। ऐसा करने से कमर पर दबाव कम पड़ता है। इसी तरह कपड़ों पर साबुन मलते या ब्रश लगाते समय अधिक परिश्रम करना पड़ता है। अधिक झुककर यह काम नहीं करना चाहिए। वहीं गीले कपड़ों को अधिक मात्रा में उठान से भी बचना चाहिए(फिजियोथैरेपिस्ट डॉ. नम्रता सिंह से शैली अजमेरा की बातचीत पर आधारित यह आलेख नई दुनिया के नायिका परिशिष्ट में 29.8.12 को प्रकाशित है)।

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मंगलवार, 28 अगस्त 2012

कई रोगों का इलाज़ हो रहा है फोटोथैरेपी से

फोटोथैरेपी त्वचा संबंधी परेशानियों में लाभकारी हो सकती हैं। अब विशेषज्ञ रोशनी का उपयोग विभिन्न रोगों के इलाज के लिए कर रहे हैं। इन दिनों स्ट्रोक, मुँह की दुर्गंध और कैंसर जैसे रोगों के इलाज के लिए भी रोशनी को उपयोग में लिया जा रहा है। शुरूआत में त्वचा रोग विशेषज्ञ लाइट थैरेपी का उपयोग सोराइसिस के इलाज के लिए करते थे। इसके बाद सर्दी के मौसम में होने वाले सीज़नल डिप्रेशन के उपचार के लिए भी इसका उपयोग किया गया। अब विभिन्न तकलीफों में राहत के लिए लाइटथैरेपी का इस्तेमाल किया जा रहा है।

कमर दर्द 
कमर दर्द से निजाद दिलाने के लिए चिकित्सक नीली रोशनी का उपयोग कर रहे हैं। सफेद रोशनी के बिखरने पर इसके सात अलग-अलग रंगों को देखा जा सकता है। नीली रोशनी बहुत शक्तिशाली होती है, यह ऊतकों को नुकसान पहुँचााए बिना शरीर पर प्रभाव डालती है। इसीलिए इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के उपचार के लिए किया जा रहा है। युनिवर्सिटी हॉस्पिटल ऑफ हेडिल्बर्ग के चिकित्सकों ने नीली रोशनी उत्सर्जित करने वाला पैच विकसित किया है। इस पैच को दर्द की मदद से चिकित्सक दर्द का उपचार कर रहे हैं। 

यह पद्धति शुरूआती अध्ययनों पर आधारित है जिनमें यह सामने आया था कि रोशनी से शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड का उत्पादन बढ़ता है। नाइट्रिक ऑक्साइड माँसपेशियों के तनाव को दूर करता है। इससे रक्त धमनियाँ चौड़ी हो जाती है जिससे रक्त संचार बेहतर होता है। हेडिल्बर्ग में पैच पर अध्ययन जारी है, नई ट्रायल में १४ दिनों में पैच का उपयोग ५ बार किया जाएगा। मरीज़ों को इसे हर बार आधे घंटे के लिए लगाया जाएगा। अमेरिका में रोशनी के ज़रिए ओस्टियोआर्थ्राइटिस के कारण घुटने में होने वाले दर्द का इलाज खोजा जा रहा है। एक अन्य शोध से सामने आया कि कंधे का दर्द दूर करने के लिए फोटोथैरेपी असरदार है, वो भी बिना किसी दुष्प्रभाव के।  

पेट के छाले 
पेट के छालों के इलाज के लिए एक ऐसा उपकरण मददगार हो सकता है जिसके ज़रिए पेट के अंदर तक नीली रोशनी पहुँचाई जा सके। इस रोशनी के प्रभाव से अल्सर के लिए ज़िम्मेदार बैक्टीरिया नष्ट होने लगते हैं। यह तकनीक पेट के कैंसर के इलाज में भी फायदेमंद हो सकती है। अध्ययन बताते हैं कि प्रभावित हिस्से पर एक घंटे से भी कम समय के लिए यदि नीली रोशनी डाली जाए तो यह हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने के लिए पर्याप्त होती है। ख़ास बात यह है कि इससे बैक्टीरिया तो नष्ट हो जाता है लेकिन शरीर के स्वस्थ ऊतकों पर कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है। यह नया उपकरण हाल ही में विकसित किया गया है और इसपर शोध-अध्ययन व ट्रायल जारी हैं। अमेरिका में हुए शोध बताते हैं कि इस इलाज के बाद बैक्टीरिया की संख्या में ९१ प्रतिशत तक की कमी देखी गई है।

मिर्गी 
मिर्गी के उपचार के लिए फोटोथैरेपी को विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। जिन मरीज़ों को मिर्गी-रोधी दवाओं से ख़ास फायदा नहीं होता है, उनके लिए फोटोथैरेपी फायदेमंद साबित हो सकती है। युनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में हुई एक ट्रायल में मिर्गी के मऱीजों को तीन महीने तक रोज़ ३० मिनिट के लिए लाइट-बॉक्स से एक्सपोज़ किया गया। इस लाइट बॉक्स से तेज़ सफेद रौशनी निकलती है। मिर्गी का यह उपचार पहले हुए शोध-अध्ययनों पर आधारित है जिससे यह पता चलता है कि जिन दिनों में बादल छाए रहते हैं, तब मरीज़ों को मिर्गी के दौरे अधिक पड़ते हैं। जिन दिनों में तेज़ धूप निकलती है, तब मरीज़ों को कम दौरे पड़ते हैं। कुछ वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि तेज़ रोशनी के प्रभाव से विटामिन-डी और मेलाटोनिन आदि का स्तर बढ़ जाता है जिससे दिम़ाग में दौरों को नियंत्रित करने वाले रसायन स्त्रावित होने लगते हैं।

घाव  
मधुमेह रोगियों के पैरों में बने गंभीर घाव, अधिक दबाव पड़ने पर बनने वाले घाव व अन्य प्रकार के गंभीर घावों के इलाज के लिए लाइट थैरेपी असरकारी है। स्टॉकहोम में हुए इस शोध अध्ययन के अनुसार लाल रोशनी और इंफ्रारेड रोशनी के कॉम्बिनेशन से घाव तेज़ी से भरते हैं। इससे प्रेशर अल्सर ५४ प्रति तेज़ी से ठीक हो गए थे। प्रेशर अल्सर का ९० प्रतिशत हिस्सा केवल ५ हफ्तों में ही भर गया था। जिन मरीज़ों को लाइट थैरेपी नहीं दी गई थी, उनमें घाव भरने के लिए ९ हफ्तों का समय लगा था। 

मुँह की दुर्गंध  
जेरूसलम की हीब्रू युनिवर्सिटी के डेंटल स्कूल के अध्ययनकर्ताओं ने एक शोध में पाया कि नीली रोशनी से मुँह की दुर्गंध को कम किया जा सकता है। दंत चिकित्सक अक्सर दाँतो को सफेद बनाने के लिए इन पर दो मिनिट तक नीली रोशनी डालते हैं। नीली रोशनी न सिर्फ दाँतों को सफेद बनाती है बल्कि थूक में मौजूद दुर्गंधकारी बैक्टीरिया भी इससे ख़त्म होते हैं। इसीलिए अब इसे मुँह की दुर्गंध के इलाज के रूप में देखा जा रहा है। अध्ययनकर्ताओं ने थूक के ५० नमूनों पर शोध कर पाया कि इनपर नीली रोशनी डालने पर दुर्गंध काफी कम हो जाती है। उन्होंने पाया कि रोशनी डालने के बाद थूक के नमूनों में दुर्गंधकारी बैक्टीरिया की संख्या काफी कम हो गई थी। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने शोध अध्ययन में पायाका कि नीली रोशनी से मसूड़ों में बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया को ख़त्म किया जा सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह रोशनी मुंह में होने वाले पेरियोडोन्टिस नामक संक्रमण से बचाव और उपचार के लिए भी असरकारी हो सकती है। इस संक्रमण से दांत और हड्डियां क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। 

शोध प्रमुख डॉ. निकोस सूकोज के अनुसार,रोशनी डालने पर मुंह में मौजूद कई नुकसानकारी बैक्टीरिया कुछ सेकेंड्स में ही ख़त्म हो जाते हैं। रोशनी से बैक्टीरिया का सुरक्षा-कवच नष्ट हो जाता है जिससे ये नष्ट होने लगते हैं। 

कैंसर का इलाज़ 
लाइट के उपयोग से कैंसर के इलाज के लिए एक विशेष प्रकार के ट्रीटमेंट का उपयोग किया जा रहा है, इसे फोटो-डायनामिक थैरेपी कहा जाता है। इसका सबसे अधिक उपयोग त्वचा कैंसर के इलाज के लिए किया जाता है। इस ट्रीटमेंट में रौशनी के साथ ही एक विशेष प्रकार के ड्रग का इस्तेमाल किया जाता है। यह ड्रग कैंसर की असामान्य कोशिकाओं को रोशनी के प्रति संवेदशील बनाता है। कैंसर के मरीज़ों को दिए जाने वाले इस ड्रग की विशेषता यह है कि इसे केवल कैंसर की कोशिकाएँ ही अवशोषित करती हैं। 

इसके बाद मरीज़ के प्रभावित हिस्से पर नीली रोशनी डाली जाती है। रोशनी के प्रभाव में कैंसर कोशिकाओं द्वारा अवशोषित यह ड्रग एक विशेष प्रकार की ऑक्सीजन उत्सर्जित करने लगता है, जिससे कैंसर की कोशिकाएँ मरने लगती हैं। यह ट्रीटमेंट ट्यूमर को सिकोड़ने और नष्ट करने के लिए प्रभावी है। शरीर के भीतरी हिस्सों में मौजूद कैंसर के लिए ऑप्टिक फाइबर द्वारा रोशनी को शरीर के अंदरूनी हिस्सों में भेजा जा सकता है(सेहत,नई दुनिया,अगस्त,2012 द्वितीयांक)।

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रविवार, 26 अगस्त 2012

न्यूरॉल्जिया में होम्योपैथी

इस ३५ साल महिला को छह महीनों से गले और छाती की बाईं ओर दर्द रहने की समस्या थी। दर्द बिना कारण ही शुरू हो गया था। एक दिन जब वह सुबह उठी तब उसे गले में कुछ भारीपन महसूस हुआ। उसने सोचा कि यह मौसम के परिवर्तन की वजह से हो सकता है। उसने इस ओर ध्यान नहीं दिया। अगले दिन उसे फिर से गले में दर्द और जलन हो रही थी। इस घटना के बाद दिन ब दिन उसे दर्द और जलन में वृद्घि होती गई। पारिवारिक चिकित्सक को दिखाने पर जाँच में कोई रोग पकड़ में नहीं आया। चिकित्सक ने बताया कि दर्द और जलन किसी संक्रमण की वजह से हो सकती है। इलाज के तौर पर मरीज को एंटीबायोटिक्स और एंटीइन्फ्लेमेटरी औषधियाँ दी गईं। उपचार से लक्षणों में सुधार तो आया लेकिन दर्द पूरी तरह से नहीं गया।

एंटीबायोटिक की पूरी खुराक लेने के बाद मरीज ने औषधियों का सेवन बंद कर दिया। अगले ही दिन से तीव्र दर्द महसूस हुआ। धीरे-धीरे दर्द की तीव्रता बढ़ने लगी। अब हर सुबह वह दर्द के साथ ही उठती थी। दर्द अब इतना तीव्र होता था कि वह दैनिक दिनचर्या के काम करने में सक्षम नहीं थी। दर्द आधा घंटे से लेकर एक घंटे तक बना रहता था। दर्द के दौरान वह बहुत बेचैन हो जाती थी। 

परिवारजनों ने समस्या के हल के लिए नाक कान गलारोग विशेषज्ञ से परामर्श लेने का फैसला किया। जांच के बाद वे दर्द का कोई कारण नहीं जान पाए। जाँचें भी करवाई गईं लेकिन कोई नतीजा सामने नहीं आया। नाक कान गलारोग विशेषज्ञ ने न्यूरॉल्जिया यानी तंत्रिकातंत्र का दर्द मानकर इलाज शुरू किया। मरीज को औषधि के तौर पर अधिक शक्तिशाली दर्दनिवारक एवं एसिडिटी को ख़त्म करने वाली गोलियां दी गईं। उपचार में थोड़ी राहत मिली लेकिन जैसे ही दवा की खुराक कम होती थी,मरीज़ का दर्द फिर उठ खड़ा होता था। एक महीने के इलाज़ के बाद एक दिन सुबह जब उसकी नींद खुली तो उसे गले कीं बायीं ओर एक तीव्र दर्द का एहसास हुआ। 

दर्द अब बायीं छाती के पूरे क्षेत्र में हो रहा था। दर्द इतना तीव्र था कि वह हाथ-पैर चलाने में भी असमर्थ हो गई थी। दर्द के दौरान रह-रहकर बिजली के झटके जैसे भी लग रहे थे। मरीज़ को किसी तरह की कोई राहत नहीं मिल रही थी। 

उसके पास इलाज़ के तौर पर केवल दर्द-निवारक ही शेष रह गया था। परिजनों ने एक दूसरे चिकित्सक का परामर्श लिया। नियमित रूप से

दर्द निवारक औषधियां लेते रहने के कारण मरीज़ का पाचन-तंत्र बुरी तरह प्रभावित हो चुका था। अत्यधिक अम्ल बढ़ जाने के कारण पेट में जलन बनी रहने लगी। पेट की नली में जलन,मिलती आना और उल्टियां आना उसके लिए रोज़ की बात हो गई। पारिवारिक मित्र के आग्रह पर मरीज़ के परिजनों ने होम्योपैथिक इलाज़ कराने का फैसला किया। 

मरीज़ की केसहिस्ट्री और लक्षणों के आधार पर लेकेसिस नामक दवा से इलाज़ शुरू हुआ। मरीज़ को दवा से आराम मिलने लगा। तीन महीने तक उपचार होने के बाद,उसका दर्द पूरी तरह ग़ायब हो गया(इंदौर के डॉ. कैलाश चंद्र दीक्षित का यह आलेख नई दुनिया के अगस्त,2012 के सेहत परिशिष्ट से साभार है। डॉ. दीक्षित कई सालों से अनेक असाध्य रोगों का इलाज दक्षतापूर्वक कर रहे हैं। उन्हें जटिल रोगों के इलाज में महारत हासिल है)।

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सोमवार, 20 अगस्त 2012

बैकपेन से निज़ात

बाहर की ओर खुलने वाली घर की खिड़की जब आप खोलते हैं तो शायद ही इस ओर ध्यान जाता है कि आप किस हद तक शरीर को झुका रहे हैं और इसका प्रभाव आपकी रीढ़ की हड्डी और पीठ पर कितना पड़ता है। बैक पेन की बात हो या फिर गर्दन या कंधों का दर्द- अधिकतर लोग परेशान रहते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक दस में से सात लोगों को गर्दन का दर्द रहता है। 90 फीसद मामलों में इस कारण सिरदर्द होता है। इससे राहत पाने के लिए वे जहां ऑलिव ऑयल से मसाज करते हैं, वहीं बर्फ के टुकड़े भी रगड़ते हैं या फिर गर्म पानी से सेंक देते हैं। इस तरह के दर्द से बचने के लिए अच्छा उपाय है कि आपका सिर गर्दन पर संतुलित हो और किसी ओर झुका न हो। खाना बनाने खासकर रोटी बनाने के दौरान झुक कर काम करने, सोफे पर बैठने या फिर लैपटॉप यूज करने के दौरान, पीठ झुकाना आम बात है। यही कारण है कि हम में लाखों लोग काम के दौरान कूबड़ बने रहते हैं। हालांकि हर दिन हमारे सिर पर इतना काम रहता है कि हम थोड़ी देर के लिए भी इस बारे में गंभीरता से नहीं सोचते, जो बाद में शरीर के इन भागों में दिक्कतें पैदा करती है। शरीर कार की तरह है। यह तुरंत ब्रेकडाउन नहीं होता है। कार के कलपुर्जे जब घिस जाते हैं,तभी ब्रेकडाउन होता है। 

निजात 
हममें से अधिकतर लोग जो सामान्य तौर पर गलती करते हैं, वह है अधिक भारी सामान उठाना। इससे पीठ पर काफी बल पड़ता है। फर्श से भारी सामान उठाने के दौरान शरीर को काफी क्षति पहुंचती है। भारी वजन उठाते समय शायद ही किसी का ध्यान इस ओर जाता है कि आपके घुटनों पर इसका क्या बुरा प्रभाव पड़ता है। ब्रिटिश ओस्टेपैथिक एसोसिएशन के टिम अलरडिक के मुताबिक, जब आप सामान उठाने के लिए झुकते हैं तो रीढ़ की हड्डी के डिस्क पर दबाव पड़ता है और वह बाद में समस्या के तौर पर सामने आती है। जब भी आप कोई सामान उठाएं खुद को सीधे रखें और भार को अपने शरीर के नजदीक रखें। इससे आपकी रीढ़ की हड्डी में दर्द नहीं उठेगा। हील वाले सैंडल न पहनें। यह भी पीठ दर्द का कारण होता है। 

बच्चों के साथ लांग ड्राइव पर जाना और बार-बार उनसे बात करने के लिए मुड़ना आपके गले के लिए खतरनाक हो सकता है। बात करने के लिए पीछे की सीट पर मुड़ने से पीठ की मांसपेशियों प्रभावित होती हैं। कार की सीटें भी आपकी पीठ और गर्दन के लिए आफत बन सकती हैं क्योंकि अधिकतर कार की सीटें या तो बाउल के आकार की होती है और स्लो प बैक होता है। यह हमारे शरीर को बुरी तरह प्रभावित करती हैं। इन सीटों के कारण पीठ की डिस्क क्षतिग्रस्त होती है। इससे मांसपेशियों, नसों आदि में खिंचाव आता है। इसलिए कार चलाते वक्त अपने पोश्चर का ख्याल रखें। हमेशा सीधी बैठें। जब भी आप लंबी यात्रा पर जाएं तो बीच में रुकें और हर घंटे अपने पैरों को सीधा करें। 

अमेरिकन जर्नल ऑफ मेडिसिन में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, जो लोग धूम्रपान नहीं करते है, उनके मुकाबले ज्यादा पीने वाले लोगों को पीठ दर्द अधिक होता है। धूम्रपान के कारण रक्त संचरण में बाधा पहुंचती है और इस कारण रीढ़ और जोड़ों में दर्द उत्पन्न होता है। सिगरेट में मौजूद हानिकारक पदार्थ हड्डियों को कमजोर करते हैं, जो ऑस्टियोपोरोसिस को बढ़ाते है। इन दिनों काफी नीचे और गहरे सोफे बन रहे हैं। इस पर अधिक समय तक बैठने से रीढ़ की हड्डी अंग्रेजी के ‘सी’ आकार की हो जाती है। इससे पीठ की डिस्क, मांसपेशी और स्नायुबंधन में तनाव आता है।

बैठते वक्त अतिरिक्त तकिये का प्रयोग करें। इस बात का जरूर ध्यान रखें कि आपके बिछावन पर कितने तकिये हैं, गलत तरीके से सोने और झुककर चलने से भी हानि पहुंचती है। अधिक ऊंचा तकिया जहां आपके सिर को आगे करता है, वहीं कम ऊंचा तकिया पीछे धकेलता है। दोनों ही स्थितियों से गर्दन और रीढ़ की ऊपरी हड्डी पर असर पड़ता है। सोते समय ध्यान रखें कि आपकी गर्दन और रीढ़ की हड्डी सीधी हो।

लैपटॉप पर काम करने के दौरान माउस की अपेक्षा टचपैड गर्दन और कंधे के लिए अधिक हानिकारक है। जब आप टचपैड पर कार्य करते हैं तो आपको अपने हाथों को इधर-उधर करना पड़ता है और इससे आपके कंधे और गले में तनाव आता है। जबकि माउस का प्रयोग करते वक्त आपका शरीर सही पॉजिशन में रहता है। जब भी कंप्यूटर पर काम करें, अपने सिर और शरीर को संतुलित रखें। बाजार में छोटे आकार में मोबाइल फोन आ रहे हैं और उसके स्क्रीन को देखने के लिए हमें अधिक झुकना पड़ता है और आंखों पर अधिक जोर देना पड़ता है। इससे आपके दिमाग पर अधिक जोर पड़ता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि जिस कान से आप फोन का अधिक इस्तेमाल करते हैं, शरीर के उस हिस्से में नर्वस सिस्टम प्रभावित होता है जबकि मांसपेशियों और डिस्क में तनाव आता है। मोबाइल या फोन से बात करते समय सिर को किसी ओर न झुकाएं। हेड सेट या स्पीकर फोन बेहतर ऑप्शन है। (आधी दुनिया,राष्ट्रीय सहारा,16.8.12 में विनीता की प्रस्तुति)

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शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

आर्थराइटिस का इलाज़ कराएं,जॉइंट रिप्लेसमेंट की नौबत न आने दें

क्या आपकी मां को जॉइंट्स में पेन रहता है? अगर इसका जवाब हां है, तो वे ऑर्थराइटिस से पीड़ित हैं। अगर केयरफुल होकर न चला जाए, तो प्रॉब्लम दिन- प्रतिदिन बढ़ती जाती है। सेंट्रल हेल्थ मिनिस्ट्री के अनुसार, 2016 तक इस प्रॉब्लम्स की चपेट में आने वाले वीमेंस की संख्या में दोगुना तेजी से इजाफा होने की उम्मीद है। वहीं, योजना आयोग की एक रिपोर्ट पर गौर करें, तो 2015 तक आर्थराइटिस से पीड़ित लोगों की संख्या डायबिटीज के पेशेंट्स से भी ज्यादा हो जाएगी। 

क्या है आर्थराइटिस 
डॉक्टर्स के मुताबिक, आर्थराइटिस 200 तरह की होती है। कोई भी रूप हो, सबसे पहले जॉइंट्स में स्वैलिंग आ जाती है। दरअसल, थाई के नीचे और लेग के ऊपरी तरफ बोन के सिरों पर चिकनी व मोटी लेयर कार्टिलेज की होती है। अधिक वेट उठाने, एक्सरसाइज न करने, न्यूट्रिशस फूड न लेने से कार्टिलेज समय से पहले ही घिस जाती है। इससे नर्व ऐंडिंगस खुल जाती हैं। नतीजतन, ये एक दूसरे को छूने लगती हैं। यह सिचुएशन ही जॉइट्स में पेन और जकड़न की वजह बनती है। प्रॉब्लम बढ़ जाने पर चलने- फिरने और हिलने- डुलने में भी परेशानी होने लगती है। 

कैसे करें पहचान 
शुरू में फिजिकल वर्क या एक्सरसाइज करने के बाद ऐसा पेन होता है। लेकिन आर्थराइटिस होने के बाद किसी वजह से भी पेन होना शुरू हो जाता है। फिर आगे चलकर थोड़े- थोड़े दिनों में हमेशा दर्द होता रहता है और जॉइट्स पर स्वैलिंग आने लगती है। ऐसे जॉइट्स से आवाजें भी आने लगती हैं। 

तीन में से एक को 
अगर हाल की रिपोर्ट की मानें, तो हर तीन में एक महिला आर्थराइट्सि से पीड़ित है। हाल ही में की गई एक रिसर्च के अनुसार, देश में 55 वर्ष से अधिक एज के 20 प्रतिशत, 65 वर्ष से अधिक एज के 40 प्रतिशत व 80 वर्ष से अधिक एज के 60 प्रतिशत लोगों को जोड़ों या घुटनों में दर्द की प्रॉब्लम आम हो गई है। इस बारे में सीनियर ऑथोर्पेडिक व जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जन डॉक्टर बीरेन नादकर्णी बताते हैं कि आर्थराइटिस एक पेनफुल प्रोसेस है। वैसे तो यह किसी भी उम्र में हो सकती है, लेकिन 45 साल के बाद यह ज्यादा जल्दी चपेट में लेती है। 

इसमें तीन आर्थराइटिस खास हैं: 
- रिह्यूमेटाइड आर्थराइटिस: इसमें पूरी बॉडी के जॉइट्स में पेन फील होता है। 

- ऑस्टिओ आर्थराइटिस: इसमें उंगलियों और अंगुठों के जॉइंट्स में पेन होता है। 

- गाउट आर्थराइटिस: इसमें हाथ व पैरों में स्वैलिंग आ जाती हैं, जिससे उठने-बैठने में बेहद दर्द होने लगता है।  

युवा भी हैं चपेट में 
आंकड़ों के मुताबिक, 15 फीसदी यूथ में भी इन दिनों इस बीमारी की चपेट में हैं। हालांकि यूथ में यह ज्यादातर किसी एक्सीडेंट या जॉइंट्स पेन से उभरती है। अगर सही इलाज न हो, तो ट्रॉमा निर्माण होता है। उसे ट्रॉमा ऑर्थराइटिस कहते हैं। डॉक्टर बीरेन ने अनुसार, इसकी वजह से चलने में, सीढ़ियां चढ़ने व उतरने में भी काफी दिक्कत होती है। इसका सॉल्युशन केवल एक्सरसाइज ही होता है। 

क्यों होती है आर्थराइटिस 
ऑर्थोपेडिक सर्जन अजय अग्रवाल कहते हैं, बढ़ती उम्र, मोटापा, खाने पीने का ध्यान न रखने, रेग्युलर रुटीन सही न होने और एक्सरसाइज न करना इसकी खास वजह होता है। बैलेंस फूड न खाने से बॉडी की मैटाबोलिज्म प्रोसेस पर असर पड़ता है, जिससे बॉडी में सेल्स नहीं बन पाते। शरीर की तमाम जॉइंट्स में साइनोवियल फ्ल्यूड की कमी आ जाती है। इसलिए कुछ चीजों पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। 

अधिक वेट 
आमतौर पर ऑस्टियो आर्थराइटिस फैट की वजह से होता है। दरअसल, बॉडी का एक्स्ट्रा फैट हिप में जमा होता जाता है, जिससे हिप और घुटनों के बीच एंगल डिवेलप हो जाता है। इससे घुटनों पर बहुत अधिक वेट पड़ने लगता है। 

एक्सरसाइज न करना 
एक्सरसाइज करने से थाई के आगे और पीछे की मसल्स को स्ट्रेच करने की और स्ट्रॉग बनाए रखने की जरूरत होती है। अगर एक्सरसाइज नहीं करते हैं, तो मसल्स वीक हो जाती है और सारा प्रेशर कार्टिलेज पर पड़ने लगता है।

न्यूट्रिंशस फूड न लेना 
कैल्शियम, आयरन, विटामिन, प्रोटीन की कमी से हड्डियां वीक होती जाती हैं। इसलिए महिलाओं के लिए कैल्शियम लेना बेहद जरूरी माना जाता है। 

स्मोकिंग करना 
स्मोकिंग करने से हड्डियां वीक होती जाती हैं। स्मोकिंग करने वालों की हड्डियां नॉर्मल व्यक्ति से हर साल एक महीने एज कम हो जाती है। 

क्या करें: 
- न होने दें एस्ट्रोजन की कमी। 

- थायराइड में रखें बैलेंस। 

- स्किन प्रॉब्लम ल्यूकेमिया होने पर। 

- बॉडी के दूसरे पार्ट्स के इन्फेक्शन से बचें। 

इलाज है पॉसबिल 
लाइफस्टाइल में कुछ बदलाव लाकर खुद ही इस प्रॉब्लम को मैनेज किया जा सकता है। लेकिन जब दिक्कत बढ़ जाती है, तो दवाओं के ऑप्शन पर जाना पड़ता है। लेकिन जब दवाओं से भी बात न बने, तो सर्जरी की नौबत आ जाती है। बीमारी जब ज्यादा अडवांस स्टेज में पहुंच जाए, जो जॉइंट रिप्लेसमेंट का ही ऑप्शन बचता है(सरोज धूलिया,नभाटा,दिल्ली,24.5.12)।

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रविवार, 6 मई 2012

गर्दन और कंधों के दर्द का इलाज़ आसन और प्राणायाम से

गर्दन में स्थित रीढ़ की हड्डियों में लंबे समय तक कड़ापन रहने, उनके जोड़ों में घिसावट होने या उनकी नसों के दबने के कारण बेहद तकलीफ होती है। इस बीमारी को सर्वाईकल स्पौण्डिलाइटिस कहा जाता है। इसमें गर्दन एवं कंधों में दर्द तथा जकड़न के साथ-साथ सिर में पीड़ा तथा तनाव बना रहता है। 

आधुनिक चिकित्सा में सर्वाइकल स्पौण्डिलाइटिस का इलाज फिजियोथेरेपी तथा दर्द निवारक गोलियां हैं। इनसे तात्कालिक आराम तो मिल जाता है, किंतु यह केवल अस्थायी उपचार है। योग इस समस्या का स्थाई समाधान है, क्योंकि यह इस बीमारी को जड़ से ठीक कर देता है। लेकिन जब रोगी को चलने-फिरने में दिक्कत आने लगे तो एलोपैथिक दवाएं, फिजियोथेरेपी तथा आराम ही करना चाहिए। इस स्थिति में यौगिक क्रियाओं का अभ्यास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह स्थिति रोग की गंभीर स्थिति होती है। आराम आते ही इससे पूरी तरह मुक्ति के लिए किसी कुशल मार्गदर्शक की निगरानी में यौगिक क्रियाओं का अभ्यास प्रारम्भ कर देना चाहिए। 

सूक्ष्म व्यायाम रामबाण 
सीधा बैठकर चेहरे को धीरे-धीरे दाएं कंधे की ओर ले जाएं। इसके बाद चेहरे को धीरे-धीरे सामने की ओर लाकर बाएं कंधे की ओर ले जाएं। इस क्रिया को प्रारम्भ में 5-7 बार करें। धीरे-धीरे बढ़ाकर इसे 15-20 बार तक करें। अब सिर को पीछे की ओर झुकाएं। सिर को आगे की ओर झुकाना इस रोग में वजिर्त है। इसके पश्चात सिर को दाएं-बाएं कंधे की ओर झुकाएं। यह क्रिया भी धीरे-धीरे 15 से 20 बार तक करें। 

सीधा बैठकर या खड़े होकर दोनों हाथों की हथेलियों को आपस में गूंथें। इसके बाद हथेलियों को सिर के पीछे मेडुला पर रखें। अब हथेलियों से सिर को तथा सिर से हथेलियों को एक-दूसरे की विपरीत दिशा में पूरे जोर से इस प्रकार दबाएं कि सिर थोड़ा भी आगे या पीछे न झुकने पाए। इसके पश्चात् हथेलियों को माथे पर रखकर इसी प्रकार का विपरीत दबाव दीजिए। ये क्रियाएं 8 से 10 बार करें। अब दाईं हथेली को दाएं गाल पर रखकर एक-दूसरे के विपरीत दबाव डालिए। यही क्रिया बाएं गाल से भी करें। इन्हें भी 8 से 10 बार करें। 

सीधा खड़ा होकर दोनों हाथों को घड़ी की सुई की दिशा में तथा इसके बाद घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में 10 से 15 बार गोल-गोल घुमाएं। इसके पश्चात् दोनों हाथों को कंधे की ऊंचाई तक अगल-बगल उठाकर उन्हें कोहनी से मोड़ लें। इस स्थिति में हाथों को 10 से 15 बार वृत्ताकार घुमाएं। इसके पश्चात् वापस पूर्व स्थिति में आएं। 

आसन 
एक-दो सप्ताह तक उपरोक्त क्रियाओं का अभ्यास करने के बाद अपने अभ्यास में आसनों को जोड़ देना चाहिए। इसके लिए वज्रासन, मत्स्यासन, सुप्त वज्रासन, कुक्कुरासन, मकरासन, धनुरासन, अर्धमत्स्येन्द्रासन तथा भुजंगासन बहुत उपयोगी हैं। 

मत्स्यासन की अभ्यास विधि 
पीठ के बल लेट जाएं। अब अपनी कुहनियों के सहारे सिर तथा धड़ के भाग को जमीन पर रखें। इस स्थिति में पीठ का ऊपरी हिस्सा तथा गर्दन जमीन से ऊपर उठ जाते हैं। हाथों को सीधा कर पेट पर रख लें। इस स्थिति में जितनी देर आसानी से रुक सकते हैं रुकें। उसके बाद वापस पूर्व स्थिति में आ जाएं। 

प्राणायाम 
रोग की गंभीर स्थिति में झटके वाले किसी भी प्राणायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिए। इस रोग में नाड़ियों को शांत तथा स्थिर करने के लिए नाड़ीशोधन, उज्जयी एवं भ्रामरी प्राणायाम बहुत लाभकारी है। 

भ्रामरी प्राणायाम की अभ्यास विधि 
पद्मासन, सिद्धासन, सुखासन में या कुर्सी पर रीढ़ व सिर को सीधा कर बैठ जाएं। दोनों हाथों को जमीन से ऊपर उठाकर अंगूठे या किसी अन्य अंगुली से कान को बंद कर लें। एक गहरी श्वास अंदर लेकर नाक या गले से भौंरे के गुंजार जैसी आवाज तब तक निकालें, जब तक पूरी श्वास बाहर न निकल जाए। यह भ्रामरी की एक आवृत्ति है। इसकी 15 से 20 आवृत्ति का अभ्यास कीजिए। 

ध्यान एवं योग निद्रा 
रीढ़ की हड्डी की बीमारी में ध्यान और योग निद्रा का अभ्यास बहुत लाभकारी है। इस स्थिति में शरीर को पूरी क्रिया के दौरान बिल्कुल स्थिर रखते हुए अपनी सहज श्वास-प्रश्वास पर मन को एकाग्र करना चाहिए। इसका अभ्यास आरामदायक अवधि तक करें। 

इन बातों का भी रखें ध्यान 
इसमें गर्दन में पट्टा बांधना बहुत ही लाभकारी होता है कड़े बिछावन पर सोना चाहिए ताकि रीढ़ की हड्डी ठीक रहे। वजन नहीं उठाना चाहिए और न ही सिर झुकाकर काम करना चाहिए(कौशल कुमार,हिंदुस्तान,दिल्ली,19.4.12)।

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शनिवार, 5 मई 2012

स्लिप डिस्क से छुटकारे के लिए आसन

आजकल पीठ दर्द एवं कमर दर्द को बहुत ही सामान्य बीमारी माना जाने लगा है। लेकिन एक समय बाद यह दर्द बढ़ता जाता है और स्लिप डिस्क की बीमारी में बदल जाता है। योगासन इस बीमारी से पूरी तरह मुक्ति दिलाता है। 

जब कमर की रीढ़ की हड्डी के चारों ओर सहारा देने वाली मांसपेशियां लंबे समय तक कठोर एवं असुविधाजनक स्थिति के कारण संकुचित हो जाती हैं, तब उस स्थान में ऐंठन और दर्द प्रारम्भ हो जाता है। कभी अचानक ज्यादा भार पड़ने के कारण रीढ़ की हड्डी के बीच की गद्दी (डिस्क) में दरार पड़ जाती है या वह टूट जाती है तो उसे स्लिप डिस्क की बीमारी कहते हैं। यह बीमारी उन्हीं लोगों को होती है जो परिश्रम नहीं करते और कुर्सी पर बैठने वाला कार्य ही करते हैं। इस रोग का प्रमुख कारण रीढ़ की हड्डियों, नसों एवं लिगमेंट में अपर्याप्त लचीलापन तथा तनाव को माना गया है। 

योग में इलाज 
इस बीमारी का योग में बहुत ही सरल, प्रभावशाली तथा स्थायी इलाज है। ऐसे रोगी भी कुछ सप्ताह के सरल यौगिक अभ्यास से इस रोग से पूर्णतया मुक्त हो गए जिन्हें डॉक्टर ने ऑपरेशन की सलाह दे दी थी। 

दर्द तेज हो तो 
यदि स्लिप डिस्क का दर्द तीव्र हो, तो कड़े बिछावन पर लेटकर कमर को कुछ दिनों तक हिलाना-डुलाना बिल्कुल बंद कर देना चाहिए। जब तक हड्डी की डिस्क ठीक न हो जाए और सूजन कम न हो जाए, बिस्तर पर पूर्ण विश्रम करना चाहिए। दर्द और सूजन वाली जगह पर बारी-बारी से गर्म और ठंडी पट्टी देते रहने से जल्दी आराम मिल जाता है। कुछ समय तक फिजियोथिरेपी का अभ्यास करना भी लाभकारी होता है। 

क्रियाएं और आसन 
जब चलने-फिरने लायक हो जाए तो इन यौगिक क्रियाओं का अभ्यास करना चाहिए। प्रारम्भ में ज्योतिष्टकासन और मत्स्य क्रीड़ासन में विश्रम करना सीखना चाहिए। इसके पश्चात् मकरासन का अभ्यास करना चाहिए। मकरासन का अभ्यास पांच-सात बार करें। जब यह आसन अच्छी तरह होने लगे तो क्रमश: अर्धशलभासन, सरल भुजंगासन, सरल धनुरासन, भुजंगासन, शलभासन, वज्रासन तथा अर्धमत्स्येन्द्रासन का अभ्यास करना चाहिए। प्रत्येक आसन को पांच-पांच बार करने के पश्चात् अद्दासन में आराम करना चाहिए। 

अर्धशलभासन की अभ्यास विधि 
पेट के बल जमीन पर लेट जाएं। सिर को ठुड्डी के बल जमीन पर रखें। दोनों हथेलियों को जांघों के नीचे जमीन पर रखें। अब दाएं पैर को जमीन से ऊपर उठाएं। पैर बिल्कुल सीधा ही ऊपर उठाएं। लगभग 5 सेकेंड तक इस स्थिति में रुकने के बाद वापस पूर्व स्थिति में आएं। यही क्रिया बाएं पैर से भी करें। प्रारम्भ में इसकी तीन आवृत्तियों का अभ्यास करें। धीरे-धीरे आवृत्तियों को 25 से 30 बार तक बढ़ाएं। जब आप इसकी 25 से 30 आवृत्तियों के अभ्यास करने की स्थिति पार कर लेते हैं तो आपको दोनों पैरों को एक साथ उठाने का अभ्यास प्रारम्भ कर देना चाहिए। 

शिथिलीकरण 
इस रोग में आपको सामान्यतया कुछ दिन बिस्तर पर बिताना पड़ता है। इसलिए यदि इस समय शिथिलीकरण का अभ्यास कर लिया जाए तो रोग बहुत जल्दी ठीक हो जाता है। यह दर्द से ध्यान हटाता है तथा मानसिक तनाव को कम करता है। यह नाड़ियों को बहुत शांत एवं शिथिल कर आत्मविश्वास भी बढ़ाता है। 

भोजन 
प्रारम्भ में हल्का भोजन लेना चाहिए। सब्जियों का रस या सूप सर्वोत्तम है। इसके बाद खिचड़ी लेनी चाहिए। बिस्तर पर पड़े रहने से रोगी को कब्ज हो जाया करता है। ये आहार कब्ज दूर करते हैं। जैसे-जैसे रोग अच्छा होता जाए, चावल, दाल, सब्जी एवं रोटी खायी जा सकती है। ऐसे भोजन जिससे कब्ज होती है या जो गरिष्ठ होते हैं, नहीं लेने चाहिए। इनमें मांस, पनीर, तेल में तली वस्तुएं आदि शामिल हैं। अण्डा, दूध, घी आदि प्रोटीनयुक्त चीजें भी नहीं लेनी चाहिए। 

ध्यान दें 
इस रोग में केवल पीठ को पीछे झुकाने वाले आसन करने चाहिए। आगे झुकने वाले आसनों का अभ्यास तब तक नहीं करना चाहिए जब तक योग विशेषज्ञ इसके लिए अनुमति न दे दे। कुर्सी पर ज्यादा देर तक बैठने वाले लोग योगासनों का अभ्यास आज से ही शुरू कर दें। वजनी चीजें घुटनों को मोड़कर सावधानी से ही उठाएं। 

शिथिलीकरण अभ्यास की विधि 
पेट के बल (मकरासन) में या पीठ के बल (शवासन) में लेट जाएं। चेहरे को पूर्णतया शिथिल कर दें तथा शरीर के सभी अंगों को पूरी तरह ढीला छोड़ दें। अब अपने दाएं पैर पर मन को एकाग्र कर उसे नितंब से लेकर अंगुलियों तक पूरी तरह से ढीला करें। ठीक इसी प्रकार बाएं पैर को भी ढीला करें। इसके बाद दाएं हाथ को कंधों से लेकर अंगुलियों तक खूब ढीला करें। फिर, यही क्रिया बाएं हाथ से भी करें। इसके पश्चात् पीठ, पेट, सीना, गला तथा चेहरे पर मन को बारी-बारी से एकाग्र करते हुए ढीला करें। यह क्रिया आरामदायक अवधि तक की जा सकती है(कौशल कुमार,हिंदुस्तान,दिल्ली,25.4.12)।

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शुक्रवार, 4 मई 2012

किडनी की समस्या का संकेत हो सकता है पीठ दर्द

पीठ के दर्द को आमतौर पर गंभीरता से नहीं लिया जाता। लेकिन शोध कहता है कि यह दर्द किडनी की समस्या का संकेत भी हो सकता है। सुषमा कुमारी का आलेखः 

एक अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबिक सिर दर्द के बाद पीठ दर्द दूसरी आम न्यूरोलॉजिकल समस्या है, जिसकी वजह से अमूमन लोग और उनका काम प्रभावित होता है। व्यस्त जीवनशैली, तनाव और गलत पोस्चर हमें अक्सर पीठ या कमर दर्द से परेशान कर देता है। ऐसे में हम पेन किलर्स लेकर काम पर चल देते हैं। लेकिन एशियन इंस्टिटय़ूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (फरीदाबाद) के चीफ नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. जितेन्द्र कुमार के मुताबिक, बैकेक की समस्या हो और आप दर्द निवारक दवाएं लेकर निश्चिंत होने की सोच रहे हैं तो सावधान हो जाएं। कहीं आप खुद को परेशानी में न डाल रहे हों। 

रहें सतर्क 
डॉ. कुमार कहते हैं कि बेशक, हमेशा ऐसा नहीं हो सकता, लेकिन सावधान होने और सतर्कता बरतने की जरूरत अवश्य है। पीठ दर्द का कारण गुर्दे से जुड़ी कोई गंभीर बीमारी भी हो सकती है। या यूं कहें कि किडनी से जुड़ी बीमारियां पीठ दर्द के जरिए अपने होने का इशारा कर सकती हैं। समय रहते इसका पता न लगा लिया गया तो यह बड़ी समस्या का कारण बन सकता है। इस कारण बाद में आपकी किडनी प्रभावित हो सकती है और वह काम करना बंद भी कर सकती है। इसलिए पेन किलर्स लेने से पहले बीमारी का सही कारण की जानकारी जरूरी है। 

जानकारी का अभाव 
अमूमन लोगों को यह मालूम नहीं होता कि हमारी दोनों किडनियां पीछे की ओर पीठ की दीवार से चिपकी होती हैं। ये दोनों किडनियां वर्टिब्रा के अगल-बगल होती हैं, जहां पसली (रिब) खत्म होती है। किडनी के कारण होने वाला दर्द पीठ के क्षेत्र में महसूस किया जाता है, जो स्पाइन के किसी भी भाग में पीछे की ओर पसलियों के लोअर एज (नीचे किनारे की ओर) में होता है। 

किडनी में संक्रमण या छोटा स्टोन होगा तो वह पीठ की ओर होगा। ऐसे में आमतौर पर कमर का दर्द समझ कर मरीज पेन किलर ले लेते हैं, जो सही नहीं है। जानकारी के अभाव में दवा लेने से किडनी प्रभावित होती है और लोग पीठ दर्द के भ्रम में दर्द के मूल कारण की ओर ध्यान नहीं दे पाते हैं। 

किडनी दर्द के कारण 
आमतौर पर किडनी के दर्द का दो कारण होते हैं-स्टोन और संक्रमण। व्यस्त जीवनशैली में पानी कम पीने और यूरिक एसिड (प्रोटीन) व पालक, टमाटर आदि अधिक मात्र में लेने से भी यह समस्या हो सकती है क्योंकि इससे खून में केमिकल्स/ यूरिक एसिड बढ़ जाता है। 

जांच जरूर कराएं 
इसका सही-सही पता लगाने के लिए डॉक्टर यूरिन टेस्ट या किडनी का अल्ट्रासाउंड कराने के लिए कह सकते हैं। जरूरत महसूस हो तो खून से जुड़ी अन्य जांच जैसे- सिटी स्कैन, न्यूक्लीयर स्कैन आदि की भी सलाह दी जा सकती है। इन जांचों को लेकर तनाव न पालें। 

डरें नहीं 
स्टोन के आकार और उसकी सही स्थिति को देखकर बड़ी सर्जरी किए बगैर भी लिपोट्रैप्सी/लेजर/पीसीएनएल (पर क्यूटेनियस नेफ्रो लिथोट्रिप्सी) के जरिए स्टोन निकाला जा सकता है। इसलिए डरें बिल्कुल भी नहीं। 

क्या करें जब पीठ सताए 
पीठ दर्द इतना बढ़ जाए कि सामान्य गतिविधियों में भी परेशानी होने लग जाए, पैर सुन्न हो जाएं, मसल्स कमजोर होने लगे तो समझ लें कि तुरंत उचित इलाज की जरूरत है। यूरिन पास करने में दिक्कत आ रही है या उसके साथ खून आ रहा है या जलन हो रही हो तो आप किडनी की समस्या से ग्रस्त हैं। जो लोग कम उम्र में ही डायबिटीज या हाइपरटेंशन के शिकार हो चुके हैं या पथरी समेत किडनी से जुड़ी कोई अन्य समस्या रही हो, तो उन्हें अधिक सचेत रहने की जरूरत है। दर्द निवारक गोलियां न लें। 

क्यों होता है पीठ दर्द 
स्टोन छोटा होगा तो दर्द ज्यादा करेगा। स्टोन बड़ा हो जाएगा तो दर्द कम महसूस होगा। इसका यह अर्थ नहीं कि स्टोन निकल गया। आप चाहे एलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेद या किसी भी अन्य पद्धति से इलाज करवा रहे हों, दर्द कम होने के बाद यह समझने की भूल न करें कि समस्या खत्म हो चुकी है। अल्ट्रासाउंड जरूर कराएं, ताकि सही स्थिति का पता चल सके। 

यदि यूरिन में जलन, रुकावट और बुखार हो तो यूरिन संक्रमण की आशंका होती है, लेकिन किडनी वाले क्षेत्र में पीठ दर्द हो तो किडनी की समस्या (पाइलोनेफ्राट्स) की आशंका ज्यादा होती है। यदि उचित इलाज नहीं किया गया तो स्थिति गंभीर हो सकती है। मधुमेह और गर्भावस्था के दौरान इसका खतरा और बढ़ जाता है। 

किडनी में गांठ (कैंसर) हो गया हो, तब भी यह दर्द हो सकता है। इसे ग्लोमेरलो नेफरैटिस कहते हैं। इसमें दोनों गुर्दो में किसी बीमारी के कारण सूजन आ जाती है। इस कारण पीठ दर्द शुरू हो सकता है। 

यूरिन में जलन या रुकावट हो, ब्लड या प्रोटीन लीक करे या सूजन हो तो यह संकेत है कि पीठ दर्द मामूली नहीं है। इसकी वजह किडनी की समस्या हो सकती है। इस लिए किसी भी तरह के पीठ दर्द को मामूली न समझों। 

अन्य कारण 
सिगरेट पीना, शराब पीना, बढ़ती उम्र, व्यस्त जीवनशैली और तनाव, गलत पोस्चर, मोटापा, चोट, दुर्घटना(हिंदुस्तान,दिल्ली,25.4.12)

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सोमवार, 30 अप्रैल 2012

जब बर्दाश्त न हो गर्दन का दर्द

सतही तौर पर देखने पर गर्दन में होने वाला दर्द भले ही एक सामान्य सी मेडिकल स्थिति लगता होता, लेकिन इसे नज़रअंदाज़ करने से समस्या काफी बढ़ सकती है। माना जाता है कि दुनिया भर के वयस्कों में से लगभग ८० प्रतिशत किसी न किसी रूप में इससे प्रभावित हैं। 

कई हैं कारण 

-गर्दन का दर्द कई कारणों से हो सकता है जैस -विकृत होते डिस्क संबंधी रोग,

-गले में अकड़न, झुनझुनी, विप्लेश,

-हरनिएटेड डिस्क के कारण गर्दन का चोटिल होना या स्नायु में ऐंठन।

-गले में वायरल संक्रमण की वजह से ग्रंथियों में सूजन और गले में दर्द की शिकायत हो सकती है।

-यह टीबी, रीढ़ की हड्डी के संक्रमण और मेनेनजाइटिस जैसी बीमारी की वजह से भी हो सकता है।

-फाइब्रोमायेलजिया और पोलिमायलजिया रुमेटिका जैसी स्थितियों के कारण भी गले में दर्द होता है। इस तरह की स्थिति में गले की मांसपेशियाँ सीधे तौर पर प्रभावित होती हैं। -कई तरह की दुर्घटनाओं की वजह से भी गला प्रभावित होता है।  

- गले का निचला हिस्सा और पीठ का ऊपरी हिस्सा सिर को सहारा देते हैं। इस व्यवस्था के गड़बड़ाने से शरीर का यह पूरा हिस्सा दर्द की चपेट में आ सकता है। 

खेल, वाहन चलाते हुए या घुड़सवारी के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं के बाद, गले के दर्द का इलाज करने के लिए तरोताज़ा करने वाले व्यायाम मददगार माने जाते हैं। लेकिन कभी-कभी गले में दर्द के बाद उसे हरकत में लाने से हालत बिगड़ने का खतरा रहता है। गले में दर्द की वजह से कई बार कुछ भी खाना-पीना मुश्किल हो जाता है। चिकित्सकीय सहायता से इस दर्द को दूर भगाया जा सकता है। दर्द के कारण पर ही इसका इलाज निर्भर करता है। दवाएँ, फीज़िकल थैरेपी आदि कारगर इलाज हैं। 

आम तौर पर इलाज के लिए सर्जरी का सुझाव नहीं दिया जाता। अगर यह दर्द ग्रंथियों के इधर-उधर खिसक जाने,कैंसर या दूसरी बीमारियों के कारण होता हो तो कईबार सर्जरी ज़रूरी हो जाती है। अगर मरीज़ स्पाइनल कॉर्ड पर दबाव पड़ने के कारण परेशान हो रहा हो या कई महीनों तक विकलांगता से ग्रस्त रहा तो भी सर्जरी का सुझाव दिया जाता है। कई बार,फिजिकल थैरेपी से भी मरीज़ को फ़ायदा होता है। 

जब गर्दन में तेज़ दर्द रहता हो तो कभी-कभी सोने की आदतों में बदलाव से भी फ़ायदा हो जाया करता है। कई बार,पारम्परिक चिकित्सा प्रणालियों का प्रयोग होता है तो कई बार एक्यूपंचर तथा एक्यूप्रेशर जैसे वैकल्पिक उपचार किए जाते हैं। 

लेकिन,एक बात तो मानी हुई है कि गले के दर्द को अगर हल्के में लिया गया तो वह बहुत परेशानी में डालने वाली भी हो सकती है। दर्द अगर गले के सामान्य व्यायामों के ज़रिए ख़त्म न हो और लम्बे समय तक बना रहे तो चिकित्सक के पास जाने में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिए। चिकित्सक ह यह तय करेंगे कि दर्द किस कारण से है और उसके इलाज़ के लिए किस तरह के उपचार का सहारा लिया जाए(डॉ. अमिताभ गुप्ता,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल तृतीयांक 2012)

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कमरदर्द का घरेलू इलाज़

-लहसुन : रोज़ सुबह लहसुन की २-३ कलियाँ लेने से कमरदर्द में राहत मिलती है। सरसों या नारियल के तेल में लहसुन की कलियाँ डालकर गर्म कर लें। लहसुन काली होने तक गर्म करें फिर ठंडा होने पर छान कर इस तेल से पीठ-कमर में मालिश करें।

-कढ़ाई में २-३ चम्मच नमक डालकर इसे अच्छे से सेक लें। थोड़े मोटे सूती कपड़े में यह गरम नमक डालकर पोटली बांध लें। मरीज़ की पीठ पर इससे सेक करें।

-गरम पानी में नमक डालें। इसमें एक फर वाला तौलिया डालकर निचोड़ लें। पेट के बल पर लेट जाएँ और पीठ पर जहाँ दर्द हो रहा हो, यह तौलिया रख लें। भाप से राहत मिलेगी।

-कमरदर्द की समस्या से बचने के लिए हमेशा सही पॉस्चर का ध्यान रखें। हर समय ऊँची हील की सैंडल्स भी कमरदर्द का कारण बन सकती है, इसके बजाय आरामदायक जूते पहनें। नियमित रुप से व्यायाम करें।

-यदि अधिक समय तक दर्द बना रहे तो मालिश और व्यायाम बिल्कुल न करें। कभी-कभी गलत तकनीक के कारण परेशानी और बढ़ जाती है। थोड़े समय केवल आराम कर के देखें और चिकित्सक से सलाह लें। इलाज से पहले दर्द का कारण जानना बहुत ज़रुरी है(सेहत,नई दुनिया,अप्रैल,2012 तृतीयांक)।

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मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

"स्पॉण्डिलाइटिस" में बरतें सावधानी

गर्दन का दर्द एक आम समस्या है जो अमूमन अपने आप ठीक हो जाती है। लेकिन कई बार दर्द ठीक होने के बजाय बढ़ता ही जाता है। मरीज़ को ऐसा लगता है जैसे कि उसकी गर्दन अकड़ ही गई हो। कभी-कभी दर्द के साथ कंधे या बाजू में जड़ता, जलन भी होती है, इसे सरवाइकल स्पोण्डिलाइटिस कहते हैं। यह गर्दन के स्पाइनल कॉलम अर्थात्‌ मेरुदंड की बीमारी है। मेरुदंड यानी रीढ़ की हड्डी कशेरूक नामक अस्थियों से मिलकर बनी होती है। सरवाइकल या गर्दन वाले भाग में कशेरूक के दो भाग होते हैं, एक मुख्य खंड और इसके पीछे तंत्रिका चाप। मुख्य खंड हड्डी का बना सिलेंडर होता है जो पास वाली हड्डियों के सिलिंडर से स्डिक द्वारा अलग होता है। ये डिस्क कार्टिलेज की बनी परतें होती हैं जो कुशन की तरह काम करती हैं और गति में सहायक होती हैं। इस डिस्क का अपक्षय होता है। यह डिस्क टूटकर बाहर निकल जाती है और बराबर वाली कशेरुक पर एक अतिरिक्त बोझ बन जाती है। इस अतिवृद्धि अथवा उभार के कारण तंत्रिकाओं पर पड़ने वाले दबाव से ही गर्दन में दर्द के साथ-साथ दोनों बाहों में झुनझुनी होती है और बाहें सुन्न हो जाती हैं। इसके अलावा,कभी-कभी ठीक से दिखाई नहीं देता है,झनझनाहट होती है औरआँखों के पीछे दर्द होता है। कुछ लोगों के कंधे में दर्द होता है,कुछ पीठ पर असफलकीय भाग में दर्द की शिकायत करते हैं। गर्दन को घुमाने में तक़लीफ बहुत होती है। मरीज़ अपनी बाईं या दायीं ओर आसानी से नहीं देख सकते। इलाज़ में सामान्य दर्दनिवारक,जैसे-पैरासिटामोल एनालजिन,एस्प्रिन ब्रुफेन असर करती हैं। इसके लिए फिजियोथैरेपी भी महत्वपूर्ण है। इससे काफी राहत मिलती है। इसके साथ ही सरवाइकल कॉलर का भी इस्तेमाल किया जाता है। यह गर्दन के झटकों से बचाती है जिससे रीढ़ की हड्डी को आवश्यक आराम मलता है। यदि रोगी को मधुमेह है तो उसे मधुमेह नियंत्रित रखना बहुत ज़रूरी है(डॉ. इक़बाल मोदी,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल द्वितीयांक 2012)

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गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

स्लिपडिस्क का इलाज एक्यूप्रेशर से

आज दौड़ती ज़िन्दगी में पीछे छूट जाने का डर हमारी रफ्तार को बढ़ा देता है। कभी-कभी यह रफ्तार इतनी तेज हो जाती है कि हमें अपने या अपनों के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं मिलता। दौड़ते वक्त के साथ कदम मिलाकर चलने के लिए हमने जिस जीवन शैली के रंग में खुद को ढाल लिया है, उसने हमें कई तरह के रोग दिए हैं। जो हमारी गति को धीमा कर देते हैं। कुछ रोग जिनसे जीवन को ज्यादा खतरा होता है, उनकी चिंता तो हम करते हैं, पर कम तकलीफदेह छोटी-मोटी बीमारियों को लेकर लापरवाही कर जाते हैं। कमर, सिर, पीठ का दर्द ऐसी ही बीमारियां हैं। जब तक ये बीमारियां बहुत बढ़ नहीं जाती,कम ही लोग इनकी ओर ध्यान देते हैं। कुछ समय पहले तक कमर में दर्द होना बुढ़ापे की निशानी माना जाता था। आज लगभग हर उम्र का व्यक्ति इससे पीड़ित है। युवाओं से लेकर वृद्धों तक में यह बीमारी देखी जा सकती है। लगातार तेज गति का वाहन चलाने, बोझ लेकर आगे झुकने या अचानक बोझ उठाने से, गलत ढंग से बैठने, अधिक मोटापे जैसी कई वजहों से कमर में दर्द होता है। कमर के छल्लों के बीच में एक स्पंजनुमा गद्दी होती है। उसका किसी वजह से अपने स्थान से हटने से, छल्लों में कमजोरी या संक्रमण होने से कमर में दर्द का एहसास होता है। डॉक्टर इस बीमारी को स्लिपडिस्क कहते हैं। एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति में स्लिपडिस्क रोग का स्थायी समाधान खोजा गया है। यह चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद की मर्म दौड़ते वक्त के साथ कदम मिलाकर चलने के लिए हमने जिस जीवन शैली के रंग में खुद को ढाल लिया है, उसने कई तरह के रोग हमें दिए हैं। 

एक्यूप्रेशर एक ऐसा उपचार है, जिसे सीखकर व्यक्ति अपना उपचार खुद कर सकता है। एक्यूप्रेशर सेवा समिति जैसी कई संस्थाएं नि:शुल्क शिविरों के माध्यम से स्लिपडिस्क का इलाज भी करती हैं। शुरुआत में ही रोग का पता लगने परनाभि, पैरों के तलवों और कमर से संबंधित एक्यूप्रेशर बिंदुओं को दबाकर उसका समाधान कर दिया जाता है, पर रोग के बढ़ जाने पर कूपिंग मेथड, नर्वस स्टीमुलेटर, लेजर या एन.सी.वी. आदि से इसका परीक्षण किया जाता है। ठीक-ठीक पता लगने के बाद जहां पर डिस्क बलजिंग या डिस्क पर प्रेशर बढ़ रहा होता है वहां की नसों को माइक्रो एक्यूप्रेशर उपकरणों द्वारा उत्तेजित कर इलाज किया जाता है। मेडीनोवा पॉलीक्लीनिक के निदेशक डॉक्टर पीयूष त्रिवेदी माइक्रोएक्यूप्रेशर तकनीक को स्लिपडिस्क के उपचार के लिए कारगर मानते हैं। वे बतलाते हैं कि इस उपचार पद्धति में माइक्रो उपकरणों द्वारा विभिन्न तरंगें डिस्क तक पहुंचाई जाती हैं, जिससे वहां हलचल होकर एक्टिव ऑक्सीजन पैदा होती है एवं ऊर्जा का संचरण सुचारु रूप से होने लगता है। ऊर्जा के संचरण से डिस्क में न्यूक्लियस के प्रोटीग्लीकेस बॉड्स जुड़ना शुरू हो जाते हैं। इस उपचार विधि को 4 से लेकर 21 दिन तक नियमित रूप से करने से बिना किसी ऑपरेशन के स्लिपडिस्क रोग से मुक्ति पाई जा सकती है। बिना ऑपरेशन के, कम खर्चे में एक्यूप्रेशर द्वारा स्लिपडिस्क का स्थायी निदान हो सकता है(अहा ज़िंदगी,11.3.12)।

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शनिवार, 14 अप्रैल 2012

सायटिका

सायटिका एक प्रकार का कमर दर्द है जिससे शरीर का निचला हिस्सा प्रभावित होता है। यह नसों पर दबाव पड़ने के कारण होता है। 

लक्षण 
आमतौर पर इससे केवल एक पैर ही प्रभावित होता है लेकिन कई बार दोनों पैर प्रभावित होते हैं। कूल्हे, पैर के पिछले हिस्से में, घुटने के पीछे या पैर में दर्द महसूस होता है। दर्द हल्का या गंभीर हो सकता है, चटके भी चल सकते हैं यानी दर्द आता जाता रहता है। कई बार प्रभावित हिस्से में सुन्नपन या झिनझिनी भी होती है। चलते-फिरते, खड़े रहने पर या खाँसते हुए दर्द बढ़ सकता है और लेटने या आराम करने से।

कारण 
साएटिका नर्व पैर की मुख्य नस है। यह मानव शरीर की सबसे बड़ी नस है। यह रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से से शुरु होकर जांघ से होते हुए घुटने तक पहुँती है, जहाँ से यह कई शाखाओं में बंट जाती है। सायटिका का दर्द रीढ़ की हड्डी के पास सायटिक नस के शुरुआती हिस्से में इसपर दबाव पड़ने के कारण होता है। नस के क्षतिग्रस्त होने पर भी दर्द होता है। 

वृद्घावस्था में ओस्टियोआर्थ्राइटिस जैसी बीमारी के कारण स्पाइन में परिवर्तन आने लगते हैं। ऐसे परिवर्तनों की वजह से साएटिका नस दबने लगती है और दर्द का कारण बनती है। हड्डियों की अन्य बीमारियाँ या कमर की चोंट भी इसका कारण बन सकती है। कई बार अजीब ढ़ंग से बैठने के कारण भी सायटिका हो जाता है। जेनाइटल हिस्से या कूल्हों में सुन्नपन, पेशाब न कर पाना, मांसपेशियों का लगातार कमज़ोर होते जाना आदि सभी सायटिका के गंभीर लक्षण हैं। ऐसे में तुरंत चिकित्सकीय देखरेख की ज़रुरत होती है।  

इलाज  
सायटिका का दर्द कई बार अपने आप ही ठीक हो जाता है। सायटिका के लक्षण दिखाई देने पर पूरा आराम करें। कुछ दिनों का बेड रेस्ट भी करना पड़ सकता है। आराम के अलावा आगे की ओर झुकना, भारी सामान उठाना और ज़मीन पर बैठने से बचें। इसके बाद भी यदि कुछ दिनों में दर्द ठीक न हो तो विशेषज्ञ से संपर्क करें। एपिड्यूरल इंजेक्शन दवाओं से इलाज करने पर भी कोई फायदा न होने पर सर्जरी करनी पड़ सकती है। तीव्र दर्द से पीड़ित मरीज़ों में सर्जरी कर डिस्क निकाल दी जाती है।  

बचाव 

-अपना वज़न बढ़ने न दें। अपनी क्षमता से अधिक भारी सामान न उठााएं। यदि भार उठाना पड़ ही जाए तो इसे सही तरीके से उठाएं। भार उठाते हुए कमर से झुकने की बजाय पैरों को मोड़कर सामान उठाएं।

-सही पॉश्चर में बैठें। लंबे समय तक एक ही स्थिति में न बैठें। कमर पर पूरा ज़ोर डालकर कभी भी न बैठें।

-नियमित व्यायाम करें। कमर को लचीला बनाने के व्यायाम करें(डॉ. पंकज जैन,सेहत,नई दुनिया,अप्रैल द्वितीयांक 2012)।

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सोमवार, 2 अप्रैल 2012

क्या करें जब दर्द सताए

रिलेक्स करें 
ध्यान से दिल की धड़कन कम होती है, ब्लड प्रेशर घटता है और साँसें भी नियंत्रित होती हैं, जिससे शरीर और मस्तिष्क में शांति आती है। एक वैज्ञानिक अध्ययन में यह बात पता चली है कि मेडिटेशन से दर्द सहने की शक्ति में निश्चित तौर पर इज़ाफा होता है। इससे दर्द के प्रति प्रतिक्रिया में ४० से ५० प्रतिशत तक की कमी आती है, इसलिए २० मिनट सुबह व २० मिनट शाम को ध्यान करने की आदत डालिए, जो भविष्य में आने वाले दर्द के दौरों को सहने में आपकी मदद करेगा।

दर्द का रिश्ता है नियमित व्यायाम से 
नियमित रूप से व्यायाम करने से दर्द सहने की क्षमता बढ़ती है, भले वह मूवमेंट की रेंज बढ़ाने वाली कसरतें हों, स्ट्रेंथनिंग कसरते हों या फिर एरोबिक्स। दर्द होने पर भी अपने जोड़ के मूवमेंट को बंद न करें नहीं तो जकड़न हो सकती है व जोड़ खराब हो सकता है। व्यायाम व दर्द के समय भी पीड़ित जोड़ की गतिशीलता बनाए रखने से - 

 - शरीर में एन्डॉर्फिन्स का स्तर बढ़ता है, जो शरीर के प्राकृतिक दर्द निवारक -शरीर की मांसपेशियां व लिगामेंट्स मज़बूत होते हैं। 

 - वज़न नियंत्रित होता है। अधिक वज़न भी अधिक दर्द का कारण होता है। 

 - दर्द से ध्यान हटाने में मदद मिलती है। 

 - व्यायाम,अपनी उम्र,शरीर की स्थिति व क्षमता के अनुसार तय किया जा सकता है।

एक्यूप्रेशर 
एक्यूप्रेशर भी कमोबेश एक्यूपंक्चर के सिद्धांत पर ही कार्य करता है। बस फर्क इतना है कि इसमें शरीर के निश्चित हिस्सों पर दबाव डालकर परिणाम प्राप्त किए जाते हैं। इसमें शरीर केनिर्धारित प्रेशर पाइंट्स पर दबाव डालकर दर्द कम करने वाले रसायनों के उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाता है। ये सभी उपाय कई प्रकार के दर्द जैसे सिरदर्द, कमरदर्द व आस्टियो-आर्थ्रराइटिस के दर्द से राहत पाने में मददगार हो सकते हैं, बशर्तें इन्हें किसी योग्य व प्रशिक्षित थैरेपिस्ट के मार्गदर्शन में लिया जाए। 

एक्यूपंक्चर 
चीन से प्रारंभ हुई इस पद्धति में शरीर के "एक्यूपाइंट्स"नामक ख़ास हिस्सों को सुइयों द्वारा सक्रिय किया जाता है, जिससे दर्द से मुक्ति मिलती है। चीनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस उपचार प्रक्रिया में ऊर्जा का स्वतंत्र प्रवाह होने लगता है। चीनी इस ऊर्जा को "चि" कहते हैं, जो शरीर के रोगमुक्त होने की प्रक्रिया को बढ़ावा देता है। इस संबंध में हुए अनेक वैज्ञानिक प्रयोगों में यह बात सामने आई है कि एक्यूपंक्चर द्वारा शरीर में से एन्डॉर्फिन्स अधिक मात्रा में निकलने लगते हैं, जो शरीर के प्राकृतिक दर्द निरोधक का कार्य करते हैं। इसी बारे में हुए एक शोध में एक अन्य प्राकृतिक दर्द निवारक एडीनोसीन के एक्यूपंक्चर के परिणामस्वरूप अधिक मात्रा में निकलने की बात पता चली है(डॉ. संजीव नाईक,सेहत,नई दुनिया,मार्च चतुर्थांक 2012)।

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शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

आर्थ्राइटिस सिर्फ बढ़ती उम्र की परेशानी नहीं

भारत में हर उम्र के करीब ४ करोड़ ६० लाख लोग आर्थ्राइटिस और इससे संबंधित बीमारियों से ग्रस्त हैं। आर्थ्राइटिस सदियों से मानव समाज को परेशान करता आ रहा है। इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन यूनानी व रोमन साहित्य में आर्थ्राइटिस के विभिन्ना रूपों का ज़िक्र मिलता है, कुछ तो यहाँ तक कहते हैं गुफा मानव भी इससे पीड़ित हुआ करता था। 

आज आर्थ्राइटिस इतना फैला हुआ है कि ६ लोगों में से १ तथा ३ परिवारों में से १ इससे पीड़ित है। अगले २० सालों में अनुमान है कि ऐसे मरीज़ों की संख्या ६ करोड़ ७० लाख हो जाएगी।

आर्थ्राइटिस क्या है? 
आर्थ्राइटिस यानी जोड़ों में सूजन, इसे आम भाषा में गठिया कहते हैं। वास्तव में "आर्थ्राइटिस" शब्द का इस्तेमाल जोड़ों की सौ से ज़्यादा बीमारियों के लिए किया जाता है।

ऑस्टियोआर्थ्राइटिस 
सबसे आम किस्म का आर्थ्राइटिस है। अधिकतर इससे वृद्ध व अधेड़ उम्र के लोग परेशान रहते हैं। यह जोड़ों के कार्टिलेज में विकार आने से होता है। कार्टिलेज जोड़ों में मौजूद कड़ी पर लचीली हड्डी होती है जिससे जोड़ों का मुड़ना संभव हो पाता है। इस रोग का वास्तविक कारण फिलहाल अज्ञात है।

फाइब्रोमयालजिया 
यह आर्थ्राइटिस का दूसरा सबसे आम प्रकार है। अधिकतर यह महिलाओं को होता है। ७०-९० प्रतिशत मरीज़ २०-५० आयु वर्ग की महिलाएँ होती हैं। इस मर्ज़ में पेशियों या जोड़ों में दर्द होता है और संक्रमण का कोई लक्षण नहीं होता। इसे अक्सर गलती से क्रॉनिक फटीग सिंड्रोम यानी अत्यधिक थकान समझ लिया जाता है। आमतौर पर इसमें सर्जरी की आवश्यकता नहीं होती। इसमें संयोजक ऊतकों में परिवर्तन होने लगते हैं। इसमें जोड़ों की मैम्ब्रेन लाइनिंग में जलन होती है जिससे दर्द, अकड़न व सूजन हो जाती है। परिणामस्वरूप मरीज़ को चलने-फिरने में मुश्किल होती है, जोड़ का आकार बिगड़ जाता है, वह एक सीध में नहीं रहता और कई बार जोड़ पूरा ध्वस्त हो जाता है। पुरुषों के मुकाबले यह महिलाओं को तीन गुना अधिक शिकार बनाता है। मरीज़ अक्सर ही आर्थ्राइटिस को अनदेखा करते हैं और इसे बढ़ती उम्र की वजह से होने वाली पीड़ा समझ लेते हैं। कई लोग खुद ही इसके लिए पेनकिलर खाने लगते हैं और उचित तरीके से इसके उपचार के बारे में नहीं सोचते। इससे उन्हें बहुत पीड़ा झेलनी पड़ती है और स्थिति बिगड़ती जाती है। इस मामले में कोई लापरवाही न बरतें। आर्थ्राइटिस बहुत ही गंभीर बीमारी है, जो मरीज़ को पंगु बना देती है। यहां तक कि यह जानलेवा भी साबित हो सकती है। इसलिए,इसके शुरूआती लक्षणों को अनदेखा नहीं करना चाहिए।(डॉ. अखिलेश यादव,सेहत,नई दुनिया,जनवरी तृतीयांक 2012)

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सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

क्या आपका बच्चा भी सुबह पैर दुखने की शिकायत करता है?

अक्सर शाम को पढ़ाई शुरू करने से पहले बच्चे माँओं को यही कहते सुनाई देते हैं। स्कूली बच्चों की यह एक बहुत ही आम समस्या है। कई बार पालक समझ ही नहीं पाते कि इसे गंभीरता से लें या अनदेखा कर दें। यह न समझें कि हर बार बच्चा पढ़ाई से बचने के लिए यह बहाना बना रहा है। दरअसल, बच्चे के पैरों में कई कारणों से दर्द उठ सकता है।

बच्चे खेलकूद में इतना मशगूल हो जाते हैं कि उन्हें कहाँ रुकना है यह भी याद नहीं रहता। अपनी शारीरिक क्षमताओं से परे तक जाकर वे खेलते रहते हैं। घर पहुँचने तक वे थककर चूर हो चुके होते हैं। फुटबॉल अथवा ऐसे ही किसी दौड़ भाग के खेल के कारण पैरों में दर्द होने लगता है।


चोट लगने के कारण
 पैरों में दर्द का यह भी एक प्रमुख कारण है। कई बार ऐसा होता है कि चोट ऊपर से दिखाई नहीं देती लेकिन रह-रहकर दर्द होता है। अक्सर इस तरह के दर्द की तीव्रता आराम करने के साथ ही कम होती जाती है।


विकसित होने का दर्द 
शिशुरोग विशेषज्ञ इसे इसी नाम से पहचानते हैं। दरअसल, अभी इस तरह के दर्द का कारण स्थापित नहीं हो सका है लेकिन स्कूली बच्चों में यह बहुत आम समस्या है। बच्चा अक्सर रात को सोते समय या शाम को पैरों में दर्द की शिकायत करता है। दोनों पैरों के निचले हिस्से और पिंडलियों से एड़ी तक यह दर्द होता है। कई बार तो यह दर्द इतना तीव्र होता है कि बच्चा नींद से जाग जाता है। मालिश और दर्द निवारक गोलियों से आराम मिलता है। बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है उसका दर्द भी ग़ायब हो जाता है। 


जोड़ों में दर्द
यह सुनकर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है कि बच्चों को जोड़ों में दर्द होता है,लेकिन यही सच है। इसे चिकित्सकीय भाषा में जुवेनाइल आर्थ्राइटिस भी कहा जाता है। आमतौर पर इसका असर घुटनों,एड़ियों पर होता है। कभी-कभी छोटे जोड़ों पर बच्चे अपना पैर एक ही स्थिति में स्थिर रखते हैं। रिड्यूमेटाइड आर्थ्राइटिस की विशेषता ह है कि इसका दर्द सुबह के समय होता है। बच्चा सुबह यह शिकायत करता हुआ उठता है कि उसके जोड़ अकड़ गए हैं। उसे बिस्तर से उठने में भी बहुत कष्ट होता है। दर्द की तीव्रता जैसे-जैसे दिन चढ़ता है,कम होने लगती है। इस तरह के दर्द का इलाज़ किसी विशेषज्ञ की निगरानी में कराना ठीक होता है। 


गठान 
बहुत अपवादस्वरूप किसी भी बच्चे का हाथ-पैरों में दर्द मांसपेशियों में अथवा हड्डियों में उभर आई गठानों के कारण होता है। ये गठानें कैंसर की व सामान्य भी हो सकती हैं। हाथ-पैरों में किसी स्थान पर लंबे समय से सूजन हो या यह लगातार बढ़ रही हो,तो किसी विशेषज्ञ चिकित्सक को दिखाना अच्छा होता है। 


कब मिलें चिकित्सक से
हाथ-पैरों के जोड़ों में दर्द के साथ बुखार भी बना रहे। दर्द १२ घंटों से अधिक समय तक बना रहे। -जोड़ों में सूजन के साथ चलना-फिरना मुश्किल हो रहा हो। -कसरत करने के बाद अथवा पैदल चलने के बाद दर्द बढ़ता हो। -पैरों की त्वचा लाल दिखाई देने लगे -दर्द का समय सुबह और शाम बदलता हो या सुबह बिस्तर से उठने में दिक्कत आने लगे तब चिकित्सक को दिखाना चाहिए। 


इसलिए अब जब भी कभी आपका बच्चा यह कहे कि "मम्मी मेरे पैरों में दर्द हो रहा है" तो घबराइए नहीं, क्योंकि इसका इलाज उपलब्ध है। बच्चों को दर्द से मुक्त करने के कई उपाय आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के पास मौजूद हैं(डॉ. ज्योति संघवी,सेहत,नई दुनिया,जनवरी तृतीयांक 2012)।

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रविवार, 5 फ़रवरी 2012

कमर कसें, जरूर हारेगा दर्द

संतुलित डाइट की कमी, गलत पॉस्चर और आपकी दिनचर्या में व्यायाम का अभाव मिलकर आपकी रीढ़ में समस्या उत्पन्न कर सकते हैं और आप कमर दर्द की तकलीफ सहने को मजबूर हो सकते हैं। तो क्यों न इन बातों का ध्यान रखें और इस तकलीफ से दूर रहें। कभी कमर दर्द की शिकायत 40 से 60 वर्ष के बीच के लोगों को हुआ करती थी, लेकिन अब यह शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचने वालों में 50 प्रतिशत से अधिक युवा हैं। ये 20 से 40 वर्ष के बीच के हैं। राजधानी में 60 प्रतिशत से अधिक लोग किसी न किसी रूप में इस दर्द से परेशान रहते हैं और बाकी 40 प्रतिशत लोग घुटने और गर्दन के दर्द से परेशान हैं, जिनके दर्द की शुरुआत कभी कमर दर्द से ही हुई होगी। 

सर गंगाराम अस्पताल के पीएमआर विभाग (फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन डिपार्टमेंट) की वरिष्ठ फिजियोथेरेपिस्ट डॉ. ज्योति बाला कहती हैं कि युवाओं में बढ़ता कमर दर्द का यह प्रतिशत चिंताजनक है। वह कहती हैं कि इसके लिए तीन मुख्य बातें जिम्मेदार हैं। आजकल के युवा बैठने, खाने से लेकर कार्यस्थल तक में सही पॉस्चर का ख्याल नहीं रखते। देर रात तक जगने और सुबह देर तक सोने, व्यायाम आदि पर बिल्कुल भी ध्यान न देने और खानपान में लापरवाही बरतने जैसी आज की जीवनशैली भी इसके लिए जिम्मेदार है और कमजोर मसल भी कमर दर्द का प्रमुख कारण है। 

आप कम्प्यूटर पर लगातार कई घंटे काम करते हैं? आपके कम्प्यूटर की स्क्रीन का मध्य बिंदु आपकी आंखों के बिल्कुल सामने नहीं है? अक्सर आप कुर्सी पर पैर समेटकर कीबोर्ड पर अंगुलियां चलाना शुरू कर देते हैं? इन सवालों का जवाब हां में पाते हुए भी अगर अब तक आप कमर दर्द से बचे हैं तो इससे बचे रहने के लिए तुरंत सावधान हो जाइए, अन्यथा आपकी कमर कभी भी दर्द की चपेट में आ सकती है। काफी संख्या में छात्रों और युवाओं में कमर दर्द की समस्या देखी जा रही है। छात्रों में कमर दर्द का यह कारण बिस्तर पर लेटे-लेटे पढ़ने, टीवी देखते वक्त कभी लेट जाना तो कभी सोफे पर टेढ़े बैठ जाना, महिलाओं में इस दर्द का कारण किचेन में लगातार एक ही पॉस्चर में खड़े होकर काम करने आदि से होता है। 

मसल असंतुलन आपके पीठ दर्द, कंधा दर्द और गर्दन दर्द समेत कई तरह के दर्द का कारण बन सकता है। कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल एंड मेडिकल रिसर्च इंस्टीटय़ूट के सेंटर फॉर फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन के कन्सल्टेंट डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव कहते हैं- यह रीढ़ में तनाव और दर्द या दबाव का भी कारण साबित होता है। इसी इंस्टीटय़ूट के कन्सल्टेंट (स्पाइन सजर्न) डॉ. मिहिर बापट के अनुसार, अगर संतुलित डाइट का अभाव रहा है और कैल्शियम/विटामिन डी की पूर्ति के लिए इसके प्राकृतिक स्रोत यानी धूप का भी लाभ नहीं उठाया गया तो रीढ़ से संबंधित समस्याएं हो सकती हैं और इसमें कमर-पीठ दर्द प्रमुख हैं। 

‘कमर दर्द और अन्य दर्द के इलाज के लिए अस्पताल आने वाले 80 प्रतिशत से अधिक लोगों में विटामिन डी की कमी होती है।’ मुंबई के हिन्दुजा अस्पताल के कन्सल्टेंट (स्पाइन सजर्न) कहते हैं, ‘पिछले वर्ष के प्रारम्भ में कुछ डॉक्टरों द्वारा किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि रुटीन जांच के लिए अस्पताल आए 561 पुरुषों में से 77.5 प्रतिशत और 443 महिलाओं में से 72.68 प्रतिशत में विटामिन डी की कमी थी।’ डॉ. बापट कहते हैं कि इस समस्या से बचे रहने के लिए जरूरी है कि 25 वर्ष की उम्र से ही मसल्स का ध्यान रखा जाए और वजन को नियंत्रित रखा जाए। 

सही बैठें, तनकर बैठें 
आप जब भी बैठें, सीधे बैठें। अपने पॉस्चर को ठीक रखें। कम्प्यूटर पर काम करें तो इस बात का ख्याल रखें कि आपके कम्प्यूटर के स्क्रीन का मध्य बिन्दु आपकी आंखों के सामने हो। कम्प्यूटर स्क्रीन और आपकी आंखों के बीच की दूरी लगभग 20 इंच हो और कोहनी से कलाई आपके बाजू से 90 डिग्री की सीध में हो। पैरों को जमीन पर सामने रखा करें। अगर आपकी कुर्सी अनुकूल नहीं है तो उस पर गद्देदार कुछ रखकर कुर्सी को लेबल में ले जाएं या कम्प्यूटर के नीचे कुछ रखें। लगातार लंबे समय तक कुर्सी पर न बैठे रहें, बल्कि लगभग हर एक घंटे पर 5 मिनट टहल लिया करें। बीच-बीच में अपने बाजू को पीछे से आगे की ओर 10 बार घुमाएं और अपनी गर्दन को 5 से 10 बार आगे झुकाएं और इसी तरह दाएं व बाएं भी। 

थोड़ी-सी धूप है जरूरी 
शहरी जीवनशैली में लोग एयरकंडीशन्ड ऑफिस से लेकर एयरकंडीशन्ड कार तक में अपने जीवन को सीमित कर लेते हैं। गोवा के समुद्री तट पर सन बाथ का मौका भी कभी-कभी ही निकाल सकते हैं, लेकिन घर की बालकनी में आने वाली धूप को नजरअंदाज करना कहां की समझदारी है। डॉ. बाला कहती हैं, विटामिन डी और कैल्शियम के लिए नियमित रूप से 15 मिनट धूप में बैठें तो इससे अच्छा कुछ हो ही नहीं सकता- डॉ. अभय नेने, कन्सल्टेंट (स्पाइन सजर्न), हिन्दुजा अस्पताल, मुंबई 

रोजाना 40 मिनट टहलें 
रोजाना 40 मिनट टहलने की आदत को इस वर्ष का संकल्प बना सकें तो यह आपकी अपने ऊपर सबसे बड़ी कृपा होगी। योग भी पीठ दर्द में बेहद कारगर साबित होता है। तीन-चार महीने तक नियमित रूप से ऐसा करें और उसके बाद जरूरत समझों तो और अधिक व्यायाम को अपनी दिनचर्या में शामिल कर सकते हैं। हां, अपने कमर दर्द का ज्यादा टेंशन न लें। एक अच्छी खबर यह है कि कमर और पीठ दर्द से परेशान 5 से 10 प्रतिशत लोगों को ही ऑपरेशन कराने की जरूरत पड़ती है अन्यथा सही पॉस्चर, सही जीवनशैली के साथ नियमित शारीरिक व्यायाम से इस दर्द से मुक्त रहा जा सकता है- डॉ. मिहिर बापट,कन्सल्टेंट (स्पाइन सजर्न), कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल एंड मेडिकल रिसर्च इंस्टीटय़ूट, मुंबई 

‘आह’ नहीं ‘वाह’ कहेगी कमर 
खानपान का रखें ख्याल 
गर्भवती महिलाओं में कमर दर्द की समस्या तो आम है, जो उनके वजन में वृद्धि के कारण होती है। वजह बढ़ने से रीढ़ पर जोर पड़ता है, जिससे कमर दर्द की समस्या पैदा होती है। लेकिन अन्य लोगों में डाइट की गड़बड़ी एक बड़ा कारण बनती है। डाइट में कैल्शियम और विटामिन डी की कमी हड्डियों की कमजोरी का कारण बनती है और आखिरकार कमर और पीठ दर्द का भी कारण बनती है। इस कमी को दूर करने में दूध उत्पाद के अलावा अंडे भी खास भूमिका निभाते हैं। रोजाना एक मुट्ठी सूखे मेवे, जिनमें 10 बादाम, 5 किसमिस, अखरोट आदि शामिल हों, लेना काफी फायदेमंद साबित होता है। 

ना बरतें लापरवाही 
कमर दर्द कई बार झटका लगने से, मोच से, वजन उठाने से भी हो सकता है। लंबा व्यक्ति झटके से झुके तो भी कमर दर्द की समस्या हो सकती है। मोटे व्यक्ति को वजन उठाने से कमर दर्द की शिकायत हो सकती है। लड़कियों में हाई हील सैंडल से भी यह समस्या पैदा हो सकती है। किसी भी कारण से डिस्क स्पेस कम होने से भी आप इस समस्या की चपेट में आ सकते हैं। चाहे आप किसी भी कारण इसकी चपेट में आएं। अगर कमर दर्द कुछ घंटे लगातार बना हुआ है तो घरेलू उपचार में समय गंवाने के बजाए तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। अगर लापरवाही बरतेंगे और स्थिति गंभीर होने के बाद डॉक्टर से मिलेंगे तो ऑपरेशन की स्थिति भी आ सकती है। डॉ. ज्योति बाला, वरिष्ठ फिजियोथेरेपिस्ट, सर गंगाराम अस्पताल 

दिल्ली में कमर दर्द की शिकायत करने वाले 
-60 प्रतिशत से अधिक लोग कमर दर्द से परेशान हैं 
-40 प्रतिशत लोग घुटने और गर्दन के दर्द से परेशान 
-50 प्रतिशत युवा करते हैं इसकी शिकायत(हिंदुस्तान,दिल्ली,18.1.12)

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