संक्षिप्त समाचार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
संक्षिप्त समाचार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

ताकि डाक्टर लिखें केवल ज़रूरी दवा

डॉक्टरों को अब बकायदा क्लास रूम में यह पाठ पढ़ाया जाएगा कि वे बेवजह की दवाएं नहीं लिखें। मरीजों को उतनी ही दवा लेने की सलाह दी जाए जितनी वाकई जरूरी है। इसी प्रकार स्वास्थ्य जांच के मामले में भी डॉक्टरों को विवेक से काम लेने की ताकीद की जाएगी। एम्स सहित दुनिया भर में चल रहे फिजूल की दवाओं के उपयोग तथा बिना वजह डॉक्टरों द्वारा जांच लिखे जाने पर किए गए शोध के बाद भारत में इसे मेडिकल शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल करने की दिशा में पहल शुरू हो गई है। 

रविवार को भारत सरकार के स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक डॉ. जगदीश प्रसाद ने कुछ ऐसे ही संकेत दिए हैं। उन्होंने सम्मेलन के दौरान कहा कि हम मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया से एविडेंस बेस्ट मेडिसीन(साक्ष्य आधारित स्वास्थ्य सुविधा) को मेडिकल कोर्स में शामिल करने की सिफारिश करेंगे। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एम्स द्वारा देश में पहली बार एविडेंस बेस्ट मेडिसीन (ईबीएम) पर चल रहे सेमिनार में डॉक्टर जगदीश प्रसाद ने कहा कि यह आज की जरूरत बन गई है। जिस प्रकार स्वास्थ्य सेवाओं में इसका बुरा असर हो रहा है वह मरीजों के हित में नहीं है। डॉक्टरों को इसे पाठ्यक्रम के जरिए सीखाकर और मरीजों को जागरूक कर ही रोका जा सकता है। एम्स के निदेशक डॉक्टर आर सी डेका ने कहा एम्स इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हर संभव मदद करेगा। आयोजन समिति के चेयरमैन तथा एम्स के न्यूरोलॉजी विभाग के डॉक्टर कामेश्वर प्रसाद ने कहा कि पाठ्यक्रम छात्रों को इस बात को बताने में सहयोग करेगा कि हमें सिर्फ उन्हीं दवाओं तथा जांच को मरीजों को लिखें, जिसका हमारे पास वैज्ञानिक साक्ष्य है। 

अमेरिका में हृदय दर को नियंत्रित करने के लिए दी जानेवाली दवा इनकैनाइड और फ्लेसियानाइड के दुष्प्रभाव पर अध्ययन के बाद प्रतिबंधित कर दिया गया है। अगर डॉक्टर जानकारी के अभाव में मरीजों को यह दवा लिखता है तो डॉक्टर ही जिम्मेदार है। यह सेमिनार इसलिए शुरू किया गया है ताकि डॉक्टरों को समय-समय पर जारी इलाज के नए गाइडलाइंस पर ध्यान रखने के लिए प्रेरित करे और मरीजों के इलाज में उसकी का उपयोग करे। एम्स के मनोचिकित्सक डा. राजीव सागर ने कहा कि आज बड़ीह संख्या में डॉक्टर जो मन में आता है वही दवा लिख देते हैं और मरीजों को नुकसान हो रहा है। ऐसे कोर्स आए, डॉक्टरों को कारगर दवा का अध्ययन करे और वैज्ञानिक तरीके से साबित दवा ही लिखें(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,दिल्ली,8.10.12)।

आगे चलें...

सोमवार, 19 सितंबर 2011

कैल्शियम की कमी दूर करेगा बाजरे का डोसा

शरीर में कैल्शियम की कमी को पूरा करने के लिए अगर मांसाहार नहीं खाना चाहते न ही दूध पीना चाहते! कोई बात नहीं। वैज्ञानिकों ने इसका विकल्प खोज लिया है। ऐसे लोगों को बाजरे के आटे से बना हुआ डोसा, सोयाबीन की चटनी, तिल के लड्डू और रसगुल्ले खाने चाहिए। ये शरीर में कैल्शियम की कमी को पूरा कर देते हैं। पुणे विश्वविद्यालय और हीराबाई कोवासजी जहांगीर मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट ने एक संयुक्त शोध में पाया कि शरीर के लिए जरूरी कैल्शियम मात्रा के मुकाबले पुरुष 63 और महिलाएं 53 प्रतिशत ही उसका सेवन करते हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा विकसित रेकमंडेड डायटेरी अलाउंस (आरडीए) के अनुसार, 7 से 9 साल के बच्चों को रोजाना 600 मिग्रा और10 से 19 साल के व्यक्तियों को 800 मिलीग्राम कैल्शियम की जरूरत होती है। देश में 7 से 19 साल के 236 व्यक्तियों पर किए गए नए सर्वे के मुताबिक, 90 प्रतिशत लोगों में कैल्शियम की मात्रा कम पाई गई। इनमें 45 प्रतिशत कम मात्रा में दूध लेते थे जबकि 36 प्रतिशत दूध पीना बिल्कुल पसंद नहीं करते थे। इस शोध के बाद वैज्ञानिकों ने बिना दूध के 14 ऐसे खाद्य पदार्थो की सूची तैयार की हैं जिनमें कैल्शियम की उचित मात्रा है। करेंट साइंस में प्रकाशित शोध के अनुसार, इन उत्पादों में बाजरे के आटे का डोसा, तिल के लड्डू, तिल और सोयाबीन की चटनी, पोस्तादाना का दलिया और तिल की चिक्की शामिल हैं। 

भारतीय खाते हैं ज्यादा तेल, वसा और नमक 
एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय अपने दैनिक भोजन में तेल, वसा और नमक की ज्यादा मात्रा का सेवन कर रहे हैं। इसके चलते उनमें दिल की बीमारी, उच्च रक्तचाप और मधुमेह की आशंका बढ़ रही है। पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इन बीमारियों के खिलाफ कवच का काम करने वाले फल और सब्जियों जैसे रेशे वाले खाद्य पदार्थो का सेवन भारत में बहुत कम है। भोजन में एक दिन में ऐसे पदार्थो की मात्रा लगभग 400 ग्राम होनी चाहिए(दैनिक जागरण,दिल्ली,19.9.11)।

आगे चलें...

बुधवार, 22 जून 2011

दिल्लीःफलों को पकाने वाले कैल्शियम कार्बाइड पर प्रतिबंध

दिल्ली सरकार ने फलों को कृत्रिम ढंग से पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड के इस्तेमाल के कारण स्वास्थ्य पर होने वाले प्रतिकूल प्रभावों को ध्यान में रखकर इसके उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। सरकार ने इसकी जगह वैकल्पिक तकनीक के रूप में एथेलीन गैस अपनाने का सुझाव दिया है।
दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री ए के वालिया ने कहा कि फलों को कृत्रिम ढंग से पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड के इस्तेमाल को (खाद्य मिलावट रोधी) पीएफए (प्रीवेंशन आफ फूड एडल्ट्रेशन कानून) के तहत दिल्ली में प्रतिबंधित किया गया है।
वालिया ने प्रदेश के अधिकारियों, आईसीएआर के वैज्ञानिकों और आम व्यापारियों के साथ बैठक की अध्यक्षता की थी जिसमें फलों को पकाने का वैकल्पिक तरीके पर बात की गई थी।
विशेषज्ञों द्वारा दी गई सूचना के आधार पर मंत्री ने कहा कि एथेलीन गैस को फलों को पकाने के लिए वैकल्पिक तकनीक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है तथा कैल्शियम कार्बाइड के इस्तेमाल से पकाये गये फलों के मुकाबले एथेलीन से पकाये गये फल अधिक समय तक ठीक रहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि फलों के पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड के इस्तेमाल से कैंसर का भी खतरा संभव है।
मंत्री ने कहा कि सरकार फल व्यापारियों के बीच एथेलीन को वैकल्पिक माध्यम के रूप में अपनाने के लिए जल्द ही एक जागरुकता अभियान शुरू करेगी।
राष्ट्रीय राजधानी में प्रति दिन आम के 200 ट्रक आते हैं जिसमें प्रत्येक ट्रक में 10 टन आम होते हैं। ये आम यूपी, बिहार, हिमाचल प्रदेश और दक्षिण भारत से यहां आते हैं(हिंदुस्तान,दिल्ली,22.6.11)।

आगे चलें...

गुरुवार, 26 मई 2011

निजी अस्पतालों को टांगनी होगी रेट लिस्ट,टीकाकरण होगा सख्त,तम्बाकू चेतावनी अधिसूचना शीघ्र

निजी अस्पताल इलाज के नाम पर मनमाना खर्च नहीं वसूल सकेंगे। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नवी आजाद ने कहा है कि निजी अस्पताल आपरेशन का खर्च सरकार अस्पतालों की तुलना में 10 गुना तक वसूल रहे हैं और सरकार इसे हरगिज बर्दाश्त नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि निजी अस्पतालों को इलाज की दर जाहिर करने के लिए बाध्य किया जाएगा और उन्हें इलाज की दर संबंधी लिस्ट अस्पताल में लगाकर भी रखनी होगी। आजाद ने बताया कि एक साल के भीतर सभी छोटे-बड़े अस्पतालों और डाक्टरों का रजिस्ट्रेशन भी सुनिश्चित बनाया जाएगा। स्वास्थ्य मंत्री ने यह भी कहा कि टीकाकरण को ठीक से करने के लिए अब स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से उन घरों का टेलीफोन नम्बर भी लेकर आने को कहा जाएगा जहां टीकाकरण किया गया है। उन्होंने कहा कि इन टेलीफोन नम्बरों पर स्वास्थ्य मंत्रालय के स्थापित किए जानेवाले कॉल सेंटर द्वारा फोन करके वास्तविक स्थिति का पता लगाया जाएगा। आजाद ने कहा कि टीकाकरण की राज्यों से सही जानकारी नहीं मिलने की वजह से सरकार यह कदम उठाने जा रही है। परिवार नियोजन के लिए सख्ती नहीं बरतने का वादा करते हुए कहा कि परिवार नियोजित करने के गर्भ निरोधकों के जरिए ही आबादी पर काबू पाया जाएगा। उन्होंने कहा कि महिलाओं और पुरुषों को गर्भ निरोधक बांटने के लिए आशा कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहन राशि भी दी जाएगी।
स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नवी आजाद ने तंबाकू को भारतीयों की सेहत के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हुए इस मामले में सख्ती बरतने के संकेत दिए। उन्होंने कहा कि सरकार जल्द ही तंबाकू उत्पादों के लिए नई चित्रमय चेतावनियों के संबंध में अधिसूचना जारी करेगी और चबाने वाले तंबाकू के संदर्भ में ये चेतावनी अधिक सख्त होंगी क्योंकि इसे धूम्रपान की तुलना में अधिक हानिकारक पाया गया है। आजाद ने कहा कि चित्रमय चेतावनियां अधिसूचना की प्रक्रिया में हैं और किसी भी दिन अधिसूचना जारी की जा सकती है। दृश्य प्रसार निदेशालय (डीएवीपी) ने कुछ चित्रों का चयन किया है। दो तरह की चेतावनी होंगी। एक सिगरेट पीने वालों के लिए और दूसरी धूम्ररहित या चबाने वाले तंबाकू के लिए होगी। उन्होंने बताया कि ‘ग्लोबल एडल्ट टोबेको सव्रे इंडिया’ में पता चला कि 35 प्रतिशत वयस्क लोग किसी न किसी प्रकार से तंबाकू का उपयोग करते हैं। इनमें से 26 प्रतिशत बालिग लोग चबाने वाले तंबाकू उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं और 9 प्रतिशत धूम्रपान करते हैं। मुख कैंसर के 80 प्रतिशत मामलों के लिए धूम्ररहित तंबाकू जिम्मेदार है वहीं 20 प्रतिशत मुख कैंसर के मामले धूम्रपान के कारण हो रहे हैं। चबाने वाले तंबाकू उत्पाद जैसे गुटखा का इस्तेमाल व्यापक तौर पर किया जाता है और इनसे मुख कैंसर की अधिक आशंका रहती है। इन परिणामों के आधार पर सरकार एक नई नीति ला रही है। आजाद ने कहा कि इसके तहत गुटखा आदि के लिए अधिक कड़ी चित्रमय चेतावनियां जारी की जाएंगी(राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,26.5.11)।

आगे चलें...

गर्भवती महिलाओं को मुफ्त दवा और भोजन

केंद्र सरकार अगले महीने की एक तारीख से सरकारी अस्पतालों में गर्भवती महिलाओं को मुफ्त दवा और भोजन देने की योजना शुरू कर रही है। गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों की मृत्यु दर को कम करने की दिशा में उठाए जा रहे इस कदम के तहत राज्यों से कहा गया है कि वे इसका अनुपालन सुनिश्चित करें। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने बुधवार को अपने दो साल के कार्यकाल की उपलब्धियों का ब्योरा देते हुए कहा कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के तहत सभी राज्यों को कहा गया है कि गर्भवती महिलाओं को अस्पताल में रहने के दौरान मुफ्त दवा और भोजन की व्यवस्था सुनिश्चित करवाई जाए। इसके अलावा उन्हें सभी तरह की जांच और अस्पताल जाने-आने के लिए साधन भी उपलब्ध करवाए जाने चाहिए। आजाद ने इस अवसर पर अफसोस जताते हुए कहा कि डॉक्टर अब भी गांवों की ओर रुख करने को तैयार नहीं हो रहे। उन्होंने कहा, मुझे दुख है कि उनमें से कोई ग्रामीण क्षेत्र में जाने को तैयार नहीं है। आजाद ने 2009 में मंत्री बनने के तुरंत बाद ग्रामीण क्षेत्र में तैनाती को अनिवार्य करने वाले नियम को बदल दिया था। पूर्व मंत्री अंबुमणि रामदास के बनाए इस नियम को लागू होने से ठीक पहले बदल कर उन्होंने ग्रामीण तैनाती के बदले पीजी दाखिले में प्राथमिकता देने की योजना तैयार की। इसके मुताबिक प्रत्येक साल की गांव में की गई प्रैक्टिस के बदले दाखिले में दस फीसदी नंबर ज्यादा दिए जाएंगे। इस तरह अधिकतम 30 फीसदी तक की प्राथमिकता का फायदा लिया जा सकता है। मेडिकल में पीजी की सीटों की कमी की वजह से एमबीबीएस डॉक्टरों को इसमें दाखिले में कड़ी प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता है। इसी तरह आजाद ने कुछ समय पहले नकली दवा पकड़वाने के लिए बड़े जोर-शोर से इनामी योजना का एलान किया था। मगर इस योजना ने भी पूरी तरह दम तोड़ दिया। आजाद के मुताबिक छह अलग-अलग राज्यों में बन रहे नए एम्स अगले साल अक्तूबर तक शुरू हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि पटना, भुवनेश्वर, जोधपुर, भोपाल, रायपुर और ऋषिकेश में इनका काम बहुत तेजी से चल रहा है(दैनिक जागरण,दिल्ली,26.5.11)।

आगे चलें...

शनिवार, 21 मई 2011

पलवल में डॉक्टर की पर्ची के बिना अबॉर्शन की दवा नहीं

पलवल जिले में मेडिकल स्टोर पर अबॉर्शन की दवा लेना लोगों के लिए आसान नहीं होगा। उन्हें यह दवा तभी दी जाएगी , जब उनके पास डॉक्टरों की स्लिप होगी। डॉक्टरों के पे्रसक्रिप्शन के बिना अबॉर्शन की कोई दवा नहीं दी जाएगी। अगर कोई मेडिकल स्टोर का मालिक बिना डॉक्टर की पर्ची के दवा देता पाया गया तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। सीएमओ डॉ . आदित्य चौधरी ने जिला केमिस्ट एसोसिएशन की बैठक को संबोधित करते हुए ये आदेश किए।

बैठक डीसी आर . सी . वर्मा के निर्देशानुसार बुलाई गई थी। बैठक में विशेष रूप से ड्रग कंट्रोलर अधिकारी कृष्ण कुमार भी उपस्थित थे। मीटिंग में बताया गया कि डीसी के संज्ञान में आया है कि पलवल जिले में कुछ मेडिकल स्टोरों पर बिना डॉक्टर की पर्ची और ऑन द काउंटर गर्भपात में उपयोग होने वाली दवाइयां बेची जा रही हैं , जो गैरकानूनी है। जो भी केमिस्ट इस तरह की दवाइयों को बेचता है उसे इनकी खरीद व बिक्री का रिकार्ड अपने पास रखना चाहिए। केमिस्ट को डॉक्टरों की पर्ची भी फोटो कॉपी करा कर रिकार्ड में अपने पास रखनी चाहिए। अगर कोई केमिस्ट इन आदेशों की अवहेलना करेगा तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
केमिस्ट एसोसिएशन के प्रधान विनोद जिंदल ने उन्हें आश्वस्त किया कि वे सभी केमिस्ट्स को इसके बारे में आवश्यक जानकारी देंगे और अगर कोई मेडिकल स्टोर का मालिक आदेश का उल्लंघन करती हैं करता है तो असोसिएशन उसका साथ नहीं देगी(नवभारत टाइम्स,पलवल,19.5.11)।

आगे चलें...

शनिवार, 14 मई 2011

देश का पहला पॉयजनिंग केयर सेंटर चंडीगढ़ में

जहर खाकर खुदुकशी करने के बढ़ते मामलों को देखते हुए प्रशासन ने चंडीगढ़ के गवर्नमेंट मल्टी स्पेशियलिटी हास्पिटल सेक्टर १६ में पॉयजनिंग केयर सेंटर खोलने का प्रस्ताव तैयार किया है।
प्रशासन के प्रस्ताव में दावा किया गया है कि भारत में यह अपनी तरह का पहला सेंटर होगा, जहां पर जहर खाने वाले मरीजों के बेहतर इलाज की व्यवस्था होगी। उनके इलाज के लिए विशेषज्ञ डाक्टरों को सेंटर में नियुक्त किया जाएगा। सन २०११-२०१२ के लिए स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं में इसे शामिल किया गया है। प्रस्ताव में कहा गया है कि शहर व आसपास के इलाके में लगातार जनसंख्या बढ़ रही है। शहर की जीवन शैली के कारण लोगों खासकर युवाओं में खुदकुशी करने की प्रवृत्ति बढ़ने के मामले देखे जा रहे हैं। कीटनाशक पदार्थों के आसानी से उपलब्ध होने के कारण लोग इनका उपयोग खुदकुशी करने के लिए करते हैं। पारिवारिक समस्याएं, नौकरी, शिक्षा व व्यक्तिगत रिश्तों को लेकर वे कई बार वे इतने तनाव में हो जाते हैं कि आत्महत्या करने के लिए जहर खा लेते हैं। ऐसे मरीजों के लिए यह सेंटर खोला जाएगा। प्रशासन ने इस साल के बजट में इस सेंटर को शुरू करने के लिए २० लाख रुपये का प्रस्ताव किया है। प्रस्ताव में कहा गया है कि सेंटर में चार मेडिकल स्पेशलिस्ट, एक मेडिकल ट्रांसक्रिप्शिनस्ट, ६ स्टाफ नर्स, दो डॉटा एंट्री आपरेटर, तीन फार्मेसिस्ट, चार रेजिडेंट डाक्टर और चार क्लास फोर के कर्मचारियों को नियुक्त किया जाएगा। सेंटर के जरूरी उपकरणों की भी खरीदने की योजना है। इन उपकरणों में एसपीओटू, मानीटर्स, आईएबीपी, पोर्टेबल वेंटीलेटर्स, पल्स आक्सीमीटर्स आदि शामिल हैं(अमर उजाला,चंडीगढ़,14.5.11)।

आगे चलें...

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

दिल्लीःमहंगा हुआ आरएमएल में इलाज, एम्स में भी तैयारी

अब राजधानी में सस्ता इलाज धीरे-धीरे लोगों की पहुंच से दूर होता जा रहा है। कहीं यूजर चार्ज के बहाने तो कहीं पैकेज चार्ज के नाम पर इलाज को महंगा किया जा रहा है। राम मनोहर लोहिया अस्पताल में सेरम इंसुलिन (मधुमेह), डीएचईए (इनफर्टिलिटी), पीटीएच (थॉयराइड) और वीआईटीडी-3 (शरीर में विटामिन डी की मात्रा) की जांच की कीमतों में वृद्धि कर दी गई है।

इसी तरह, एम्स में भी निर्जी वार्ड में पैकेज चार्ज लागू करने के लिए प्रशासन कई बार बैठक बुलाकर मंत्रणा कर चुका है और वरिष्ठ डॉक्टरों के विरोध के बावजूद इसे लागू करने की तैयारी की जा रही है। गौरतलब है कि पूरी दिल्ली में गरीबों के पास उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करने के लिए इन दोनों अस्पतालों के अलावा कोई खास विकल्प भी नहीं है।

चिंता कि बात यह है कि दोनों अस्पताल केंद्र सरकार के अधीन हैं, इसके बावजूद मरीजों को राहत देने की जगह उनको इलाज से भी वंचित किया जा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक आला अधिकारी का तो साफ कहना है कि स्वास्थ्य क्षेत्र का व्यवसायीकरण करना स्वास्थ्य मंत्रालय के एजेंडे में शामिल है।

आरएमएल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. टीएस सिद्धू कहते हैं कि बीते 25 वर्षो में किसी भी जांच या स्वास्थ्य सुविधा की कीमत में वृद्धि नहीं की गई है। ऐसे में कुछ स्वास्थ्य सुविधाओं के दरों में बढ़ोतरी गलत नहीं कही जा सकती है। वह आगे कहते हैं कि जिन जांचों की कीमतों में वृद्धि की गई है, वे केवल निजी वार्डो में ही लागू है। इसके साथ ही वह यह दावा करने से भी नहीं चूकते हैं कि दरों में वृद्धि के बावजूद आरएमएल में अभी भी एम्स से सस्ता इलाज उपलब्ध है। बताते चलें कि दरों में वृद्धि के लिए आरएमएल प्रशासन द्वारा जारी सर्कुलर की कॉपी दैनिक भास्कर के पास उपलब्ध है। दूसरी ओर, निजी अस्पतालों की तर्ज पर एम्स में भी इलाज का पैकेज सिस्टम लागू करने की योजना है।

इसके तहत मरीजों को अस्पताल, इलाज, बिस्तर, जांच समेत तमाम सेवाओं का शुल्क एक साथ जमा करना होगा। पैकेज प्रणाली में तमाम ऐसी जांच या इलाज प्रक्रिया शामिल होगी, जिनकी अमूमन सभी मरीजों को जरूरत ही नहीं पड़ती है। इसके बावजूद सभी मरीजों को पैकेज चार्ज के नाम पूरा पैसा इलाज से पहले ही जमा करना होगा।

गौर करने वाली बात यह है कि कमरों व बिस्तरों के शुल्क के तौर पर संस्थान को सालाना 37 करोड़ रुपए की आमदनी होती है। इसके अलावा, जांच सेवाओं के शुल्क के तौर पर 10 करोड़ रुपए की आय होती है। जबकि हकीकत यह है कि अस्पताल को चलाने के लिए महज 25 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। दूसरी ओर केंद्र सरकार से इस वर्ष के बजट में एक हजार करोड़ रुपए से अधिक की राशि प्राप्त हुई है(धनंजय कुमार,दैनिक भास्कर,दिल्ली,25.4.11)।

आगे चलें...

शनिवार, 19 मार्च 2011

महंगी हुई दवाएं

दवा कीमत तय करने वाले प्राधिकरण एनपीपीए ने 62 दवाओं के दाम बढ़ा दिए हैं जबकि 14 औषधियों की कीमतें घटाई गई हैं। जो दवाएं महंगी हुई हैं उनमें से ज्यादातर का उपयोग मधुमेह और टीबी जैसी बीमारियों के इलाज में होता है। हालांकि राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) की पिछले सप्ताह हुई बैठक में 21 दवाओं की कीमतों को पूर्वस्तर पर बनाए रखा गया है। एनपीपीए ने मधुमेह, एलर्जी, मलेरिया, डायरिया, अस्थमा और उच्च तनाव के साथ एंटीसेप्टिक दवाओं की कीमतों की समीक्षा की। प्राधिकरण ने पहली बार 19 दवाओं के दाम पर विचार किया। एनपीपीए के चेयरमैन एसएम झारवाल ने कहा, ‘हमें संतुलित कदम उठाने हैं और स्वदेशी कंपनियों को समान अवसर उपलब्ध कराना है। इंसुलिन के कुल घरेलू बाजार में देसी कंपनियों का योगदान 10 फीसद है। उन्होंने कहा कि इंसुलिन आधारित दवाओं की कीमत बढ़ाए जाने के बावजूद यह किफायती बनी रहेंगी। देश में इनका निर्माण कंपनियां बायोकॉन और वोकहार्ड करती हैं। झारवाल ने कहा कि हालांकि घरेलू कंपनियों द्वारा निर्मित इंसुलिन की कीमत में पांच से 18 फीसद की वृद्धि की गई है। इसके बावजूद यह आयातित इंसुलिन के मुकाबले करीब 15 फीसद सस्ती होंगी। एनपीपीए ने कहा कि कच्चे माल के दाम में वृद्धि के साथ पैकेजिंग शुल्क समेत अन्य मदों में लागत संबंधी नियमों की समीक्षा के बाद कीमतें बढ़ाना जरूरी था। लागत संबंधी नियमों के बारे अधिसूचना 16 दिसम्बर, 2010 को जारी की गई थी। प्राधिकरण के मुताबिक कीमतों में संशोधन से प्रभावित होने वाली कंपनियों में इली लिली, फाइजर, नोवार्तिस, सनोफी एवेन्टिस, जीएसके, बायोकॉन, वोकहार्ड, ल्यूपिन और सिप्ला शामिल हैं। एनपीपीए ने थोक दवाओं की कीमतों की समीक्षा भी की है। इससे डाइरेटिक सपिरोनोलैक्टोन तथा सालबुटामोन सल्फेट क्रमश: 2.5 प्रतिशत तथा 18.87 प्रतिशत सस्ती हो जाएंगी। अस्थमा और उच्च तनाव में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाओं की कीमतें घटायी गयी हैं। एनपीपीए का गठन 29 अगस्त, 1997 में किया गया था। यह विशेषज्ञों का स्वतंत्र निकाय है जो दवा कीमतों की समीक्षा और उनकी उपलब्धता सुनिश्चित करता है।(राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,18.3.11)।

आगे चलें...

मंगलवार, 8 मार्च 2011

महिलाओं के पोषण स्तर का पता लगाने के लिए दिल्ली में होगा सर्वे

महिलाओं व बच्चों में कुपोषण से निपटने के लिए जागरूकता लाने के लिए दिल्ली सरकार सर्वेक्षण कराएगी, जिसमें महिलाओं के पोषण स्तर का पता लगाया जाएगा। दिल्ली की बाल एवं महिला कल्याण मंत्री किरण वालिया ने सोमवार को कहा कि हमारे यहां परंपरा रही है कि महिलाएं अपने बारे में सबसे बाद में सोचती हैं।

इसलिए उन्हें जागरूक करने की जरूरत है कि उन्हें अपना भी ख्याल रखना चाहिए। अनेक सर्वेक्षण व अध्ययन हुए हैं, लेकिन हमारे पास विश्वस्त आंकड़े नहीं हैं और विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानदंडों के अनुरूप ताजा सूचनाओं की जरूरत है। इस लिहाज से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर मंगलवार को एक अभियान की भी शुरुआत की जाएगी।

भारत सरकार के विज्ञान व तकनीकी विभाग के तहत आने वाले विज्ञान प्रसार ने गैर-सरकारी संगठन सुदिनालय व अन्य सरकारी विभागों के साथ समृद्धि व सामाजिक बदलाव के लिए महिलाओं के स्वास्थ्य व सशक्तिकरण कार्यक्रम शुरू करने का एलान किया।

मंगलवार से ये अभियान एक हफ्ते तक चलेगा। दो बार एवरेस्ट पर कदम रख चुकीं महिला पर्वतारोही संतोष यादव को इस अभियान का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया है। वालिया व यादव ने इस अभियान के सिलसिले में नारा.. भारत से इंडिया जुड़ेगा जब, महिला सशक्त होगी तब.. का विमोचन भी किया।

विज्ञान प्रसार के निदेशक अनुज सिन्हा ने कहा कि अभियान का उद्देश्य शहरी व ग्रामीण भारत के बीच अंतर को पाटने का होगा। आयोजकों का कहना है कि वे महिलाओं और खासतौर पर गर्भवती महिलाओं के लिए पोषाहार की जरूरत के बारे में पुस्तिकाओं, पोस्टरों, नुक्कड़ नाटक, फिल्मों आदि गतिविधियों के माध्यम से जानकारी का प्रसार करेंगे(दैनिक भास्कर,दिल्ली,8.3.11)।

आगे चलें...

मंगलवार, 1 मार्च 2011

पीएसआईपीएल की दवा बिक्री पर प्रतिबंध

जोधपुर के उम्मेद अस्पताल में ग्लूकोज चढ़ाए जाने के बाद प्रसूताओं की मौत के मामले को गंभीरता से लेते हुए औषधि नियंत्रण संगठन ने एहतियातन संबंधित कंपनी पीएसआईपीएल की सभी दवाइयों पर राज्य में बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है। ड्रग कंट्रोलर डीके श्रृंगी के निर्देश मिलने के तत्काल बाद ही सीकर में जयपुर से मिली जानकारी के मुताबिक दो जगह से कंपनी की अन्य दवा मिली, जिन्हें फ्रीज कर दिया गया।

ड्रग कंट्रोलर ने स्वास्थ्य महकमे के आला अधिकारियों के साथ सभी जिला अधिकारियों को भी पत्र जारी कर सतर्कता बरतने को कहा है। सीकर शहर में भगवान मेडिकल स्टोर एवं शर्मा डिस्ट्रीब्यूटर से इंदौर की पेरेंटल सर्जिकल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की दवा मिली। कंपनी की सभी दवाइयों पर प्रतिबंध लगाया गया है। क्योंकि इसी के ग्लूकोज चढ़ाए जाने के बाद जोधपुर में प्रसूताओं की मौत हुई है।

अधिकारियों के अनुसार, कंपनी के जिस संदिग्ध बैच की दवा के सेंपल लिए गए हैं, उनकी अभी जांच चल रही है। ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कंपनी की दूसरी दवाइयां भी घातक साबित हो सकती है। इसलिए अन्य कहीं कोई ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो, इसलिए प्राथमिकता के आधार पर कंपनी की सभी दवाइयों की बिक्री रोकी गई है।


उधर, ड्रग इंस्पेक्टर सुनील मित्तल का कहना है कि इस मामले में जयपुर से जांच की जा रही है कि कंपनी की दवा कहां कहां सप्लाई हुई,उसी के आधार पर कार्रवाई की जा रही है। कार्यवाहक सीएमएचओ डा. बीएल सैनी का कहना है कि पत्र मिलते ही सभी बीसीएमएचओ को निर्देश जारी कर दिए जाएंगे कि डाक्टर्स इस कंपनी की दवा का इस्तेमाल न करें। वैसे एहतियात बरतने को पहले ही कहा जा चुका है।

पीसीआईपीएल की सभी प्रकार की दवाओं पर प्रतिबंध लगाया गया है। क्योंकि उनमें भी बैक्टिरिया हो सकता है। इसलिए प्राथमिक तौर पर जो सेंपल लिए हैं, उनकी रिपोर्ट आने तक तक दवा की बिक्री नहीं होगी।
डीके श्रृंगी, ड्रग कंट्रोलर(दैनिक भास्कर,सीकर,1.3.11)

आगे चलें...

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

जीवन-शैली से जुड़ी बीमारियों से बचाव की पहल

जीवन शैली का बदलाव आम लोगों के लिए परेशानियों का सबब तो बना ही अब सरकार के लिए भी चिंता का विषय बन गया है। धीमा जहर के नाम से मशहूर मधुमेह रोग की रोकथाम अब पूरे देश में चलेगा। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की इस महत्वाकांक्षी योजना में 30 साल की उम्र पार कर चुके सभी युवाओं के स्वास्थ्य जांच सुनिश्चित होगी। इस योजना पर खर्च होने वाली राशि में 80 फीसदी हिस्सेदारी केंद्र सरकार देगी। जबकि राज्य सरकार मात्र 20 फीसदी खर्च करेगी। अनुमान लगाया जा रहा है कि इस योजना पर लगभग पच्चीस हजार रुपये खर्च होगी। इसके लिए 12वीं पंचवर्षीय योजना में विशेष व्यवस्था की जाएगी।
केंद्र सरकार ने पिछले साल देश के 15 राज्यों के 100 जिले में जीवन शैली से जुड़े रोगों की जांच शुरू की। बीमारियों की जांच पर लगभग 499.38 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। योजना की सफलता से उत्साहित केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय अब इसे पूरे देश में शुरू करने की योजना बना रहा है। देश के कुल 625 जिले में योजना शुरू करने के लिए लगभग पच्चीस हजार करोड़ रुपये की जरूरत होगी। इसके लिए केंद्र सरकार आम बजट में विशेष व्यवस्था करने जा रही है। मंत्रालय के अधिकारियों की माने तो 30 साल की उम्र पार कर चुके युवा और 35 साल की उम्र पार कर चुकी महिलाओं के स्वास्थ्य की जांच सुनिश्चित हो सकेगी।
मंत्रालय का दावा है कि यह कार्यक्रम देश का सबसे बड़ा राष्ट्रीय कार्यक्रम होगा। क्योंकि मधुमेह, हृदय रोग, कैंसर और स्ट्रोक से 42 फीसदी लोग मरते हैं। 35 से 64 वर्ष की आयु के लोगों की मौत से आर्थिक पहलू प्रभावित होता है। योजना के तहत स्वास्थ्य उपकेंद्रों पर युवाओं और महिलाओं का पारिवारिक इतिहास पूछा जाएगा। साथ ही ग्लूकोमीटर व ईसीजी मशीन से मधुमेह व दिल की जांच की जाएगी। जिन लोगों के पारिवारिक इतिहास में इन बीमारियों का पता चलेगा उन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र व जिला अस्पताल भेजकर ईको करवाई जाएगी। ऐसे लोगों को खानपान पर नियंत्रण व व्यायाम की सलाह डॉक्टर देंगे। ताकि बीमारी की चपेट में आने से रोका जा सके(अमर उजाला,दिल्ली,8.2.11)।

आगे चलें...

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

आयुर्वेदिक दवाओं के दाम 70 फीसदी बढ़े

आसमान छूती सोने-चांदी की कीमतों के कारण पिछले छह माह के दौरान आयुर्वेदिक दवाओं के दाम 60 से 80 फीसदी बढ़ गए हैं। खास ही नहीं अमूमन उपयोग आने वाली दवाओं की भी कीमत बढ़ने से मरीज भी हलाकान हैं। कुछ मरीज महंगी आयुर्वेदिक दवा से कन्नी भी काट कर एलोपैथिक दवा लेने लगे हैं।

आयुर्वेदिक दवाओं की कीमत आसमान छूने लगी हैं। छह माह पहले की कीमत में 60 से 80 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। मधुमेह, लकवा, बीपी, अस्थमा, चर्म रोग व अन्य बीमारियों में कारगार दवाएं महंगी हो गई हैं।

सोने व चांदी की प्रति तोला मात्रा की कीमत में आई उछाल के कारण दवाओं के दाम बढ़ गए हैं। इन दिनों सोना प्रति 10 ग्राम 20, 550 रुपए व चांदी प्रति किलोग्राम 44,500 रुपए है। आयुर्वेदिक दवाओं में स्वर्ण व रजत भस्म का उपयोग किया जाता है। सभी कंपनियों ने दवाओं की कीमत बढ़ाई है।

दोनों धातुओं की कीमत में उछाल आने के कारण दवा कंपनियों ने दवाओं की कीमत भी बढ़ा दी। दवा में उपयोग होने वाले कच्च माल के कारण भी कीमत बढ़ने का दूसरा कारण है।

"आयुर्वेदिक दवाओं में स्वर्ण व रजत भस्म की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये जीवाणुनाशक के साथ स्वास्थ्यवर्धक भी होते हैं। सोने-चांदी की कीमतों में उछाल के कारण आयुर्वेदिक दवाओं के दाम 60 से 80 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं। इसके असर से कुछ दवाओं की कीमत दोगुनी भी हो गई है। "

डॉ. हरींद्रमोहन शुक्ला, प्रोफेसर, आयुर्वेदिक कॉलेज

दवाओं की कीमत (10 टेबलेट)

दवा छह माह पहले अब कीमत उपयोग

कुमार कल्याण रस 400 रु. 700 रु. बच्चों के

स्वास्थ्य काथ चिंतामणि 375 रु. 550 रु. अस्थमा

रसराज रस 500 रु. 800 रु. वात, लकवा

बसंत कुस्माकर रस 350 रु. 700 रु. मधुमेह

स्वर्ण सूत शेखर 300 रु. 520 रु. चर्म रोग, पित्त(दैनिक भास्कर,रायपुर,21.1.11)

आगे चलें...

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

आवश्यक दवाओं की होगी समीक्षा

दवाओं की समीक्षा वर्षों से न होने से यह पता नहीं चल पा रहा है कि कौन सी दवा आवश्यक श्रेणी में है और कौन सी जीवन रक्षक की श्रेणी में। अब केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय आवश्यक दवाओं की सूची की समीक्षा करने जा रहा है। यह समीक्षा विशेषज्ञों का पैनल करेगी।
दवाओं की श्रेणी तय करने के लिए केंद्र सरकार ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के तर्ज पर वर्ष १९९६ में नेशनल लिस्ट ऑफ इसेंशियल मेडिसन यानी एनएलईएम का गठन किया था। लगभग सात साल बाद २००३ में इस सूची की समीक्षा कर ७१ नई दवाओं को सूची में स्थान दिया गया। एक समय था जब इस सूची में ३४२ दवाओं को शामिल कर मूल्य नियंत्रण के तहत लाया गया था। धीरे धीरे यह सूची घटकर १४२ पर आ गई। अब हालात ऐसे हैं कि आवश्यक दवाओं की सूची में ७० से भी कम दवाइयां रह गई हैं। मंत्रालय के अधिकारी इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि सूची की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाने की योजना है। भारत के औषधि महानियंत्रक ने भी इस बाबत एक प्रस्ताव भेजा है। प्रस्ताव में रोग उपचार से जुड़े श्रेणी में ज्यादा आवश्यक दवाओं को शामिल किया जाए। जबकि फर्मा विभाग इस बात पर दबाव डाल रहा है कि इस सूची में ३५४ दवाओं को मूल्य नियंत्रण की श्रेणी में शामिल किए जाए। हालांकि, औषधि मूल्य नियंत्रक आदेश इस बात को परिभाषित नहीं कर रहा है कि आवश्यक और जीवन रक्षक दवाएं कौन कौन सी है। यदि एनएलईएम इन दवाओं को आवश्यक या जीवन रक्षक दवाओं की श्रेणी में लाता है तो १२ फीसदी से ज्यादा दवाइयां मूल्य नियंत्रण के अधीन आ जाएंगी। वर्तमान में २० फीसदी दवाइयों पर सरकार का नियंत्रण है(अमर उजाला,दिल्ली,20.1.11)।

आगे चलें...

सोमवार, 3 जनवरी 2011

भारत में स्टेम सेल प्रत्यारोपण के लिए विदेशी मरीज की भरमार

कई बीमारियों से पूरी तरह मुक्ति दिलाने वाले स्टेम सेल प्रत्यारोपण काफी सस्ता होने के कारण विदेशियों के लिए भारत आकर्षण का केंद्र बन रहा है। हालांकि मरीजों की मांग के अनुरूप सुविधा नहीं उपलब्ध होने के कारण मरीजों को काफी समय तक इंतजार भी करना पड़ता है।
बीमारियों के कारण क्षतिग्रस्त टिश्यू को हटाकर नए सेल को प्रत्यारोपण करने की विधि को स्टेम सेल प्रत्यारोपण कहा जाता है। इससे न सिर्फ कैंसर जैसी बीमारियों को ठीक किया जा सकता है बल्कि दुर्घटना के शिकार मरीजों का इलाज किया जाता है। यह सुविधा एम्स, टाटा मेमोरियल सेंटर, आर्मी अस्पताल, सीएमसी वेल्लोर समेत देश के 11 केंद्रों में उपलब्ध है।
एम्स के मेडिकल आंकोलॉजी विभाग के प्रो.ललित कुमार का कहना है कि विदेश में स्टेम सेल प्रत्यारोपण का खर्च एक करोड़ से भी ज्यादा आता है जबकि भारत के निजी अस्पतालों में दस से बारह लाख रुपये में ही प्रत्यारोपित हो जाता है। सरकारी अस्पतालों में तो मात्र तीन से छह लाख में हो जाता है। उनका कहना है कि कैंसर के इलाज में स्टेम सेल की सफलता दर 50 फीसदी है। वंशानुगत रोग बीटा थेलिसिमिया और एप्लास्टिक एनिमिया के इलाज में सफलता दर 70 से 80 फीसदी है। उनका कहना है कि भारत में प्रतिवर्ष 500 लोगों का ही स्टेम सेल प्रत्यारोपण हो पाता है। जबकि जरूरत इससे कई गुना ज्यादा मरीजों को है। प्रो.कुमार का कहना है कि देश में स्टेम सेल बैंक की स्थापना करना बेहद जरूरी है जिससे स्टेम सेल दान करने वालों का पंजीकरण हो सके(अमर उजाला,दिल्ली,2.1.11)।

आगे चलें...

रविवार, 5 दिसंबर 2010

यूपी के 27 ब्लड बैकों के लाइसेंस रद्द

पेशेवर रक्तदाताओं पर चलने वाले ब्लड बैकों के खिलाफ शुरू किये गये अभियान के तहत प्रदेश में चार ब्लड बैकों के लाइसेंस निरस्त कर दिये गये है, जबकि बारह को निलम्बित व ग्यारह को चेतावनी दी गयी है। लाइसेंस निरस्त किये जाने वाले ब्लड बैकों में लखनऊ की गोल मार्केट (महानगर) स्थित देवा ब्लड बैक भी शामिल है। चौक स्थित चरक ब्लड बैक का लाइसेंस निलम्बित कर दिया गया है। इसके अलावा 699 दवा व्यापारियों के भी लाइसेंस निरस्त कर दिये गये है। होम्योपैथिक दवा के निर्माण में श्ड्यूल एम-1 का पालन न करने वाली पंद्रह इकाइयों में दवा निर्माण पर रोक लगा दी गयी है। मिलावटखोरी के खिलाफ पूरे प्रदेश में चलाये गये अभियान में 275 मिलावटखोरों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करायी गयी, जबकि 280 को गिरफ्तार किया गया। खाद्य एवं औषधि प्रशासन द्वारा चलाये गये अभियान में देवा ब्लड बैक गोल मार्केट (महानगर), लखनऊ के साथ गोयल ब्लड बैक आगरा, श्रीराम ब्लड बैक तिवारी मार्केट जनकपुरी बरेली व क्लैराश्वान हॉस्पिटल ब्लड बैक बरेली का लाइसेंस निरस्त किया गया है। बारह ब्लड बैकों के लाइसेंस निलम्बित किये गये है, जिसमें लखनऊ में चौक स्थित चरक ब्लड बैक के साथ ही जनसुविधा ब्लड बैक संजय पैलेस आगरा, डाक्टर चतुव्रेदी सेंट्रल ब्लड बैक मुरादाबाद, गौरव डायग्नोस्टिक सेंटर एवं ब्लड बैक झांसी, गुप्ता ब्लड बैक मुरादाबाद, चंदन डायग्नोस्टिक सेंटर व ब्लड बैक फैजाबाद, बाधवा ब्लड बैक बुलंदशहर, साइर्ं ब्लड बैक किदवई नगर, कानपुर, जयीमत चैरिटेबल ब्लड बैक वाराणसी, मित्तल पैथालॉजी क्लीनिक एवं ब्लड बैक गाजियाबाद, केशव माधव ब्लड बैक व बरेली पैथालॉजी शामिल है। इसके अतिरिक्त 11 ब्लड बैकों को कार्य रोके जाने की चेतावनी दी गयी है। औषधि व खाद्य प्रशासन विभाग के प्रवक्ता के अनुसार नकली दवाओं के धर- पकड़ अभियान में राजधानी के चार हिन्दुस्तान लैबोरटीज, होमियोसाइंटिफिक, एनएंडएन होमियो लैबोरेटीज व सेंट्रल हैनीमेन फाम्रेसी के लाइसेंस निरस्त किये गये है। इसके अतिरिक्त रैमकोडिटरसिव बदायूं, शक्त केमिकल मेरठ, ओवेलिया फार्मास्युटिकल गाजियाबाद, जैन मैन्यूफैक्चरिंग कानपुर, हाईटेक रिरिजेज गोरखपुर, ओनिडा फार्मा गाजियाबाद, इलेक्ट्रोसोल फार्माकानपुर, यूपी फार्मा कानपुर, दार्जिलिंग इंडस्ट्रीज कानपुर, ओमेक्स हेल्थ केयर हापुड़ गाजियाबाद, यूनीवेट फार्मास्युटिकल नोएडा, बंकाग केमिकल नोएडा, शक्त केमिकल वर्क्‍स मेरठ, आइडियल केमिकल्स सहारनपुर, लायड लैबोरेटरीज गाजियाबाद, वैदिक कास्मेस्युटिकल्स नोएडा व हनीमैन प्योर ड्रग आजमगढ़ के लाइसेंस निरस्त किये गये है। इसी तरह दवा के निर्माण में लगीं नौ इकाइयों के लाइसेंस निलम्बित किये गये है। नौ औषधि निर्माणशालाओं में निर्मित दवाओं के निर्माण की अनुमति निरस्त की गयी है(राष्ट्रीय सहारा,लखनऊ,5.12.2010)।

आगे चलें...

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

यूपी के 5 करोड़ बच्चों को पिलाई जाएगी विटामिन-ए

अब कोई भी बच्चा रतौंधी व अंधता से पीडि़त नहीं होगा। वह मानसिक व शारीरिक रूप से भी स्वस्थ रहेगा। यूनीसेफ के साथ ही अब अंतर्राष्ट्रीय संस्था माइक्रोन्यूट्रिएंट एनेसेटिव भी बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए प्रदेश में काम करेगी। इसके लिए यूपी में 71 जिलों के 9 माह से 5 साल के 5.22 करोड़ बच्चों को विटामिन ए की दवा खिलाने का लक्ष्य तय किया गया है। बच्चों को रतौंधी, अंधता आदि बीमारियों के साथ कुपोषण से बचाने के लिए इस बार अंतरराष्ट्रीय संस्था माइक्रोन्यूट्रिएंट एनेसेटिव इंडिया को भी जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह संस्था यूनीसेफ के पाटर्नर के रूप में बाल स्वास्थ्य के लिए काम करेगी। संस्था ने परिवार कल्याण विभाग के सहयोग से प्रदेश के 71 जिलों में इस अभियान को प्रभावी बनाने के लिए विटामिन ए की दवा खिलाने का कार्यक्रम तय किया है। संस्था के मंडल समन्वयक अंकित मिश्रा के अनुसार दो माह के भीतर प्रदेश के 5 करोड़ 22 लाख बच्चों को विटामिन ए की दवा भेजने का लक्ष्य तय किया है। जिला मुख्य चिकित्साधिकारी डा. आरपी तिवारी का कहना है कि विटामिन ए की खुराक च्च्चों के लिए संजीवनी की तरह है(दैनिक जागरण,शाहजहांपुर,25.11.2010)।

आगे चलें...

बुधवार, 17 नवंबर 2010

उदयपुर में जुटेंगे 18 देशों के 38 आयुर्वेद वैज्ञानिक

सुखाड़िया विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के तत्वावधान में राज्य में पहली बार आयुर्वेद चिकित्सा पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन होगा। 25 से 27 नवंबर तक होने वाले इस आयोजन में 18 देशों के 38 आयुर्वेद वैज्ञानिकों के साथ भारत के विभिन्न राज्यों से सैंकड़ों गुणी (आयुर्वेद की परंपरागत पद्धतियों से उपचार करने वाले अनुभवी) भी हिस्सा लेंगे। वनस्पति विज्ञान के विभागाध्यक्ष एसएस कटेवा ने बताया कि इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारतीय आयुर्वेद के साथ चाइनीज चिकित्सा पद्धति पर भी चर्चा होगी(दैनिक भास्कर,उदयपुर,17.11.2010)।

आगे चलें...

सोमवार, 15 नवंबर 2010

घर ले जाएं अपने डीएनए की जानकारी

क्या आप डीएनए घर लेकर जाना चाहते हैं? चौंकिए मत जनाब! वैज्ञानिक यह पेशकश प्रगति मैदान में रविवार से शुरू दक्षिण एशिया के सबसे बड़े 30वें भारतीय अंतरराष्ट्री व्यापार मेले में कर रहे हैं। आप इस तकनीक का फायदा उठा सकते हैं। व्यापार मेले में सीएसआईआर के टेक्नोफेस्ट में इंस्टीटय़ूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंट्रीगेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) के स्टॉल में वैज्ञानिकों ने इस तकनीक का प्रदर्शन किया है। आईजीआईबी के पीएचडी छात्र ने बताया कि हम थूक के जरिए अपनी जांच कर रहे हैं। थूक में मेम्ब्रेन होता है और इसमें कोशिकाएं होती हैं। रसायन के प्रयोग से मेम्ब्रेन को फाड़ा जाता है जिससे यह बड़ा हो जाता है। इसके बाद इसकी कोशिकाओं से डीएनए निकाल लिया जाता है। मेंबरेन की कोशिकाओं से डीएनए निकाल लिया जाता है। आईजीआईबी दिल्ली की वरिष्ठ वैज्ञानिक मिताली मुखर्जी ने बताया कि डीएनए को अलग करना बिल्कुल आसान है। हम लोगों में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए पेशकश कर रहे हैं कि अपना डीएनए अपने साथ घर ले जाएं। पूरी प्रक्रिया में कुछ मिनट ही लगते हैं और युवा वैज्ञानिक डीएनए अलग कर एक छोटी शीशी में संरक्षित रूप में दे देते हैं। सीएसआईआर के महानिदेशक समीर के ब्रह्मचारी के मुताबिक यह डीएनए पूरी तरह शुद्ध नहीं है। ऐसे में इस डीएनए से किसी बड़े नजीते के बारे में पता करना कठिन है। यदि आप इसे डीएनए के शुद्ध रूप में तब्दील करना चाहते हैं तो इसे रासायनिक तौर पर अधिक सांद्र करना होगा। हमारा मकसद आम लोगों तक विज्ञान पहुंचाने का है और यह ट्रेड फेयर हमें लोगों तक पहुंचा रहा है। सीएसआईआर के स्टॉल पर लोगों की काफी भीड़ देखी गई। लोग इस मनोरम याद को घर लेकर जा रहे हैं। - समीर के ब्रह्मचारी, महानिदेशक सीएसआईआर कैसेः डीएनए टेस्ट लेने के लिए व्यक्ति का थूक लिया जाता है। कितनी देरः पूरी प्रक्रिया में मुश्किल पांच से सात मिनट का समय लगता है। कहां- सीएसआईआर का हॉल नंबर 11 कैसे पहुंचें- मैट्रो के एग्जिट से निकलने के बाद गेट नंबर सात पर आकर सीधा आकर बाएं मुड़ जाएं। आम जनता के लिए 19 नवंबर से खुलेगा। कब तकः 9:30 से 7: 30 तक (अनुराग मिश्र,हिंदुस्तान,15.11.2010) दैनिक जागरण की रिपोर्टः क्या आप अपना डीएनए यानी विशिष्ट वंशागत जानकारी अपने घर ले जाना चाहते हैं? वैज्ञानिक यह पेशकश दिल्ली के प्रगति मैदान में रविवार से शुरू हुए भारतीय अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (आइजीआइबी) के स्टाल में कर रहे हैं। आइजीआइबी की वरिष्ठ वैज्ञानिक मिताली मुखर्जी के अनुसार, डीएनए को अलग करना आसान है। हम लोगों में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए यह पेशकश कर रहे हैं कि अपना डीएनए अपने साथ घर ले जाएं। फिर आप अपने आनुवांशिक लक्षणों से ठीक तरह से वाकिफ हो सकते हैं। पूरी प्रक्रिया में केवल कुछ मिनट लगते हैं और वैज्ञानिक डीएनए अलग कर एक नन्हीं सी शीशी में संरक्षित रूप में उस शख्स को दे देते हैं, जिसका डीएनए है। रविवार को पूरे दिन आइजीआइबी का यह स्टाल मेले में आए लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहा। लोग अपने से जुड़ी बेहद खास जानकारी को घर ले जाने को इच्छुक दिखे। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने सीएसआइआर टेक्नोफेस्ट स्थित इस स्टाल का उद्घाटन किया। सीएसआइआर के महानिदेशक समीर ब्रह्मचारी ने कहा, हमारे लिए यह सीएसआइआर की प्रयोगशालाओं में शोध कार्यो में जुटे करीब 4,000 वैज्ञानिकों के किए काम को दिखाने का एक सुनहरा अवसर है। डिऑक्सीराइबो न्यूक्लिक एसिड यानी डीएनए। मानव सहित सभी प्राणियों में वंशानुगत लक्षणों का प्रतिनिधित्व करने वाला तत्व है। यह वह तत्व है जिसके जरिए प्राणी खास तरह के लक्षण एक से दूसरी पीढ़ी में ले जाता है।

आगे चलें...

बुधवार, 3 नवंबर 2010

सब्जियों में रसायनों के प्रयोग पर नोटिस जारी

सब्जियां उगाने व उनको सुरक्षित रखने के लिए खतरनाक रसायनों का प्रयोग करने के संबंध में एक समाचार पत्र में छपी रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार व दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा व न्यायमूर्ति मनमोहन की खंडपीठ ने मामले में केंद्र व दिल्ली सरकार से जबाव मांगते हुए एक दिसंबर की तारीख तय की है। खंडपीठ ने इस मामले में दो वकीलों को एमिक्स क्यूरी भी नियुक्त किया है। साथ ही उस गैर सरकारी संगठन को भी नोटिस भेजने के लिए कहा है जिसकी रिसर्च के आधार पर यह रिपोर्ट छापी गई थी। ताकि वह गैर सरकारी संगठन भी अदालत की सहायता कर सके। वही केंद्र सरकार व दिल्ली सरकार के वकीलों ने कहा है कि जरूरत हुई तो वह इस संबंध में एक बैठक भी आयोजित करेंगे, क्योंकि यह मामला स्वास्थ्य से जुड़ा है। खंडपीठ ने कहा कि समाचार पत्र में छपी रिपोर्ट को देखकर यह कहना मुश्किल है कि समाज को इस पर कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए। जिसमें एक रिसर्च के आधार पर यह बताया गया है कि सब्जियां व फल के उत्पादन व उन्हें सुरक्षित रखने की प्रक्रिया में इस्तेमाल रसायनों के कारण वह जहरीले बनते जा रहे हैं जो कई गंभीर बीमारियों को न्यौता दे रहे हैं। इसलिए मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार इसमें जवाब दायर करे। एक गैर-सरकारी संगठन कंज्यूमर वाइस की रिसर्च के आधार पर छपी रिपोर्ट में बताया गया है कि सब्जियों को उगाने व उनको सुरक्षित रखने के लिए जिन रसायनों का प्रयोग हो रहा है वह उनको स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बना रहे है। इन सब्जियों में खतरनाक रसायनों के प्रयोग से यह न्यूरोलोजिकल, किडनी खराब होने, त्वचा की बिमारियां, कैंसर सहित अन्य कई गंभीर बिमारियां हो सकती है। इन सब्जियों से उठाए गए सैंपल से पता चला है कि इनमें क्लॉरडेन, एंड्रीन, हेप्टाक्लोर, ईथाइल और पैराथियोन केमिकल का इस्तेमाल हो रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक जिन सब्जियों से सैंपल उठाने की बात कही गई है उनमें आलू, टमाटर, लौकी, टिंडा, ककड़ी, परवल, मटर, करेला, पालक, चुकंदर, कमल ककड़ी आदि शामिल हैं। इतना ही नहीं भारत में प्रयोग हो रही पांच कीटनाशक दवाइयों में से चार दवाइयां विश्व स्तर पर प्रतिबंधित है। (दैनिक जागरण,दिल्ली,3.11.2010 में प्रकाशित रिपोर्ट पर आधारित)।

आगे चलें...