डॉक्टरों को अब बकायदा क्लास रूम में यह पाठ पढ़ाया जाएगा कि वे बेवजह की दवाएं नहीं लिखें। मरीजों को उतनी ही दवा लेने की सलाह दी जाए जितनी वाकई जरूरी है। इसी प्रकार स्वास्थ्य जांच के मामले में भी डॉक्टरों को विवेक से काम लेने की ताकीद की जाएगी। एम्स सहित दुनिया भर में चल रहे फिजूल की दवाओं के उपयोग तथा बिना वजह डॉक्टरों द्वारा जांच लिखे जाने पर किए गए शोध के बाद भारत में इसे मेडिकल शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल करने की दिशा में पहल शुरू हो गई है।
रविवार को भारत सरकार के स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक डॉ. जगदीश प्रसाद ने कुछ ऐसे ही संकेत दिए हैं। उन्होंने सम्मेलन के दौरान कहा कि हम मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया से एविडेंस बेस्ट मेडिसीन(साक्ष्य आधारित स्वास्थ्य सुविधा) को मेडिकल कोर्स में शामिल करने की सिफारिश करेंगे। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एम्स द्वारा देश में पहली बार एविडेंस बेस्ट मेडिसीन (ईबीएम) पर चल रहे सेमिनार में डॉक्टर जगदीश प्रसाद ने कहा कि यह आज की जरूरत बन गई है। जिस प्रकार स्वास्थ्य सेवाओं में इसका बुरा असर हो रहा है वह मरीजों के हित में नहीं है। डॉक्टरों को इसे पाठ्यक्रम के जरिए सीखाकर और मरीजों को जागरूक कर ही रोका जा सकता है। एम्स के निदेशक डॉक्टर आर सी डेका ने कहा एम्स इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हर संभव मदद करेगा। आयोजन समिति के चेयरमैन तथा एम्स के न्यूरोलॉजी विभाग के डॉक्टर कामेश्वर प्रसाद ने कहा कि पाठ्यक्रम छात्रों को इस बात को बताने में सहयोग करेगा कि हमें सिर्फ उन्हीं दवाओं तथा जांच को मरीजों को लिखें, जिसका हमारे पास वैज्ञानिक साक्ष्य है।
अमेरिका में हृदय दर को नियंत्रित करने के लिए दी जानेवाली दवा इनकैनाइड और फ्लेसियानाइड के दुष्प्रभाव पर अध्ययन के बाद प्रतिबंधित कर दिया गया है। अगर डॉक्टर जानकारी के अभाव में मरीजों को यह दवा लिखता है तो डॉक्टर ही जिम्मेदार है। यह सेमिनार इसलिए शुरू किया गया है ताकि डॉक्टरों को समय-समय पर जारी इलाज के नए गाइडलाइंस पर ध्यान रखने के लिए प्रेरित करे और मरीजों के इलाज में उसकी का उपयोग करे। एम्स के मनोचिकित्सक डा. राजीव सागर ने कहा कि आज बड़ीह संख्या में डॉक्टर जो मन में आता है वही दवा लिख देते हैं और मरीजों को नुकसान हो रहा है। ऐसे कोर्स आए, डॉक्टरों को कारगर दवा का अध्ययन करे और वैज्ञानिक तरीके से साबित दवा ही लिखें(दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,दिल्ली,8.10.12)।
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