सांस उखड़ने का दौरा पड़ जाता है। जरा सा मौसम बदलता सांस फूलने लगती है। सांस रूठ जाने का एहसास होता है। कोई खास चीज खाने पीने पर सांस जैसे जवाब देती हुई महसूस होती है। दम घुटने लगता है। डॉक्टर इसे दमा के लक्षण बताते हैं। इन लक्षणों को प्रकट होने देने से रोका जा सकता है। ऐसा तभी मुमकिन है जब हमारी सांसों में सेहत घुली होगी।
दमा के दम के साथ जाने की बात भी सालों से सुनी जा रही है। आज की तारीख में चिकित्सा विज्ञान की तरक्की ने इसे झूठा साबित कर दिया है। दमा का बेहतर इलाज संभव हो गया है तो इससे बचाव को लेकर भी लोगों को जागरूक किए जाने पर जोर दिया जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा योग गुरु के रूप में नियुक्त आयुर्वेद के सीनियर फिजीशियन डॉ.एसपी गुप्ता कहते हैं, दमा ऐसी बीमारी है जिसमें श्वास नलियां सिकुड़ जाती हैं जिसकी वजह से मरीज को सांस अंदर लेने और बाहर छोड़ने में दिक्कत होती है। सांस की इस तकलीफ की वजह तमाम तरह की एलर्जी बनती है। किसी भी प्रकार की एलर्जी अपना असर नहीं दिखा सके इसके लिए शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता, जीवनशक्ति मजबूत होना जरूरी है। प्राणायाम हमारी जीवनशक्ति बढ़ाने के साथ ही सांसों की नलियों का आयाम बढ़ाता है। सीनियर फिजीशियन डॉ.राकेश कुमार के मुताबिक दमा का कारण चाहे कोई भी एलर्जी हो, लेकिन इसका कारगर इलाज उपलब्ध हो गया है। इनहेलर तकनीक से साइड इफेक्ट का खतरा लगातार कम होता जा रहा है। इनहेलर के इस्तेमाल से फेफड़ों की ताकत बढ़ती है। इनहेलर को पहले लोग आखिरी दवा मानते थे, लेकिन अब इसे पहली और सबसे कारगर दवा के रूप में स्वीकार किया जाने लगा है। यह दवा सीधे फेफड़ों में जाती है शरीर के बाकी हिस्सों पर इसका असर नहीं पड़ता। अस्थमा रोग विशेषज्ञ डॉ.अजीम इकबाल के मुताबिक इनहेलर दमा रोगियों के लिए वरदान बन रहा है। इसकी वजह से मरीजों में दमा के दौरे पड़ने की प्रवृत्ति कम हुई है। लोगों में इनहेलर का इस्तेमाल बढ़ने लगा है। इसकी वजह से दवा खाने की जरूरत कम हो रही है। ज्यादा गंभीर स्थिति में खाने की दवा असर करना बंद कर देती है। तब इनहेलर का ही सहारा लेना पड़ता है।
बदला हुआ लाइफ स्टाइल दमा को दावत दे रहा है। वो चाहे डॉगी पालने का शौक हो या फिर एक से बढ़कर सुगंधित परफ्यूम के इस्तेमाल का। डॉ.अजीम इकबाल के मुताबिक जिन लोगों को धूल से एलर्जी के चलते दमा होता है उनके लिए पालतू जानवरों जैसे कुत्ते के बाल भी परेशानी का कारण बनते हैं। परफ्यूम, रूम स्प्रे, कॉइल का धुआं, कोई भी क्रीम, लोशन आदि के इस्तेमाल से भी एलर्जी हो सकती है। दमा के मर्ज की कोई उम्र नहीं है, लेकिन पंद्रह से पैंतीस साल के युवाओं में इसकी प्रवृत्ति ज्यादा देखने को मिल रही है। इसकी वजह उन्हें धूल का एक्सपोजर ज्यादा होना हो सकती है।
दमा के जो मरीज अपने इलाज पर ज्यादा पैसा खर्च करने की स्थिति में नहीं हैं वह होम्योपैथी का सहारा ले सकते हैं। जिला होम्योपैथी चिकित्साधिकारी डॉ.बीपी सिंह के मुताबिक होम्योपैथी में दमा का कारगर इलाज हो सकता है। होम्योपैथी में हर मरीज को अलग अलग दवा देने की जरूरत महसूस की जाती है। क्योंकि, सभी के लक्षण एक जैसे नहीं होते। इस चिकित्सा पद्धति से इलाज करते समय मरीज की मानसिक स्थिति भी ध्यान में रखी जाती है। पचास साल से कम उम्र के मरीजों का होम्योपैथी में पूरी तरह से इलाज हो जाता है। इलाज के दौरान और सामान्य स्थिति में भी दमा के मरीजों को ठंडी और खट्टी चीजें खाने से बचना चाहिए। कोल्ड ड्रिंक, आइसक्रीम आदि का सेवन बिल्कुल नहीं करें तो अच्छा है। आयुर्वेद फिजीशियन डॉ.एसपी गुप्ता के मुताबिक, दमा के मरीजों को चावल, उड़द, दही से परहेज करना चाहिए(हिंदुस्तान संवाददाता,मुरादाबाद,6.5.14)।
दमा के संबंध में इस ब्लॉग पर पूर्व में प्रकाशित कुछ उपयोगी आलेखों का लिंक है-
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